मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

फीचर / अपने घरौदों को भूलने लगा है पहाड


यहां महक वफाओं की, मोहब्बतों का रंग है,
ये घर तुम्हारा ख्वाब है, ये घर मेरी उमंग है
ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर...........


हिमालय की घाटियों मे पहाड की ढालों पर मिट्टी, पत्थर और लकडी से बने पारंपरिक मकान कभी यहां की ग्रामीण जिंदगी का हिस्सा रहे हैं । इनसे पीढीयों का जो एक गहरा भावनात्मक रिश्ता रहा है अब वह बिखरने लगा है । हिमाचल के गांव हों या फिर उत्तराखंड के, अब इन कलात्मक मकानों के प्रति मोह कम होता जा रहा है । इनकी जगह ले रहे हैं सीमेंट, कंकरीट , ईंट और सरिया से बने मकान । मैदानी शहरों की भवन निर्माण शैली का प्रभाव अब पहाड के इन गांवों मे साफ दिखाई देने लगा है ।
एक समय था जब हिमालय के इन गांबों मे पत्थरों को कांट छांट कर, एक के ऊपर एक रख कर चिना जाता था । सीमेंट के प्रयोग के बिना ही पूरा मकान बन कर खडा हो जाता और इतना मजबूत कि बरसों बरस यूं ही सीना ताने खडा रहता । यहां के स्थानीय कारीगर इस भवन निर्माण शैली मे पारंगत हुआ करते थे । पहाड के वाशिदों की कई पीढीयां इन मकानों मे रह कर पली बढी हैं ।

लेकिन बढती समृध्दि और बदलती जीवन शैली ने बहुत कुछ बदल दिया है । अब पहाड के गांवों मे भी सीमेंट और ईंट से बने मकानों की संख्या बढती जा रही है । इन्हें यहां समृध्दि का प्रतीक भी माना जाने लगा है । लेकिन एक पीढी का जो लगाव इन कलात्मक पारंपरिक पहाडी मकानों से रहा है वह इन सीमेंट कंकरीट के मकानों से कहां ? अब दिखाई नही देतीं पत्थर की ढलानदार छ्तों पर सूखती हुई मक्की या दालों के फलियां । चूल्हे से उठता धुंआ जो छ्तों, दरवाजों पर लगी लकडी को मजबूती दिया करता था और छ्ज्जे की वह गुनगुनी धूप ।


चीड और देवदार के पेडों के बीच खडे यह ईंट सीमेंट से बने मकान पहाड मे उतने ही अजनबी लगते हैं जितना एक देश के वाशिंदे गैर मुल्क में । लेकिन शायद यही है जिंदगी जो बदल रही है हिमालय की घाटियों, ढालों और वादियों मे । 

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

लापरवाही के हादसे

अतीत मे हुए दर्दनाक हाद्सों से सबक न सीखने के कारण केरल के पुत्तिंगल देवी मंदिर के हादसे मे सौ से अधिक लोगों को अकाल मृत्यु का ग्रास बनना पडा । इस दर्दनाक घटना मे वास्तव मे कितने श्र्ध्दालु काल कवलित ह्ए इसकी सही संख्या का पता लगना अभी शेष है । दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि इस मंदिर मे आतिशबाजी की परंपरा रही है । हर वर्ष इस अवसर पर आतिशबाजी की जाती रही है लेकिन लगता है कि मानो स्थानीय प्रशासन को किसी दुर्घटना का ही इंतजार था और अब जब यह दुखद हादसा हो गया तो तमाम नियमों-कानूनों और कारणों की पडताल की बात की जाने लगी है । सच तो यह है कि इस घटना से बचा जा सकता था यदि ऐसे आयोजनों के लिए बनाये गये नियम कानूनों का पालन सुनिश्चित किया जाता । लेकिन ऐसा हुआ नही और आयोजकों की लापरवाही का खामियाजा श्र्ध्दालुओं को अपनी जान देकर चुकाना पडा । आश्चर्य तो इस बात पर है कि इतने बडे स्तर पर आतिशबाजी करने के लिए किसी प्रकार की अनुमति लेना भी आयोजकों ने जरूरी नही समझा । जब कि नियमानुसार जिलाधिकारी से इसके लिए अनुमति लेना अनिवार्य है ।

वैसे देखा जाए तो उच्चतम न्यायालय के एक आदेशानुसार रात 10 बजे के बाद आतिशबाजी नही की जानी चाहिए । लेकिन हमारे देश मे शायद ही कोई इसका पालन करता हो । घटना की तह पर जाएं तो इसके पीछे दो समूहों के बीच आतिशबाजी का मुकाबला होना ही  एक बडे कारण के रूप मे सामने आया  है । एक दूसरे से बेहतर आतिशबाजी की होड इस कदर हावी होती है कि इससे आवाज का शोर ही एक खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है । इस बारे मे कुछ स्थानीय लोगों का विरोध हमेशा से रहा लेकिन इसे अनसुना किया जाता रहा । अंतत: यह लापरवाही इस हादसे के रूप मे सामने आई ।

देवी मंदिर का यह हादसा कोई पहली घटना नही है । हमारे तीर्थस्थलों, धार्मिक स्थानों व पर्व विशेष पर पहले भी इस तरह की घटनाएं कई बार हो चुकी हैं । कहीं भीड के दवाब मे भगदड का होनी दुर्घटना का कारण बनती है तो कहीं दूसरे कारणों से हादसे होते हैं और सैकडों लोगों को अपनी जान गंवानी पडती है ।

दक्षिण भारत के मंदिरों मे आतिशबाजी की पुरानी परंपरा रही है लेकिन आस्था के चलते शायद ही कभी नियमों का समुचित पालन किया  जाता रहा हो । छोटी मोटी घटनाओं को नजर-अंदाज करते रहना भी इस बडे हादसे का कारण बना । 2013 मे यहां एक पटाखा कारखाने मे ऐसा ही हादसा हुआ था जिसमे सात लोगों की मौत हुई थी । 2011 मे भी त्रिचूर की एक पटाखा फैक्टरी मे आग लगने के हादसे मे 6 लोगों को जान गंवानी पडी थी । इसी वर्ष शोरानपुर मे भी ऐसा ही हादसा हुआ और 13 लोग काल के ग्रास बने । 1952 के उस हादसे को लोग अभी तक भूले नही हैं जब प्रसिध्द सबरीबाला मंदिर मे पटाखों के कारण आगे लगने से 68 लोगों की जाने गई थीं । यानी इस तरह के हादसे होते रहे थे लेकिन कोई सबक लेने की जहमत किसी ने नही उठाई ।

यही नही, हमारे धार्मिक स्थलों व विशेष धार्मिक पर्वों पर बदइंतजामी के कारण होने वाली भगदड के कारण भी हादसे होते रहे हैं । हमारे कुंभ मेले तो न जाने कितनी बार इन दर्दनाक हादसों के गवाह बने हैं । 7 मार्च 1997 को अजमेर  दरगाह मे उर्स के अवसर पर हुई भगदड , अप्रैल 2010 मे हरिदार मे शाही स्नान के समय हुई भगदड , 10 फरबरी 2013 को इलाहाबाद कुंभ मेले मे रेलवे स्टेशन मे एक रेलिंग टूट जाने से जो हादसा हुआ तथा 2014 मे दशहरा के अवसर पर पटना गांधी मैदान मे वह दर्दनाक हाद्सा जिसकी भगदड मे अधिकांश महिलाएं व बच्चों को अपनी जान से हाथ धोना पडा था को भला कौन भूल सकता है । वैसे इस प्रकार के हादसों की लंबी फेहरिस्त है ।

इस तरह के हादसों के कारणों की तह पर जाएं तो बद्इंतजामी ही इसका एकमात्र कारण उभर कर सामने आती है । जहां लाखों लोग एकत्र हों वहां सुरक्षा व बचाव के जो इंतजाम किये जाने चाहिए वह नदारत ही रहते हैं । यहां तक कि स्थानीय प्रशासन भीड के इतने बडे जमावडे की गंभीरता को भी समझने मे असमर्थ ही दिखाई देता है । लाखों लोगों की भीड के लिए सुविधाजनक आवागमन जरूरी होता है | इसमे थोडी सी भी चूक दुर्घ\टना को न्योता दे सकती है | अधिकांश मामलों मे बडी भीड के प्रवेश व निकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण दुर्घटनाएं हुई हैं | मंदिर या धार्मिक स्थ्ल के पास  भीड. का उचित और प्रभावी नियंत्रण बहुत जरूरी है अक्सर इसमे चूक होने की संभावना बनी रहती है | इस घट्ना मे आतिशबाजी से जुडे खतरे को कभी महसूस ही नही किया गया और इसका ही परिणाम रहा कि इतने मासूम लोगों को अप्नी जान गंवानी पडी ।

         अब यह जरूरी है कि इस प्रकार के सार्वजनिक मेलों, उत्सवों तथा धार्मिक पर्वों पर सभी जरूरी सुरक्षा उपाय पहले से ही कर लिए जाएं | आपातकालीन व्यवस्था का होना भी जरूरी है |  हमें यह सीख लेनी ही होगी कि यह सभी घटनाएं बदइंतजामी व प्रशासनिक भूलों का ही परिणाम रही हैं | इन्हें आसानी से रोका जा सकता था | आगे ऐसा न हो इस पर गंभीरता से सोचा जाना जरूरी है तथा ऐसे अवसरों के लिए एक त्रुटिविहीन तंत्र विकसित किया जाना चाहिए |
     
   
   

मंगलवार, 29 मार्च 2016

उत्तराखंड के हित मे नही राजनीतिक अस्थिरता

उत्तराखंड की यह त्रासदी रही है कि आजादी के बाद लंबे समय तक यह राजनीतिक रूप से उत्तरप्रदेश का एक उपेक्षित हिस्सा रहा है । अपनी विशेष भौगोलिक संरचना के कारण विकास की दौड मे भी यह पर्वतीय अंचल प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों की तुलना मे कहीं पीछे छूटता चला गया । इसके आर्थिक पिछ्डेपन का एक बडा कारण इसका राजनीतिक रूप से कम महत्वपूर्ण होना भी रहा है । लेकिन नवम्बर 2000 मे इसे एक अलग राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ और उम्मीद की गई कि यह छोटा उपेक्षित पर्वतीय अंचल विकास की राह पर आगे बढेगा । लेकिन विकास को  वह गति न मिल सकी जिसकी अपेक्षा की गई थी । इसका एक बडा कारण इस नव प्रदेश मे राजनीतिक स्थिरता का न होना भी रहा ।

उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो परंपरा से यह कांग्रेस का एक मजबूर गढ रहा है । इसका एक बडा कारण स्वतंत्रता आंदोलन मे इस क्षेत्र के लोगों की भूमिका का होना भी है । यही कारण है कि कांग्रेस के कर्मठ व प्रतिबध्द नेताओं की यहां लंबी परम्परा रही है । लंबे समय तक कांग्रेस को इस क्षेत्र से कोई विशेष राजनीतिक चुनौती का सामना भी  नही करना पडा । लेकिन राममंदिर आंदोलन के बाद से राजनीतिक स्थितियां तेजी से बदलीं तथा भाजपा ने इस क्षेत्र मे एक मजबूत उपस्थिति दर्ज करने मे सफलता प्राप्त की ।

चूंकि इस राज्य के गठन मे भाजपा की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है इसलिए भी यहां के लोगों का पार्टी के प्रति रूझान होना भी स्वाभाविक ही है । वैसे भी राज्य निर्माण के बाद भाजपा को ही इस राज्य की सत्ता प्राप्त हुई तथा नित्यानंद स्वामी इस प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने ।  लेकिन उसके बाद कांग्रेस बनाम भाजपा की राजनीतिक लडाई के चलते इस राज्य मे मुख्यमंत्री बदलते रहने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज तक जारी है ।

तेरह जिलों वाले इस हिंदु बहुल प्रदेश मे धार्मिक व जातीय आधार पर बहुत ज्यादा उलझाव तो नही हैं लेकिन राजपूत व ब्राहमण बहुलता के कारण राजनीति के समीकरणों मे इन दो जातीयों का प्रभाव हमेशा से रहा है । अन्य जातियों का प्रभाव कुछ विशेष क्षेत्रों तक ही सीमित है । मुस्लिम आबादी भी महज 12% होने के कारण बहुत ज्यादा प्रभावी भूमिका मे कभी नही रही ।

यहां की राजनीति के संदर्भ मे गौरतलब यह भी है कि उत्तराखंड दो मंडलों से मिल कर बना है । पहला कुमाऊं मंडल जिसमे छ: जिले हैं और गढवाल मंडल इसमे सात जिले सम्मलित हैं । इनमे भाषाई भिन्नता के साथ कुछ अन्य सामाजिक -सांस्कृर्तिक विभिन्नताएं भी हैं । इन भिन्नताओं के कारण ही यहां की राजनीति मे गढवाल व कुमांऊ फेक्टर की अपनी भूमिका हमेशा रही है । तमाम छोटे बडे राजनीतिक फैसलों को इसी नजरिये से देखा जाता है । मौजूदा राजनीतिक घटनाक्र्म मे भी इस पहलू को नजर-अंदाज नही किया जा सकता । यहां गौरतलब है कि मुख्यमंत्री हरीश रावत कुमांऊ मंडल से हैं तथा विजय बहुगुणा व हरकसिंह रावत गढवाल मंडल से ।

यहां यह समझना भी जरूरी है कि मौजूदा दौर मूल्यों की राजनीति का नही बल्कि अवसरवादिता, घात-प्रतिघात व हद दरजे की सत्ता लौलुपता का है । कुर्सी की ललक ने सारी मर्यादाओं को हाशिए पर डाल दिया है । दल विशेष से जुडाव उसकी नीतियों या राजनीतिक दर्शन के कारण नही बल्कि सत्ता सुख से है । कांग्रेस सरकार के पतन के पीछे भी यही कारण रहे हैं । स्वंय कांग्रेस के नौ विधायकों ने बगावत का झंडा लहरा कर सरकार के सामने अस्तित्व का संकट खडा किया और अंतत: उसकी दुखद परिणति राष्ट्रपति शासन के रूप हुई ।
लेकिन ऐसा सिर्फ उत्तराखंड के साथ ही नही है । अभी हाल मे अरूणाचल प्रदेश को भी यही त्रासदी झेलनी पडी है । झारखंड, गोवा व उत्तरपूर्व के राज्यों मे भी ऐसा होता रहा है । ऐसा इसलिए भी संभव हो जाता है कि कम सदस्यों वाली इन राज्य विधानसभाओं आठ दस लोगों के पाला बदलने से राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल जाते हैं और सरकार  आसानी  से अल्पमत मे आ जाती है । यही उत्तराखंड मे हुआ है ।

लेकिन  विकास की राह चलते इस प्रदेश के आर्थिक विकास के लिए यह  राजनीतिक अस्थिरता कतई हितकारी नही है । अगर यहां विकास को गति देनी है तो राजनीतिक स्थायित्व का होना बेहद जरूरी है । दुखद तो यह है कि दल बदल कानून के बाबजूद ऐसा हो पा रहा है । छोटे राज्यों मे इस राजनीतिक दोष को देखते हुए जरूरी है कि कानूनों मे कुछ बदलाव किये जांये जिससे इस प्रकार की स्थितियां आसानी से उत्पन्न न हो सकें ।






 

शनिवार, 19 मार्च 2016

चुनावी राजनीति का बदलता चेहरा



हर सुबह के साथ भारतीय राजनीति का चेहरा कुछ और कुरूप होता जा रहा है । अब इस बात की संभावना कहीं नही दिखती कि यह मूल्यों की राजनीति के अपने पुराने दौर की तरफ वापसी कर सकेगी । दर-असल वोट के माध्यम से जनसमर्थन की अभिव्यक्ति के महत्व ने ही इसे इस स्थिति मे ला खडा किया है ।

क्या यह जानना अफसोसजनक नही होगा कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी अब असम मे कन्हैया कुमार को अपना पोस्टर ब्वाय बनाने जा रही है । रोहित वेमुला की आत्महत्या की तस्वीरें भी कांग्रेस के लिए वोट मांगती दिखाई देंगी । कल अगर उमर खालिद का चेहरा भी साम्यवादी दलों के चुनावी पोस्टरों मे दिखाई दे तो कोई आश्चर्य नही ।

वोट राजनीति के इस घिनौने चेहरे को क्या अब भारतीय जनमानस की बदलती सोच का एक संकेत मान लिया जाए या फिर खलनायकों को राजनीति मे महिमा मंडित कर हीरो बनाने की एक घृणित राजनीतिक सोच । क्या अब भारतीय चुनावी राजनीति का दर्शन कुछ इस तरह से बदलने जा रहा है जिसमे गांधी, नेहरू और चरखे को अप्रासंगिक मान लेने की सोच् आकार लेती दिखाई दे रही है ।

बदलते सामाजिक परिवेश मे शायद यह माना जाने लगा है कि आज के युवाओं के लिए गांधी या नेहरू सिर्फ इतिहास मे दर्ज एक किताबी आयकन बन कर रह गये हैं जिनकी युवा सोच मे कोई प्रासंगिकता नही रही । युवाओं के लिए वह विद्रोही चरित्र आदर्श हैं जो पूरी मुखरता के साथ शासन -सत्ता के विरूध्द किसी भी  सीमा तक जा सकने का साहस रखते हैं । इसमे कोई फर्क नही पडता कि वह पारंपरिक मूल्यों व आदर्शों के विरूध्द है या फिर देश प्रेम की अवधारणा को ही खारिज कर रहे हैं । शायद यह मानते हुए ही गैर भाजपा राजनीतिक दल इन्हें अपनी चुनावी रणनीति का एक अहम हिस्सा बनाने के प्रयोग से भी गुरेज नही कर रहे ।

यह जानना व समझना भी जरूरी है कि क्या केन्द्र मे गैर कांग्रेसी सत्ता का वर्चस्व दीगर राजनीतिक विचारधाराओं को पारंपरिक चुनावी सोच से हट कर कुछ अलग और नया करने को विवश कर रहा है । अगर ऐसा है तो  यह उनके अंदर पनपी राजनीतिक असुरक्षा व हाशिए पर चले जाने की चिंता को भी उजागर कर रहा है ।
बहुत संभव है कि गत आम चुनावों मे जिस तरह से मोदी एक चमत्कारिक छवि के रूप मे पूरे देश को अपने मोह पाश मे बांध एक अकल्पनीय चुनावी जीत के नायक बने उसने गैर भाजपा राजनीतिक दलों मे राजनीतिक असुरक्षा की भावना को पैदा करने मे अहम भूमिका निभाई हो ।

लेकिन कारण कुछ भी हों, अगर चुनावी राजनीति का यह चेहरा सामने आता है तो शायद भविष्य मे देश के अंदर सच्चे हीरो बनने की नही बल्कि विलेन बनने की भी एक होड  आकार लेती दिखाई देगी और यह देश हित के नजरिये से ताबूत मे एक और कील  साबित होगी ।

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

सार्वजनिक संपत्ति यानी गरीब की लुगाई

जाट आरक्षण आंदोलन से आंदोलनकारियों को क्या मिला और आंदोलन पर राजनीतिक रोटियां सेकने वाले राजनेताओं की रोटी कितनी सिक सकी, यह तो समय् बतायेगा । लेकिन करोडों रूपये की सरकारी संपत्ति का जो नुकसान हुआ, वह किसी से छिपा नही है । जिसे जो मिला उसने उसे आग के हवाले कर अपनी पीठ थपथपाई । यहां गौरतलब है कि ऐसा पहली बार भी नही हुआ । आंदोलन चाहे जिन मुद्दों पर रहा हो, उसका सबसे ज्यादा खामियाजा सार्वजनिक संपत्ति को ही उठाना पडा है । ऐसा लगता है मानो सरकारी संपत्ति तो गरीब की लुगाई है जो इतनी कमजोर है कि अपने ऊपर हो रही ज्यादती का भे प्रतिरोध नही कर सकती । वैसे न्यायापालिका ने इसे काफी गंभीरता से लिया है तथा इस पर जवाबदेही तय करने की बात कही है । देखना है कि हमारी सरकार इस दिशा मे क्या कदम उठाती है ।

वैसे तो प्रदर्शनों व आंदोलनों के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की बढती प्रवृत्ति को देखते हुए उच्चतम न्यायालय ने बहुत पहले ही एक कमेटी गठित कर दी थी । इस कमेटी को यह सुझाव देना था कि ' प्रिवेंशन आफ डेमेज टू पब्लिक प्रापर्टी कानून 1984 '  को किस तरह से और अधिक प्रभावी बनाया जा सके । लेकिन काफी समय तक इस दिशा मे कोई विशेष प्रगति नही हुई थी । कुछ समय बाद  कमेटी ने अपनी  जो सिफारिशें सरकार को दी उसमें  सरकारी संपत्ति की रक्षा मे वर्तमान कानून को कमजोर बताते हुए इसे और अधिक कठोर बनाने के सुझाव भी दिए थे ।  कानून को कुछ इस तरह से सख्त बनाये जाने की बात कही गई थी  कि प्रदर्शनों व आंदोलनों के दौरान किए गये सरकारी संपत्ति के नुकसान के लिए भारी जुर्माना देना पडे तथा लंबी कैद की सजा भी ।

यहां गौरतलब है कि इधर कुछ वर्षों से देश मे नागरिक अधिकारों व प्रजातंत्र के नाम पर ऐसे व्यवहार का प्रदर्शन किया जाने लगा है कि एक्बारगी यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि इसे राष्ट्र्हित कहें या फिर राष्ट्र्द्रोह । राजनीतिक रूप से ' भारत बंद " या ' प्र्देश बंद अथवा शहर बंद का नारा हो या फिर छोटी छोटी नागरिक समस्याओं को लेकर प्रदर्शन करना, सडक जाम कर लोगों को असुविधा मे डालना तथा सरकारी संपत्ति का नुकसान करना, यह सब अब रोज की बात है । शुरूआती दौर मे यह कभी कधार देखने को मिलता था लेकिन अब तो मानो इसे एक हथियार बना दिया गया हो ।

देखा जाए तो शुरूआती दौर मे सरकारी संपत्ति के नुकसान का श्रेय भी हमारी राजनीतिक संस्कृर्ति को ही जाता है । बंद के आयोजनों तथा राजनीतिक प्रदर्शनों मे सत्ता पक्ष दवारा किये जाने वाले विरोध की प्रतिक्रिया स्वरूप सरकारी गाडियों , इमारतों आदि को आग के हवाले कर देने से इसकी शुरूआत हुई । तब इसे इतनी गंभीरता से नही लिया गया । लेकिन धीरे धीरे इसे अपने विरोध का एक कारगर तरीका ही बना दिया गया ।

आज स्थिति यह है कि किसी मुहल्ले मे बिजली की परेशानी हो या फिर पानी की समस्या, देखते देखते लोग सडक जाम कर धरना-प्रदर्शन शुरू कर देते हैं । पुलिस के थोडा भी बल प्रयोग या विरोध से यह प्रदर्शन आगजनी व तोडफोड के हिंसक प्रदर्शन मे बदल जाता है । थोडी ही देर मे कई सरकारी वाहनों को आग के हवाले कर दिया जाता है । सबकुछ शांत हो जाने पर इस भीडतंत्र का कुछ नही बिगडता । एक औपचारिक पुलिस रिपोर्ट अनजान चेहरों की भीड के नाम लिखा दी जाती है । इस तरह की रिपोर्ट लिखवाने का मकसद ऐसे तत्वों को सजा दिलवाना नही बल्कि सरकारी स्तर पर अपनी ' खाल बचाना '  होता है । खाना पूरी के बाद लाखों करोडों के सरकारी नुकसान को बट्टे खाते मे डाल कर फाइल बंद कर दी जाती है ।

यहां गौरतलब यह भी है कि सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के इस कार्य का विस्तार अब सिर्फ राजनीतिक प्रदर्शनों या नागरिक धरनों तक सीमित नही है । न्क्सलवाद व क्षेत्रीयवाद के नाम पर भी ऐसा किया जा रहा है । नक्सलियों दवारा आए दिन सरकारी वाहनों व पुलों को उडाने की खबरें आती रहती हैं । देश के नक्सली प्रभावित क्षेत्रों मे प्रतिवर्ष करोडों रूपयों की सरकारी संपत्ति इस ' वैचारिक विरोध ' की भेंट चढ जाते हैं । आंध्र प्रदेश , महाराष्ट्र , छ्त्तीसगढ, झारखंड व बिहार जैसे राज्यों मे तो करोडों रूपयों की सरकारी संपत्ति का नुकसान प्रतिवर्ष हो रहा है ।

कुछ समय पहले इस संदर्भ मे एक पत्रिका मे एक चुटकला प्रकाशित हुआ था कि देश मे अगर किसी चार साल के बच्चे को भी किसी बात पर अपना आक्रोश व्यक्त करना है तो  वह भी अपनी दूध की बोतल को किसी सरकारी बस की तरफ ही फेकेगा । बेशक यह एक अतिश्योक्तिपूर्ण प्रसंग हो लेकिन हालातों की एक बानगी तो प्रस्तुत करता ही है ।

दुर्भाग्यपूर्ण दुखद स्थिति तो यह है कि अपने गुस्से का इस प्रकार से इजहार करते हुए शायद ही कभी किसी ने सोचने की जहमत उठाई हो कि आखिर यह सरकारी संपत्ति आई कहां से ?  क्षण मात्र के अगर य्ह विचार मस्तिष्क में कौंध जाए तो संभवत: उठे हुए हाथ वहीं ठहर जाएं । लेकिन ऐसा होता नही है । इस तरह सरकारी संपत्ति से यह खिलवाड बदस्तूर जारी है ।

वैसे देखने वाली बात यह भी है कि ऐसे ही कानूनों की आवश्यक्ता कुछ अन्य क्षेत्रों मे भी है । जिस तरह से सार्वजनिक स्थलों व सेवाओं के प्रति हमारी एक लापरवाह व स्वार्थी मानसिकता बन गई है, उसे देखते हुए कानून का भय जरूरी हो गया है । बेशक मन से न सही, कम से कम सजा के भय से तो कुछ अच्छे परिणाम मिलने की संभावना बनेगी । इसलिए अब जरूरत इस बात की है कि इस कानून को यथाशीघ्र सामयिक व सख्त बना कर देश भर मे लागू किया जाए तथा सरकारी संपत्ति के प्रति जो नजरिया बन गया है उसे बदला जाए ।

एल.एस.बिष्ट, 11/508, इंदिरा नगर, लखनऊ-16



सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

दलगत राजनीति बनाम छात्र संघों की भूमिका

जे.एन.यू घटना से यह बात पूरी तरह साफ हो गई है कि हमारे विश्वविधालयों के परिसर मे दलगत राजनीति किस हद तक अपनी जडें जमा चुकी है । राजनीतिक दलों की विचारधारा के प्रभाव मे छात्रराजनीति किस सीमा तक भटकाव का शिकार हो सक्ती है, यह बात भी  पूरी तरह से उजागर हुई है । देखा जाए तो जे.एन.यू परिसर मे छात्र राजनीति के नाम पर जो कुछ भी हुआ वह दलगत राजनीति का ही परिणाम है । यह दीगर बात् है कि यह प्रतिष्ठित संस्थान परंपरागत रूप से वामपंथी विचारधारा का पोषक रहा है । इसीलिए इसके अंदर की गतिविधियां हमेशा से विवादास्पद रही हैं ।

मुख्यधारा की तथा अन्य राजनीतिक विचारधाराओं से इसका टकराव भी होता रहा है । लेकिन ऐसा भी नही है कि ऐसा सिर्फ यहीं तक सीमित है । देश के दूसरे विश्वविधालयों मे भी दलीय राजनीति के प्रभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है । लेकिन चूंकि इस घटना ने चाहे-अनचाहे पूरी बहस को राष्ट्र्प्रेम बनाम राष्ट्रविरोध के बिंदु पर ला खडा किया, इसलिए छात्र राजनीति से जुडे कुछ बुनियादी सवाल पृष्ठभूमि मे चले गये ।

छात्रसंघों में राजनीति किस सीमा तक होनी चाहिये यह अभी तक तय नही हो सका है। क्या यह कम आश्चर्यजनक नही कि जहां दुनिया के दूसरे देशों में छात्रसंघों की भूमिका स्पष्ट है वहीं दुनिया के सबसे बडे इस लोकतांत्रिक देश मे तस्वीर अभी तक साफ नही हो पायी है।
देश के अधिकांश विश्वविधालयों व कालेजों में छात्रसंघों के चुनाव होते हैं । रंगीन पोस्टर व बैनरों से कुछ दिन के लिए पूरा शहर पट सा जाता है । प्र्चार युध्द भी कम आक्रामक नही होता । अब तो परिसर के अंदर कम बाहर शोर अधिक सुनाई देता है । हिंसात्मक घटनाओं से लेकर उम्मीदवार के अपहरण व हत्या तक की वारदातों को देख सुन अब किसी को हैरत नही होती। विजयी उम्मीदवारों के जुलूस पूरे शहर को मंत्रमुग्ध कर आकर्षण तथा चर्चा का विषय बनते हैं । लेकिन इसके बाद यह छात्र नेता और छात्रसंघ क्या कर रहे हैं इसका पता किसी को नही लगता ।  देखते देखते कुछ छात्र नेता जन नेता बनने की प्रक्रिया से जुड राजनीतिक गलियारों में दिखाई देने लगते हैं । कुछ अपवादों को छोड कमोवेश यही तस्वीर है हमारे तथाकथित छात्रसंघों की और कुल मिला कर छात्र शक्ति का यही चरित्र उभर सका है ।

लेकिन ऐसा हमेशा नही रहा । अतीत गवाह है कि महात्मा गांधी, सुभाष च्न्द्र बोस और जय प्र्काश नरायण के आहवान पर छात्र संगठन जो कर गुजरे वह आज इतिहास बन गया है ।
स्वतंत्रता पूर्व की छात्र राज्नीति का सुनहला इतिहास रहा है । 1905 में कलकत्ता विश्वविधालय के दीझांत समारोह में लार्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन की बात बडे ह्ल्के ढंग से कही थी लेकिन छात्रों को समझते देर न लगी । जल्द ही पूरे राज्य मे इसके विरूद आंदोलन शुरू हुए। एकबारगी अंग्रेज सरकार हैरत मे पड गई । बंगाल से उपजी यह चेतना जल्द ही दूसारे राज्यों में भी फैल गयी । 1920 मे नागपुर में अखिल भारतीय कालेज विधार्थी सम्मेलन हुआ और नेहरू के प्र्यासों से छात्र संगठनों को सही अर्थों मे अखिल भारतीय स्वरूप मिला । इसके बाद वैचारिक मतभेदों को लेकर संगठनों में टूट फ़ूट होती रही ।
कुछ वर्षों तक कुछ भी सार्थक न हो सका । सत्तर के दशक में दो महत्वपूर्ण घट्नाएं अवश्य छात्र राजनीति के क्षितिज मे उभरीं । पहला 1974 मे ज़े.पी. आंदोलन जो व्यापक राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर शुरू हुआ। दूसरा असम छात्रों का आंदोलन जिसकी सुखद परिणति हुई तथा युवा छात्र सत्ता में भागीदार बने । बाकी याद करने लायक कुछ दिखाई नही देता । मंडल आयोग को लेकर युवा आक्रोश जिस रूप मे प्र्कट हुआ इससे तो एक्बारगी पूरा देश हतप्र्भ रह गया ।

लेकिन इधर कुछ वर्षों से छात्र राजनीति मे  दलगत राजनीति के साथ ही जातीय , क्षेत्रीय व साम्प्र्दायिक समीकरणों को भी बल मिला है ।  जिस तरह से परिसर मे दलीय राजनीति अपना रंग दिखाने लगी है इससे यह बात साफ हो चली है अब निर्णय लेना होगा कि परिसर की राजनीति संसद या विधानसभाओं को मद्देनजर च्लाई जानी चाहिये या सिर्फ छात्रों द्दारा परिसर के लिऐ । क्योंकि इन दो अलग अलग उदेश्यों के लिऐ भिन्न राजनीतिक चरित्र का होना जरूरी है ।

वस्तुत: आज फिजा बहुत बदल गई है। छात्र राजनीति बुनियादी उद्देश्यों से भटक गई है। यह पूरी तरह से राजनीतिक दलों के प्रभाव मे दिखाई देने लगी है । आखिर सोचा जाना चाहिए कि यह  किस प्र्कार की छात्र राजनीति है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश विरोधी नारे लगाने मे भी गुरेज नही करती । यह कौन सी राजनीतिक विचारधारा है जो आंतकवादियों का महिमा मंडन करने तथा देश के टुकडे करने मे भी राष्ट्रहित समझने लगी है ।बेशक आज हम वामपंथी विचारधारा का तर्क देकर राष्ट्र्विरोधी नारों को अनसुना कर दें लेकिन यह वास्तव मे एक खतरे की घंटी है । इसे नजरअंदाज करने का मतलब है दलीय राजनीति के दोषों को अनदेखा करना । अगर आज इसे न रोका गया तो इसके घातक परिणाम परिसर राजनीति मे देखने को मिलेंगे ।  

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

लखनऊ महोत्सव / कहीं खो गई हुक्के की गुडगुडाहट


कभी मान-मर्यादा, शान-ओ-शौकत का प्रतीक हुक्का बदली रूचियों में उपेक्षा का शिकार हो कर रह गया है । गांव की चौपालों से लेकर दरबारों तक इसकी अपनी शान थी । जहां एक तरफ आम आदमी के बीच यह मेलजोल का माध्यम बना वहीं राजा-रजवाडों और नवाबों की ठसक का प्रतीक भी ।
इसका महत्व इस बात से ही लग जाता है कि यदि किन्हीं कारणों से किसी व्यक्ति को समाज से बाहर करना हो तो उसका हुक्का पानी बंद कर दिया जाता था । वैसे आज भी यह प्रथा खत्म नहीं हुई है । यह दीगर बात है कि अब न हुक्के रहे और न ही उसका लुत्फ उठाने वाले, बस कहावत रह गई ।
वैसे तो तंबाकू या नशा का चलन किसी न किसी रूप में हमेशा रहा है । लेकिन जहां तक हुक्के के चलन का सवाल है इसकी शुरूआत मध्यकाल से मानी जाती है । कहा जाता है कि अकबर के शासंनकाल में सबसे पहले हुक्का पीने की शुरूआत हुई थी । कुछ विवरणों से पता चलता है कि इसकी खोज हकीम लुकमान ने की थी । उन्होने पहले पहल प्रयोग में आने वाली चिलम में एक नली जोडी और उसे पानी से भरे एक पात्र से जोड दिया । इसे ही फर्शी कहा गया । इस फर्शी से एक दूसरी नली को जोडा । इससे ही धुंआ खींचा जाने लगा । यह धुंआ चूंकि पानी से गुजर कर आया इसलिए इसमें तंबाकू की कडवाहट न थी ।
बहरहाल हुक्के की इस शुरूआत के बाद धीरे धीरे यह इतना लोकप्रिय हो गया कि नवाबी दौ की तहजीब का एक हिस्सा बन गया । लखनऊ के हुक्कों तथा यहां तैयार किए गये तंबाकू की एक अलग पहचान बनी । यही नहीं, बल्कि हुक्का पिलाने वाले साकी और उनसे जुडे दिलचस्प किस्से इस शहर की सरजमी से ही जुडे हैं । हुक्का और हुक्केदारी की यह तहजीब अपने आप में अनोखी थी ।
जहां तक नवाबी तहजीब के इस शहर में हुक्कों के चलन का सवाल है, यहां तांबे, पीतल और फूल व जस्ता के हुक्कों के अलावा मिट्टी के खूबसूरत हुक्कों का भी उपयोग किया जाता रहा । इनके पूर्व तक यहां चिलमों का बोलबाला था । कई आकार-प्रकार की चिलमें उपयोग मे लाई जाती थीं । लेकिन हुक्के की ईजाद होने पर चिलमों का चलन धीरे-धीरे खत्म हो गया ।
मिट्टी के हल्के और खूबसूरत हुक्कों के साथ ही यहां का बना तंबाकू भी दूर-दूर तक जाना जाता था । यहां के बने तंबाकू की पूरे देश में अपनी अलग पहचान थी । आज भी यहां अलग किस्म से बना तंबाकू दूर-दूर तक जाता है । बेशक अब मांग उतनी नही रही ।
दर-असल तंबाकू की कडवाहट को दूर करने के लिए उसे शीरे में मिला लेने के तरीके की शुरूआत यहीं से हुई । लेकिन लखनऊ ने तो इससे भी आगे बढ कर ऐसा खुशबूदार तंबाकू तैयार किया कि एक्बारगी पीने वाले यह विश्वास ही नही कर सके कि तंबाकू जैसी चीज को भी इतना खुशबूदार बनाया जा सकता है । चंदन का बुरादा, इत्र, लौंग, इलाइची, केसर आदि को सही ढंग से तंबाकू में मिलाया जाता था । इसका धुंआ इतना खुशबूदार होता कि कमरा खुशबू से भर जाया करता । न पीने वाला भी एकाध कश लेने को मचल उठता था ।
हालांकि हुक्का आम आदमी की जिंदगी से जुडा हुआ था फिर भी सामाजिक हैसियत और आर्थिक स्तर के अनुसार इसके आकार-प्रकार व डिजाइन में अंतर साफ तौर पर दिखाई देता । ऊंचे ओहदे वाले या राजदरबार से जुडे लोगों के हुक्कें में कीमती धातुओं की नक्कासी भी होती और हुक्के की चिलम को ढंकने के लिए जालीदार सरपोश भी ।
मौसम के हिसाब से भी यहां के हुक्के लाजवाब हैं । यहां की मिट्टी से बने हुक्कों की तासीर ठंडी होती है । बहुत अधिक गर्मी महसूस होने पर हुक्के की नली पर ख्सखस भी लपेट दिया जाता था । चूंकि हुक्का मूल रूप से राजे-रजवाडों, नवाबों, जमींदारों और अमीरों की शान का प्रतीक भी रहा इसलिए हुक्के की चिलम भरने कि लिए चिलमी भी होते जिन्हें चिलम भरने की पूरी जानकारी होती । यह चिलमी हुक्के की चिलम भरने की ही रोटी खाते थे ।
हुक्कों के पीने पिलाने से एक वर्ग जुडा था जिंनका काम लोगों को हुक्का पिला कर जो मिला उससे अपना जीवकोपार्जन करना था । इन्हें साकी कहा जाता था । लेकिन इनकी संख्या बहुत सीमित ही रही । हुक्का पीने-पिलाने की लखनऊ मे कुछ दुकानें भी थीं । यहां बैठने की अच्छी व्यवस्था रहती । लोग आते और हुक्के का लुत्फ उठा कर जो मुनासिब समझते दे जाते । अब यह परंपरा पूरी तरह खत्म हो चुकी है । बताया जाता है कि हुक्का पिलाने का यह रिवाज दिल्ली से लखनऊ आया । वहां तो साकी इतनी बडी नली लेकर चलते कि मकान की पहली मंजिल में ही बैठ कर पीने का लुत्फ उठाया जा सके । बहरहाल यह परंपरा अब इतिहास मे दफन हो गई है ।
बहरहाल गांव की चौपालों से लेकर नवाबों, अमीरों और रजवाडों की मान-मर्यादा तथा समृध्दि का प्रतीक हुक्का धीरे धीरे बंद होने की कगार पर खडा है । वैसे उत्तर् प्रदेश, हरियाणा, बिहार, उत्तराखंड् व राजस्थान जैसे राज्यों के गांबों में पुरानी पीढी के लोग बेशक इसके आज भी शौकीन हैं लेकिन तेजी से बदल रहे जमाने में यह कब तक जिंदा रह सकेगा, कह पाना मुश्किल है । अब तो तंबाकू के शौकीन बीडी या सिगरेट के कश लेकर अपनी तलब बुझा लेते हैं । कुल मिला कर हुक्के की गुडगुडाहट बदले वक्त की बदली रूचियों की शिकार हो संकट के दौर से गुजर रही है ।