मंगलवार, 15 सितंबर 2015

गैर जरूरी मुद्दों मे उलझी राजनीति


( एल. एस. बिष्ट ) -आजादी के बाद हमारे संविधान निर्माताओं ने देश के लिए जिस लोकतांत्रिक प्रणाली को अनुकूल माना उसमें उम्मीद की गई थी कि समय के साथ हमारा यह लोकतंत्र राजंनीतिक रूप से परिपक्व होता जायेगा । देश अपने सभी नीतिगत फैसले व अपनी समस्त राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक समस्याओं को संविधान के दायरे मे रह कर ही हल करेगा । इस तरह परिपक्व होता लोकतंत्र विकास की राह पर अग्रसर रहेगा । लेकिन आज इस राजनीतिक प्रणाली के तहत देश की जो दशा और दिशा है उसने कई गंभीर सवाल खडे कर दिये हैं । कहां तो उम्मीद की गई थी  एक परिपक्व राजनीतिक परिवेश की और आज कहां सतही और गैरजरूरी मुद्दों तक सीमित रह गया है राजनीतिक चिंतन व सरोकार ।

इधर कुछ समय से संसद के अंदर और बाहर जिन मुद्दों पर बहस की जा रही है वह न सिर्फ गैर जरूरी हैं बल्कि अहितकारी भी हैं । इन अनावश्यक मुद्दों पर बहस को केन्द्रित करने का ही परिणाम है कि देश के विकास के लिए नीतिगत फैसले कहीं हाशिए पर आ गये हैं । चाहे-अनचाहे इनकी उपेक्षा हो रही है । ऐसा सिर्फ संसद के बाहर या मीडिया वाक युध्द मे ही नही हो रहा बल्कि संसद के अंदर भी यही गैरजरूरी मुद्दे छाये हुए हैं । गौर करें तो पूरे मानसून सत्र  की बलि या तो राजनीतिक हठ धर्मिता के कारण चढी  या फिर अनावश्यक मुद्दों पर बहस के कारण ।
इधर फिर एक और मुद्दा चर्चा का विषय बना । महाराष्ट्र सरकार ने जैन समुदाय की धार्मिक भावनाओं को देखते हुए कुछ विशेष दिनों के लिए मांस की बिक्री पर प्रतिबंध क्या लगाया कि मानो आसमान सर पर गिर गया । राजस्थान सरकार ने भी इसी  तर्ज पर जैन समुदाय के पर्युषण पर्व के अवसर पर मांस बिक्री पर रोक के आदेश पारित किये । इसके विरूध्द शिवसेना ने सडकों पर आकर विरोध दर्ज कराया । यही नही, इसके चलते जैन समुदाय के लिए ऐसा कुछ भी कहा गया जिसे अच्छा तो नही कहा जा सकता ।
मांस प्रतिबंध को लेकर की गई कुछ राजनीतिक दलों की यह घटिया राजनीति एक अकेला उदाहरण नही है । इसके पूर्व भी तमाम ऐसे मुद्दों पर माहौल गर्म रहा है जिनका देश के विकास से दूर दूर तक कोई रिश्ता ही नही था । अधिकांश ऐसे मामलों ने सामाजिक सौहार्द बिगाडने मे ही अपनी भूमिका निभाई । आज स्थिति यह है कि किसी सामाजिक मुद्दे पर सही संदर्भ व परिप्रेक्ष्य मे भी चर्चा की जाए तो जल्द ही उसका मूल चरित्र बिगाड कर तिल का ताड बनाने मे कोई विलंब नही होगा । ऐसी सोच ने कमोवेश प्र्त्येक राजनीतिक दल को अपनी गिरफ्त मे ले लिया है ।
आश्चर्य तो तब होता है जब कई बार गांव-कस्बे स्तर के मुद्दे भी राष्ट्रीय बन जाते हैं । उनमें उलझ कर हमारे राजनेता संसद का कीमती वक्त बर्बाद करते हैं । दुखद तो यह है कि यह प्रवत्ति कम होने की बजाए बढती जा रही है । हमारे न्यूज चैनलों की गैरजिम्मेदार पत्रकारिता आग मे घी का काम कर रही है ।
इस प्रवत्ति का ही परिणाम है कि जिन मुद्दों व समस्याओं पर चर्चा व हंगामा किया जाना चाहिए वह कहीं किनारे हाशिए पर उपेक्षित पडे रहते हैं । अभी हाल मे दिल्ली मे एक् दपंति ने इसलिए आत्महत्या कर ली कि उनका बच्चा जो डेंगू से पीडित था समय पर  इलाज न मिलने के कारण असमय काल का ग्रास बना । वह उस सदमे को न सहन कर सके तथा उन्होनें अपनी भी जीवन लीला समाप्त कर दी । इस दर्दनाक हादसे ने दिल्ली के निजी अस्पतालों के जिस अमानवीय चेहरे को उजागर किया है बहस और हंगामा उस पर किया जाना चाहिए । इस तरह की यह पहली घटना नही है । इसके कुछ ही दिन पूर्व दिल्ली के ही एक निजी अस्पताल ने परिजनों को एक शव  इसलिए देने से इंकार कर दिया था कि भारी भरकम बिल के एक छोटे से हिस्से का भुगतान परिजन करने मे असमर्थ थे ।
इसी तरह शहरों व महानगरों मे बुजुर्गों की जिस तरह सरेआम हत्या कर लूट पाट की जा रही हैं, बहस-चर्चा व हंगामा इस मुद्दे पर किया जाना चाहिए । लेकिन शायद ही कोई राजनीतिक दल इस पर शोर मचाता हो । यही नही जिस तरह बच्चों के अपहरण की घटनाएं बढ रही हैं तथा फिरौती के कारण उनकी ह्त्यायें की जा रही हैं , इस पर भी संसद के अंदर बहस की जानी चाहिए । आम आदमी की गाढी कमाई को जिस तरह से किस्म किस्म के हथकंडों से ठगा जा रहा है यह भी चर्चा का विषय बनना चाहिए । मुद्दे तो अनेक हैं लेकिन उन पर शायद राजनीति की रोटी नही सेकी जा सकती इसलिए खामोशी की एक चादर पडी रहती है । जरूरत है ऐसे  मुद्दों पर मुखर होने की , सडक से लेकर ससंद तक । वोट बैंक और सुविधा की राजनीति के मोह से मुक्त हो ऐसी सोच कब विकसित होगी , पता नही । लेकिन होनी चाहिए । 

बुधवार, 9 सितंबर 2015

प्यार पर यह कैसा विवाद

कुछ वर्ष पूर्व एक फिल्म आई थी " नि:शब्द " । अमिताभ बच्चन और नई तारिका जो दुर्भाग्य से अब इस दुनिया मे नही है यानी जिया खान की अदाकारी से ज्यादा इस फिल्म की कथावस्तु चर्चित व विवादास्पद रही थी । दर-असल इस फिल्म मे एक उम्रदराज व्यक्ति (अमिताभ) का अपनी बेटी की सोलह वर्षीय  सहेली(जिया खान) के प्रति आकर्षण को बडी खूबसूरती से परदे पर फिल्माया गया था । इस फिल्म का विवादास्पद व विरोध का विषय बनना स्वाभाविक ही था । क्योंकि जिंदगी के जिस पहलू को छुआ गया था उस पर रूढिवादी सोच की मोटी चादर डालना ही बेहतर व सुविधाजनक समझा जाता रहा है ।
                    इधर दिग्विजय सिंह व अमृता राय ने असल जिंदगी मे उन मानवीय भावनाओं को सतह पर ला खडा किया है जिन पर रूढिवादी सोच की  मोटी चादर हटा कर अभी गहंनता व पूरी संवेदनशीलता से सोचा जाना बाकी  है । ऐसे मे 68 वर्ष के उम्रदराज किसी व्यक्ति का 44 वर्षीय किसी युवती से प्यार करना व फिर विवाह बंधन मे बंधना सवाल तो उठायेगा ही । दर-असल यह इंसानी जिंदगी का एक ऐसा संवेदनशील पहलू है कि प्यार, कसमें-वादे, बरखा-सावन जैसे  शब्दों पर स्याही उडेलने वाले तमाम कवि व शायर भी आंखें तरेरते देखाई देते हैं । प्यार को उसके कई कई रूपों मे परदे पर फिल्माने वाले फिल्मकार भी असल जिंदगी मे " मोहब्बत जिंदाबाद " कहने मे सकुचाते दिख रहे हैं । यही नही, किसी अदालत मे लव मेरिज कराने वाले मजिस्ट्रेट और द्स्तावेजों पर लव मैरिज की मुहर लगाने वाले भी सहजता से इस प्यार पर भी अप्नी मुहर लगा सकेंगे, कहना मुश्किल है । यानी सदियों से प्यार का दुश्मन समझे जानी वाली निष्ठुर दुनिया यहां भी पसीजती नजर नही आ रही ।
                  दर-असल प्यार व काम भावना को हमने उम्र की सीमाओं मे बांध दिया है। जब कभी इन सीमाओं का उल्लघंन होता दिखाई देता है तो हम असहज हो जाते हैं । अपने आप से पूछ्ने लगते हैं ' ऐसा कैसे हो सकता है ' ? । जबकि वास्तविक सच यह है कि प्यार व काम भावना किसी उम्र की मोहताज नही होती । थोपे गये बंधन व आदर्श इन्हें अनचाहे ही कैदी बना देते हैं । जब कभी कोई प्रेमी इनमे विद्रोह के स्वर भर देता है तो समाज की बनाई गई जेल की दीवारों पर दरकने की आवाज सुनाई देने लगती है और समाज अपनी जेल बचाने के लिए विरोध के स्वर ऊंचा कर देता है ।
                      दिग्गि राजा व अमृता की प्रेमकथा इसी विद्रोह का प्रतीक है । वैसे भी देखा जाए तो इन प्रेमियों ने प्यार को उसके सही अर्थों मे परिभाषित ही किया है कि प्यार उम्र का मोहताज नही होता । वैसे भी सच तो यह है कि प्यार की दुनिया है ही ऐसी कि कुछ चीजें कभी समझ मे नही आतीं । अगर हम इस प्यार को 68 और 44 के आंकडे से बाहर निकल कर देखें तो शायद यहां भी प्यार के वही रंग दिखेंगे जो सदियों से इंसान को सम्मोहित करते आये हैं और जिन पर दिमाग नही दिल की हुकूमत चलती है । वही प्यार तो है जिसकी तरंगों ने दुनिया के न जाने कितने देशों का इतिहास ही नही भूगोल भी बद्ल दिया । वही प्यार जिसमे राजा रंक भी हुए हैं और किसी रूपवती ने किसी रंक को अपने दिल मे बसाने मे कोई संकोच भी नही किया ।प्यार की इस दुनिया मे अपने प्यार को पाने के लिए जान लेने वालों का भी इतिहास है और अपने प्यार के लिए जान गवाने वालों का भी । इसलिए प्यार की इस तिलिस्मी, खूबसूरत दुनिया मे गुड लक दिग्गि राजा-अमृता । 

सोमवार, 31 अगस्त 2015

दरकते रिश्तों की त्रासदी

( एल.एस. बिष्ट ) - मुबंई के बहुचर्चित शीना बोरा हत्याकांड ने आज सभ्यता के ऊंचे पायदान पर खडे हमारे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया । दर-असल अपराध के नजरिये से देखें तो इसमें ऐसा कुछ भी नही जिसे देख या सुन कर कोई हैरत मे पड जाए या जो कल्पना से परे लगे । यह ह्त्याकांड इसलिए भी खास नही कि इस कहानी की नायिका यानी इंद्राणी मुखर्जी ने कपडों की तरह अपने पति बदले। न ही इसलिए कि इस ह्त्या कथा का जाल एक औरत के दवारा बुना गया जिसे भारतीय समाज मे अबला समझा जाता रहा है । दर-असल इस घृणित हत्या कथा ने हमारे समाज के उस चेहरे को उजागर किया है जिससे हम मुंह चुराते आए हैं । ग्लैमर की चकाचौंध के पीछे भी अंधेरे की एक दुनिया आबाद रह सकती है, इस सच से हम रू---रू हुए ।
इंसानी जिंदगी के चटक़ और भदेस रंगों को समेटे यह ह्त्याकथा हमे उस दुनिया मे ले जाती है जहां सतह पर ठहाकों की गूंज सुनाई देती है और थोडा अंदर जाने पर सिसकियों और बेबसी का ऐसा क्र्दंन कि सहज विश्वास ही न हो । दर-असल विश्वास न होने के भी अपने कारण हैं । भला एक रंगीन, चहकती और खुशियों मे मदहोस दुनिया के अंदर की परतों मे इस कदर उदासी और अवसाद का दमघोंटू अंधेरा होगा, भला कैसे सोचा जा सकता है । लेकिन यह भी एक सच है, इसे इंद्राणी और शीना की इस पेचीदी कहानी ने पूरी शिद्दत से सामने रखा है ।
देखा जाए तो यह कहानी सिर्फ शीना बोरा की हत्या की कहानी नही है बल्कि यह कहानी है इंसानी महत्वाकांक्षाओं, सपनों और उडानों की । एक ऐसी लडकी की कहानी जिसका स्वंय का बचपन एक् भयावह सपने से कम नही था । जिसे स्वंय घर की चाहरदीवारी के अंदर की ऐसी जिंदगी से गुजरना पडा जिस पर सात परदे डालने की ' दुनियादार प्रथा ' आज भी कायम है । उसे एक ऐसी जिंदगी जीने को अभिशप्त होना पडा जहां सिसकियां भी दम तोड देती हैं ।
लेकिन महत्वाकांक्षाओं के रथ पर सवार उस लडकी ने अपने लिए एक ऐसी दुनिया रच डाली जो उसकी उम्र की लडकियों के लिए दिवास्वप्न देखने जैसा ही है । लेकिन इंद्राणी के लिए यह एक हकीकत की दुनिया थी जहां उसने वह सबकुछ पाया जिसकी चाह उसे अपने किशोरवय उम्र के सपनों मे रही होगी
लेकिन सपनों सरीखी इस जिंदगी को जिन मूल्यों पर हासिल किया यही इस ह्त्याकांड का सबसे भयावह सच है । पति परमेश्वर की अवधारणा पर टिके समाज को जिस तरह वह ठेंगा दिखाती हुई , कपडों की तरह अपने लिए पति बदलती रही, इसने एक बडा सवाल हमारे सामाजिक मूल्यों पर उठाया है । यही नही, दया और ममता की जीती जागती मूर्ति समझे जाने वाली मां के किरदार मे जिन रंगों को भरा उसने सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि आखिर हम किस दिशा की ओर बढने लगे हैं ।
दर-असल गौर करें तो इधर उपभोक्ता संस्कृर्‍ति ने एक ऐसे सामाजिक परिवेश को तैयार किया है जहां हमारे परंपरागत सामाजिक मूल्यों का तेजी से अवमूल्यन हुआ है । नैतिक-अनैतिक जैसे शब्द अपना महत्व खोने लगे हैं । महत्वाकांक्षाओं और सबकुछ पा लेने की होड मे अच्छे बुरे के भेद की लकीर न सिर्फ कमजोर बल्कि खत्म सी होती दिखाई देने लगी है । समाज के हर स्तर और पहलू पर यह गिरावट साफ तौर पर देखी जा सकती है ।
देश के किसी भी शहर के अखबार पर नजर डालें तो एहसास हो जाता है कि हम एक ऐसी बदलती दुनिया का हिस्सा बन चुके हैं जहां वासना और ख्वाहिशों की मिनारें रोज--रोज ऊंची होती जा रही हैं । पत्नी अपने प्रेमी के लिए और पति अपने ' सपनों की रानी ' के लिए उन हदों को भी लांघ सकता या सकती है, जिनके मजबूत बंधनों पर भारतीय समाज गर्व करता रहा है । ऐसी घटनाएं अब किसी अखबार की सुर्खियां भी नही बनतीं क्योंकि यह हर शहर गांव कस्बे का सच बनती दिखाई दे रही है ।
अभी हाल के वर्षों की कुछ घटनाओं पर नजर डालें तो वासना की आंधी मे गिरते हुए मूल्यों की हकीकत को समझा जा सकता है । यही नही, प्यार और कामवासना मे अपना विवेक खो देने वाली अमरोहा ( .प्र. ) की उस लडकी को लोग अभी भूले नही हैं जिसने प्रेमी के साथ मिल कर पूरे अपने परिवार की ही ह्त्या कर दी थी । अभी हाल मे लखनऊ शहर के मडियाव मे एक महिला ने छ्ह साल के एक मासूम की जान सिर्फ इसलिए ली कि वह अपने प्रेमी के साथ फिरौती से मिले पैसों से ऐश कर सके । वह महिला रिश्ते मे उस बच्चे की सगी चाची थी ।
इस तरह की घटनाएं किसी एक शहर या राज्य तक सीमित नही हैं । इनका चंहुमुखी विस्तार हुआ है । ऐसा भी नही कि यह वर्ग विशेष तक् सीमित हो बल्कि यह जहर हर वर्ग को अपनी चपेट मे ले चुका है । अगर एक तरफ शहरी मध्यम वर्ग के आकाश छूते सपने हैं तो दूसरी तरफ उच्चवर्ग मे ऐशो आराम की ग्लैमर भरी जिंदगी की ख्वाहिशें कम हिलोरें नही मारतीं । किसी को पावर की भूख है तो किसी को खूबसूरत जिस्मों की तो कोई सपनों सी जिंदगी जीने को आतुर दिखाई देता है । यानी कुल मिला कर जिंदगी जीने की वह पुरानी सामाजिक अवधारणाएं अब कहीं हाशिए पर आती नजर आ रही हैं ।
बात यहीं तक नही है । बल्कि इन्हें पाने की एक ऐसी होड भी जिसमे सबकुछ लुटा कर भी पाने का दुस्साहस दिखाई दे रहा है । इस तरह देखा जाए तो बात चाहे इंद्राणी मुखर्जी की महत्वाकांक्षा भरी जिंदगी की हो या फिर उन महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढती शीना की जिंदगी की या फिर एक गुमनाम सी जिंदगी जीते मिखाइल या फिर मां बाप के अजीब रिश्तों की सजा भुगतने वाली विधि की , सभी को कहीं न कहीं बदले हुए उन मूल्यों ने ही डसा है जिनमे रिश्ते-नातों का कोई मूल्य नही रह जाता । भावनाएं महत्वाकांक्षाओं की बलि चढ जाती हैं ।

यह वह मूल्य हैं जो उपभोक्ता संस्कृति से उपजे हैं । और जिनका नशा सर चढ कर बोलता है और अंतत: उस मोड पर आकर खत्म हो जाता है जहां जिंदगी अपना अर्थ खो देती है । दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि इस अंधेरे का घेरा हमारी जिंदगी मे कसता ही जा रहा है । हम इससे मुक्त हो सकेंगे या नही, यही एक बडा सवाल है । 

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

बैसाखियों की दरकार


( एल.एस. बिष्ट ) - यह कहीं अच्छा और सुखद होता अगर गुजरात मे यह आंदोलन आरक्षण पाने के लिए नही बल्कि आरक्षण खत्म करने के लिए किया जाता । लेकिन जब देश की नसों मे स्वार्थ का रक्त संचारित होने लगा हो तो ऐसी आशा करना दिवास्वप्न देखने जैसा हो जाता है । दरअसल इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि पिछ्ले कुछ दशकों से भारतीय समाज व्यापक हितों से हट कर संकीर्ण स्वार्थों की सोच का शिकार बन कर रह गया है । राजनीतिक परिद्रश्य को ही देखें तो यहां भी व्पापक हित की सोच सिरे से नदारत है ।महज अपने हित की राजनीति को ही राजनीति का उद्देश्य मान लिया गया है । गौर करें तो स्वार्थ की यह सोच राजनीति के गलियारों से होती हुई सामाजिक जीवन के हर पहलू मे समाहित हो गई है ।
गुजरात जिसने विकास के एक माडल के रूप मे अपनी पहचान बनाई और दूसरों के लिए भी समृर्‍ध्दि के नये मुहावरे गढे, रातों रात असंतोष की आग मे जलने लगा । आश्चर्य यह कि वह उस समुदाय के कोप का शिकार बना जिसकी राजनीति से लेकर आर्थिक व सामाजिक सभी क्षेत्रों मे एक महत्वपूर्ण भागीदारी रही है । पटेलों का यह समाज एक ताकतवर व समृर्‍ध्द समाज के रूप मे जाना जाता है । यही नही, गुजरात की क्षेत्रीय राजनीति भी इनके इर्द गिर्द ही घूमती दिखाई देती है। फिर ऐसा क्या हो गया कि यह समुदाय अपने आप को पिछ्डा समझने लगा है । नब्बे के दशक मे हुए आरक्षण विरोधी आंदोलन एक हिस्सा बने इस पटेल समुदाय को ही आरक्षण की बैसाखी क्यों रास आने लगी है ।
इतिहास मे थोडा पीछे जांए तो पता चलता है कि संविधान सभा मे शामिल सदस्यों के बीच इस आरक्षण व्यवस्था को लेकर मतभेद था । लेकिन दलित समाज व जन-जातियों की जो दयनीय सामाजिक-आर्थिक स्थिति उस दौर मे थी उसे देखते हुए इन जाति समुदायों के लिए संविधान मे 15 7.5 प्रतिशत के आरक्षण की व्यवस्था पर सहमति बन ही गई । लेकिन दस वर्ष उपरांत इसकी समीक्षा की जानी थी । बस यहीं से देश का दुर्भाग्य इससे जुड गया और वोट की राजनीति से जुड आरक्षण व्यवस्था ने स्थायी रूप ले लिया
भारतीय राजनीति दलित आरक्षण के इस प्रेत से अभी मुक्त हो भी न सकी थी कि संकीर्ण राजनीति ने कोढ पर खाज का काम कर दिया । कमंडल के प्रभाव को खत्म करने के उद्देश्य से वी.पी.सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए पिछ्डी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा कर दी । बस यहीं से शुरू हुई सरकारी सेवाओं मे आरक्षण पाने की चुहा दौड जो आज भी जारी है ।
उत्तर भारत ही नही, दक्षिण भारत मे भी राजनीतिक हितों को देखते हुए पिछ्डी जातियों का चयन किया जाने लगा । ऐसे मे उत्तर व दक्षिण मे कई ताकतवर जातियां राजनीतिक समीकरणों के चलते पिछ्डे वर्ग मे शामिल कर दी गईं । देखा देखी दूसरी जातियों ने भी इसके लिए संगठित होना शुरू किया ।
उत्तर भारत मे राजस्थान, हरियाणा व प. उत्तर प्रदेश के एक ताकतवर जाट समाज ने भी आरक्षण के लिए गुहार लगाना शुरू कर दिया है । जब कि कभी अपने को पिछ्डा कहे जाने पर इन्हें सख्त विरोध था । यही स्थिति पटेलों की भी रही है । लेकिन आज यह भी इस ठ्सक को किनारा कर पिछ्डा कहलाने की होड मे लग गये हैं । यह हिंसक आंदोलन इसी का प्रतिफल है ।
यह सबकुछ नही होता अगर समय रहते इस आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने की पहल कर दी जाती । लेकिन वोट राजनीति के चलते ऐसा संभव न हो सका । बल्कि इसे वोट् कमाने का एक माध्यम बना दिया गया । आरक्षण को लेकर की गई स्वार्थपरक राजनीति ने देश के सामाजिक ताने बाने को ही छिन्न भिन्न कर दिया । गुजरात तो महज एक बानगी भर है ।
आसानी से सरकारी नौकरी मिल जाने के लोभ ने जातीय समुदायों को संगठित कर लडने का साहस दिया । जाट आंदोलन और अब गुजरात मे पटेल समुदाय की लडाई इसका उदाहरण है । यही नही, आरक्षण अब एक ऐसा मुद्दा बन गया है कि इस लालीपाप को दिखा कर कोई भी रातों रात नेता बन सकता है । हार्दिक पटेल उन्हीं नेताओं मे एक हैं ।
आरक्षण की इस बैसाखी को पाने के लिए अभी कई और जातीय समूह अपनी जमीन तलाश रहे हैं । समय रहते इस खतरे को न समझा गया तो इसका गंभीर परिणाम देश को भुगतना पड सकता है । इसलिए यह समय है कि राजनीतिक स्वार्थों को छोड कर आरक्षण को खत्म करने की पहल राजनीतिक स्तर पर की जानी चाहिए । वरना आरक्षण का यह दैत्य देश के भविष्य पर एक बडा सवाल बना रहेगा ।



मंगलवार, 28 जुलाई 2015

ऐसे तो खत्म न होगी आतंकी दहशत


( L. S. Bisht ) - इस बार गुरदासपुर । पांच नदियों का प्रदेश जिसने हिंसा का एक दौर देखा है, फिर दहल गया है । एक पीढी गुजर गई जिसने पंजाब के उस लहुलुहान चेहरे को देखा और दर्द की चीखें सुनीं । आज फिर चेहरे पर भय की रेखायें । इसलिए नही कि फिर हिंसा के दानवों ने हमारी चौखट पार की है, बल्कि इसलिए कि कहीं यह उस स्याह दौर की दस्तक तो नही जिसे भुलाये जाने की पुरजोर कोशिशें अब भी जारी हैं ।
सीमा पर गोलियों और बम की आवाजों से किसी को सिहरन नही होती ।लेकिन जब यही आवाजें घर के अंदर जहां हम अपने को सबसे ज्यादा सुरक्षित समझते हैं सुनाई देती हैं तो डरना स्वाभाविक ही है । तीन आतंकी आए और फिर हमे घाव दे गये । अब तो लगता है कि हम इन घावों के अभ्यस्त से होते जा रहे हैं । इन घावों से रिसते खून को येनकेन रोकने के लिए मानो हम दवा-पट्टी लेकर हमेशा तैयार बैठे हों ।
आतंकी घटनाओं मे अकाल मृत्यु के ग्रास बने अपने जवानों, अफसरों और नागरिकों को " शहीद " का दर्जा दे मानो फिर मौत की अगली दस्तक का इंतजार करने लगते हैं । रोज--रोज होने वाले यह धमाके और फिर दिल को चीर देने वाली चीखों को मानो हम अपनी नियति मान बैठे हैं । लगता है हर ऐसे हादसे के बाद लाशों को गिनने के लिए हम अभिशप्त हैं । एक सन्नाटा सा पसरा है । जहां किसी को कुछ सूझ नही रहा ।
दर-असल गौर से देखें तो पाकिस्तान प्रायोजित यह आतंकवाद हमारी मानसिक कमजोरी पर बार बार चोट कर हमे आहत कर रहा है । वह जांनता है कि अतीत की सैनिक असफलताएं अब इतिहास बन गई हैं । 1965 हो या फिर 1971 या करगिल युध्द पारंपरिक युध्द शैली मे उसे मुंह की खानी पडी है । आज के हालातों मे भी उसे शिकस्त दिवारों पर लिखी साफ दिखाई दे रही है । लेकिन एक परमाणु सम्पन देश होने का जो तमगा उसने लगा दिया है, इससे वह अपने को ऊंचाई पर खडा देख रहा है ।
बार बार भारत को घाव देने के बाबजूद भारतीय सेना ने सीमाओं की हद नही लांघी । इसे वह अपनी एक उपलब्धी समझने लगा है । यहां तक कि करगिल युध्द मे भी भारतीय सेनाएं अपनी ही जमीन पर खडी थीं । यह उसने स्वयं नंगी आंखों से देखा है ।
कहीं न कहीं परमाणु अस्त्रों को वह भारत की लाचारगी का कारण मानने लगा है । समय समय पर परमाणु युध्द की धमकी देने मे भी उसे कोई हिचकिचाहट नहीं । भारतीय पक्ष को देखें तो शायद लाचारगी का यही कारण समझ मे भी आता है । अन्यथा दुनिया की एक बेहतरीन विशाल सेना वाले देश का नित घाव खाना और आहत होना समझ से परे है ।
इसमे अब कोई संदे ह नही कि भारत को अगर इस प्रायोजित आतंकवाद को रोकना है तो पडोसी की इस धमकी से पार पाना ही होगा । ऐसा भी नही कि युध्द रण्नीतियों की किताबों मे इसका कोई जवाब ही न हो । महाभारतकालीन चक्र्व्यूह जिसे एक अजेय व्यूह रचना समझा जाता रहा उसको भी भेदने की कला अर्जुन को मालूम थी । इसी तरह आधुनिक युध्द कौशल मे भी ऐसा संभव है कि परमाणु शस्त्रों का जखीरा सिर्फ देखने की चीज बन कर रह जाए और उसका उपयोग ही संभव न हो सके । आक्रामक युध्द शैली अनेक संभावनाओं के रास्ते खोलती है । वैसे भी गांधी के पदचिन्हों पर चलने वाले इस देश को अब यह समझ लेना चाहिए कि कभी चीन के राष्ट्र्पति माउत--तुंग ने यूं ही नही कहा था कि " पीस क्म्स फ्रोम बैरल आफ गन " यानी शांति बदूंक की नाल से आती है । आज वह देश न सिर्फ समृध्दि के ऊंचे पायदान पर खडा है बल्कि दुनिया की एक ताकत भी है ।


बहरहाल अब समय आ गया है कि आतंक की इस दहशत से मुक्ति के लिए नितांत नई संभावनाओं पर विचार करें । अन्यथा इसका काला साया पूरे देश को अपनी गिरफ्त मे ले लेगा और तब हम अपने को लाचारगी की स्थिति मे देख रहे होंगे ।

सोमवार, 20 जुलाई 2015

घाटी मे आतंक का बदलता चेहरा



( एल. एस. बिष्ट ) दिल्ली की राजनीति मे राजनीतिक दलों के बीच नित नये आरापों-प्रत्यारोपों से थोडा अलग हट कर देखें तो घाटी मे आतंक का एक नया चेहरा उभरता दिखाई देने लगा है । रूबिया अपहरण कांड के बाद हिंसा और अलगाव की जिस लहर ने पूरी घाटी को अपने चपेट मे ले लिया था, अब एक बार फिर वही हालात बनते दिखाई दे रहे हैं । अभी तक देश घाटी मे आतंक के जिस चेहरे व तेवर से परिचित रहा है उसमे तेजी से बदलाव आता दिख रहा है । युवाओं की बढती भागीदारी स्प्ष्ट दिखाई देने लगी है । बडी संख्या मे कश्मीरी युवा विरोध प्रदर्शनों मे आने लगे हैं । यही नही, इधर कुछ समय से घाटी के प्रदर्शनों मे इस्लामिक स्टेट और फिलस्तीन के झंडे भी कुछ ज्यादा ही नजर आने लगे हैं । इन झंडों का कुछ समय पहले तक घाटी से कोई रिश्ता नही था ।

इधर हाल मे अमेरिका के विदेश विभाग ने आतंकवाद की अपनी 2014 की जो वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित की है इसमे इस्लामिक स्टेट के बढते प्रभाव पर चिंता व्यक्त की है । इस रिपोर्ट मे यह भी बताया गया है कि वैसे अभी तक बहुत कम भारतीय इस आतंकी संगठन से जुडे हैं परंतु भारत मे मुस्लिम आबादी को देखते हुए अधिक संख्या मे लोगों के इस्लामिक स्टेट से जुडने की संभावनाओं से इंकार नही किया जा सकता ।

इस संदर्भ मे देखें तो यहां पाकिस्तान के झंडों का लहराया जाना व पाकिस्तान समर्थक बैनरों का दिखाई देना कोई बडी बात नही रही । लेकिन जिस तरह से अब आए दिन इस्लामिक स्टेट के झंडे दिखाई देने लगे हैं , यह आने वाले खतरे की द्स्तक है । बहुत संभव है आतंक का यह नया चेहरा कश्मीर घाटी के रास्ते देश मे अपनी जडें जमाने की संभावनाओं को तलाशने लगा हो । युवाओं की बढती भागीदारी तो इसी तरफ इशारा कर रही है । अगर ऐसा है तो यह वास्तव मे एक बडा खतरा है जिसे समय रहते समझना और खत्म करना होगा । अगर इन झंडों के प्रदर्शन और उनको लेकर लगाए जाने वाले अलगाववादी नारों पर गंभीरता से ध्यान नही दिया गया तो बहुत संभव है देश के दूसरे हिस्सों मे भी इसका विस्तार दिखाई देने लगे ।
वैसे भी इस संगठन के मुखिया अबु बकर अल बगदादी मुस्लिम युवाओं को दुनिया में इस्लामिक स्टेट का सपना दिखा कर अपनी लडाई में शामिल करते आये हैं । बगदादी अपने मजहबी भाषणों और वीडियो के जरिये मुस्लिम युवाओं को यह समझाने में सफल रहा है कि दुनिया में इस्लाम खतरे मे है और शरीयत के अनुसार एक इस्लामिक देश बनाया जा सकता है जो दुनिया पर राज करे लेकिन इसके लिए एकजुट होकर लडना होगा । कई देशों के युवा उसकी बातों से प्र्भावित हो उसके साथ शामिल हो चुके हैं ।

   अगर सीरियन आब्जर्बेटरी फार ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के आंकडों पर विश्वास करें तो इस संगठ्न के पास लगभग 50 हजार लडाके इरान में और 30 हजार सीरिया में हैं । इनमें अच्छी खासी संख्या विदेशी लडाकों की भी है । इनमें मुख्य रूप से फ्रांस, ब्रिटेन, चेचेन्या आदि देशों के युवा शामिल हैं । यह खतरा भारत मे भी मंडराने लगा है ।
यही नही, यह संगठन अब मासूम बच्चों को अपना मोहरा बनाने लगा है । पांच साल से 14 साल तक के बच्चों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देकर इन्हें लडाई में झोंका जा रहा है । दर-असल बच्चों को शामिल करना इस संगठन की बहुत सोची समझी रणनीति है । यह एक पीढी के मासूम दिलो-दिमाग में अभी से नफरत पैदा कर इस्लाम के लिए लडने वाले जेहादियों की एक खतरनाक फौज तैयार कर रहा है । उसका मकसद आने वाले समय के लिए इन्हें तैयार करना है ।
यही नही, इन बच्चों को लडाई के मोर्चों पर एक ढाल के रूप में भी इस्तेमाल करने की उसकी सोची समझी योजना है । इसलिए जरूरी है कि भारत मे इस खतरे को समय रहते महसूस किया जाए तथा ऐसा न हो इसके लिए कारगर रणनीति बना कर इस आतंकी संगठन के इरादों को पूरा न होने दिया जाए ।


     इधर घाटी मे कुछ आतंकी युवाओं ने आतंक के लिए भारतीय सेना की वर्दी का इस्तेमाल करने की भी योजना को अमल मे लाने का प्रयास शुरू किया है । आतंक का यह चेहरा बेहद डरावना है । इसकी शुरूआत अभी हाल मे ही हुई है । इस तरह कुल मिला कर घाटी मे आतंक का एक नया चेहरा अपनी शक्ल लेने लगा है । इस्लामिक स्टेट और फिलिस्तीन के झडे इस ओर साफ इशारा कर रहे हैं और युवाओं की बढती भागीदारी भी । जरूरी है कि इन प्रयासों को शुरूआती दौर मे ही खत्म कर दिया जाए । अन्यथा एक बार जडे जमा लेने के बाद इसे रोक पाना इतना आसान नही रहेगा ।  

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

मां के सम्मान का फैसला

(एल. एस. बिष्ट ) - अभी हाल मे उच्चतम न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले मे कहा है कि अब बिन ब्याही मां अपने बच्चों की कानूनी रूप से अभिभावक ( गार्जियन ) हो सकती है । इसके लिए बच्चे के पिता से अनुमति लेने की जरूरत नही होगी । अदालत ने अपने ;फैसले मे कहा है कि अगर कोई अविवाहित मां बच्चे का बर्थ सर्टिफिकेट बनवाने की अर्जी लगाए तो उसे यह सर्टिफिकेट दिया जाए । अदालत ने आगे यह भी स्पष्ट किया है कि समाज बदल रहा है । ऐसी महिलाओं की संख्या बढ रही है जो स्वंय बच्चे की परवरिश करना चाहती हैं । यह सही नही होगा कि ऐसे पिता की अनुमति को जरूरी माना जाए जो बच्चे को न तो  कानूनी तौर पर रखने को तैयार है और न ही बच्चे से वह कोई मतलब रखना चाहता है ।

देखा जाए तो न्यायालय का यह फैसला मां के रूप मे एक औरत के सम्मान से जुडा ऐतिहासिक फैसला है । यह सच है कि पिता चाहे कोई भी हो लेकिन मां हमेशा मां रहती है । ऐसे समय मे जब भारतीय समाज मे परंपरागत मूल्य तेजी से बदल रहे हों तथा स्त्री-पुरूष संबधों मे खुलेपन की नित नई खिडकियां खुलने लगी हों, इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए ।

दर-असल भारतीय समाज परंपरागत रूप से पुरूष प्रधान रहा है । इस द्र्ष्टि से महिलाओं की सामाजिक भूमिका बहुत ही सीमित रही है । एक महिला का जीवन घर-परिवार की चाहरदीवारी तक ही सीमित होकर रहा है । बरसों बरस तक हमारे समाज मे महिलाओं ने इसे एक परंपरा के रूप मे सहर्ष स्वीकार किया है । इसलिए भूमिका को लेकर कभी भी अहम के टकाराव जैसी  बात देखने को नही मिली । लेकिन इधर विकास व उन्नति की सीढियां चढते भारतीय समाज मे बहुत कुछ ऐसा नया जुडा है जिसकी कल्पना साठ या सत्तर के दशक मे संभव नही थी ।

घर के चारदीवारी तक सीमित रहने वाली औरत ने बाहर की दुनिया मे भी अपनी भूमिका को तलाशा तथा उसे निर्वाह करने कि लिए अपने को एक अलग ही मानसिक सांचे मे ढालने का सफल प्रयास किया । रसोई व बच्चों से हट कर जब वह दूसरे क्षेत्रों मे भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगी तो कई पारंपरिक मूल्य व विचार यकायक दरकने लगे । खुली हुई खिडकियों से उसने अपने अलग वजूद को देखा और समझा । यहीं से शुरू हुई उसके अपने अधिकारों व सम्मान के लिए लडाई जो अब भी जारी है । अस्सी के दशक मे चर्चित टी वी कलाकार नीना गुप्ता  वेस्ट इंडिज के क्रिकेटर विवियन रिचडर्स से संबधों के चलते बिन ब्याही मां बनी थीं और तब इस मामले ने सामाजिक क्षेत्र मे एक तहलका मचा दिया था । लेकिन इधर समय चक्र के साथ सामाजिक जीवन मे बहुत कुछ बद्ला है ।

खुलेपन व समाज मे महिलाओं की बढती भागीदारी के फलस्वरूप वह सवाल भी   सामने आने लगे हैं जिन पर कभी सोचा ही नही गया । स्त्री पुरूष दैहिक संबधों की तमाम उलझनें मुखरता से अपने जवाब तलाश रही हैं । वे तमाम सामाजिक बातें जिन पर परदेदारी रही हैं, बेपर्दा हो गईं । प्यार, सेक्स व विवाह संबधों से उपजे सवालों पर जो बेबसी व लाचारगी की स्थिति को वह झेलती रही है उससे मुक्त होने के प्रयास मे वह पूरे जी जान से जुट गई है । मानवीय भूलों या अनचाही दुर्घटनाओं की स्थिति मे चाहे बलात्कार के बाद अनचाहे गर्भधारण की बात हो या फिर सहमति से बनाये गये रिश्तों के फलस्वरूप जन्म लेने वाले बच्चे का सवाल हो, उसकी स्थिति हमेशा निरीह रही मानो सारा दोष उसी का रहा हो ।

आज बेबसी व लाचारी के इस अंधेरे से ही उसे उजाले मे लाने के प्र्यास किये जा रहे हैं । जिससे वह भी समाज मे सम्मान के साथ जी सके । न्यायालय का यह फैसल्ल उसी उजाले की ओर ले जाने का एक प्र्यास है जहां उसे किसी पुरूष का मोहताज न रहना पडे । सही अर्थों मे यह एक मां का सम्मान है चाहे उसकी संतान के पिता का  रिश्ता कानूनी रूप से स्वीकार्य हो या न हो लेकिन चूंकि वह उस बच्चे की मां है इसलिए उस पर उसका पूरा अधिकार है । आने वाले समय मे तेजी से बदलते समाज मे इसका बडा दूरगामी प्रभाव पडेगा ।