बुधवार, 25 मार्च 2015

विचारों पर पहरे की रिहाई


 ( L. S. Bisht ) - साइबर दुनिया की उडान जितनी तेजी से अपनी ऊंचाईयों तक पहुंची उतने ही इसमें उलझाव भी दिखाई देने लगे । भारत जैसे विकासशील देश मे यूरोपीय देशों की तुलना मे यह साइबर दुनिया अभी अपने शुरूआती दौर मे है लेकिन खतरे कई गुना । अब तो अन्य किस्म के अपराधों के साथ साइबर अपराध ने भी तेजी से अपनी जडें जमाना शुरू कर दिया है । इन खतरों के मद्देनजर इंटरनेट की तिलिस्मी दुनिया को नियंत्रित करने के लिए आईटी एक्ट सन 2000 मे बना और 2008 मे इसमें कुछ परिवर्तन किए गये । लेकिन इसकी धारा 66ए मे जल्द ही विवादास्पद होने का टैग लग गया ।

शुरूआती दौर मे तो इस धारा को लेकर सबकुछ सामान्य ही रहा लेकिन बहुत जल्द ही सत्ता मे बैठे लोगों और कुछ रसूखदारों ने इसका दुरूपयोग करना शुरू कर दिया । यहीं से इस पर बहस व चर्चा की शुरूआत हुई । अभी हाल मे उत्तर प्रदेश के प्रभावशाली मंत्री आजम खान के खिलाफ ' आपत्तिजनक ' पोस्ट डालने के आरोप मे बरेली के एक छात्र को जिस तरह से गिरफ्तार किया गया, उस पर पूरे देश मे तीखी प्रतिक्रिया हुई । अंतत: उच्चतम न्यायलय ने एक जनहित याचिका के माध्यम से ह्स्तक्षेप करते हुए इस एक्ट की 66 ए धारा को खारिज कर दिया । इस निर्णय का पूरे देश ने स्वागत किया ।

दर-असल आईटी एक्ट की इस धारा को उच्चतम न्यायालय ने संविधान मे अनुच्छेद 19 (1) मे दिये गये अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के खिलाफ माना है । न्यायालय का मानना है कि 66-ए की भाषा अस्पष्ट है । इसमे न तो आरोपी को पता है और न ही सरकारी अथारिटी को कि क्या अपराध है और क्या नही । इस धारा के चिढाने वाला, असहज करने वाला, पीडादायक और अपमानजनक जैसे शब्द अस्पष्ट हैं ।
अपराध स्पष्ट रूप से परिभाषित न होने के कारण ही इसका दुरूपयोग किया जाने लगा था । यही कारण है कि बाल ठाकरे के निधन पर एक टिप्पणी करने के अपराध मे दो लडकियों को गिरफ्तार किया गया । उन्होने सिर्फ यह लिखा था कि मुंबई डर की वजह से बंद हुई है न कि सम्मान की वजह से । तब इस गिरफ्तारी को लेकर राजनीति काफी गर्म हुई थी लेकिन जल्द ही सबकुछ भुला दिया गया । कुछ ऐसा ही पांडेचरी मे हुआ । वहां एक व्यक्ति को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर दिया गया उसने पी.चिदंबरम के बेटे के खिलाफ कुछ आपत्तिजनक लिखा । इसी तरह कुछ समय पहले ममता बनर्जी के एक कार्टून को लेकर भी गिरफ्तारी की गई । मई 2012 मे मुंबई के एक व्यक्ति को नेताओं के अपमांजंनक चुटकले शेयर करने के लिए जेल की हवा खानी पडी । ऐसे तमाम मामले हाल के वर्षों मे होते रहे हैं । इधर कुछ समय से तो यह एक सिलसिला ही बन गया । राजनेताओं की थोडी सी आलोचना कर देना इस धारा मे अपनी गिरफ्तारी को न्योता देना जैसा हो गया । इस तरह विरोध और असहमति को दबाने का यह एक हथियार बन गया ।
इस धारा का इतना दुरूपयोग किया जाने लगा कि आम आदमी फेसबुक पर कुछ भी लिखने व शेयर करने से डरने लगा । राजनीतिक टिप्पणी लिखने से पहले वह कई बार सोचता कि कहीं किसी को इसमे कुछ ' आपत्तिजनक ' न लग जाए और वह मुसीबत मे फंस जाए । अब इस धारा के हटने से उसे कुछ राहत महसूस हुई है । लेकिन ऐसा भी नही है कि इस धारा को हटाने के बाद कुछ भी लिखने का असीमित अधिकार मिल गया हो । राहत बस इतनी सी है कि अब किसी को तुरंत गिरफ्तार नही किया जा सकता । पहले की तरह सरकार के पास फेसबुक, टिवटर अकाउंट आदि को ब्लाक करने का अधिकार मौजूद है ।
गौर करने वाली बात यह भी है कि अभी भी आई.पी.सी की तमाम धाराएं हैं जिनसे साइबर दुनिया से जुडे अपराधों को रोका जा सकता है और प्रभावी हस्तक्षेप भी किया जा सकता है । जैसे कि देशद्रोह जैसी बातें लिखने या शेयर करने के विरूध्द आई.पी.सी की धारा 124 ए के तहत मुकदमा दायर किया जा सकता है । इसमे उम्रकैद तक की सजा का प्राविधान है । इसी तरह दो संप्रदायों के बीच नफरत फैलाने वाली किसी भी सामग्री के विरूध्द धारा 153 के तहत कार्रवाही की जा सकती है । इसमे 3 साल तक की सजा का प्राविधान है । जानबूझ कर अफवाह फैलाने के लिए आईपीसी की धारा 505 है । इसमे भी 3 साल तक की सजा हो सकती है । यह धाराएं प्रिंट, इलेक्ट्रानिक व अन्य सभी माध्यमों मे लागू होती हैं । यानी एक तरह से 66-ए हटने के बाद भी अगर इंटरनेट पर कोई सामग्री से आई.पी.सी की धाराओं का उल्लघंन होता है तो कार्रवाही होगी ।
बहरहाल, इस विवादास्पद धारा के हटने से सोशल मीडिया मे सक्रिय लोगों को थोडा राहत महसूस हुई है । अब कोई उन्हें रातों रात गिरफ्तार नही कर सकेगा । लेकिन यहां यह समझना भी जरूरी है कि इससे किसी को भी कुछ भी लिखने के असीमित अधिकार नही मिल जाते । यह सच है कि इस धारा के दुरूपयोग से अभिव्यक्ति की आजादी प्रभावित होने लगी थी लेकिन समाज व देश के प्रति जिम्मेदारी जस की तस है । ऐसा कुछ भी नही लिखा या दिखाया जाना चाहिए जिससे राष्ट्र व समाज का अहित हो ।


यह भी सच है कि साइबर दुनिया से हमारा रिश्ता अभी बहुत पुराना नही है । हम अभी शुरूआती दौर मे हैं इसलिए बहुत कुछ सीखना शेष है । यह हमारी एक ताकत है और इसलिए इसका उपयोग किस तरह किया जाना चाहिए , यह समझना और सीखना भी हमारे लिए बेहद जरूरी है । हर चीज की अपनी सीमाएं होती हैं हमें सोशल मीडिया मे अपनी इन सीमाओं को भी समझना होगा । समाज हित व व्यक्तिगत आजादी का संतुलन ही इसे हमारी दुनिया के लिए उपयोगी बना सकेगा अन्यथा इसके दुष्परिणामों को झेलना भी हमारी नियति होगी । 

रविवार, 22 मार्च 2015

पहाड के मेलों में होती हैं सुख-दुख की बातें

               
( एल एस बिष्ट ) -  उत्तराखंड का पर्वतीय अंचल न सिर्फ़ भौगोलिक रूप से भिन्न है बल्कि लोक संस्कृति की भी यहां अपनी अलग छ्टा है ।

कठिन जीवन का पर्याय बने इस अंचल मे स्थानीय मेलों का एक अलग सांस्कृतिक व सामाजिक महत्व रहा है । अतीत मे और आज भी, आवागमन के साधनों की कमी व सड्कों के अभाव ने इस अंचल के लोकजीवन को एक अलग ही रंग दिया है ।

     तमाम बदलावों के बाबजूद उत्तराखड के मेले आज भी काफ़ी सीमा तक अपने पारम्परिक स्वरूप मे दिखाइ देते हैं ।आज भी इन मेलों मे पहाडियों की गोद मे बसे दूर दूर के गांवों से लोग आते हैं और साल भर न मिल पाने वाले संगी साथी , नाते-रिश्तेदार , सखियां यहां अपनी सुख दुख की बातें करते हैं । यही नही पहाडों से बहुत दूर, मैदानों के बडे शहरों मे ब्याही पहाड की बालाओं को भी यह मेले बरबस याद आते हैं ।
          पर्वतीय अंचल के लोकगीतों मे इन मेलों के भावनात्मक पहलू पर बहुत कुछ कहा गया है । न जाने कितने गीत स्थानीय मेलों को लेकर रचे गये हैं । ऐसा ही एक गढ्वाली गीत है –
जब जैली कौतिक मैंणा सेलु दगण्या पेट्ली,  हरि साडी, लाल ब्लाउज मथ पैड़ा मुंड बांधली । कानु मां तेरो कुडल होल , हल हल हलकड़ैं , हरि साड़ी लाल_ _ _( एक सहेली दूसरे से कहती है हे मैणा जब तू मेला देखने जाएगी तेरी सभी सहेलियां जाने को तैयार होगीं । जब तू हरी साडी और लाल ब्लाउज पहन कर बालों को सजा, कानों में कुंड्ल पहन कर जाएगी तब वह कुडंल हल हल कर हिलेंगे )

     परदेस मे नौकरी कर रहे गांव के युवक भी इन मेलों मे सम्मलित होने के लिए बेताब रहते हैं । आखिर क्यों न हों । उनकी बचपन और युवा उम्र की न जाने कितनी खट्टी मीठी यादें इन मेलों से ही तो जुडी होती हैं । मीलों दूर गांवों से आए युवक-युवतियों का हुजूम यहां एक अलग ही नजारा पेश करता है । न जाने कितनी प्रणय गाथाएं यहां जन्म लेकर परवान चढ्ती हैं ।

   गढ्वाल अंचल मे लगने वाले इन मेलों का यहां के लोकजीवन से गहरा सम्बध है । प्र्त्येक मेले के पीछे कोई^ न कोई^ स्थानीय कहानी अवश्य होती  है ।
     कहीं किसी असफ़ल प्रणय गाथा की याद मे मेला लगता है तो कहीं किसी प्राकृतिक हादसे मे अकाल मौत को प्राप्त किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की याद में।महापुरूषों की स्मृति मे भी कई मेलों का आयोजन किया जाता है। कुछ स्थानों पर मेले गांव की किसी बाला या युवा की याद मे भी आयोजित किये जाते हैं जो किन्हीं कारणों से अब इस दुनिया मे नही रहे ।

     टिहरी मे बैसाख माह मे लगने वाला एक मेला मदन नेगी नाम के एक व्यक्ति की याद मे लगता है । भगीरथी नदी के तेज प्रवाह मे बह जाने के कारण उसकी मृत्यु हो गयी थी । हर साल इस मेले के दिन उसे याद किया जाता है। धारकोट मे आयोजित मेले के पीछे भी एक व्यक्ति की स्मृति है जिसने नदी मे कूद कर आत्महत्या कर ली थी । पौड़ी जिले के उदयपुर पट्टी के थल नदी में लगने वाले गेंद के मेले का अपना आकर्षण है । अजमेर पट्टी और उदयपुर पट्टी के लोगों के बीच यह खेल काफी लोकप्रिय है ।  स्थानीय घट्नाओं पर भी मेले आयोजित किए जाते हैं ।

     कुछ मेले देश व क्षेत्र के कुछ ऐसे व्यक्तियों के नाम पर भी आयोजित किए जाते हैं जिन्होने देश व समाज के लिए अपने प्राणों की आहुति दी । इन मेलों की भी एक लंबी फ़ेहरिस्त है ।

     पर्वतीय अंचल के यह मेले यहां की संस्कृति और लोकजीवन की पहचान बने हुए हैं । प्रत्येक मेले की पृष्ठभूमि से यहां की मान्यताओं और लोक विश्वासों का परिचय मिलता है , लेकिन अब बद्लते वक्त के साथ इनका स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है । यहां लगने वाले बाजार का चेहरा भी बहुत तेजी से बदल रहा है । आज जो चीजें यहां बिकने को आती हैं उन्हें देख कर यह महसूस नही होता कि यह पर्वतीय अंचल का वही बाजार है जिसमे खरीददारी करने के लिए लोग मीलों पैदल चल कर आते थे । बाजार संस्कृति ने उन भावनात्मक तारों को छिन्न भिन्न कर दिया है जो कभी इन मेला बाजारों से गहरे जुडे थे ।

            लुप्त होती मेलों की इस पुरानी पहचान का एक कारण तेजी से आ रहा सामाजिक व आर्थिक बद्लाव है। पहाडों मे सड्कों के जाल बिछ जाने से भी अब वह पुरानी बात नही रही । जरूरत की चीजें गांव ग़ांव पहुंचने लगी हैं । ऐसे मे इन मेलों का महत्व कम होता जा रहा है ।लेकिन पहाड कभी मैदान तो नही हो सकते । वह गहरी घाटियां, सीना ताने खडी चोटियां व घने जंगल, कदमों की सीमाएं स्वंय ही तय कर लेती हैं । घर से दूर ब्याही किसी लड्की को आज भी इंतजार रहता है इन मेलों का जब वह  अपने मायके की सहेलियों से मिल सकेगी ।बहरहाल बद्लाव की बयार चाहे कितनी ही तेज क्यों न हो, आज भी इन मेलों से जुडे न जाने कितने मार्मिक गीत यहां की वादियों मे गूंजते हैं । 
     

बुधवार, 4 मार्च 2015

जीवन मे बहने वाला संगीत है होली



 ( एल.एस. बिष्ट ) - अनेक पौराणिक धार्मिक मान्यताओं से जुडी होली भारतीय मन मे जैसा उछाह भरती है, कोई दूसरा पर्व नही भरता । दशहरा, दीपावली जैसे कई त्यौहारों वाले इस देश में होली का एक अपना अलग रंग है । होली यानी रंगो का यह पर्व एक तरह से पूरे समाज को एक सूत्र मे बांधने वाला पर्व भी है । ऐसा जनोल्लास किसी दूसरे अवसर पर नही दिखता ।

होली का यह पर्व पूरे समाज को प्रेम रस मे डूबो कर एक रंग कर देता है । जिस तरह वसंत अपनी सुंदरता चारों तरफ बिखेर सभी को आनंदित करता है, ठीक उसी प्रकार होली अपने रंग मे सभी को डूबो एक सूत्र मे बांधती है । होली का रंग सबसे जीवंत और अलग है । रीतिकालीन कवियों ने तो न जाने कितनी स्याही इस रंग भरे त्यौहार के वर्णन मे उडेल दी है ।

साहित्य के साथ ही गायन और नृत्य मे भी इसके रंग हैं । होली पर आधारित ठुमरियां और भजन आज भी आनंदित करते हैं । रंगों के इस पर्व को सही अभिव्यक्ति तो लोकगीतों मे ही मिली है । ब्रज और अवधी के लोकगीतों ने तो होली वर्णन मे अदभुत प्रसिध्दि पाई है । बुंदेलखंडी लोकगीतों मे भी होली खेलने का बडा मनोहारी चित्रण मिलता है । फागुन मे तो बुंदेलखंडी महिलाओं के समझ मे जो आता है, वही गाती हैं । नैनों की कटारी चलने लगती है, तो नायिका उलाहना देती है -
कटारी काहे मारे, राजा मोरे
पहली कटारी मोरे घुंघटा पे मारी
घुंघट खुल गए रे, राजा मोरे ।

नृत्यों मे कत्थक और मणिपुर नृत्यों मे इसकी अलग अलग छ्टाएं हैं , अलग अलग रूप हैं । कत्थक मे तो होली का ही रंग है । इसके सारे स्त्रोत ही कृष्ण लीलाओं और काव्य से आए हैं । और फिर कृष्ण , होली और रास इस कदर एक दूसरे से जुडे हैं कि इनके साथ सीधे इन अवसरों से जुडे ब्रज के उत्सवों की याद आती है ।

होली का यह लोकपर्व साहित्य मे हर काल मे इन्द्र्धनुषी रंगों से सरोबार रहा है । कवि नजीर ने होली के जरिए लोक तत्व की सफल अभिव्यक्ति दी है -
नजीर होली का मौसम जो जग मे आता है,
वो ऐसा कौन है, होली नही मनाता है ।

नजीर अट्ठारवीं सदी के कवि थे । हिंदुओं के साथ मुसलमान भी होली के रंग मे भीग टोलियां बना नाचते गाते थे । आम जन की इस होली का बडा ही सटीक वर्णन नजीर की काव्य रचनाओं मे मिलता है ।

अभी न होगा मेरा अंत,
अभी अभी ही तो आया है,
मेरे जीवन मे मृदुल वसंत ।
यह कहने वाले महाकवि निराला की रचनाओं मे वसंत बार बार लौटता है ।

वास्तव मे सभी बंधनों से मुक्त है होली । हमारी सभ्यता, रीति-रिवाजों और लोक लाज के तमाम बंधनों के कारण हमें उन्मुक्त अभिव्यक्ति के अवसर कम ही मिलते हैं । साल भर की कुंठाओं से मुक्ति दिलाता है होली का यह् त्यौहार । मदिरा, भांग, ढोल-मजीरा और मौज मस्ती मे बह जाता है सब कचरा । लोक उत्सव की इस रसधारा मे पूरी तरह डूब कर तभी तो गोपियां सारे लोक बधंनों को तोड एकाकार हो जाती हैं और कह उठती हैं -
हे श्याम, भुजाओं मे भर लो,
लो आज मैं तुम्हारी हो गई ।


वस्तुत: ऋतु पर्व के रूप मे मनाया जाने वाला यह फागुनी पर्व जन जन को आनंद से भर देता है । वन-प्रांतरों मे प्रकृति की मनमोहक छ्टा राग रंग की लालसा जगाती है । इसीलिए तो प्राचींनकाल से ही यह लोकपर्व मदन महोत्सव के रूप मे लोकमानस पर छा जाता है ।

बहरहाल, रोज कोई न कोई उत्सव मनाने वाले इस देश मे होली के अनेक रूप और अनेक कथाएं हो सकती हैं, परंतु किसी भी रूप मे यह एक मात्र उत्सव नहीं बल्कि लोकजीवन की आनंदमयी धारा है । जिसमें सब मिल कर एकाकार हो जाता है ।
एल.एस.बिष्ट, 11/508, इंदिरा नगर, लखनऊ-16

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

सवालों के घेरे में सरकारी कार्य संस्कृति


 ( एल.एस. बिष्ट ) - देशभक्ति की चाश्नी में डूबी हिंदी फिल्मों की दुनिया से बाहर निकल कर देखें तो देश की एक अलग ही तस्वीर नजर आती है । विकास की सीढीयां चढता यह देश भ्रष्टाचार के मामले में भी कम उन्नति नही कर रहा और इसीलिए भ्र्ष्ट देशों की सूची मे हम काफी ऊपर पायदान में खडे हैं ।
अभी हाल में पैर पसारता यह भ्र्ष्टाचार फिर चर्चा व चिंता का विषय बना । यकायक यह पता चला कि कुछ मंत्रालयों से गोपनीय और महत्वपूर्ण जानकारियां बाहर भेजी जाती हैं । इस सबंध मे दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय मे एक रैकेट का पर्दाफाश किया है । अभी तक मंत्रालय के कुछ कर्मचारियों सहित 12 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है । इन लोगों ने गोपनीय दस्तावेज 5-6 बडी कंपनियों को बेचे थे । गिरफ्तार लोगों मे इन कंपनियों के कुछ बडे अधिकारी भी शामिल हैं ।
अब धीरे धीरे यह भी पता चल रहा है कि इस काम को कुछ अन्य मंत्रालयों मे भी किया जाता रहा है । इसमे कोयला व उर्जा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय शामिल हैं । एक पत्रकार शांतनु सैकिया भी कानून की गिरफ्त मे हैं । इन्हें इस साजिश की एक महत्वपूर्ण कडी माना जा रहा है ।
देखा जाए तो यह कोई ऐसा धमाका नही है जो पहली बार हुआ हो। इस तरह की बातें जब तब चर्चा मे आती रहीं हैं । लेकिन जैसा अक्सर होता है कुछ समय बाद सबकुछ भुला दिया जाता है । 2012 यू.पी.ए सरकार मे रक्षा मंत्री रहे ए.के.एंटनी के कार्यालय मे जासूसी किये जाने की बातें चर्चा में आई थीं । इसके बाद 2013 मे वित्त मंत्री अरूण जेटली के फोन टेपिंग का मामला भी गर्म हुआ था लेकिन समय के साथ सब भुला दिया गया । पिछ्ले वर्ष ही जुलाई मे नितिन गडकरी के घर जासूसी के कुछ उपकरण मिलने की खबर ने सनसनी पैदा की थी । अगर थोडा पीछे देखें तो मुरली देवडा के कार्यकाल मे भी पेट्रोलियम मंत्रालय मे सूचनाएं लीक किए जाने की बात कही गई थी ।
दर-असल इस तरह की बातों को कभी गंभीरता से लिया ही नही गया । अब जब कि देश आर्थिक क्षेत्र के एक नये युग मे प्रवेश कर रहा है इन चीजों का महत्व समझ मे आने लगा है। जिस तरह से यह काम सुनियोजित तरीके से किया जाता रहा है, इससे आभास होता है कि इसकी जडें बहुत पुरानी व गहरी हैं ।
यहां गौरतलब यह है कि देश के सभी नीतिगत फैसले मंत्रालयों मे ही लिए जाते हैं और इन फैसलों से कई प्रकार के लोगों और संस्थाओं का हित जुडा होता है । अगर लिए जा रहे फैसलों की जानकारी समय रहते प्राप्त हो जाए तो इनसे बडा लाभ लिया जा सकता है या फिर संभावित नुकसान से बचा जा सकता है । देश के निजी क्षेत्रों की कंपनियों के हित इन फैसलों से सीधे जुडे होते हैं । इन्हें प्राप्त करने का यह हर संभव प्रयास भी करते हैं । यह पर्दाफाश इस प्रयास की ही एक कडी है ।
सरकारी कार्यालयों व मंत्रालयों के अंदर से इस प्रकार की महत्वपूर्ण सूचनाएं बडे ही नियोजित तरीके से प्राप्त की जाती रही हैं । इसके लिए कंसल्टेंसी एजेंसी बना कर और महत्वपूर्ण सूचनाएं प्राप्त कर कंपनियों को उपलब्ध किया जाता रहा है । यह सूचनाएं मंत्रालय के छोटे कर्मचारियों को पैसे देकर प्राप्त की जाती हैं । यह लोग पैसे के लालच मे पत्रों व टिप्पणियों की फोटोकापी करके इन्हें उपलब्ध कराते हैं । फिर इन्हें बडी कंपनियों को भारी रकम लेकर बेच दिया जाता है ।
गौरतलब यह भी है कि अगर मंत्रालय या फिर किसी भी सरकारी कार्यालय की कार्यशैली को देखें तो यह काम मुश्किल भी नही लगता । चूंकि अभी तक सभी काम फाइलों के माध्यम से होता रहा है इसलिए दस्तावेज को पढना व उसकी कापी करना मुश्किल काम भी नही । फैसले संबधित टिप्पणियां फाइल की नोटशीट मे ही दर्ज की जाती हैं इसलिए ऐसे मे छोटे कर्मचारियों की मिलीभगत से इन्हें आसानी से प्राप्त किया जा सकता है ।
इस मामले मे कानूनी कार्यवाही सरकारी गोपनीय एक्ट ( आफिसियल सीक्रेट एक्ट ) के तहत ही होनी है जिसमें काफी सख्त प्राविधान हैं । यहां तक कि इस एक्ट मे मुकदमा उस स्थिति मे भी चलाया जा सकता है जब किसी व्यक्ति विशेष की नियत देश के हितों को नुकसान पहुंचाने की न भी रही हो । इस एक्ट के तहत मजिस्ट्रेट को विशेष अधिकार प्राप्त हैं । इसमें यह भी प्रावधान है कि अगर कोई कंपनी दोषी पाई जाती है तो कंपनी के प्रबंध तंत्र से जुडे प्रत्येक व्यक्ति यहां तक कि बोर्ड आफ डाइरेक्टरस को भी सजा हो सकती है । इस एक्ट के तहत 3 साल से 14 साल तक की सजा का प्राविधान है ।
लेकिन ऊपरी तौर पर यह कानून जितना सख्त नजर आता है उतना ही इसमे विरोधाभास भी है । सूचना के अधिकार कानून 2005 से इसका सीधा टकराव है । सूचना अधिकार् के तहत् कई सरकारी सूचनाएं सार्वजनिक की जानी चाहिए लेकिन यह एक्ट इन्हें 'गोपनीय' मानता है । जून 2002 मे पत्रकार इफ्तकार गिलानी को इसी आफिसियल सीक्रेट एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था । तब इस पर बडी चर्चा हुई थी । लेकिन अंतत: इस मामले मे परस्पर विरोधाभासी राय मिलने के कारण सरकार को मामला वापस लेना पडा था । सेना की रिपोर्ट मे उन सूचनाओं को ' गोपनीय ' नही माना गया । इस सबंध मे दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि सिर्फ ' सीक्रेट ' का लेबल लगा देने से पत्रकार को इसका दोषी करार नही दिया जा सकता ।
बहरहाल सरकारी गोपनीय कानून मे कई किंतु परंतु हैं । यह भी सच है कि कई बार इस कानून की आड मे आम नागरिकों को जरूरी सूचनाएं भी उपलब्ध नही कराई जाती हैं । यहां यह भी गौरतलब है कि सरकारी कार्यालयों मे भ्र्ष्टाचार रोकने के लिए सर्तकता आयोग भी है जिसका मुख्य कार्य भ्रष्टाचार पर रोक लगाना है । इसके लिए प्र्त्येक सरकारी कार्यालय मे एक सर्तकता अधिकारी की नियुक्ति भी की जाती है लेकिन यह एक औपचारिक्ता मात्र बन कर रह गया है । इसका लाभ भी भ्र्ष्ट कर्मचारियों व अधिकारियों को मिलता है ।

बहरहाल, अब जब कि बात सतह मे आ गई है इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए । मामला पूरी तरह से दस्तावेजों की चोरी, जासूसी और बडे व्यापारिक घरानों को लाभ पहुंचाने का है । इससे तो देश की बजट प्रकिया भी प्रभावित होने की शंका पैदा हो गई है जो एक गंभीर बात है । इसलिए जरूरी है कि इस मामले की तह पर जाकर दोषी लोगों को सख्त सजा दी जाए । इसके साथ ही सरकारी कार्यालयों की कार्य शैली को बदला जाए तथा काम व गोपनीयता के प्रति इन्हें जिम्मेदार बनाया जाए । परम्परागत फाइल व्यवस्था के स्थान पर कम्प्यूटर कार्य संस्कृति को विकसित करके उसे भी तकनीकी तौर पर सुरक्षित बनाया जाना जरूरी है जिससे कोई भी व्यक्ति वहां रहने का अनुचित लाभ न उठा सके ।  

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

यादें- वैलेंटाइन डे / लगता है तुम यहीं कहीं हो

                                                           
( एल.एस. बिष्ट ) -लगता है ऐसा कि तुम यहीं कहीं हो । बिल्कुल चंचल हिरणी की तरह, कुंलाचे मारती हुई । छोटी छोटी बातों मे तुम्हारा रूठना और फिर कुछ दिन के लिए मुंह फुलाना ।समय की तेजधारा मे जिंदगी के रंग चाहे कितने ही चटक या भदेस हो गये हों, तुम्हारी यादों का काफिला आज भी जिंदा है ।
हमारे उस प्यारे से स्कूल की वह लंबी लंबी सैनिकों की बैरकें, शहर की चकाचौंध और शोर-शराबे से दूर, आज भी वहीं खडी हैं । लेकिन अब शायद उसकी दीवारों का इतिहास बदल गया है । बस एक दिन यूं ही जाना हुआ या यूं कहूं कि धुंधलाती तस्वीरों के मिट जाने से पहले उस किशोरवय उम्र के खूबसूरत, मासूम दिनों को जी भर महसूस कर लेने की जिद यह मन कर बैठा ।
कितना बदल गया.......आंखों ने सहज विश्वास नहीं किया । जहां के चप्पे चप्पे पर उम्र की अनगिनत निशानियां थीं उन्हीं का पता राहगीरों से पूछ्ना पडा । लेकिन अच्छा लगा यह देख कर कि आम का वह पेड जिसके नीचे अक्सर तुम मिल जाया करती थी और जिसके खट्टे आम तुम्हें कभी पसंद नही आए, बहुत बडा होकर एक वट वृक्ष की तरह आज भी खडा है । लेकिन चार दशकों के बीते कालखंड् ने उसे भी वैसा नही रहने दिया । अब वह बहुत बूढा , जर्जर और असहाय सा मानो बस अपनी जिंदगी के दिन गिन रहा हो । न जाने हमारे कितने पलों का गवाह रहा है वह । लेकिन उसे इस तरह से बुढाते देखना बिल्कुल अच्छा नही लगा...पता नही क्यों ।
प्रिसिपल सर के कमरे के सामने वाला वह पीपल का पेड अब कहीं नही दिखा और न ही गूलर का वह पेड जिसके मीठे गुलरों को खाने के लिए क्लास के साथियों मे एक होड सी लगी रहती थी । हमारी यादों के ये निशां शायद जमींदोज हो गये ।
वह बडा सा फुटबाल मैदान जो कभी लंच टाइम मे भर जाया करता था और खाने पर झपटती वह चीलें, जिनसे खाना बचाना भी एक जंग जीतने के बराबर हुआ करता था अब शायद दुनिया मे नही होंगी । लेकिन उनका वह झपटना और एक दिन तुम्हारे हाथों पर उनके तेज पंजों का लग जाना, आज भी याद है.....शायद तुम्हे भी ।
रफ्ता रफ्ता गुजरती जिंदगी मे बीते हुए पलों के अक्स अब धुंधलाने लगे हैं । लेकिन फिर भी ऐसा कुछ है कि समय की तेज धारा उन्हें कभी न मिटा सकेगी । तुम्हारा वह चिढाना और घर के नाम से पुकारना....लगता है कल की ही बात है ।

बहुत कुछ है उन यादों के समंदर में । लेकिन कभी सोचता हूं कि जिंदगी मे ऐसा होता तो कैसा होता.....तुम होती तो .....। लेकिन ऐसा हो न सका । तुम कहां हो, पता नहीं दुनिया की इस भीड में.......शायद कभी न तलाश सकूंगा तुम्हे...फिर भी तुम जहां भी हो...हैप्पी वैलेंटाइन डे , नीलू । 

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

राजनीतिक फैसले जिन्होने हार की कहानी लिखी




( एल.एस.बिष्ट )  - भारत विजय के लिए निकला भाजपा का यह चमत्कारिक रथ आखिर रूक ही गया । वैसे तो राजनीति मे जीत और हार सिक्के के दो पहलू हैं लेकिन दिल्ली चुनाव की यह हार अपने आप मे कुछ अलग जरूर है । नौ माह पहले प्रचंड बहुमत से विजयी भाजपा इस कदर चुनावी मैदान मे चारों खाने चित्त गिरेगी, किसी ने सोचा भी नही था । लेकिन ऐसा हुआ और दिल्ली इसकी जीती जागती गवाह बनी । गौरतलब यह है कि इस ऐतिहासिक चुनावी जीत का सेहरा उस इंसान के सर पर बंधा जिसे दो राष्ट्रीय दलों के मजबूत प्रचार तंत्र ने हाशिए पर डाल दिया था ।
सपनों सी यह विजयी कहानी न सिर्फ अदभुद है बल्कि चमत्कारिक भी । कौन कह सकता था कि सिर्फ नौ माह पहले आम चुनाव मे परास्त , पस्त एक नव नवेली राजनीतिक पार्टी इस कदर दिल्ली का मन मोह लेगी और चुनावी इतिहास मे एक ऐसी जीत दर्ज करेगी जिसे शायद भुला पाना मुश्किल होगा । बडे बडे राजनीतिक पंडित अपनी पोथियां बांचते रहे लेकिन दिल्ली के दिल मे क्या था, समझने मे नाकाम रहे । ऐसा इंसान जिसे भगोडा, नौटंकीबाज, नक्सली, देशद्रोही और न जाने कितने विशेषणों से विभुषित किया गया जीत की ऐसी कहानी लिख सकेगा, किसी को उम्मीद न थी । लेकिन उस इंसान ने अकल्पनीय इतिहास लिखा और लोगों ने उस इतिहास को बनते देखा ।
चुनावी विजय की यह कहानी भाजपा और कांग्रेस दोनो के लिए एक हादसे से कम नहीं । लेकिन यह आज का सच है कि दिल्ली ने दोनो राष्ट्रीय दलों को सिरे से नकार दिया । वैसे कांग्रेस के डूबते जहाज के लिए यह हार ताबूद मे एक और कील साबित हुई लेकिन भाजपा व मोदी सरकार के लिए इस हार के मायने कुछ अलग हैं।
उत्साह और उम्मीदों से भरी भाजपा के लिए यह चुनावी जंग एक ऐसा घाव दे गई जिस पर अभी काफी समय तक सोचा जाता रहेगा । लेकिन सतही तौर पर जो दिखाई दे रहा है वह भी कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं । आश्चर्य होना स्वाभाविक ही है कि राजनैतिक कौशल के लिए जाने जानी वाली इस राष्ट्रीय दल के बडे बडे पंडित चुनावी गणित मे आखिर कैसे फेल हो गये । केजरीवाल के त्याग पत्र से उपजे अनुकूल राजनैतिक माहौल को भांपने मे चूक कैसे हो गई । दिल्ली मे केजरीवाल के सत्ता पलायन से उपजे आक्रोश का लाभ भाजपा के पंडितों को क्यों नही दिखाई दिया और जब चुनावी रण्भेरी बजाई तब तक केजरीवाल दिल्लीवासियों के आहत दिल पर मलहम लगा चुके थे । जमीन मे पडे यौध्दा को उठने के लिए इतना समय प्रर्याप्त था । गलत समय का चुनाव करना अंतत: ऐतिहासिक हार का कारण बना ।
यही नही, मोदी और अमित साह के लिऐ गये फैसले घातक सिध्द हुए । जो किरन बेदी कल तक पूरी राजनीतिक संस्कृति और नेताओं की खिल्ली उडा रही थी उसे न सिर्फ दल मे शामिल किया बल्कि मुख्यमंत्री पद के लिए घोषित भी कर दिया

और वह भी दिल्ली ईकाइ के नेताओं के सम्मान और प्रतिष्ठा की कीमत पर । पैराशूट से उतारी गई किरन बेदी को भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता स्वीकार करने को कतई तैयार नही थे लेकिन यह फैसला था मोदी और अमित साह का , जो घातक सिध्द हुआ । हंटरवाली छवि का भी नुक्सान उठाना पडा । किरन बेदी के स्थान पर किसी और का नाम संभवत: इतनी बडी हार को न्योता न देता । बात यही तक नही रही । शाजिया इल्मी और बिन्नी जैसे लोगों को दल मे शामिल कर एक और गलती कर डाली । यानी दूसरे दलों के अवसरवादी लोगों के लिए दल का दरवाजा खोलना भी हार का कारण बना ।
मोदी जी के राजनैतिक कौशल मे भी कुछ चूकें रही हैं । गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री को न बुलाना भी दिल्लीवासियों को अच्छा नही लगा । यह एक ऐसा देश है जहां खुशी के अवसर पर दुश्मन को भी न्योता देने की परंपरा रही है । इससे लोगों मे केजरीवाल के प्रति सहानुभूति का जागना स्वाभाविक ही था । इसके अतिरिक्त केजरीवाल के लिए स्वयं मोदी जी ने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया वह भी दिल्ली के लोगों को पसंद नही आया । यानी नकारात्मक प्रचार ने रही सही कसर पूरी कर दी । यह अतिवादी प्रतिक्रियाएं दर-असल ' केजरी फोबिया ' का परिणाम थीं जिससे बचा जाना चाहिए था ।
मुस्लिम वोटों का एकजुट होना और लडाई मे कांग्रेस का बेहद कमजोर रह्ना भी आप पार्टी के पक्ष मे ही गया । दर-असल भाजपा के राजनैतिक पंडित इसे त्रिकोणीय या चतुष्कोरणीय लडाई न बना सके । यहीं पर कौशल की जरूरत थी जिसमे चूक हुई और सीधी लडाई मे हार का मुंह देखना पडा ।

बहरहाल लडाई खत्म हो चुकी है और दिल्ली ने दिल खोल कर आप पार्टी तथा केजरीवाल जी को अपना समर्थन दिया है । इस दल की अलग राजनैतिक संस्कृर्ति की दिशा और दशा क्या होगी , यह तो समय के गर्भ मे है लेकिन इतना अवश्य है कि अब देश मे आम आदमी की राजनैतिक सोच बदलने लगी है और वह वादों को हकीकत मे बदलता देखना चाहता है । दिल्ली वालों से किए गये वादे और उन्हें दिखाई गई सपनों की दुनिया हकीकत मे कितना तब्दील हो पाती है इस पर ही केजरीवाल और उनकी आप पार्टी का भविष्य निर्भर है । लेकिन भाजपा और मोदी जी को भी फिर से चिंतन करने की जरूरत है । अगर इस चुनाव् की हार से कुछ न सीखा गया तो निकट भविष्य मे राज्यों मे होने वाले चुनाव राजनैतिक हादसों की कहानी लिखेंगे ।  

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

क्रिकेट महाकुंभ में भारत की चुनौती




(एल. एस. बिष्ट ) - क्रिकेट का महाकुंभ दस्तक दे रहा है लेकिन इस बार कोई खास उत्तेजना और उत्साह दिखाई नही दे रहा । इसका कारण दिल्ली का हाई प्रोफाइल चुनाव भी हो सकता है और भारतीय क्रिकेट टीम की आष्ट्रेलिया मे हुई दुर्गत से उपजी निराशा भी । बहुत संभव है संतुष्टि का भाव भी एक कारण हो कि 2011 का वर्ल्ड कप तो जीत ही चुके हैं । लेकिन इतना अवश्य है कि 14 फरबरी से हो रहे इस क्रिकेट कुंभ को लेकर वह बात दिखाई नही दे रही ।
तमाम संभावित कारणों मे से संभवत: सबसे बडा कारण इस बार भारत की दावेदारी का कमजोर दिखाई देना भी हो सकता है ।वैसे तो क्रिकेट बोर्ड और कुछ भूतपूर्व खिलाडी बडे बडे दावे कर रहे हैं लेकिन आम भारतीय क्रिकेट प्रेमी इन दावों मे जरा भी सच्चाई नही देख पा रहा । सट्टा बाजार के संकेत भी भारत के पक्ष मे नही दिखाई दे रहे हैं । यानी कुल मिला कर एक निराशा का माहौल है ।
क्रिकेट के इस सबसे बडे उत्सव मे भारतीय संभावनाओं को तलाशने का प्रयास करें तो उम्मीदों का कोई आधार नजर नही आ रहा सिवाय इसके कि भारत इस खेल का गत विजेता है । धोनी कोई चमत्कार दिखा सकेंगे इसकी संभावना भी कम ही दिखाई देती है । इसका एक बडा कारण है कि 2011 के वर्ल्ड कप मे मिली जीत के कारणों को सही तरीके से समझा ही नही गया । धोनी की कप्तानी और युवा चेहरों को जिस तरह से महिमा मंडित किया गया उसने सच को कहीं पीछे धकेल दिया था ।
देखा जाए तो पिछ्ले वर्ल्ड कप की जीत का एक बडा कारण वर्ल्ड कप का भारतीय उपमहादीप मे होना था । फाइनल भी मुबंई के वानखेडे स्टेडियम मे खेला गया था और इसका लाभ भारतीय टीम को मिला । वैसे कमोवेश  इस महादीप मे होने का भरपूर लाभ इस क्षेत्र की सभी टीमों को मिला था । यही कारण  रहा  कि अंतिम चार मे  सिर्फ न्यूजीलेंड को छोड कर बाकी तीन टीमें इस महादीप की ही रहीं ।
यहां की पिचें स्पिन गेंदबाजी के अनुकूल रही हैं । जिसमें भारत का पक्ष हमेशा से मजबूत रहा है । दूसरी तरफ क्रिकेट की दूसरी दिग्गज टीमों की ताकत हमेशा से उनकी तेज गेंदबाजी रही है और यहां की बेजान धीमी पिचों पर उनके तेज गेंदबाज प्रभावहीन साबित हुए । अपनी जमीन का भरपूर लाभ भारतीय टीम को मिला जिसने कप तक पहुंचने का रास्ता आसान कर दिया और अंतत: भारतीय टीम विजयी हुई ।
एक् दूसरा बडा कारण जिसको नजरअंदाज कर दिया गया या फिर खेल राजनीति के चलते श्रेय देना ही उचित नही समझा वह् था वरिष्ठ खिलाडियों का योगदान । सचिन, सहवाग, युवराज , गौतम गंभीर, मुनाफपटेल, हरभजन व जहीर खान जैसे वरिष्ठ खिलाडियों का बहुत अच्छा प्रदर्शन रहा था । युवराज सिंह को तो " प्लेयर आफ द टुर्नामंट " होने का सम्मांन भी मिला था । आज इस वर्ल्ड कप मे इनमें से कोई भी खिलाडी टीम मे सम्मलित नही है ।
अब यदि 2015 के इस खेल महाकुंभ के लिए चुने गये 15 खिलाडियों पर नजर डालें तो सभी युवा चेहरे ही दिखाई देते हैं सिवाय धोनी के । इस दल मे  कोहली, शेखर धवन, रोहित शर्मा, रहाने, रिध्दिमान साह, बिन्नी, भुवनेश्वर सिंह, उमेश यादव, अमित मिश्रा व मुरली विजय जैसे युवा चेहरे हैं । अभी हाल मे आष्ट्रेलिया व इग्लैंड मे इन खिलाडियों का शर्मनाक प्रदर्शन किसी से छिपा नहीं है । इस युवा टीम को एक भी जीत नसीब नही हुई । यहां तक कि त्रिकोणीय सीरीज मे यह फाइनल तक न पहुंच सके । टेस्ट टीम के रूप मे तो यह युवा भारतीय टीम अपनी चमक पहले ही खो चुकी है ।
भारतीय गेंदबाजी और बल्लेबाजी की धार को परखने  का प्रयास करें तो यहां भी निराशा ही दिखती है । इस भारतीय टीम मे एक भी मैच जिताऊ गेंदबाज नही दिखाई देता । गंभीरता इस बात से ही समझ मे आ जाती है कि आज एक दिनी प्रारूप मे दुनिया के टाप दस गेंदबाजों  मे एक भी भारतीय गेंदबाज शामिल नही है । जब कि पाकिस्तान के सईद अजमल, बांग्ला देश के शाकिब अली हसन दस गेंदबाजों मे शामिल हैं । ईशांत शर्मा, भुवनेश्वर कुमार व उमेश यादव जिन पर तेज गेंदबाजी का दारोमदार रहेगा, बेरंग नजर आ रहे हैं । महत्वपूर्ण आखिरी ओवरों के लिए जहीर खान जैसा गेंदबाज टीम मे नही दिखाई देता । रविन्द्र जडेजा व अश्वनि आष्ट्रेलिया - न्यूजीलैंड की तेज पिचों मे कोई चमत्कार कर सकेंगे, संभव नही लगता ।
अब रही बल्लेबाजी की बात तो अपनी मजबूत बल्लेबाजी के लिए जाने जानी वाली भारतीय टीम अब इस पहलू से भी कमजोर दिखाई देने लगी है । एक दिनी प्रारूप मे विराट कोहली के अलावा किसी भी बल्लेबाज का प्रदर्शन विश्वसनीय नही है । दवाब मे भारतीय मजबूत बल्लेबाजी अब ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती है ।
खेल के इस प्रारूप मे हरफनमौला खिलाडियों का विशेष महत्व रहता है । इस द्र्ष्टि से भी भारतीय टीम बेहद गरीब नजर आती है । टाप दस मे सिर्फ रविन्द्र जडेजा को स्थान मिला है जबकि आष्ट्रेलिया , पाकिस्तान व श्रीलंका प्र्त्येक के दो दो खिलाडी इस सूची मे शामिल हैं । गौरतलब है कि हरफनमौना खिलाडी निर्णायक भूमिका अदा करते हैं ।
यानी कुल मिला कर इस क्रिकेट महाकुंभ मे भारतीय चुनौती दमदार नजर नही आती । चमत्कारों के बादशाह धोनी कोई चमत्कार कर बैठे तो दीगर बात है । वैसे टीम को इस कमजोर स्थिति मे लाने का श्रेय भी धोनी को ही जाता है । दर-असल 2011 के वर्ल्ड कप के बाद  धोनी ने मानो प्रतिज्ञा ले ली हो कि 2015 वर्ल्ड कप को सीनियर विहीन करना है । उसमे वह सफल भी हुए । कम से कम युवराज सिंह, गौतम गंभीर, हरभजन व जहीर खान को तो शामिल किया ही जा सकता था । तब यह भारतीय टीम एक संतुलित टीम दिखाई देती । यह खिलाडी इतने बूढे भी नही हैं कि इस खेल कुंभ मे उनके हाथ पैर कांपते दिखाई देते । इनसे भी उम्र दराज खिलाडी दूसरी टीमों मे आज भी खेल रहे हैं । यह तो सिर्फ धोनी की जिद और अहम का नतीजा है ।
कुल मिला कर देखें तो बेशक् भारत पूल ' बी ' मे आयरलैंड, वेस्ट इंडीज, जिम्वाबे व अरब अमीरात जैसी कमजोर टीमों को हरा कर दूसरे चक्र मे पहुंच जाए लेकिन जब मुकाबला पूल ' ए ' की आष्ट्रेलिया ,इंग्लैड व न्यूजीलैंड् जैसी टीमों से होगा तो अंतिम चार मे पहुंचने का सफर बेहद कठिन होगा । वैसे भारतीय टीम की पहली  परीक्षा ही 15 फरबरी को एडिलेट मे होगी जहां उसे पाकिस्तान से खेलना होगा ।
29 मार्च को मेलबोर्न क्रिकेट ग्राउंड मे होने वाले फाइनल मैच की एक टीम भारत की होगी या नही, यह तो समय ही बताऐगा लेकिन सिर्फ युवा और अनुभवहीन खिलाडियों के बल पर यहां तक पहुंचने का सफर कठिन जरूर दिखाई दे रहा है ।