रविवार, 31 जुलाई 2016

एक उलझी, अनसुनी लडाई का मध्यांतर


(L. S. Bisht  ) ईरोम चानू शर्मीला, जी हां यही नाम है मणिपुर की उस महिला का जिसे " आयरन लेडी " यानी लौह महिला भी कहा जाता है । पूर्वोत्तर मे लागू भारत सरकार के विवादास्पद कानून ' आफस्पा ' यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के खिलाफ उसकी लडाई की अपनी कहानी है । राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय मंचों मे चर्चित ईरोम का संघर्ष जनांदोलनों के इतिहास मे एक खास पहचान रखता है । यह इस मायने मे अलग रहा है कि इसकी लडाई सिर्फ और सिर्फ एक अकेली ईरोम की लडाई बन कर रह गई । इस मायने मे इसे एक अकेले सिपाही की जंग भी कहा जा सकता है । यह दीगर बात है कि सुर्खियों मे आने पर इसे सीमित जनसमर्थन भी मिलता रहा है । लेकिन पानी के बुलबुलों की तरह वह समर्थन जल्द ही कहां विलीन हो जाता था, पता नही । और फिर ईरोम झंडा पकडे अकेले ही दिखाई देती रहीं ।

अलग किस्म की इस यौध्दा ने 26 जुलाई, 2016 को यह घोषणा करके सभी को चौंका दिया है कि वह 9 अगस्त से अपना  16 साल से चला आ रहा अनशन खत्म करने जा रही हैं । यही नही, अनशन खत्म कर वह अपने प्रेमी डेसमंड  कौतिन्हों जिनसे वह ई मेल के माध्यम से संपर्क मे आयीं विवाह रचा कर मणिपुर की राजनीति मे सक्रिय रूप से हिस्सा लेकर अपनी इस मांग को एक नई दिशा देंगी

आफस्पा यानी आर्मड फोर्सेस स्पेशल एक्ट के खिलाफ 16 सालों से लडने वाली इस लौह महिला की इस घोषणा ने कई सवाल भी खडे किये हैं और इस लडाई को लेकर जनसमर्थन पर भी । अपने अनशन को खत्म करने के सवाल पर वह जब मीडिया को यह कहती हैं कि इस लडाई मे जनता की बेरूखी व सरकार के जिद्दीपन को लेकर वह बहुत मायूस हैं , तब कई और सवाल उठते हैं । आखिर ऐसा क्यों ? सरकार की उदासीनता तो समझ मे आती है लेकिन जनता का अपेक्षित सहयोग न मिलने की पीडा जरूर सोचने के लिए मजबूर करती है ।

इन सवालों के जवाब तलाशने के प्रयास से पहले थोडा पीछे देख लेना जरूरी है । दर-असल पूर्वोत्तर के राज्य आजादी के बाद से कई कारणों से ' समस्याग्र्स्त राज्य ' रहे हैं ।  उग्रवादी तत्वों से निपटने मे जब सेना को परेशानी महसूस होने लगी तो यह महसूस किया गया कि सेना को कुछ अधिक अधिकार देने से ही इनसे निपटा जा सकता है । ऐसे मे सरकार ने संसद मे  सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून पारित कर इसे उत्तर पूर्व के समस्याग्रस्त राज्यों मे लागू कर दिया । इस कानून से सेना को कुछ अतिरिक्त छूट मिल जाने से वह देशद्रोही व उग्रवादी तत्वों से प्रभावी तरीके से निपटने मे सफल हुई । लेकिन यह कानून बहुत जल्द विवादों के घेरे मे भी आ गया ।

2 नवम्बर 2000 को मणीपुर कस्बे के एक बस स्टाप मे असम राइफल के जवानों ने जिस तरह 10 लोगों को गोलियों से भून कर उनकी हत्या की थी, वह एक अभूतपूर्व घटना बनी । पूरे मणिपुर मे इस कानून के खिलाफ जनाक्रोश भडक गया । लोगों का मानना था कि इस नरसंहार मे सेना ने मासूम लोगों को गोलियों का निशाना बनाया जिसमे बच्चे , बूढे सभी थे । ईरोम जो उस समय सिर्फ 28 वर्ष की थीं इस घटना से इतना आहत हुईं कि इसके खिलाफ उन्होने भूख हडताल शुरू कर दी । लेकिन जैसा होता है सरकार ने इनकी मांग को उचित नही माना । ईरोम भी अपनी मांग से पीछे नही हटीं । इस बीच मानवाधिकार समर्थ्कों की भागीदारी ने  इसे अंतरराष/ट्रीय  चर्चा का विषय बना दिया । लेकिन सरकार ने कोई नरमी नही बरती और  ईरोम का यह अनशन भी लगातार चलता रहा । अब इस अनशन को खत्म करने की घोषणा ने कई सवाल खडे किये हैं ।

यहां गौरतलब यह है कि कभी भी ईरोम की इस मांग को व्यापक समर्थन नही मिल सका जैसा कि दूसरे जनांदोलनों के साथ होता है । इसका एक बडा कारण यह रहा है कि देश मे एक बडा वर्ग यह मानता है कि आज के हालातों मे सेना को इस विशेष अधिकार की सख्त जरूरत है । इसके अभाव मे सेना की धार कमजोर पडती है और अलगाववादी व देश विरोधी तत्व मजबूत हो जाते हैं । जम्मू कश्मीर मे भी ' आफस्पा ' लागू है और वहां भी इसका विरोध जब तब किया जाता है । लेकिन दूसरी तरफ लोग वहां अलगाववादियों के खून खराबे से भी वाकिफ हैं । यही कारण है कि सरकार, सेना और जनता का बहुत बडा वर्ग इसके समर्थन मे दिखाई देता है ।

इसके दुरूपयोग की खबरें भी चर्चा का विषय बनी हैं । कुछ मामलों मे फर्जी मुठभेडों के मामले सही भी पाये गये हैं । लेकिन यह अपवाद ही रहे हैं । आज के हालातों मे कश्मीर घाटी मे सेना को जिस चुनौती का सामना करना पड रहा है उसे देखते हुए लोग इस कानून के पक्ष मे खडे दिखाई दे रहे हैं । उग्रवाद की कुछ ऐसी ही कहानी पूर्वोत्तर राज्यों की भी है । लिहाजा इस कानून को सेना के लिए वहां जरूरी समझा जा रहा है ।

ईरोम के अनशन खत्म करने के पीछे सबसे बडा कारण व्यापक जनसमर्थन न मिलना ही रहा है । बहरहाल वह अपनी लडाई राजनीति के मंच से लडना चाहती हैं और इसके लिए मणिपुर चुनाव सबसे अच्छा मंच है । इसलिए यह कहना कि उन्होने अपनी लडाई खत्म कर दी है , यह गलत होगा । बल्कि यह लडाई के बीच एक मध्यांतर है । देखना है कि राजनीति मे जब वह स्वयं जनता के बीच होगीं  इस मुद्दे पर कितना समर्थन जुटा पाती हैं । 

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

बरसात मेें घायल होता हिमालय क्षेत्र

मौसम की पहली बरसात ने ही केदारनाथ व बदरीनाथ पहुंचने के तमाम रास्ते बंद कर दिये | जगह जगह पहाड़ की चट्टाने टूट कर गिरने लगीं | ऐसा पहली बार नहीं है | बरसात के मौसम मे इसी तरह साल-दर-साल घायल होता हिमालय क्षेत्र आज हमारी उपलब्धियों के तमाम दावों को झुठलाने लगा है | साथ ही विकास नीतियों की खामियों को भी उजागर कर रहा है | वैसे तो पहाड़ की टूट फ़ूट प्रकृति का चक्र है लेकिन जिस तरह से इधर हाल के वर्षों से पहाड़ मे भू-स्खलन की घटनाएं बढी हैं, यह हमारे लिए खतरे का संकेत है | विडंबना तो यह है कि दूसरी तरफ़ हम पर्यावरण की रक्षा की बात करते नही थक रहे |
     अब तो स्थिति यह है कि थोडी सी बरसात मे ही पहाड़ दरकने लगे हैं | आवागमन का ठप होना तो बरसात के मौसम मे रोज की बात है | दरकते हुए पहाड़ इस बात का संकेत हैं कि पर्यावरणीय विनाश की सीमा अब खतरे के निशान को भी पार करने लगी है | इससे पर्वतीय विकास की मूलभूत सरकारी नीतियों तथा नजरिये पर एक प्रशनचिन्ह लग गया है | विकास की यह उल्टी चाल इस तथ्य को भी उजागर कर रही है कि आज पर्वतीय विकास के लिए धन नही वरन नियोजन की अधिक आवश्यक्ता है | साथ ही यह चेतावनी भी कि सिर्फ़ एक माडल के आधार पर पर्वतीय विकास की योजनाएं तैयार नही की जा सकती हैं | इसके लिए जरूरी है इस अंचल की भौगोलिक परिस्थितियों , तराइ-भावर, मध्य हिमालय व उच्च हिमालय श्रेणियों मे विभाजित कर योजनाएं बनाई जानी चाहिए |
     दर-असल आज घायल होते हिमालय क्षेत्र की इस पीडा के पीछे सरकारी गलत नीतियों तथा पर्यावरण के प्रति हमारी घोर उपेक्षा की एक लंबी कहानी है | कभी यह क्षेत्र अपनी वन सपंदा के लिए जाना जाता था |  लेकिन आज स्थिति यह है कि दूर दूर तक वन उजड चुके हैं | यहां तक कि गांवों मे चारे ईधन तक का संकट उपस्थित हो गया है | खनिज दोहन के लोभ ने भी पहाड़ की छाती पर गहरे घाव लगाए हैं | डायनामाइट विस्फ़ोट से कच्चे पडे पहाडों से अब मिट्टी निकल निकल कर बहने लगी है | और परिणामस्वरूप भू-स्खलन व भूक्ष्ररण की गति उत्तरोत्तर तेज हो रही है |
     विनाश की यह प्रकिया आज भी जल, जानवर और जडी बूटी की लूट, सडक और बांधों का क्रूरतापूर्ण निर्माण, निरन्तर हो रहे असंतुलित खनन आदि के रूप मे जारी है | यह विनाश जिस बिंदु पर पहुंचा है उसी का परिणाम है भू-स्खलन से टूटता पहाड़ और थोडी सी बरसात मे पहाड़ी नदी-नालों का ताडंव |
     दर-असल पहाड़ के शोषण की परम्परा एक शताब्दी पूर्व की औपनिवेशक शासकों की देन रही है | खास कर ईस्ट इंडिया कंपनी के काल खंड के दस्तावेजों को देखने से पता चलता है कि इनकी नजर यहां के प्राकृतिक संसाधनों पर थी | फ़्रांसिस ह्वाइट ( 1837 ) के यात्रा विवरणों मे मसूरी की पहाडियों मे चूना खदाने होने का उल्लेख मिलता है | लेकिन काफ़ी समय तक इन्हे कोई नुकसान नही हुआ | य्हां तक की 1883 तक इनसे कोई छेड़छाड़ नही की गई |
     लेकिन इसके बाद वनों के शोषण का काला अध्याय शुरू हुआ | वनों का अंधाधुंध दोहन कर रेलवे स्लीपर बनाये जाने लगे | व्यापारिक द्र्ष्टिकोण से ही चीड़ के वनों का विस्तार किया गया | इससे लीसा निकालने की प्रकिया भी तभी शुरू हुई | एक तरफ़ व्यापारिक उद्देश्यों के लिए वनों का निर्मम दोहन हुआ दूसरी तरफ़ कृषि योग्य भूमि के विस्तार के लिए भी वनों को साफ़ किया जाने लगा परिणाम्वरूप 1930 के आसपास से हिमालय क्षेत्र मे भू-स्खलन और बाढ की घटनाएं शुरू हो गईं |
     1940 के बाद खनिज खनन का कार्य शुरू हुआ | खुलेआम डायनामाइटों का प्रयोग शुरू हुआ | खनन कार्य के फ़लस्वरूप भू-स्खलन की गति और तेज हो गई | यह सब आजादी के पूर्व की बात है परन्तु हिमालय क्षेत्र का दुर्भाग्य यह रहा कि स्वतंत्रता के बाद भी उसके प्रति शासकों का द्र्ष्टिकोण नही बदला | हमारे नीति निर्माता ऐसी विकास योजनाएं बनाने मे असफ़ल रहे जिनसे पर्यावरण के साथ पहाड़ की अर्थव्यवस्था मे भी सुधार होता |
     60 के दशक से विकास के नाम पर सड्कों का निर्माण कार्य शुरू हुआ | इसका परिणाम यह निकला कि ठेकेदारों ने पहाड़ के जंगलों तथा खेतों के साथ खूब मनमानी की | रही सही कसर सरकारी बिजली परियोजनाओं ने पूरी कर दी | टिहरी जैसा विशालकाय बांध बनाना वह भी हिमालय क्षेत्र में, हमारी गलत नीतियों का सबसे अच्छा उदाहरण है |
     बहरहाल इन तमाम गलतियों का परिणाम आज सामने है | परन्तु इससे बडी गलती यह रही कि समय समय पर समितियों की चेतावनियों को बार बार नजर-अंदाज किया जाता रहा जो आज भी जारी है | इस हिमालय क्षेत्र के भू-स्खलन के कारणों और पर्यावरण के असंतुलन पर न जाने कितने  अध्ययन  किए गये और सिफ़ारिशें सरकार को दी गईं लेकिन सभी अलमारियों मे धूल खाती रहीं | उन्हें कभी गंभीरता से लिया ही नही गया | बद्रीनाथ धाम के बिगडते पर्यावरण पर दी गई चेतावनी, नैनीताल मे पहाड धसकने की डा नौटियाल की शंका को भी नजर-अंदाज कर दिया गया |
     दर-असल हिमालय की पहाड़ियां कच्ची और नई हैं और इसलिए संवेदनशील भी | इनके साथ थोड़ी सी लापरवाही भी घातक सिध्द हो सकती है | इधर कुछ समय से उत्तराखंड मे टूरिज्म के विकास को गति मिली है | सड्कों का जाल बिछा है और पहाडियों पर बढते वाहनों का दवाब निरंतर बढ रहा है | इससे भी जरा सी बरसात भू-स्खलन को न्योता देने लगी है | आज यहां पांच सितारा पर्यटन की अवधारणा के तहत तमाम होटल पूरी सज धज के साथ सडक किनारे स्वागत के लिए खडे हैं | इनसे इन पहाडियों पर दवाब लगातार बढता जा रहा है | गाड़ियों का आवागमन पिछ्ले वर्षों  की तुलना मे कई गुना बढ गया है | लेकिन इन सब बातों से यहां किसी को कोई लेना देना नही |
     आज जरूरत इस बात की है कि पहाड़ की योजनाएं यहां के भौगोलिक रचना के हिसाब से संतुलित व सुनियोजित हों | आर्थिक विकास हेतु उठाये जा रहे किसी भी कदम से पूर्व पर्यावरणीय पहलू पर भी उचित ध्यान दिया जाए | अन्यथा  इस तरह तो एक दिन पहाड का अस्तित्व ही खतरे मे पड जाऐगा |
    
एल.एस.बिष्ट,

11/508, इंदिरा नगर, लखनऊ-16  

शुक्रवार, 20 मई 2016

मानवीय संवेदनाओं को डसती राजनीति

इसमे संदेह नही कि मूल्यों व आदर्शों से विहीन मौजूदा दौर की राजनीति को हम कोसने मे कहीं पीछे नही । लेकिन इस नकारात्मक्ता के बाबजूद इसी राजनीति ने कब हमे अपने मोहपाश मे बांध लिया, हम समझ भी न सके ।
यही कारण है कि हमारी राजनीतिक खबरों मे जितनी दिलचस्पी है उसकी आधी भी सामाजिक जीवन से जुडी खबरों मे नही । दर-असल आज की उपभोक्ता संस्कृति व हमारी आत्मकेन्द्रित जीवन शैली  हमें मानवीय संवेदनाओं से कहीं दूर ले गई है । हमें  या तो सरकार, शासन व चुनाव की खबरें रास आती हैं या फिर बाजार मे आने वाले नित नये उपभोक्ता उत्पादों की । कहां क्या सस्ता बिक रहा है, यह हमारी सोच की प्राथमिकताओं मे है । सच तो यह है कि हमारी चिंताओं , सरोकारों और सोच का दायरा सिमट कर रह गया है ।
शैक्षिक डिग्रियों  की नौटंकी से लेकर दिल्ली  मे सत्ता की कलाबाजियों तक मे तो हमारी पैनी नजर है लेकिन एक अदद नौकरी के लिए हो रही गला काट स्पर्धा के बीच युवाओं दवारा आत्महत्या की खबरें हमे विचलित नही कर रहीं ।

     आज अगर हम अपने आसपास हो रही घटनाओं से मुंह न मोडें तो यह बात पूरी तरह से साफ हो जाती है कि विकास व उन्नति की तेज धारा के साथ बहते हुए हम कहीं न कहीं मानवीय संवेदनाओं से कटते जा रहे हैं । यही नही, विकास की सीढियां चढते समाज का ताना-बाना भी कुछ इस तरह से उलझने लगा है जिसमें जिंदगी ही बोझ लगने लगती है । आज किसी भी अखबार मे राजनीतिक खबरों के बीच ऐसा बहुत कुछ भी है जिस पर सोचा जाना चाहिए लेकिन यह खबरें बिना किसी का ध्यान अपनी ओर खींचे चुपचाप बासी हो जाती हैं और हम आसानी से भूल जाते हैं कि ऐसा कुछ भी हमारे आस-पास घटित हुआ था ।
शायद ही कोई ऐसा दिन हो कि अखबार मे किसी आत्महत्या की खबर न हो | आये दिन किसी भी शहर के अखबार मे आठ-दस ऐसी खबरें होना अब आम बात हो गई है | बल्कि हमे कुछ नया तब लगता है जब किसी दिन ऐसी कोई खबर पढने को न मिले | कभी कोई छात्र नौकरी न मिल पाने के कारण फ़ांसी से लटक जाता है तो कभी कोई युवती अपने असफ़ल प्रेम के कारण अपने हाथों की नस काट लेती है | कहीं कोई कर्ज मे डूब कर किसी अपार्टमेंट से नीचे कूद पडता है तो कोई रेल की पटरियों के बीच लेट कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर देता है | गहरे अवसाद मे डूबे और फ़िर मौत को गले लगाते ऐसे लोगों की संख्या साल-दर-साल बढती जा रही है |

देश मे इस समय आत्मह्त्या की दर प्रति एक लाख मे 11.2 है | आत्महत्या के कारणों को जानने के लिए अब तक जो शोध हुए हैं, उनसे प्रमुख रूप से एक बात उभर कर सामने आई है कि मनुष्य भीषण मानसिक विषाद के दौर मे ऐसा करता है | इसमे संदेह नही कि भारतीय समाज मे मानसिक विषाद मे लगातार बढोत्तरी हो रही है | दर-असल जिस तरह से हमारा सामाजिक ताना बाना उपभोक्तावाद के चलते छिन्न-भिन्न हो रहा है, इससे चिंताएं और कुंठाएं बढी हैं | जो अंतत: दिमाग को अपना शिकार बना रही हैं |
बडे शहरों मे अकेले पडते बुजुर्गों की हत्याएं भी  हमे भावुक नही कर पा रहीं और न ही जिंदगी की परेशानियों से अवसादग्रस्त लोगों की असमय मौतों के बढते आंकडों से हमे कोई लेना देना  है । यानी जिंदगी जिन ताने बानों पर चलती है उनका निरंतर कमजोर पडते जाना भी हमे कहीं से कचोट नही रहा ।
क्या वाकई मे हम एक ऐसे दौर मे पहुंच गये हैं जहां संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों पर राजनीति हावी होती जा रही है । कहीं हम जाने अनजाने एक निष्ठुर समाज मे तो तब्दील नही हो रहे ? वरना और क्या कारण हो सकता है कि भूख और प्यास से हो रही मौतों  व किसानों की जानलेवा त्रासदी के बीच हमे राजनीतिक खबरों की चटनी ही आकर्षित कर रही है ।
इसे बदले जमाने का एक नया चेहरा मानें या फिर आत्मकेन्द्रित हो रहे समाज का एक रोग, लेकिन कुल मिला कर तमाम उपलब्धियों के ढोल नगाडों के बीच जिंदगी तो दांव पर लगी  ही है । चाहे वह शहर की हो या गांव-कस्बे की या फिर किसी किसान की हो या लातूर, बुंदेलखंड के किसी ग्रामीण की या फिर कोटा के किसी युवा की । लेकिन मौजूदा दौर की दुखद त्रासदी यही है कि आज हमारी सोच व मिजाज मे राजनीति सामाजिक सरोकारों से ऊपर है ।
और हम अपने आसपास की दुनिया के दुखों से उदासीन होते जा रहे हैं । यह मिजाज  कब बदलेगा, पता नही ।
 

बुधवार, 4 मई 2016

घोटालों और भ्रष्टाचार का गहराता दलदल

21 दिसंबर 1963 को संसद मे भ्र्ष्टाचार पर हुई बहस पर डा. राममनोहर लोहिया ने जो भाषण दिया था वह आज भी प्रासंगिक है । उन्होने कहा था - " सिंहासन और व्यापार के बीच सबंध भारत मे जितना दूषित, भ्र्ष्ट व बैइमान हो गया है उतना दुनिया के इतिहास मे कहीं नही हुआ है । " साठ के दशक मे कहे गये उनके यह शब्द आज भी उतने ही अर्थपूर्ण हैं जितना उस समय रहे होंगे ।

गौर से देखें तो देश मे घोटालों का सिलसिला रूकने का नाम नही ले रहा । किसी एक घोटाले पर मचाए जाने वाला शोर खत्म नही होता कि दूसरा सामने आ जाता है । अब नये घोटाले के रूप मे वीवीआइपी हस्तियों के इस्तेमाल के लिए उपयोग मे लाये जाने वाले हेलीकाफ्टरों की खरीद पर दी गई रिश्वत का मामला गर्म है। चूंकि यह समझौता यू.पी.ए सरकार के कार्यकाल से जुडा है इसलिए भाजपा सरकार कांग्रेस को घेरने के इस सुअवसर को छोडना नही चाहती । चूंकि इटली के एक अदालती फैसले मे कुछ भारतीय नेताओं के नामों का भी उल्लेख है इसलिए यह मामला राजनीतिक तौर पर संवेदनशील बन गया है । विशेष कर कांग्रेस के लिए यह गले की घंटी बन गया है । लेकिन देखा जाए तो यह घोटालों की लंबी श्रखला की एक कडी मात्र है ।

आजादी के बाद नेहरू युग से ही इन घोटालों की शुरूआत हो गई थी । साल-दर-साल इनकी संख्या और घोटालों की राशि मे बढोतरी होती गई । वैसे तो समय समय पर देश मे सरकारें भी बदलती गईं लेकिन सत्ता से जुडे विचौलियों और भ्र्ष्टाचारियों का खेल बदस्तूर जारी रहा । अब तो हालात यह हैं कि मानो देश की पूरी अर्थव्यवस्था को ही गिरवी रखे जाने की तैयारी हो ।

बहरहाल थोडा पीछे देखें तो आजाद भारत मे इसकी शुरूआत नेहरू युग के  जीप घोटाले(1948) से मानी जा सकती है जो लगभग 80 लाख रूपये का था । पाकिस्तानी हमले के बाद भारतीय सेना के लिए जीपों की खरीद मे यह घोटाला किया गया । वी.के.कृष्णामेनन जो ब्रिटेन मे भारत के उच्चायुक्त थे उन्होने इस सौदे मे अहम जिम्मेदारी निभाई थी । आरोप था कि बिना किसी औपचारिक्ता पूरी किये बिना भारी धनराशी का भुगतान कर दिया गया था । यही नही जो 155 जीपें मिलीं वह खराब हालत मे थीं जबकि सौदा 2000 जीपों का था । लेकिन अंतत: गठित जांच कमेटी को ही सरकार ने रद्द ने कर दिया ।और मामला हमेशा के लिए दफन हो गया ।

1958 मे फिरोजगांधी ने एक घोटाले का पर्दाफाश किया था जिसमे राजनीति व पूंजीपतियों के बीच के रिश्ते उजागर हुए । इसे मूंदडा कांड के नाम से जाना जाता है । इसमे उदयोग्पति हरिदास मूंदडा ने कुछ कंपनियों को फायदा पंहुचाने के लिए एल.आई.सी से ज्यादा कीमत मे  शेयर् खरीदवाये । बाद मे जांच मे तत्कालीन वित्तमंत्री टी.टी.कृष्णामचारी, वित्त सचिव एच.एम.पटेल, एल.आई.सी. के अध्यक्ष दोषी पाये गये ।

1960 मे नेहरू जी पर भी उंगली उठी । उन्होने उदयोगपति धर्मतेजा को एक शिपिंग कंपनी खोलने के लिए 20 करोड रूपये का लोन दिलाया । बाद मे धर्मतेजा उस पैसे के साथ ही विदेश भाग गये । काफी प्रयासों के बाद उसे पकडा गया और 6 साल की कैद हुई ।

इंदिरा गांधी के शासन काल मे 1971 मे एक विचित्र कांड हुआ जो आज भी रहस्य बना हुआ है । किसी ने इंदिरा जी की आवाज मे स्टेट बैंक संसद मार्ग शाखा के मुख्य खचांजी को फोन पर कोड बताने वाले को तत्काल 60 लाख रूपये देने को कहा । बाद मे इस धोखाधडी के लिए कैप्टन रूस्तम सोहराब नागरवाला को गिरफ्तार किया गया था । लेकिन मार्च 1972 को रहस्यमयी परिस्थितियों मे उसकी मौत हो गई । 6 माह बाद जांच करने वाले पुलिस अधिकारी की भी एक सडक दुर्घटना मे मौत हो गई । आज तक यह कांड एक रहस्य बना हुआ है ।

राजनीति के दुनिया मे हलचल मचा देने वाला बोफोर्स तोप घोटाले को भला कैसे भुला जा सकता है । 1987 के इस बहुचर्चित घोटाले मे पता चला था कि बोफोर्स कंपनी ने 1437 करोड रूपये का सौदा हासिल करने के लिए भारत के राजनेताओं व सेना के अधिकारियो6 को रिश्वत दी थी । राजीव सरकार ने मार्च 1986 मे स्वीडन की ए.बी. बोफोर्स से 400 होबित्जर तोपें खरीदने का करार किया था । इस मामले ने देश की राजनीति को ही हिला कर रख दिया । इस मुद्दे के कारण ही 1989 के चुनाव मे राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार सत्ता मे आई और वी.पी सिंह प्रधानमंत्री बने । 1990 को इसकी जांच सी.बी.आई को सौंप दी गई । इसकी जांच मे तमाम उतार चढाव आये । अंतत: 1999 मे विन चड्डा , क्वात्रोची, पूर्व रक्षा सचिव एस.के.भटनागर , बोफोर्स कंपनी के प्रमुख मार्टिन अर्बडो व राजीव गांधी को आरोपी बनाया गया । बाद मे सन 2000 मे सप्लीमेंट्री चार्जशीट मे श्रीचंद हिंदुजा, गोपीचंद हिंदुजा आदि को भी आरोपी बनाया गया । लेकिन 2002 मे मुख्य आरोपियों के निधन के साथ ही सारा मामला ठंडा पड गया ।

ऐसे ही तमाम घोटालों का लंबा इतिहास है । गौरतलब यह है कि समय समय पर सत्ता बदलती रहीं लेकिन घोटाले और भ्र्ष्टाचार बदस्तूर जारी रहे । इतना ही नही कई छोटे घाटाले तो कभी सामने आ ही न सके । उदारीकरण के दौर की शुरूआत मे शेयर दलाल हर्षद मेहता ने भी बैकों और निवेशिकों को करोडों रूपयों की चपत लगाई । इसी तरह बिहार चारा घोटाला भी राजनीति मे काफी चर्चित रहा । लालू यादव इस घोटाले के मुख्य नायक रहे । रक्षा सौदों मे रिश्वत लेने से जुडा एक मामला 2001 मे सामने आया । इसमे एक स्टिंग आपरेशन मे भाजपा के बंगारू लक्ष्मण को रिश्वत लेते देखा गया था । तत्तकालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीज व नौ सेना के पूर्व एडमिरल सुशील कुमार का भी नाम सामने आया था । इसके बाद के वर्षों मे स्टम्प पेपर घोटाला व सत्यम घोटाला जिसे कारपोरेट जगत का सबसे बडा घोटाला माना जाता है सामने आये ।

घोटालों की लंबी श्रंखला मे राष्ट्रमंडल खेल घोटाला ( 2010 ) 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला , और बहुचर्चित कोल ब्लाक आबटंन घोटाला भी चर्चा मे रहे हैं लेकिन भ्र्ष्टाचार के इस दलदल मे कुल मिला कर ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ हुई है ।

आज अगर थोडा गौर से देखें तो पता चलता है कि ऐसा कोई क्षेत्र नही जो भ्र्ष्टाचार से मुक्त हो । सरकारी खरीद से लेकर, रक्षा सौदे, मीडिया, शेयर बाजार, कारपोरेट जगत सभी मे भ्र्ष्टाचार का दीमक लग चुका है । राजनेताओं और नौकरशाही के गठजोड से भ्र्ष्टाचार के नये नये मामले रोज सामने आ रहे हैं । लेकिन इन सब के बीच हैरत की बात तो यह है कि अब भ्र्ष्टाचार के इन मामलों को लेकर कोई गंभीर चिंता कहीं नही दिखाई देती । बदले हुए दौर मे मीडिया के भी मायंने बदल चुके हैं । इसलिए यहां भी इन घोटालों को लेकर एक बंटा हुआ शोर ही सुनाई देता है । दूसरी तरफ जनता ने तो मानो भ्र्ष्टाचार को लेकर खामोशी की चादर ही ओढ ली है । बहुत संभव है कि वह निराश हो चुकी है और उसे किसी भी प्रकार की कोई आशा दिखाई नही देती ।

बहरहाल कोई संदेह नही कि अंधेरा गहराता जा रहा है और इसका कोई कारगर हल निकलता भी नही दिखाई दे रहा । लेकिन इतना अवश्य है कि लोकतंत्र मे जनता का आक्रोश व विरोध सबकुछ बदलने की सामर्थ्य रखता है । इस गुस्से को ही हथियार बनाना होगा और तभी राजनेताओं, नौकरशाहों व पूंजीपतियों के बीच बने अपवित्र रिश्तों पर प्रभावी चोट की जा सकेगी । यह नही भूलना चाहिए कि लोकतंत्र मे वह व्यवस्था कायम नही रह सकती जिसे जनता न चाहे।

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

फीचर / अपने घरौदों को भूलने लगा है पहाड


यहां महक वफाओं की, मोहब्बतों का रंग है,
ये घर तुम्हारा ख्वाब है, ये घर मेरी उमंग है
ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर...........


हिमालय की घाटियों मे पहाड की ढालों पर मिट्टी, पत्थर और लकडी से बने पारंपरिक मकान कभी यहां की ग्रामीण जिंदगी का हिस्सा रहे हैं । इनसे पीढीयों का जो एक गहरा भावनात्मक रिश्ता रहा है अब वह बिखरने लगा है । हिमाचल के गांव हों या फिर उत्तराखंड के, अब इन कलात्मक मकानों के प्रति मोह कम होता जा रहा है । इनकी जगह ले रहे हैं सीमेंट, कंकरीट , ईंट और सरिया से बने मकान । मैदानी शहरों की भवन निर्माण शैली का प्रभाव अब पहाड के इन गांवों मे साफ दिखाई देने लगा है ।
एक समय था जब हिमालय के इन गांबों मे पत्थरों को कांट छांट कर, एक के ऊपर एक रख कर चिना जाता था । सीमेंट के प्रयोग के बिना ही पूरा मकान बन कर खडा हो जाता और इतना मजबूत कि बरसों बरस यूं ही सीना ताने खडा रहता । यहां के स्थानीय कारीगर इस भवन निर्माण शैली मे पारंगत हुआ करते थे । पहाड के वाशिदों की कई पीढीयां इन मकानों मे रह कर पली बढी हैं ।

लेकिन बढती समृध्दि और बदलती जीवन शैली ने बहुत कुछ बदल दिया है । अब पहाड के गांवों मे भी सीमेंट और ईंट से बने मकानों की संख्या बढती जा रही है । इन्हें यहां समृध्दि का प्रतीक भी माना जाने लगा है । लेकिन एक पीढी का जो लगाव इन कलात्मक पारंपरिक पहाडी मकानों से रहा है वह इन सीमेंट कंकरीट के मकानों से कहां ? अब दिखाई नही देतीं पत्थर की ढलानदार छ्तों पर सूखती हुई मक्की या दालों के फलियां । चूल्हे से उठता धुंआ जो छ्तों, दरवाजों पर लगी लकडी को मजबूती दिया करता था और छ्ज्जे की वह गुनगुनी धूप ।


चीड और देवदार के पेडों के बीच खडे यह ईंट सीमेंट से बने मकान पहाड मे उतने ही अजनबी लगते हैं जितना एक देश के वाशिंदे गैर मुल्क में । लेकिन शायद यही है जिंदगी जो बदल रही है हिमालय की घाटियों, ढालों और वादियों मे । 

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

लापरवाही के हादसे

अतीत मे हुए दर्दनाक हाद्सों से सबक न सीखने के कारण केरल के पुत्तिंगल देवी मंदिर के हादसे मे सौ से अधिक लोगों को अकाल मृत्यु का ग्रास बनना पडा । इस दर्दनाक घटना मे वास्तव मे कितने श्र्ध्दालु काल कवलित ह्ए इसकी सही संख्या का पता लगना अभी शेष है । दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि इस मंदिर मे आतिशबाजी की परंपरा रही है । हर वर्ष इस अवसर पर आतिशबाजी की जाती रही है लेकिन लगता है कि मानो स्थानीय प्रशासन को किसी दुर्घटना का ही इंतजार था और अब जब यह दुखद हादसा हो गया तो तमाम नियमों-कानूनों और कारणों की पडताल की बात की जाने लगी है । सच तो यह है कि इस घटना से बचा जा सकता था यदि ऐसे आयोजनों के लिए बनाये गये नियम कानूनों का पालन सुनिश्चित किया जाता । लेकिन ऐसा हुआ नही और आयोजकों की लापरवाही का खामियाजा श्र्ध्दालुओं को अपनी जान देकर चुकाना पडा । आश्चर्य तो इस बात पर है कि इतने बडे स्तर पर आतिशबाजी करने के लिए किसी प्रकार की अनुमति लेना भी आयोजकों ने जरूरी नही समझा । जब कि नियमानुसार जिलाधिकारी से इसके लिए अनुमति लेना अनिवार्य है ।

वैसे देखा जाए तो उच्चतम न्यायालय के एक आदेशानुसार रात 10 बजे के बाद आतिशबाजी नही की जानी चाहिए । लेकिन हमारे देश मे शायद ही कोई इसका पालन करता हो । घटना की तह पर जाएं तो इसके पीछे दो समूहों के बीच आतिशबाजी का मुकाबला होना ही  एक बडे कारण के रूप मे सामने आया  है । एक दूसरे से बेहतर आतिशबाजी की होड इस कदर हावी होती है कि इससे आवाज का शोर ही एक खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है । इस बारे मे कुछ स्थानीय लोगों का विरोध हमेशा से रहा लेकिन इसे अनसुना किया जाता रहा । अंतत: यह लापरवाही इस हादसे के रूप मे सामने आई ।

देवी मंदिर का यह हादसा कोई पहली घटना नही है । हमारे तीर्थस्थलों, धार्मिक स्थानों व पर्व विशेष पर पहले भी इस तरह की घटनाएं कई बार हो चुकी हैं । कहीं भीड के दवाब मे भगदड का होनी दुर्घटना का कारण बनती है तो कहीं दूसरे कारणों से हादसे होते हैं और सैकडों लोगों को अपनी जान गंवानी पडती है ।

दक्षिण भारत के मंदिरों मे आतिशबाजी की पुरानी परंपरा रही है लेकिन आस्था के चलते शायद ही कभी नियमों का समुचित पालन किया  जाता रहा हो । छोटी मोटी घटनाओं को नजर-अंदाज करते रहना भी इस बडे हादसे का कारण बना । 2013 मे यहां एक पटाखा कारखाने मे ऐसा ही हादसा हुआ था जिसमे सात लोगों की मौत हुई थी । 2011 मे भी त्रिचूर की एक पटाखा फैक्टरी मे आग लगने के हादसे मे 6 लोगों को जान गंवानी पडी थी । इसी वर्ष शोरानपुर मे भी ऐसा ही हादसा हुआ और 13 लोग काल के ग्रास बने । 1952 के उस हादसे को लोग अभी तक भूले नही हैं जब प्रसिध्द सबरीबाला मंदिर मे पटाखों के कारण आगे लगने से 68 लोगों की जाने गई थीं । यानी इस तरह के हादसे होते रहे थे लेकिन कोई सबक लेने की जहमत किसी ने नही उठाई ।

यही नही, हमारे धार्मिक स्थलों व विशेष धार्मिक पर्वों पर बदइंतजामी के कारण होने वाली भगदड के कारण भी हादसे होते रहे हैं । हमारे कुंभ मेले तो न जाने कितनी बार इन दर्दनाक हादसों के गवाह बने हैं । 7 मार्च 1997 को अजमेर  दरगाह मे उर्स के अवसर पर हुई भगदड , अप्रैल 2010 मे हरिदार मे शाही स्नान के समय हुई भगदड , 10 फरबरी 2013 को इलाहाबाद कुंभ मेले मे रेलवे स्टेशन मे एक रेलिंग टूट जाने से जो हादसा हुआ तथा 2014 मे दशहरा के अवसर पर पटना गांधी मैदान मे वह दर्दनाक हाद्सा जिसकी भगदड मे अधिकांश महिलाएं व बच्चों को अपनी जान से हाथ धोना पडा था को भला कौन भूल सकता है । वैसे इस प्रकार के हादसों की लंबी फेहरिस्त है ।

इस तरह के हादसों के कारणों की तह पर जाएं तो बद्इंतजामी ही इसका एकमात्र कारण उभर कर सामने आती है । जहां लाखों लोग एकत्र हों वहां सुरक्षा व बचाव के जो इंतजाम किये जाने चाहिए वह नदारत ही रहते हैं । यहां तक कि स्थानीय प्रशासन भीड के इतने बडे जमावडे की गंभीरता को भी समझने मे असमर्थ ही दिखाई देता है । लाखों लोगों की भीड के लिए सुविधाजनक आवागमन जरूरी होता है | इसमे थोडी सी भी चूक दुर्घ\टना को न्योता दे सकती है | अधिकांश मामलों मे बडी भीड के प्रवेश व निकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण दुर्घटनाएं हुई हैं | मंदिर या धार्मिक स्थ्ल के पास  भीड. का उचित और प्रभावी नियंत्रण बहुत जरूरी है अक्सर इसमे चूक होने की संभावना बनी रहती है | इस घट्ना मे आतिशबाजी से जुडे खतरे को कभी महसूस ही नही किया गया और इसका ही परिणाम रहा कि इतने मासूम लोगों को अप्नी जान गंवानी पडी ।

         अब यह जरूरी है कि इस प्रकार के सार्वजनिक मेलों, उत्सवों तथा धार्मिक पर्वों पर सभी जरूरी सुरक्षा उपाय पहले से ही कर लिए जाएं | आपातकालीन व्यवस्था का होना भी जरूरी है |  हमें यह सीख लेनी ही होगी कि यह सभी घटनाएं बदइंतजामी व प्रशासनिक भूलों का ही परिणाम रही हैं | इन्हें आसानी से रोका जा सकता था | आगे ऐसा न हो इस पर गंभीरता से सोचा जाना जरूरी है तथा ऐसे अवसरों के लिए एक त्रुटिविहीन तंत्र विकसित किया जाना चाहिए |
     
   
   

मंगलवार, 29 मार्च 2016

उत्तराखंड के हित मे नही राजनीतिक अस्थिरता

उत्तराखंड की यह त्रासदी रही है कि आजादी के बाद लंबे समय तक यह राजनीतिक रूप से उत्तरप्रदेश का एक उपेक्षित हिस्सा रहा है । अपनी विशेष भौगोलिक संरचना के कारण विकास की दौड मे भी यह पर्वतीय अंचल प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों की तुलना मे कहीं पीछे छूटता चला गया । इसके आर्थिक पिछ्डेपन का एक बडा कारण इसका राजनीतिक रूप से कम महत्वपूर्ण होना भी रहा है । लेकिन नवम्बर 2000 मे इसे एक अलग राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ और उम्मीद की गई कि यह छोटा उपेक्षित पर्वतीय अंचल विकास की राह पर आगे बढेगा । लेकिन विकास को  वह गति न मिल सकी जिसकी अपेक्षा की गई थी । इसका एक बडा कारण इस नव प्रदेश मे राजनीतिक स्थिरता का न होना भी रहा ।

उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो परंपरा से यह कांग्रेस का एक मजबूर गढ रहा है । इसका एक बडा कारण स्वतंत्रता आंदोलन मे इस क्षेत्र के लोगों की भूमिका का होना भी है । यही कारण है कि कांग्रेस के कर्मठ व प्रतिबध्द नेताओं की यहां लंबी परम्परा रही है । लंबे समय तक कांग्रेस को इस क्षेत्र से कोई विशेष राजनीतिक चुनौती का सामना भी  नही करना पडा । लेकिन राममंदिर आंदोलन के बाद से राजनीतिक स्थितियां तेजी से बदलीं तथा भाजपा ने इस क्षेत्र मे एक मजबूत उपस्थिति दर्ज करने मे सफलता प्राप्त की ।

चूंकि इस राज्य के गठन मे भाजपा की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है इसलिए भी यहां के लोगों का पार्टी के प्रति रूझान होना भी स्वाभाविक ही है । वैसे भी राज्य निर्माण के बाद भाजपा को ही इस राज्य की सत्ता प्राप्त हुई तथा नित्यानंद स्वामी इस प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने ।  लेकिन उसके बाद कांग्रेस बनाम भाजपा की राजनीतिक लडाई के चलते इस राज्य मे मुख्यमंत्री बदलते रहने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज तक जारी है ।

तेरह जिलों वाले इस हिंदु बहुल प्रदेश मे धार्मिक व जातीय आधार पर बहुत ज्यादा उलझाव तो नही हैं लेकिन राजपूत व ब्राहमण बहुलता के कारण राजनीति के समीकरणों मे इन दो जातीयों का प्रभाव हमेशा से रहा है । अन्य जातियों का प्रभाव कुछ विशेष क्षेत्रों तक ही सीमित है । मुस्लिम आबादी भी महज 12% होने के कारण बहुत ज्यादा प्रभावी भूमिका मे कभी नही रही ।

यहां की राजनीति के संदर्भ मे गौरतलब यह भी है कि उत्तराखंड दो मंडलों से मिल कर बना है । पहला कुमाऊं मंडल जिसमे छ: जिले हैं और गढवाल मंडल इसमे सात जिले सम्मलित हैं । इनमे भाषाई भिन्नता के साथ कुछ अन्य सामाजिक -सांस्कृर्तिक विभिन्नताएं भी हैं । इन भिन्नताओं के कारण ही यहां की राजनीति मे गढवाल व कुमांऊ फेक्टर की अपनी भूमिका हमेशा रही है । तमाम छोटे बडे राजनीतिक फैसलों को इसी नजरिये से देखा जाता है । मौजूदा राजनीतिक घटनाक्र्म मे भी इस पहलू को नजर-अंदाज नही किया जा सकता । यहां गौरतलब है कि मुख्यमंत्री हरीश रावत कुमांऊ मंडल से हैं तथा विजय बहुगुणा व हरकसिंह रावत गढवाल मंडल से ।

यहां यह समझना भी जरूरी है कि मौजूदा दौर मूल्यों की राजनीति का नही बल्कि अवसरवादिता, घात-प्रतिघात व हद दरजे की सत्ता लौलुपता का है । कुर्सी की ललक ने सारी मर्यादाओं को हाशिए पर डाल दिया है । दल विशेष से जुडाव उसकी नीतियों या राजनीतिक दर्शन के कारण नही बल्कि सत्ता सुख से है । कांग्रेस सरकार के पतन के पीछे भी यही कारण रहे हैं । स्वंय कांग्रेस के नौ विधायकों ने बगावत का झंडा लहरा कर सरकार के सामने अस्तित्व का संकट खडा किया और अंतत: उसकी दुखद परिणति राष्ट्रपति शासन के रूप हुई ।
लेकिन ऐसा सिर्फ उत्तराखंड के साथ ही नही है । अभी हाल मे अरूणाचल प्रदेश को भी यही त्रासदी झेलनी पडी है । झारखंड, गोवा व उत्तरपूर्व के राज्यों मे भी ऐसा होता रहा है । ऐसा इसलिए भी संभव हो जाता है कि कम सदस्यों वाली इन राज्य विधानसभाओं आठ दस लोगों के पाला बदलने से राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल जाते हैं और सरकार  आसानी  से अल्पमत मे आ जाती है । यही उत्तराखंड मे हुआ है ।

लेकिन  विकास की राह चलते इस प्रदेश के आर्थिक विकास के लिए यह  राजनीतिक अस्थिरता कतई हितकारी नही है । अगर यहां विकास को गति देनी है तो राजनीतिक स्थायित्व का होना बेहद जरूरी है । दुखद तो यह है कि दल बदल कानून के बाबजूद ऐसा हो पा रहा है । छोटे राज्यों मे इस राजनीतिक दोष को देखते हुए जरूरी है कि कानूनों मे कुछ बदलाव किये जांये जिससे इस प्रकार की स्थितियां आसानी से उत्पन्न न हो सकें ।