रविवार, 16 नवंबर 2014

हताशा और अवसाद का दंश झेलते बच्चे

    

( L.S. Bisht ) अभी हाल में हमने नेहरू जी को बडी शिद्दत से याद किया | नेहरू यानी जिन्हें उनकी राजनीतिक विचारधारा से ज्यादा पंचशील, गुलाब और बच्चों के लिए जाना जाता है | लेकिन शायद उनकी विरासत की छीना-झपटी के चलते हम बच्चों की दुनिया को करीब से देखने और समझने का अवसर गंवा बैठे | सत्ता के गलियारों से निकले नारे, घोषणाएं और वादे जल्द ही राजनीति के गर्भ मे विलीन हो गये | लेकिन ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ | देश का दुर्भाग्य रहा है कि इधर कुछ वर्षों से पूरे जनमानस का राजनीतिकरण बखूबी से हुआ है और मीडिया से लेकर आम आदमी तक की सोच मे राजनीति रच बस गई है | समाज से जुडे सवाल कहीं पीछे छूट गये हैं | राजनीति का नशा इतना गहरा है कि इन सवालों पर गंभीरता और गहराई से सोचने की जहमत कोई नहीं उठाना चाहता |
     जब पूरा देश अपने अपने तरीके से मासूम सपनों में रंग भरने की कवायद मे लगा था, लगभग उसी समय राजस्थान के एक स्कूल में एक बच्चे ने अपने अध्यापकों की प्रताडना से तंग आकर अपनी जिंदगी को अलविदा कह दिया | थोडी चर्चा हुई, शोर हुआ और फ़िर दूसरे ही दिन राजनीति की गरमा-गर्म खबरों की नई खेप ने उस खबर को हाशिए पर डाल दिया | किसी बच्चे की आत्महत्या की यह पहली खबर नहीं है | रोज ही देश के किसी न किसी कोने में कोई न कोई बच्चा इस तरह की प्रताडना का शिकार बनता है | लेकिन चंद दिनों बाद सबकुछ भुला दिया जाता है |
     अगर हम राजनीतिक खबरों की दुनिया से बाहर निकल थोडा गौर करें तो पता चलता है कि 2012 के सुस्त सरकारी आंकडों में 14 वर्ष तक की उम्र में कुल 2738 बच्चों ने आत्महत्या कर अपनी जीवन लीला समाप्त की | इसमें 1353 लडकियां और 1385 लडके सम्मलित हैं | इतनी आत्म्हत्याओं का कोई न कोई कारण होना भी स्वाभाविक है | ज्ञात कारणों पर नजर डाले तो पारिवारिक कारणों से कुल 354 व परीक्षा मे असफ़ल हो जाने के कारण 226 बच्चों ने मृत्य को गले लगाया | यहां गौरत्लब यह भी है कि 560 बाल आत्महत्याओं मे कोई कारण ज्ञात न हो सका यानी इन बच्चों ने आत्महत्य जैसा कदम क्यों उठाया, कभी पता न चल सका |
     दर-असल यही वह मौतें हैं जिनमें या तो स्कूल बच्चे के परिसर की दुनिया जिम्मेदार है या फ़िर स्वंय बच्चे के घर के अंदर का दमघोटू माहौल जहां उससे उसकी उम्र से कहीं ज्यादा की अपेक्षाएं की जाती रही हैं | स्कूल व पारिवारिक परिवेश से जुडी यह आत्महत्याएं ही अज्ञात कारणों के अंधेरों में धकेल दी जाती हैं और फ़िर इन पर क्भी कोई बहस नहीं होती |
     दर-असल विकास की सीढीयां चढ्ते हुए इस देश मे महत्वाकाक्षाओं की उडानों का ऐसा विस्तार भी हुआ है जिसके दुष्परिणामों का दंश बच्चे भुगतने के लिए मानो अभिशप्त हैं | अभिभावकों की जीवन में ऊचे पायदान मे खडे होने की लालसा उनके ही बच्चों के बचपन को डसने लगी है, इससे वह बेखबर हैं | वह नहीं जान पा रहे हैं कि अपने बच्चों से किसी भी कीमत पर उपलब्धियों की अपेक्षाएं उन्हें हताशा और अवसाद के अंधेरों की तरफ़ खींच रही हैं | असमय मृत्यु का ग्रास बनते बच्चों के बचपन का यह एक बहुत बडा कारण है |
     एक तरफ़ माता पिता की आकाश छूती महत्वाकाक्षाएं और सपने हैं जिनका दवाब यह बच्चे पूरी खामोशी से येन केन झेल रहे हैं तो दूसरी तरफ़ स्कूली अनुशासन व स्टेट्स का पाखंड जहां उन्हें ख्र्रा उतरना है | पढाई संबधित थोडी सी चूक अध्यापकों के व्यवहार को इस सीमा तक अमानवीय बना देती है कि बच्चा भय और अवसाद के गहरे समुद्र में डूबने उतराने लगता है | प्र्ताडना और मानसिक दवाब जब सारी सीमाएं लाघं जाता है तो वह एक दिन वह कर बैठ्ता है जो दूसरे दिन के अखबार की सुर्खियां बनता है | और फ़िर चंद समय के लिए संवेदनाओं की लहर पैदा कर अनुत्तरित सवाल पीछा छोड जाता है | इस तरह यह सिलसिला जारी रहता है | समाज व शासन की संवेदना इतनी सतही होती है कि भविष्य मे होने वाली इन आत्महत्याओं को नही रोक पाती |
     यहां गौरतलब यह भी है कि माता-पिता की आकाश छूती महत्वाकाक्षाओं तथा आधुनिक स्कूल संस्कृति के दोहरे दवाब के अलावा भी उसकी जिंदगी मे बदले सामाजिक परिवेश ने कई और दुखों का इजाफ़ा किया है | नैतिक मूल्यों की गिरावट से जहां एक तरफ़ उसकी मासूम दुनिया मे यौन शोषण का गहराता अंधेरा है तो वहीं दूसरी तरफ़ आर्थिक उन्नति की दौड ने लाखों नौनिहालों के बचपन को कारखानों, ढाबों और फ़ुटपाथों पर गिरवी रख दिया है | यानी उसकी मासूम दुनिया के चहुं ओर खतरों का घेरा क्सता जा रहा है |
     लेकिन इन सबके बाबजूद दुखद तो यह है कि इन खतरों की गंभीरता को अभी समझा जाना शेष है | घट्ना विशेष के संदर्भ में टुकडों में मह्सूस की जाने वाली संवेदना से कोई विशेष हित नही होने वाला | ह्में पूरी शिद्द्त से बच्चों की दुनिया के दुखों और खतरों को स्मझना होगा और उन सभी रास्तों को बंद करना होगा जो उसे अंधेरे की तरफ़ बरबस खींच ले जाते हैं |


बुधवार, 12 नवंबर 2014

टी.वी. पत्रकारिता का यह कैसा चेहरा है


पत्रकारिता चाहे वह प्रिंट मीडिया की हो या फिर टी.वी. न्यूज चैनल की, उसका यह नैतिक दायित्व है कि वह समाज से जुडी खबरों को संतुलित तरीके से पेश करे तथा सच को सामने लाने का प्रयास करे । लेकिन इधर कुछ समय से न्यूज चैनल पत्रकारिता का एक अलग ही चेहरा सामने आया है । जिसे देख कर ऐसा तो कतई नहीं लगता कि इन्हें सकारात्मक जनमत बनाने के अपने नैतिक दायित्व का तनिक भी बोध है ।
महिलाओं से जुडे मुद्दों पर जिस तरह की पत्रकारिता कुछ चैनलों मे की जा रही है उसे देख कर तो लगता है कि इनका मुख्य उद्देश्य या तो अपनी टी.आर.पी. बढाना है या फिर हवा के साथ बहते हुए वाही वाही बटोरनी है । 11 नवम्बर को एक न्यूज चैनल ने अपने कार्यक्रम में जिस तरह से एक साधारण खबर का तिल का ताड बनाया उसने सोचने को मजबूर कर दिया कि आखिर यह कैसी टी.वी.पत्रकारिता है ।
महिला संबधी खबरों का पक्षधर होना गलत नहीं लेकिन अर्थ का अनर्थ निकाल कर अपने को पक्षधर साबित करना कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं होता । अपनी खबर मे उस प्रतिष्ठित चैनल ने बताया कि जम्मू-कश्मीर के चुनावों के लिए भरे जाने वाले नामांकन में एक विधायक ने ' लाइबिलीटी ' कालम मे अपनी दो अविवाहित बेटियों के होने का उल्लेख किया है । खबरों मे इस बात की निंदा की गई यह कहते हुए कि विधायक अपनी बेटियों को अपने लिए भार समझते हैं । ऐसा लिखना महिलाओं का अपमान है । यानी उन्हें महिला विरोधी करार दे दिया गया ।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि उन विधायक ने लाइबिलीटी के कालम मे यह लिख कर कोई गलती नही की थी । दर-असल इस शब्द का शाब्दिक अर्थ है ' जिम्मेदारियां ' । यहां समझने वाली बात यह है कि एक पिता के लिए अपनी दो बेटियों का विवाह करवाना क्या एक जिम्मेदारी नही है । उनके लिए उचित वर की तलाश करना और फिर विवाह समारोह का खर्च पिता की जिम्मेदारी नही तो किसकी क्या है । यही नही सरकारी कागजों मे सरकारी कर्मचारी ' लाइबिलीटी ' के कालम मे ऐसा लिखते हैं । विशेष रूप से किसी कर्मचारी की सेवाकाल मे होने वाली मृत्यु पर उसके आश्रितों को निर्धारित प्रपत्र पर इस सूचना का भी उल्लेख करना होता है कि मृत्यु समय मरने वाले की लाइबिलीटी कितनी थी । यही नही, आम बोलचाल की भाषा मे रिटायर्मेंट के समय बहुधा यह कहा जाता है कि " अभी एक बेटी की शादी की लाइबिलीटी बची है और बेटे को भी कहीं सेटल करना है " । ऐसे मे विधायक का कथन किस नजरिये से गलत हो गया ।
ऐसा पहली बार नहीं । अक्सर महिलाओं से जुडी खबरों को इसी अंदाज मे परोसा जाने लगा है । बात का बतगंढ कर बना कर अपने को महिलाओं का हितैषी बताने की पुरजोर कोशिश की जाती है । सामाजिक जीवन की छोटी छोटी खबरों को भी महिलाओं के सम्मान और अस्मिता से जोड कर प्रचारित करना एक चलन या फैश्न सा बना दिया गया है । ऐसे मे खबरों का इस तरह से प्रस्तुतीकरण एक वर्ग के लिए नकारात्मक परिवेश की जमीन भी तैयार करता है । लेकिन अपने को महिला पक्षधर साबित करने का नशा कुछ इस कदर हावी है कि इसके साइड इफेक्ट दिखाई नही दे रहे ।

एक सीमा से अधिक अंध भक्ति से महिलाओं का हित नही अपितु अहित ही होगा । अभी हाल मे दिल्ली और कुछ दूसरे स्थानों पर " किस आफ लव " जैसे अश्लील प्रदर्शनों ने यह साबित भी कर दिया है । पत्रकारिता का तो यह पहला दायित्व है कि खबरों को संतुलित तरीके से पेश किया जाए न कि सनसनीखेज बना कर, जैसा कि किया जा रहा है ।खबरों की दुनिया में यह चुहा दौड कब रूकेगी, पता नहीं । 

रविवार, 9 नवंबर 2014

देह व्यापार को कानूनी वैधता का सवाल

( L. S. Bisht ) भारत मेँ देह व्यापार को एक कानूनी दर्जा देने का मुद्दा उस जिन्न के समान है जो वैसे तो बोतल मे ही बंद रहता है लेकिन यदा कदा ढ्क्कन खोल कर उसे निकालने की कमजोर कोशिश मेँ फिर बंद कर दिया जाता है । उच्चतम न्यायालय मेँ यह मामला एक बार चर्चा मे है । दर-असल 2010 में एक जनहित याचिका में देह व्यापार से जुडी महिलाओँ के पुनर्वास की व्यवस्था करने की मांग उठाई गई थी । इसी सिलसिले में एक पैनल का गठन किया गया है जिसे उन सभी बिंदुओं पर विचार करना है जिनसे वेश्याएं एक सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सकें ।
देह व्यापार के दलदल में फंसी सेक्स वर्कर के काम को भी कानूनी दर्जा दिए जाने की वकालत महिला आयोग की अध्यक्षा ने एक प्रस्ताव मे किया है जिस पर गठित पैनल को विचार करना है । लेकिन जैसी की उम्मीद थी इस प्रस्ताव के विरोध में खडे होने वाले झंडाबरदारों की भी कमी नहीं है । लेकिन दूसरी तरफ इस घृणित व्यवसाय से जुडी वेश्याएं एक स्वर से यह मांग उठाती रही हैं कि उनके काम को भी वैधता प्रदान कर एक व्यवसाय के रूप मे देखा जाए ।
जनवरी में कोलकता मे आयोजित सम्मेलन में देशभर की सेक्स वर्कर ने घृणित समझे जाने वाले अपने इस काम की तमाम समस्याओं की तरफ लोगों का ध्यान खींचा था और सरकार से इसे कानूनी मान्यता देने की पुरजोर वकालत की थी । उनका मानना है कि दूसरे अन्य व्यवसायों से जुडे कामगारों की तरह उन्हें भी सरकार कुछ सुविधाएं उपलब्ध कराए ।
बहरहाल यह तो समय बताऐगा कि सेक्स वर्कर के सबंध में क्या कुछ किया जा सकेगा लेकिन इतना तय है कि भारत जैसे देश में इस मुद्दे पर उदार फैसले का मतलब मधुमक्खियों के छ्त्ते को छेडने के समान है । दर-असल इस मामले मे भारतीय समाज में एक पाखंडपूर्ण व्यवहार दिखाई देता है । जो एक तरफ तो पश्चिमी संस्कृति की न सिर्फ वकालत करता है अपितु उसे नि:संकोच अपनाने मे भी कोई गुरेज नहीं । वह सामाजिक जीवन में खुलेपन के पक्ष में खडा दिखाई देता है जहां पहनावे से लेकर व्यवहार तक मे किसी भी तरह का बधंन उसे रूढिवादी सोच का परिचायक लगता है । उसे माल संस्कृति से लेकर फैशन शो और इंटननेट पर खुली छूट आधुनिकता के मापदंड प्रतीत होते हैं । लेकिन सेक्स के मामले में उसकी सोच को लकवा मार जाता है और वह उस पर परदेदारी के पक्ष में ही खडा दिखाई देता है ।
आधुनिक होते समाज मे वह आज भी यह मानने को तैयार नहीं कि सेक्स इंसान की उतनी ही बडी जरूरत है जितना कि उसके लिए भोजन और पानी । यहां पर उसकी सोच विवाह से शुरू होकर वहीं पर खत्म हो जाती है । इसके अलग सोचने को वह कतई तैयार नहीं । आज जबकि जिंदगी कहीं ज्यादा जटिल हो गई है और जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति विवाह बधंन से जुडी जिम्मेदारियों को वहन करने मे सक्षम हो तो क्या सेक्स उसकी जरूरत का हिस्सा नहीं बनती ? ऐसे मे कहीं कोई विकल्प तो तलाशना ही होगा ।
भारतीय समाज व आज की जीवन शैली पर थोडा गौर करें तो हम देखेंगे कि हमारे बडे महानगर दिल्ली, मुबंई व कोलकता ही नहीं कई और शहर भी रोजी रोटी के लिए लाखों लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं और इन शहरों मे लाखों लोग छोटे-बडे कामों की तलाश में अपने परिवार व गांव-कस्बों को छोड आने को मजबूर दिखाई देते हैं । यह शहर उन्हें रोटी तो देता है और सडक किनारे एक झुग्गी बसाने की मोहलत भी लेकिन आर्थिक रूप से इतना सामर्थ्यवान नहीं बनाता कि वह बार बार मीलों दूर अपनी पत्नी के पास जा सके । ऐसे मे किसी विकल्प के अभाव मे उसके अपने ही आसपास या तो अवैध सबंध बनते हैं या फिर सभंव है वह् बलात्कार जैसा घिनोना काम कर बैठे ।
यहां गौरतलब यह भी है कि हमारा समाज एक तरफ ऐसे अवैध सबंधों व बलात्कार जैसे कृत्यों की तो आलोचना भी करता है और वहीं दूसरी तरफ इस मामले में किसी प्रकार की आजादी के पक्ष मे खडा होता भी नहीं दिखाई देता । यहां उसे सारी सामाजिक व्यवस्था ही छिन्न भिन्न नजर आने लगती है
लेकिन दुनिया का सबसे पुराना व्यवसाय समझा जाने वाला यह देह व्यापार इस पाखंडपूर्ण सोच के बाबजूद बखूबी फल फूल रहा है । परंतु दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कानूनी वैधता के अभाव में लाखों सेक्स वर्कर एक तिरस्कारपूर्ण, उपेक्षित व घिनौनी जिंदगी जीने को अभिशप्त हैं । सारे कानून उन्हें ही कटघरे मे खडा करते दिखाई देते हैं । वह न तो अपने वर्तमान से सतुष्ट है और न ही भविष्य के प्रति आशावान । घिनौनी, उपेक्षित व तिरस्कृत जिंदगी के कुचक्र मे फंसी इन सेक्स वर्करों को क्या सम्मानजनक जिंदगी जीने का अधिकार नहीं ? क्यों नहीं इनके काम को भी एक काम मान कर वह सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं जो दूसरे व्यवसायों से जुडे कामगारों को मिलती हैं

आज तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश मे यह जरूरी हो जाता है कि देह व्यापार को कानूनी वैधता प्रदान कर सेक्स वर्करों को भी सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार दिया जाए और यह तभी संभव है जब हम तमाम पूर्वाग्रहों व संस्कारगत हठधर्मिता से हट कर सेक्स को इंसान की एक अहम जरूरत के रूप में स्वीकार करें । 

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

केजरीवाल का भविष्य तय करेगा यह चुनाव


(L.S. Bisht ) दिल्ली में चुनाव का बिगुल बज उठा है । इसके साथ ही दिल्ली को फिर इंतजार है एक अदद सरकार की जो देश की राजधानी को संभाल सके । लेकिन सरकार बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है इस चुनाव मे प्रतिष्ठा का सवाल । भारतीय जनता पार्टी तमाम दावों के बाबजूद बहुमत हासिल करने में असफल रही थी । वहीं चमत्कारिक ढंग से वजूद में आई आम आदमी पार्टी ने पूरी राजनीति की तस्वीर ही बदल दी थी और 28 सीटें जीत दूसरे नम्बर की पार्टी होने का तमगा हासिल कर चर्चा का विषय बनी । देश की सबसे बडी और पुरानी पार्टी होने का दम भरने वाली कांग्रेस चारों खाने चित्त गिर कर बेदम सी दिखने लगी थी । लेकिन चमत्कार और राजनीतिक दांव-पेंचों के बीच अंतत: दिल्ली 49 दिन बाद फिर वहीं खडी होने को अभिशप्त हो गई जहां से चली थी ।

अब यह चुनाव एक तरफ भाजपा व मोदी जी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी व केजरीवाल को यह साबित करना है कि दिल्ली का मतदाता आज भी उसके साथ खडा है । उन्हें इन राजनीतिक अटकलों को भी गलत सिध्द करना है कि जनता का उनसे मोह भंग हो गया है और दिल्ली की गद्दी छोडना उनकी एक राजनीतिक भूल थी । वैसे यह तो समय ही बतायेगा कि दिल्ली किस पाले मे खडी होती है लेकिन इतना जरूर है कि राजनीति का अंदाज साफ संकेत दे रहा है कि यह चुनाव महज एक सरकार बनाने के लिए नहीं अपितु उससे कहीं ज्यादा प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है ।

दर-असल दिल्ली का चुनाव इस मायने मे  खास है कि यहां आम आदमी पार्टी है जिसने अपनी चुनावी राजनीति के आगाज में ही चमत्कारिक ढंग से दूसरे बडे दलों को पीछे छोड दिया था । केजरीवाल एक धूमकेतू की तरह दिल्ली मे ही नहीं राष्ट्रीय  राजनीति के  क्षितिज पर भी एक जन नायक के रूप मे उभर कर सामने आए थे । अपनी नई राजनीतिक व कार्य संस्कृति के बल पर जिस तरह आप पार्टी ने राजनीति मे आगाज किया, उसने बडे बडे राजनीतिक पंडितों को भी हैरत मे डाल दिया था ।

यह कम आश्चर्यजनक नहीं कि अपने पहले ही चुनाव मे इस नई नवेली पार्टी ने दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों मे से 28 में विजय हासिल की । यही नहीं 29.49 प्रतिशत वोट प्राप्त कर अपनी लोकप्रियता भी सिध्द की । जब कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी सिर्फ 8 सीटें जीत कर 24.55 प्रतिशत वोट ही पा सकी थी । ऐसे मे केजरीवाल जी के झाडू का व्यवस्था विरोध का प्रतीक बन जाना स्वाभाविक ही था । लेकिन समय चक्र कुछ ऐसा घूमा कि तमाम राजनीतिक प्रपंच व दांव पेंचों के बीच केजरीवाल मुख्यमंत्री बने लेकिन फिर 49 दिन बाद जन लोक्पाल बिल के सवाल पर त्याग पत्र देकर सत्ता से बाहर हो गये और दिल्ली ठगी सी रह गई ।

इसके बाद लोकसभा चुनाव मे तमाम उम्मीदों के विपरीत केजरीवाल पूरी तरह फ्लाप साबित हुए और बनारस में ताल ठोंक कर चारों खाने चित्त गिरे । अन्य राज्यों में भी उनका और पार्टी का प्रभाव नगण्य ही रहा । ऐसे मे राजनीतिक पंडितों ने उन्हें सिरे से खारिज कर दिया । दूसरी तरफ मोदी जी और भाजपा ने चुनावी इतिहास का एक नया अध्याय लिखा । इसके बाद होने वाले महाराष्ट्र व हरियाणा के चुनावों में भी जीत हासिल कर अपने ' जादू ' को बरकरार  रखा । राजनीतिक पंडितों की भाषा में इसे ' मोदी जादू ' व ' मोदी लहर ' का नाम दिया गया ।

अब यह चुनाव मोदी, मोदी सरकार और भाजपा के लिए भी एक प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है । भाजपा को साबित करना है कि आप पार्टी की लोकप्रियता महज कांग्रेसी कुशासन का नतीजा थी और केजरीवाल का जन-नायक बनना महज एक संयोग । दूसरी तरफ आप पार्टी व केजरीवाल जी को साबित करना है कि कम से कम दिल्ली आज भी उनकी है । यहां मोदी लहर या मोदी जादू की कोई भूमिका नही ।

यह चुनाव भाजपा के विजय रथ के आगे बढने या रूकने से ज्यादा केजरीवाल जी के लिए महत्वपूर्ण है । अगर इन चुनावों मे केजरीवाल व उनकी  पार्टी पिछ्ले प्रदर्शन को न दोहरा सकी तो बहुत संभव है कि उनका राजनीतिक भविष्य ही खतरे में पड जाए । केजरीवाल तो स्वयं हाशिए पर चले ही जायेंगे साथ में बहुत संभव है कि पार्टी बिखराव का शिकार बन अपने वजूद को ही खत्म कर दे । यानी एक तरह से यह चुनाव केजरीवाल व उनकी पार्टी के लिए महज एक चुनाव ही नही अपितु जीवन व मरण का सवाल भी बन गया है । अब देखिए होता है क्या ।   

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

केनी, तुम्हें क्या कहूं

                                               
( L.S. Bisht ) आज वह फिर उदास है । वैसे उसके चेहरे में गहरी उदासी की रेखायें देखने का मैं एक तरह से अभ्यस्त सा हो गया हूं । मुझे पता है कि उसकी जिंदगी में बसंत अब एक गुजरे दौर की याद भर रह गया है । अब अगर कुछ शेष है तो रेगिस्तान की मानिंद खामोशी जिसे उसने स्वीकार कर लिया है ।

अस्सी के दशक की केनी यानी कनुप्रिया अब कहीं खो सी गई है । लखनऊ विश्वविधालय में बिताए खूबसूरत दिनों की यादों को संजोये रखने की भी उसे कोई वजह नजर् नहीं आती । हां कुछ साहित्यिक  किताबें जिन्हें वह अक्सर हम दोस्तों से साझा किया करती थी एक कोने में धूल खा रही हैं । बीच में दो मोटी किताबें वुडवर्थ की लिखी मनोविज्ञान  विषय पर जिन्हें मैं अक्सर उससे उधार मांगा करता था अभी सही सलामत हैं । बस यही कुछ् निशानियां हैं उसके पास उस बीते दौर की जिसे वह बहुत पीछे छोड चुकी है ।

चंचल हिरनी की तरह विश्वविधालय के मनोविज्ञान ब्लाग् में कुंलाचे भरने वाली केनी अब बेदम, बेबस सी , झील के ठहरे हुए पानी की तरह बस मुझे टुकर टुकर देखती भर है । बहुत कम बोलती है । उसके पास अब शायद ही कोई आता हो । उसने अपने आपको उदासी की गहरी परतों में कैद जो कर लिया है । लेकिन मेरा आना जरूर उसे सुकून सा देता है । शायद इसलिए भी कि मैं एक्मात्र गवाह हूं उसकी उस स्वप्निल दुनिया का, सुहानी शामों और चांदनी रातों का जो कभी उसने नीरज के साथ गुजारे । सबकुछ एक फिल्म की तरह आंखों में तैरने लगता है ।

लेकिन उसके सपनों के उस राजकुमार के लिए तो प्यार मात्र एक खिलवाड था । प्यार में अपना सबकुछ न्योछावर कर देने वाली केनी की जिंदगी से विवाह के पांच साल बाद नीरज का  यूं चले जाना, उस दौर के हम दोस्तों के लिए एक आघात से कम नहीं रहा ।

परिवार से संबध प्यार के चलते पहले ही छिन्न भिन्न हो चुके थे । समय की गति ने बाकी बचे रिश्तों को भी अपने आगोश मे ले लिया । वह दुनिया में निपट अकेली रह गई और तब तक उन दिनों के दोस्त भी इधर उधर बिखर गये । नौकरी जीने का सहारा बन गई लेकिन यादों के टीसते नासूर को भुला उसने जिंदगी मे दोबारा रंग भरने की कोशिश कभी नहीं की । अपनी उदासियों और छ्ले जाने के संताप के बीच, पहाड सी जिंदगी मे अब वह एक प्रौढ महिला में तब्दील हो चुकी है ।

अब मेरा उसके पास जाना भी बहुत कम हो पाता है । सोचता हूं आखिर उसके सपनों और प्यार की यह अकाल मौत क्यों हुई । एक दोस्त के रूप में उन दिनों  नीरज हमें कभी बुरा क्यों नही लगा । लेकिन आखिर उसने ऐसा क्यों किया । एक छ्लावे भरे प्यार के लिए अपनी पूरी जिंदगी को होम कर देने वाली इस मित्र केनी को क्या कहूं ।जहां एक तरफ महिलाओं के भावनात्मक व शारीरिक शोषण को लेकर बडे बडे कानूनों व बातों की हवा बह रही हो वहीं अपने को अपने ही जीवन मूल्यों पर होम कर देना एक सवाल तो उठाता ही है कि आखिर तमाम विद्रोही स्वरों के बीच यह कैसी सोच है । यह भी संभव है कि  शायद प्यार की दुनिया है ही ऐसी कुछ चीजें कभी समझ नहीं आतीं । 

शनिवार, 1 नवंबर 2014

लुप्तप्राय: सांस्कृतिक याद – रंग-बंग


( L.S. Bisht )     हिमालय क्षेत्र की वादियों में बसे गांव सदियों से अपने में बहुत कुछ समेटे हुए हैं | एक अलग सस्कृति, लोकजीवन की अपनी लय और सपनों की अपनी विरासत | यह सांस्कृतिक विरासत अब समय के थपेडों के साथ बहुत कुछ बदलने लगी है | काफ़ी कुछ बिसरता जा रहा है | कभी यहां की घाटियां अपने इन्द्रधनुषी लोकजीवन के लिए कौतुहल का विषय हुआ करती थीं | बहुत कुछ आज भी जानना-समझना शेष है |
     आकाश छूती पर्वतश्रंखलाओं के बीच इस अंचल की ऐसी ही दो घाटियां हैं – दारमा और जोहार | यहां के लोकजीवन में बहती सांस्कृतिक धारा की अपनी लय है जिसंमें बहुत कुछ अनूठा है | इन घाटियों के वाशिंदे मूल रूप से मंगोल नस्ल के हैं तथा चेहरे तिब्बती जैसे | वैसे भी तिब्बत सीमा से जुडे रहने के कारण इनका तिब्बत से व्यापारिक संबधों का एक पुराना इतिहास है | इन्हीं सीमावर्ती लोगों को अब हम आमतौर पर ‘ भोटिया नाम से जानते हैं |
     इस समुदाय के बारे में बहुत सी बातें चर्चा मे रही हैं |यहां की महिलाओं के सौंदर्य की कहानियां तो दूर दूर तक लोगों के कौतुहल का विषय बनी हैं | अनेक कहानी-किस्सों के बीच यह भी कहा जाता है कि कभी इतिहास में यहां की एक बेहद सुंदर युवती राजुला के रूप सौंदर्य का जादू दवाराहाट के एक राजकुमार पर ऐसा छाया कि वह अपना राजपाट छोड उसके गांव आ पहुंचा और अंतत: उसे अपने साथ ले जाकर ही दम लिया |
     लेकिन यह सीमावर्ती घाटियां महज इन परिणय लोककथाओं की ही गवाह नहीं हैं अपितु एक अनोखी परंपरा भी यहां सालों साल परवान चढती रही है | युवाओं को प्रेम व काम सुख का प्रथम एहसास दिलाने की एक प्राचीन परंपरा यहां रही है और जहां किशोर-किशोरियां का पहली बार मिलन होता था उसे रंगबंग गृह के नाम से जाना जाता था | यह गांव का एक सामुहिक घर होता था जिसे गांव के लोगों दवारा ही बनवाया जाता था |
     प्रथम प्रेम के उन्मुक्त व्यवहार से जुडे इस ‘ रंग-बंग ‘ नामक गृह में आने का निमत्रंण भी गांव की किशोरियां अपने तरीके से देती थीं | बहुधा किसी ऊंचे स्थान से सफ़ेद रूमाल हिला कर युवतियां दूसरे गांव के युवकों को रंग-बंग में आने का संदेश पहुंचाया करती थीं | सूरज डूबने के साथ युवाओं की टोलियां नाचते गाते पहुंच जाया करतीं और फ़िर शुरू होती लडके लड्कियों के बीच गीत प्रतियोगिता | इसमें स्थानीय लोकगीतों का भी भरपूर इस्तेमाल होता |
     इनके नृत्य और गीतों से पूरे वातावरण में प्रेम रस घुल सा जाता और फ़िर अपने पसंद के साथी को चुन पहुंच जाते ‘ रंग-बंग ‘ के भीतर , उस दुनिया में जहां उन्मुक्त प्रेमरस में डूब बुनने लगते अपने भविष्य के सुनहले सपनें | बाद मे परिवार के बडे बुजुर्ग बातचीत कर विवाह का दिन निश्चित कर लिया करते |
     इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्र्मों का आयोजन किया जाता था | युवतियां मदिरा पान करवातीं और फ़िर मस्ती में डूब सभी जोडे संगीत और नृत्य की लय में झूमने लगते | इस अवसर पर प्रणय गीतों का समां बंध जाया करता |
     प्राचीन पुस्तकों में इस अवसर पर किये जाने वाले अनेक भोटिया नृत्यों का भी उल्लेख मिलता है | चम्फ़ोली, इडियाना तथा घुरंग आदि प्रमुख नृत्य थे | यह सभी धीमी गति के नृत्य थे जिन्हें गोलाकार रूप में किया जाता था |
     यहां युवक-युवतियों को एक तरफ़ पूरी स्वतंत्रता रहती तो दूसरी तरफ़ कुछ कानून कायदों का भी पालन करना पडता था | रंग-बंग की गतिविधियों का संचाल्न उस प्रौढा द्वारा किया जाता था जो या तो आजन्म कुंवारी रही हो अथवा जिसने गृहस्थ जीवन त्याग दिया हो | यह संचालिका कुछ विशेष सामाजिक नियमों के तहत ही मिलने का अवसर देती और फ़िर उनके विवाह रस्म की तैयारियां भी शुरू हो जाया करतीं | लडकी के घरवाले बारातियों का स्वागत करते तथा भोजन की व्यवस्था भी करते |
     इस व्यव्स्था से दाम्पत्य सूत्र में बंधने वाले युगल यदि किन्हीं कारणों से बाद में अलग होना चाहते तो इसके लिए उन्हें पूरी स्वतंत्रता रहती | बहरहाल अब ‘ रंग-बंग ‘ की यह परंपरा लगभग लुप्तप्राय: ही है | दर-असल समय के साथ लोगों ने इस प्रथा को उपयोगी नहीं समझा | शिक्षा के प्रसार ने भी लोगों का नजरिया काफ़ी बदला है | लेकिन क्भी कधार सुदूर गांवों मे “ रंग-बंग” यानी युवागृह के भवन देखने मात्र से ही लोगों को पुराने दिन याद आने लगते हैं |




शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

हिमालय क्षेत्र के जंगलों से लुप्त होती जडी-बूटियां

           

( L.S. Bisht )     हिमालय क्षेत्र आदिकाल से अपने प्राकृतिक संसाधनों की द्र्ष्टि से समृध्द रहा है | यहां के वन और पहाड तमाम खनिजों व बहूमूल्य लकडियों के लिए तो जाने ही जाते हैं इसके साथ ही दुर्लभ जडी-बूटियों का भी भंडार यही हिमालय क्षेत्र है | परन्तु सरकार की उदासीनता तथा किसी योजना के अभाव में जडी-बूटियों के इस भंडार का यथोचित उपयोग नही हो पाया है और न ही स्थानीय लोगों को कोई विशेष लाभ पहुंचा है |
     इधर कुछ वर्षों से प्राकृतिक द्र्ष्टि से संपन्न इस हिमालय क्षेत्र का चौतरफ़ा शोषण हुआ है | वनों के निर्मम दोहन से लेकर खनिज दोहन तक की लंबी कहानी है |
     इस शोषण के विरूध्द जाग्रत चेतना का प्रतीक रहे हैं चिपको आन्दोलन व दून घाटी से उपजी पर्यावरण की संगठित लडाई , जिसका अपना एक इतिहास रहा है | आज उत्तराखंड के नंगे पहाड और चूना खदानों से आहत हुई दून घाटी के अलावा जहां तहां खनिज दोहन के फ़लस्वरूप घायल पडी पहाडियां इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं |
     बात सिर्फ़ यहीं तक सीमित नही रही | अभी उत्तराखंड के खामोश पहाड इस त्रासदी से उबर भी न सके थे कि सरकारी तंत्र की मिली भगत व वन विभाग की लापरवाही के फ़लस्वरूप पहाड के वनों से जडी-बूटियों की तस्करी भी होने लगी | इसका दुखद पहलू यह भी रहा कि काफ़ी समय तक इस संपदा के महत्व और उपयोगिता पर किसी का ध्यान गया ही नही | यह ऐसे ही चलता रहा |
     इस प्रवृत्ति के फ़लस्वरूप आज पहाड के वनों में अनेक चिकित्सोपयोगी जडी-बूटियों का अस्तित्व ही संकट में पड गया है | यही नही, बहूमूल्य औषधियों की खोज में कई दुर्लभ किस्म की वनस्पतियों को भी नष्ट किया जा रहा है |
     दुर्भाग्यपूर्ण पहलू तो यह है कि कई बार अवैध चोरी के ऐसे मामले पकडे भी जाते रहे हैं लेकिन सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्र्ष्टाचार के कारण कुछ नही हो पाता | आज भी उत्तराखंड के सुदूर जंगलों से जडी-बूटियों की चोरी बदस्तूर जारी है | इसके चलते तस्कर, ठेकेदार व शहरों के कुछ आयुर्वेदिक दवा कंपनियों के मालिक अपनी जेबें भर रहे हैं |
     यहां के अनेक स्थलों पर औषधियों का अथाह भंडार है | तुंगनाथ, मलारी, पवाली, बिनसर, डांडा क्षेत्र, द्रोणागिरी पर्वतमाला, टोंस घाटी क्षेत्र व मुन्स्यारी, नंदकोट आदि स्थानों पर अनेक दुर्लभ व बहूमूल्य जडी-बूटियां मिलती हैं | इसके अतिरिक्त तमाम रोगों में लाभकारी पहाडी फ़ल जैसे काफ़ल, किंगोड, हरड, रीठा, बेडू, हिसर तो लगभग पूरे उत्तराखंड में मिलते हैं | लेकिन आज यहां से इनका अवैध व्यापार हो रहा है | यही चीजे मैदानी शहरों मे कई गुना दामों पर बेची जा रही हैं |
     लाइलाज समझी जाने वाली अनेक बीमारियों में काम आने वाली जडी-बूटियों की इस क्षेत्र मे भरमार है | दमा, गठिया व उदरशूल के लिए तो यहां अनेक प्रभावकारी औषधि पौधे बहुतायत मे मौजूद हैं | सर्पदंश व अन्य किसी भी तरह के विष मे काम आने वाली औषधियां भी इस हिमालय क्षेत्र में मिलती हैं | परन्तु यहां के प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जो शोषण की प्रवत्ति पनपी है उससे इन जडी-बूटियों का अस्तित्व ही खतरे में पड गया है |
     कभी मंदाकनी घाटी मे सर्पगंधा व मृत संजीवनी बहुतायत में मिलती थी लेकिन आज बहुत तलाशने पर ही इनके दर्शन होते हैं | इसी तरह ब्रहमकुमारी, इसरमूल, वसींगा तथ अपराजिता आदि औषधियां भी संकट के दौर से गुजर रही हैं| शक्तिवर्धक कई औषधियां तो अब लुप्त होने की कगार में हैं | इन जडी-बूटियों का महत्व इस बात से ही पता चल जाता है कि आयुर्वेदिक चिकित्सा मे सर्पगंधा, मृत संजीवनी व अपराजिता जैसी औषधियों का कोई विकल्प नही है |
     हिमालय क्षेत्र में पायी जाने वाली इन औषधियों का स्थानीय लोगों के जीवन से गहरा संबध रहा है | आज भी सुदूर क्षेत्रों में लोग इन्हीं जडी-बूटियों से तमाम रोगों का इलाज स्वयं कर लेते हैं | सरकारी अस्पतालों की संख्या बहुत कम है जो हैं भी वह काफ़ी दूर | ऐसे में यह औषधियां ही इनके काम आती हैं | पहाड की पुरानी पीढी को इन औषधियों का अच्छा ज्ञान था लेकिन समय के साथ यह परंपरा भी खत्म हो रही है |
     आज चिंताजनक यह है कि हमारी गलत नीतियां व उपेक्षा से यह भंडार खतरे मे है | एक तरफ़ सरकार उदासीन है तो दूसरी तरफ़ स्वार्थी तत्व इन बहुमूल्य औषधियों का उपयोग अपने हित मे करने लगे हैं | कुल मिला कर वर्षों से संभाली यह धरोहर अब संकट के दौर से गुजर रही है |
     आज जरूरत इस बात की है कि हिमालय के इस क्षेत्र मे पायी जाने वाली इन जडी-बूटियों का योजनाबध्द अध्ययन व शोध हो तथा इन्हें सुरक्षित रखने के लिए वन कानूनों मे भी परिवर्तन किया जाए जिससे इनके अवैध व्यापार को सख्ती से रोका जा सके | अगर समय रहते यह नही किया गया तो एकदिन हिमालय क्षेत्र में औषधियों का यह भंडार पूरी तरह रिक्त हो जायेगा |