गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

राजनीतिक क्षितिज के हाशिए पर आती कांग्रेस

 


वह दौर खत्म हुआ जब कांग्रेसी नेता फाख्ता उडाया करते थे । अब मोदी सरकार की एक नई कार्य शैली ने कांग्रेस को हाशिए पर डाल दिया है । पिछ्ले दो  लोकसभा चुनावों  में जिस तरह कांग्रेस समेत अन्य राजनैतिक दलों को जनता ने नकारा और मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा को समर्थन दिया, उससे बहुत कुछ साफ हो गया था । राहुल, प्रियंका की नौटंकी भी लोगों को आकर्षित न कर सकी थी । मनमोहन और सोनिया जी के मीठेपन के अंदर छिपे राजनीतिक दिवालियेपन व प्रपंच को लोग समझ चुके थे । । दर-असल अब कांग्रेस को महसूस होने लगा है कि उसके पैरों के नीचे जो जमीन अभी तक उसका साथ दे रही थी, वह खिसकने लगी है और इसलिये राहुल गांधी हर उस प्रपंच का सहारा लेने लगे हैं जिससे मोदी सरकार को बदनाम किया जा सके | यह अलग बात है कि अब उन्हें कोई गंभीरता से नही लेता और उनके प्रयास निरर्थक ही जाते हैं | 

दर-असल देश में कांग्रेस का शासनकाल कुछ अल्पकालिक कालखंडों को छोड, नकारेपन का इतिहास रहा है लेकिन एक मुख्य राजनीतिक दल होने का लाभ उसे हमेशा मिलता रहा । दूसरे राजनीतिक दलों का प्रभाव,  क्षेत्र विशेष तक सीमित रहा । यह भारतीय राजनीति की त्रासदी रही कि आजादी के बाद जो राजनीतिक दल जनाधार समेटे अस्तित्व में आए उनका जन्म या तो जातीयता के गर्भ से हुआ या फिर क्षेत्रीय अस्मिता के संकीर्ण नारों से । इस प्रकार की सोच के फलस्वरूप जन्मे और विकसित दलों का सीमित प्रभाव होना स्वाभाविक ही था । यही कारण है कि चाहे कम्युनिस्ट  पार्टियां रहीं हों या फिर समाजवादी, बहुजन अथवा डी.एम.के, अन्ना डी.एम.के, शिवसेना सभी सीमित क्षेत्र तक ही सीमित होकर रह गईं । इसका सीधा लाभ हमेशा कांग्रेस को मिलता रहा ।

थोडा पीछे देखें तो कांग्रेस पार्टी का देश की आजादी से जो रिश्ता रहा है, स्वतंत्रता के बाद उसका भरपूर राजनीतिक लाभ इसे लंबे समय तक मिलता रहा । गांधी और नेहरू को जिस तरह से देश के स्वाधीनता आंदोलन से जोड कर महिमा मंडित किया गया,  उसे समझने मे आमजन को कई दशक लग गये । दर-असल विभाजन के बाद पहले आम चुनाव में कांग्रेस का सत्ता में आना एक राजनीतिक वरदान साबित हुआ । सत्ता की बागडोर मिलते ही कांग्रेस ने जैसा चाह वैसा इतिहास पाठय पुस्तकों में सम्मलित कर एक पूरी पीढी का "ब्रेन वाश " किया । पांचवे दशक मे पैदा हुई पीढी ने वही पढा और समझा जो उसे स्कूलों की पाठय पुस्तकों में पढाया गया था । यह कांग्रेस का सौभाग्य रहा कि वह आजादी के बाद लंबे समय तक सत्ता में काबिज रही और उस इतिहास को पढ कर कई पीढीयां जवान हुईं । 

अगर थोडा गौर करें तो स्वाधीनता आंदोलन में क्रांतिकारियों की भूमिका को कम करके आंकते हुए इतिहास लिखा गया । एक तरह से बडी चालाकी से इनके योगदान को हाशिए पर रखने में कांग्रेस सफल रही । यही नहीं, जहां एक तरफ नेहरू और गांधी को इतिहास में महिमा मंडित किया गया वहीं दूसरी तरफ लोह पुरूष कहे जाने वाले पटेल की भूमिका और उनके योगदान को भी बडी खूबसूरती से इतिहास के एक छोटे से कोने में समेट कर रख दिया गया । अब जब सूचनाओं और संचार साधनों का विकसित तंत्र सामने आया तो लोग समझ सके कि पटेल क्या थे और देश के नव निर्माण में उनका क्या योगदान रहा । 

यही नहीं, नेहरू शासनकाल की कमजोरियों और विफलताओं के बारे में भी अब थोडा बहुत जानकारियां मिलने लगीं हैं । अन्य़था कांग्रेसी इतिहास की चमकीली परतों के अंदर खामियों के सारे अंधेरे दफन पडे रहे । धुंध छंटने के बाद अब आमजन का कांग्रेस की लचर, ढुलमुल व तुष्टीकरण की नीतियों से मोहभंग हो रहा है । उसे यह समझने में अब कोई दुविधा नहीं कि मोदी जी के नेतृर्त्व  में देश की दशा व दिशा को नई गति और आयाम मिलेंगे । 

कांग्रेस कुछ अपवादों को छोड कर, अधिकांश मामलों में यथास्थितिवाद की पोषक रही है । आज उसी यथास्थितिवाद से ऊबे आमजन को मोदी सरकार ने विकास का जो माडल दिखाया है, उसमें लोगों ने न सिर्फ भरोसा जताया है अपितु अपना सहयोग भी देना प्रारम्भ कर दिया है । यही नहीं विकास की रोशनी को घुप्प अंधेरे में बैठे आखिरी जन तक पहुंचाने के लिए जिस कार्यशैली को अपनाया, उससे भी लोगों में उम्मीद की एक नई आस जगी है । इस कार्य शैली का कांग्रेसी शासनकाल में नितांत अभाव रहा था । यही कारण है कि देश की अर्थव्यवस्था पिछ्ले कई वर्षों से " स्टैंड बाय " स्थिति में नजर आने लगी थी । 

     लेकिन राजनीतिक क्षितिज मे मंद होती चमक के बीच कांग्रेसी नेता उन कारणों को  समझने की कोशिश करते कहीं नजर नही आए जिनसे आज यह हालत बनी है | अब जब इसका जनाधार दो- तीन राज्यों तक सीमित रह गया है ममता बनर्जी जैसी जननेता कांग्रेस को सीधे सीधे चुनौती देने लगी है | लेकिन विडंबना यह है कि पार्टी परिवार मोह से ऊपर उठ्ना ही नही चाहती | अब पार्टी की सारी उम्मीदें पांच राज्यों के चुनाव पर लगी है कि शायद कोई चमत्कार हो जाए | लेकिन लगता नही कि ऐसा कुछ होगा | शायद कांग्रेस का राजनीतिक हाशिये पर रहना उसकी नियति बनती जा रही है | 

 


शुक्रवार, 26 नवंबर 2021

दलगत राजनीति का बदलता चेहरा

 



भारतीय राजनीति  का चेहरा  अब बडी तेजी से बदल रहा है   इस बात की संभावना कहीं नही दिखती कि यह मूल्यों की राजनीति के अपने पुराने दौर की तरफ वापसी कर सकेगी । दर-असल वोट के माध्यम से जनसमर्थन की अभिव्यक्ति के महत्व ने ही इसे इस स्थिति मे ला खडा किया है । आज हालात यह हैं कि वोट के लिये राष्ट्र हितों की उपेक्षा करने मे भी किसी को कोई गुरेज नही | मौजूदा किसान आंदोलन को लेकर हुई दलगत राजनीति ने जिस तरह से राष्ट्र हितों को नजर-अंदाज कर विशुद्द रूप से वोट की राजनीति को प्राथमिकता दी उसने भविष्य की राजनीति के सकेत साफ़ तौर पर दे दिये हैं |

      सत्ता से दूर राजनीतिक दल जिन्हें  लोकतंत्र मे विरोधी की भूमिका का निर्वाह करना होता है , अब सिर्फ़ कुर्सी झपटने की राजनीति को अंजाम देने मे लगे हैं | यही कारण है कि अब  विरोध की राजनीति के बीच सही नीतियों को समर्थन देने की परंपरा खत्म होती जा रही है | सत्ता पार्टी को येन केन  सत्ता से हटा स्वंय सत्तारूढ होना ही एकमात्र ध्येय बन गया है | इसके लिये किसी हद तक भी जाने मे कोई संकोच दिखाई नही देता | विरोधी राजनीति का यही  चेहरा किसान आंदोलन के चेहरे को भी भदेस बना रहा है |

      क्या यह जानना अफसोसजनक नही होगा कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी अब  कन्हैया कुमार को अपना पोस्टर ब्वाय बनाने जा रही है । रोहित वेमुला की आत्महत्या की तस्वीरें भी कांग्रेस के लिए वोट मांगती दिखाई देंगी । कल अगर उमर खालिद का चेहरा भी साम्यवादी दलों के चुनावी पोस्टरों मे दिखाई दे तो कोई आश्चर्य नही ।

      वोट राजनीति के इस घिनौने चेहरे को क्या अब भारतीय जनमानस की बदलती सोच का एक संकेत मान लिया जाए या फिर खलनायकों को राजनीति मे महिमा मंडित कर हीरो बनाने की एक घृणित राजनीतिक सोच । क्या अब भारतीय चुनावी राजनीति का दर्शन कुछ इस तरह से बदलने जा रहा है जिसमे नैतिक मूल्यों का कोई स्थान नही |

। युवाओं के लिए वह विद्रोही चरित्र आदर्श हैं जो पूरी मुखरता के साथ शासन -सत्ता के विरूध्द किसी भी  सीमा तक जा सकने का साहस रखते हैं । इसमे कोई फर्क नही पडता कि वह पारंपरिक मूल्यों व आदर्शों के विरूध्द है या फिर देश प्रेम की अवधारणा को ही खारिज कर रहे हैं ।

         बहुत संभव है कि गत आम चुनावों मे जिस तरह से मोदी एक चमत्कारिक छवि के रूप मे पूरे देश को अपने मोह पाश मे बांध एक अकल्पनीय चुनावी जीत के नायक बने उसने गैर भाजपा राजनीतिक दलों मे राजनीतिक असुरक्षा की भावना को पैदा करने मे अहम भूमिका निभाई हो । बहरहाल  कारण कूछ भी हों  लेकिन राष्ट्र हितों की कीमत पर सिर्फ़ सत्ता के लिये वोट की राजनीति देश के हित मे तो कतइ नही है |

 

              

 

गुरुवार, 18 नवंबर 2021

लौटना ही होगा सागर की ओर


 

यह बात तय हो चुकी है कि बहुत समय पहले धुंधले अतीत मे जल के महापात्र सागर मे तब्दील हुए | फ़िर इनमे पाए जाने वाले तत्वों –क्षार से प्रोटोप्लाजम बना और इससे जीव का जन्म हुआ | धीरे-धीरे इस जीव पदार्थ ने किसी तरह क्लोरोफ़िल जैसी महत्वपूर्ण चीज अपने अंदर पैदा कर ली | फ़िर फ़ोटो संश्लेषण के ज्ररिए जड पदार्थों से जीवन तत्वों का निर्माण करना सीख लिया | दूसरी ओर इसी जीव पदार्थ की दूसरी जाति ने क्लोरोफ़िल वाले जीवित पदार्थों को अपने जीवन का आधार बनाना सीखा | इस तरह जीवन की शुरूआत हुई |

     समय के साथ जीवन के विकास की यात्रा भी बढती गई और यह जीवन जटिल होता गया| एक कोशिय जीवों से तब ऐसे जीवों का विकास हुआ जो बहुकोशिय थे | इन्मे अपने ही जैसे दूसरे जीवों को पैदा करने हेतु अलग-अलग अंग थे | इनमे अनेक जीव ऐसे थे जो पृथ्वी और सागर दोनो जगह आसानी से रह सकते थे | जीवन की गाडी आगे बढ्ती गई और कुछ जीव जन्तु सागरों मे लौट आए | कुछ स्तनपायी जीवों ने अपने मस्तिष्क का असाधारण विकास कर लिया और इस तरह मनुष्य के पहले पूर्वजों का स्वरूप सामने आया | वनस्पतियों का भी असाधरण विकास हुआ और कई किस्म के पेड-पौधे, झाड-घास आदि के जंगल उग आए |

     हमारे अवतार्वाद की धारणा भी इस मत कि पुष्टि करती है | जीव का जन्म सागर से हुआ और मत्स्य अवतार इसी का प्रतीक है | दूसरे पहलू की तरफ़ देखें तो पृथ्वी एक जलीय ग्रह है | इसका तीन चौथाई भाग जलमय है | पृथ्वी की तरह सागरों मे भी असंख्य जीव पलते हैं | सागर के एक चुल्लू भर पानी मे करोडों नन्हें पौधे और जीव दिखाई दे सकते हैं | यही वह जीवित पदार्थ हैं जिन पर सारे जीवन की नींव रखी हुई है | इंसान भी तो इन्हीं सागरों की संतान है |

     जल के बिना जीवन असंभव है | सागर मंथन की कथा इसी सच्चाई को मिथक रूप से प्रकट करती है | यही नही, सौर परिवार मे पृथ्वी ही अकेला जलीय ग्रह है | इस जल से ही यहां जीवन संभव हो सका है | दूसरे ग्रह तो जीव जन्तु विहीन हैं |

     इस तरह महासागरों की इस जन्म कहानी से यह बात तो सिध्द हो ही जाती है कि इनकी उम्र पृथ्वी से ज्यादा तो है ही नही | पृथ्वी की उम्र ल्गभग 4 अरब वर्ष मानी जाती है और इस तरह महा सागरों की उम्र इससे कम मानी जा सकती है | हिन्द महासागर इनमे कुछ नया है |इसका जन्म आज से 18 करोड वर्ष पहले महादीपीय अपसरण का परिणाम माना जाता है |

     कभी भारत और आष्ट्रेलिया अंटार्कटिका महाद्वीप से जुडे थे | कुछ भूगर्भीय हलचलों के कारण भारत गौंडवाना लैंड से टूट कर 3 इंच प्रतिवर्ष की गति से उत्तर पूर्व की ओर खिसकते हुये दूर चला गया | इसी तरह लगभग 2 करोड वर्ष पूर्व अरब देश अफ़्रीका से अलग होकर पूर्व की ओर खिसक गए जिससे लाल सागर और अदन की खाडी मे हिंद महासागर का जन्म हुआ |

     अतीत मे यह महासागर जीवों के जीवन की धूरी थे | अगर यह कहा जाए कि धरती का जीवन इन्ही पर आधारित था तो गलत न होगा | गौरतलब यह भी यह है कि आज भी सागर के किनारे रहने वाले लोगों का जीवन बहुत हद तक इन पर ही निर्भर है | इनके भोजन का मुख्य स्त्रोत सागर ही हैं |  आज जबकि पृथ्वी के विभिन्न स्त्रोत और संसाधन लगातार कम होते जा रहे हैं हमे फ़िर अपने सागरों की याद आने लगी है | सागरों मे वे सभी चीजें मिलती हैं जो हमारी पृथ्वी मे हैं | अब तो यह बात भी सिध्द हो चुकी है कि सागर के विभिन्न संसाधनों के विवेक संगत उपयोग से लोगों का जीवन स्तर सुधारा जा सकता है | लेकिन यही तभी संभव है जब हम सागर की संपदा का उपयोग समझदारी से करें | आपसी होड इस संपदा को बर्बाद ही करेगी | साथ ही हमे अपने सागरों को तरह तरह के प्र्योग करने की प्रयोगशाला बनाने से बचना होगा | आगे चल कर इसके दुष्परिणाम हमे ही भुगतने होंगे |

गुरुवार, 20 मई 2021

स्पेनी कविता / जीवन

 

अंग्रेजी से अनुवाद जार्ज लुई बोर्खेस की स्पेनी कविता / जीवन

 

फ़िर एक बार खो जाना चाहता हूं

तेरे अधरों की स्मृतियों में

घोर अंधकार में टटोलता हूं अपना मन |

   जब भी मैनें खुशियां पानी चाहीं

   अपने आपको हमेशा दुखों की छाया में खडा पाया

   समुद्र लांघें हैं मैने

   परिचित हूं मरूभूमि से भी

   आज मैने देखा / दो-तीन लोगों के साथ

   जब वह औरत बन चुकी थी |

पर मैने प्यार किया था

उस सुन्दर सौम्य लड्की से

जिसे अपने हिस्पानी होने का गर्व था

मैने शहर के उस अंतहीन, बेढब किनारे को भी देखा है

जहां थका हुआ सूर्य

धीरे धीरे आकर अस्त हो जाता है

मेरे अंदर उठती है उद्गार की एक लहर

विश्वास है मुझे

शायद, यही अंत है

कभी नहीं पा सकूंगा

इस जीवन का नया अर्थ |

 

 

सोमवार, 7 सितंबर 2020

उजाले और उम्मीद की राह दिखाती पुस्तक

 

पुस्तकों का इंसानी जिंदगी से गहरा रिश्ता रहा है | प्राचीन इतिहास पर नजर डालें तो इंसान का अक्षरों से किसी न किसी रूप मे सबंध हमेशा रहा है और यही कारण है प्राचीन सभ्भयताओं की खोज मे हमें शब्दों का अस्तित्व हमेशा मिलता है |आज भी हम पुस्तकों को इंसान का पथ प्रदर्शक मानते हैं |

     राजस्थान के अजमेर मे जन्मे व मनीला-फ़िलिपींस को अपने कर्म भूमि बनाने वाले श्री हीरो वाधवानी जी की नवीनतम पुस्तक “ मनोहर सूक्तियां “ एक ऐसी ही बहुमूल्य पुस्तक है जो हमें जीवन की सही राह दिखाती है | सूक्तियों के रूप मे इस पुस्तक मे वह अमृत है जिसका स्वाद इसे पढने के बाद ही समझा जा सकता है | यह पुस्तक सही अर्थों मे अनमोल मोतियों की एक खूबसूरत माला है जिसमे हर मोती की अपनी चमक है | एक ऐसी चमक जिसकी रोशनी मे आप जीवन की सही राह देख सकते हैं |

     वाधवानी जी ने संभवत: अपने रचना कर्म के लिये साहित्य की इस विधा का चयन बहुत सोच समझ कर किया होगा | कहानी, कविता जैसी विधाओं से हट कर सूक्तियों व विचारों का लेखन एक अलग किस्म का रचनाकर्म है | लेकिन कोई सदेह नही कि जनकल्याण की द्र्ष्टि से यह सबसे अधिक उपयोगी विधा है | जीवन के कठिन दिनों व मानसिक अवसाद के क्षणों मे यह पुस्तक आपको उजाले और उम्मीद की राह दिखाती है क्योंकि इसमे जीवन का सार है, क्पोल कल्पित कथा नही |  इसमे लेखक वाधवानी जी के जीवन का गहन अनुभव व मौलिक प्रतिभा का बेहतरीन निष्कर्ष है |

    इस पुस्तक के प्रथम पृष्ठ मे छपी सूक्तियों से ही पुस्तक की उपयोगिता का आभास हो जाता है | प्रत्येक सुक्ति लाखों रूपयों से भी ज्यादा मूल्यवान है | कुछ सुक्तियां इस प्रकार हैं –

·        असंयमी इंसान को शैतान शीघ्र वश मे कर लेता है |

·        ईश्वर ने योग्य समझ कर बुजुर्गों और बरगद के पेडों को अधिक समय दिया है, इनका सम्मान करो |

·        रेलगाडी पटरी पर होगी तो हजारों मील चलेगी, पटरी से उतर ग-ई तो एक इंच भी नही चलेगी |

·        मां के गर्भ मे रहने का किराया जीवन भर कमाए गए धन का दोगुना है |

·        गरीबी केवल त्योहार पर नही, रोजाना तंग करती है |

·        मोतियों से मिल कर धागा भी मूल्यवान हो जाता है |

ऐसी ही तमाम सूक्तियां जो जीवन के विभिन्न पहलुओं से जुडी हैं और अधंकार मे सही दिशा का भान कराती हैं | जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नही जिसके बारे मे पुस्तक मे उल्लेख न हो |

     पुस्तक की सुंदर कंपोजिंग, मजबूत बाइडिंग, आकर्षक कवर तथा त्रुटिहीन छपाई इस पर चार चांद लगाती हैं |

     यह पुस्तक हर उम्र के लोगों के पाठकों के लिये उपयोगी है और इस दौर के हमारे बच्चों के लिये तो प्रकाशपुंज के समान है | उनके पास रामायण, गीता व वेदों के अध्धयन का न तो समय है और न ही सामाजिक परिवेश लेकिन एक या दो पंक्ति के यह अमृत विचार उन्हें जीवन मे अच्छे बुरे व नैतिक-अनैतिक का विवेक देने मे समर्थ हैं |

    कारोबार के संबध मे  अपनी भूमि से दूर रहने के बाबजूद मनीला फ़िलिपींस मे रहते हुए   हिंदी की इस विधा मे , अपनी जमीन की सुगंध व मूल्यों को लिए ऐसी उपयोगी पुस्तक लिखने के लिये श्री वाधवानी जी निसंदेह साधुवाद  व शुभकामनाओं के पात्र हैं |

पुस्तक – मनोहर सूक्तियां

लेखक – हीरो वाधवानी

के बी एस प्रकाशन, ई मेल  - kbsprakashan.@gmail.com

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

सपनों को सच करने का नशा


 

बहुचर्चित सुशांत सिंह राजपूत  हत्याकांड ने आज सभ्यता के ऊंचे पायदान पर खडे हमारे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है । दर-असल अपराध के नजरिये से देखें तो इसमें ऐसा कुछ भी नही जिसे देख या सुन कर कोई बहुत ज्यादा  हैरत मे पड जाए या जो कल्पना से परे लगे । यह ह्त्याकांड इसलिए भी खास नही कि इस कहानी की नायिका एक खूबसूरत बाला रिया चक्रवर्ती है जो सिल्वर स्क्रीन की दुनिया से ताल्लुक रखती है और  न ही इसलिए कि इस ह्त्या कथा के  जाल के पीछे  एक औरत है  जिसे भारतीय समाज मे अबला समझा जाता रहा है । दर-असल इस  हत्या कांड  ने हमारे समाज के उस चेहरे को उजागर किया है जिससे हम मुंह चुराते आए हैं । ग्लैमर की चकाचौंध के पीछे भी अंधेरे की एक दुनिया आबाद रह सकती है, इस सच से हम रू-ब--रू हुए ।

इंसानी जिंदगी के चटक़ और भदेस रंगों को समेटे यह ह्त्या कांड  हमे उस दुनिया मे ले जाता  है जहां सतह पर ठहाकों की गूंज सुनाई देती है और थोडा अंदर जाने पर सबकुछ पा लेने की ऐसी हवस जिसके आगे कोई नैतिक अनैतिक का बंधन नही , बस पा लेने का नशा है |   एक रंगीन, चहकती और खुशियों मे मदहोस दुनिया के अंदर की परतों मे  प्यार के नाम पर इस कदर  फ़रेब का  अंधेरा होगा, भला कैसे सोचा जा सकता है । लेकिन यह भी एक सच है, इसे रिया चक्रवती  की इस पेचीदी कहानी ने पूरी शिद्दत से सामने रखा है ।

देखा जाए तो यह कहानी सिर्फ सुशांत राजपूत  की हत्या की कहानी नही है बल्कि यह कहानी है इंसानी महत्वाकांक्षाओं, सपनों और उडानों की । एक ऐसी लडकी की कहानी जिसने जिंदगी मे सबकुछ पा लेने की होड मे एक ऐसे इंसान को अपने फ़रेबी प्यार का शिकार बनाया , जिसने शायद क्कभी ऐसा सपने मे भी न सोचा हो|  

 महत्वाकांक्षाओं के रथ पर सवार उस लडकी ने  सपनों सरीखी इस जिंदगी को जिन मूल्यों पर हासिल किया यही इस ह्त्याकांड का सबसे भयावह सच है । प्यार की  अवधारणा पर टिके समाज को जिस तरह उसने  ठेंगा दिखा कर प्यार को ही फ़रेब का हथियार बनाया,   इसने एक बडा सवाल हमारे सामाजिक मूल्यों पर भी उठाया है । आखिर हम किस दिशा की ओर बढने लगे हैं ।

दर-असल गौर करें तो इधर उपभोक्ता संस्कृर्ति ने एक ऐसे सामाजिक परिवेश को तैयार किया है जहां हमारे परंपरागत सामाजिक मूल्यों का तेजी से अवमूल्यन हुआ है । नैतिक-अनैतिक जैसे शब्द अपना महत्व खोने लगे हैं । महत्वाकांक्षाओं और सबकुछ पा लेने की होड मे अच्छे बुरे के भेद की लकीर न सिर्फ कमजोर बल्कि खत्म सी होती दिखाई देने लगी है ..............

अभी हाल के वर्षों की कुछ घटनाओं पर नजर डालें तो  गिरते हुए मूल्यों की हकीकत को समझा जा सकता है ।

बात यहीं तक नही है । जिंदगी मे धन, दौलत, नाम ,यश व ग्लैमर  पाने की एक ऐसी होड भी जिसमे सबकुछ लुटा कर भी पाने का दुस्साहस दिखाई दे रहा है । इस तरह देखा जाए तो बात चाहे रिया चक्रवती की  जिंदगी की हो या फिर  महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढती उन सभी की जिन्हें  कहीं न कहीं बदले हुए उन मूल्यों ने ही डसा है जिनमे रिश्ते-नातों , प्यार-मोहब्बत का कोई मूल्य नही रह जाता । भावनाएं महत्वाकांक्षाओं की बलि चढ जाती हैं | जैसा कि रिया के साथ हुआ |

यह वह मूल्य हैं जो उपभोक्ता संस्कृति से उपजे हैं । और जिनका नशा सर चढ कर बोलता है और अंतत: उस मोड पर आकर खत्म हो जाता है जहां जिंदगी अपना अर्थ खो देती है । दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि इस अंधेरे का घेरा हमारी जिंदगी मे कसता ही जा रहा है । हम इससे मुक्त हो सकेंगे या नही, यही एक बडा सवाल है ।

 

 

शनिवार, 25 जुलाई 2020

मुस्लिम आस्थाओं के नाम पर


     फ़िर एक बार असहमति के स्वर सुनाई देने लगे हैं | यह दीगर बात है कि कोरोना महामारी के चलते मुस्लिम मुल्ला मौलवियों का एक वर्ग जरूर बकरीद पर अपने समाज से सरकार को  सहयोग करने की अपील कर रहा है | लेकिन उन लोगों की संख्या कम नही जिन्हें कोरोना या दूसरे समाज की भावनाओं की जरा भी परवाह नही | उन्हें तो बस धर्म के नाम पर एक लीक पीटनी है | अभी हाल मे गायों की तस्करी के कुछ मामले भी पकडे गये हैं | इन गायों को कत्लखाने ले जाया जा रहा था | बकरीद के अवसर पर इस प्रकार से गायों की तस्करी आग मे घी डालने का काम कर रही है | गौर-तलब है कि उत्तर पूर्व के कुछ क्षेत्रों को छोड कर गोमांस पूरी तरह प्रतिबंधित है |

दर-असल एक कहावत है कि ज्यों ज्यों दवा की मर्ज बढता गया | देश मे धर्मनिरपेक्षता के स्वरूप को लेकर कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है | बल्कि सच तो यह है कि जिनके हितों के मदद्देनजर धर्मनिरपेक्षता का ढोल जोर जोर से पीटा जाता रहा है, वहीं से धर्म की चाश्नी मे लिपटे नारे सुनाई देने लगे हैं | आस्थाओं और रिवाजों के नाम पर कई बार तो उन बातों का भी विरोध किया जाने लगा है जिनका प्रत्यक्ष रूप से किसी धर्म विशेष की आस्था से कोई रिश्ता ही नही | लेकिन कोढ पर खाज यह कि जिस अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक हितों की चिंता को लेकर देश के अधिकांश सेक्यूलर नेता छाती पीटते और दिन रात चिंता मे डूबे नजर आते हैं और समाज का तथाकथित सेक्यूलर बौध्दिक जीव भी फ़्रिक मे दुबला होता दिखाई दे रहा हो, वही समाज अब देश हित के कैई फ़ैसलों मे   अपनी आस्था को खतरे मे पडता देख रहा है | किसी भी बात का तिल का ताड बनाने मे उसे कोई परहेज नही | चिंताजनक तो यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय के एक वर्ग की इस दुर्भाग्यपूर्ण सोच पर अभी गंभीरता से सोचा जाना बाकी है |
      
          अब सवाल इस बात का है कि जिस धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय की पहचान व उनके धार्मिक निजता को सुरक्षित रखे जाने के लिए इतना राजनीतिक घमासान दिखाई देता हो वही समुदाय बात बात पर तिल को ताड बनाते हुए अपनी धार्मिक पहचान को खतरे मे होने का बेवजह शोर नही मचा रहा |

     याद कीजिए  योग को लेकर भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला था | इसे अपने धर्म विरूध्द मानते हुए इसमें भाग न लेने की बातों को जोर शोर से प्रचारित किया गया | वह तमाम बातें जिनका कोई तार्किक आधार नही था, योग के विरोध मे कही गईं | बेवजह उसे धर्म से जोडने के प्रयास हुए | यहां संतोष की बात यह रही कि मुस्लिम समाज के ही एक प्रगतिशील ,उदार वर्ग ने इसे नकार दिया |

     यही नही, समय समय पर राष्ट्र्गान व बंदे मातरम को लेकर भी मुस्लिम समाज के एक वर्ग ने अपनी “ धार्मिक चिंताओं “ को बखूबी उजागर किया है | अब तो ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीतिक फ़ैसलों व देशहित मे उठाये गये प्रशासनिक निर्णयों को धर्म और आस्था के चश्मे से देखना और फ़िर सहमति या असहमति प्रकट करना जरूरी समझा जाने लगा है | यहां गौरतलब यह है कि यह प्रवत्ति बहुसंख्यक समाज मे नही बल्कि अल्पसंख्यक समाज मे दिखाई दे रही है |

     इस तरह अल्पसंख्यक समुदाय की गैरजरूरी धार्मिक आस्था की यह चिंता बहुसंख्यक समुदाय को भी कहीं न कहीं रास नही आ रही और एक ऐसे सामाजिक परिवेश को भी विकसित कर रही है जहां बहुसंख्यक समाज को अपनी उपेक्षा होती दिख रही है | ऐसे मे उसे अपने ही घर के कोने मे धकेले जाने की तुष्टिकरण जनित साजिश की भी बू आ रही है | अगर ऐसा होता है तो यह इस देश के कतई हित मे नही होगा | 
इसलिए जरूरी है कि अल्पसंख्यक समुदाय धार्मिक पहचान व आस्था के सवाल पर भेडिया आया, भेडिया आया की मानसिकता से अपने को मुक्त करे |