सोमवार, 31 अगस्त 2015

दरकते रिश्तों की त्रासदी

( एल.एस. बिष्ट ) - मुबंई के बहुचर्चित शीना बोरा हत्याकांड ने आज सभ्यता के ऊंचे पायदान पर खडे हमारे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया । दर-असल अपराध के नजरिये से देखें तो इसमें ऐसा कुछ भी नही जिसे देख या सुन कर कोई हैरत मे पड जाए या जो कल्पना से परे लगे । यह ह्त्याकांड इसलिए भी खास नही कि इस कहानी की नायिका यानी इंद्राणी मुखर्जी ने कपडों की तरह अपने पति बदले। न ही इसलिए कि इस ह्त्या कथा का जाल एक औरत के दवारा बुना गया जिसे भारतीय समाज मे अबला समझा जाता रहा है । दर-असल इस घृणित हत्या कथा ने हमारे समाज के उस चेहरे को उजागर किया है जिससे हम मुंह चुराते आए हैं । ग्लैमर की चकाचौंध के पीछे भी अंधेरे की एक दुनिया आबाद रह सकती है, इस सच से हम रू---रू हुए ।
इंसानी जिंदगी के चटक़ और भदेस रंगों को समेटे यह ह्त्याकथा हमे उस दुनिया मे ले जाती है जहां सतह पर ठहाकों की गूंज सुनाई देती है और थोडा अंदर जाने पर सिसकियों और बेबसी का ऐसा क्र्दंन कि सहज विश्वास ही न हो । दर-असल विश्वास न होने के भी अपने कारण हैं । भला एक रंगीन, चहकती और खुशियों मे मदहोस दुनिया के अंदर की परतों मे इस कदर उदासी और अवसाद का दमघोंटू अंधेरा होगा, भला कैसे सोचा जा सकता है । लेकिन यह भी एक सच है, इसे इंद्राणी और शीना की इस पेचीदी कहानी ने पूरी शिद्दत से सामने रखा है ।
देखा जाए तो यह कहानी सिर्फ शीना बोरा की हत्या की कहानी नही है बल्कि यह कहानी है इंसानी महत्वाकांक्षाओं, सपनों और उडानों की । एक ऐसी लडकी की कहानी जिसका स्वंय का बचपन एक् भयावह सपने से कम नही था । जिसे स्वंय घर की चाहरदीवारी के अंदर की ऐसी जिंदगी से गुजरना पडा जिस पर सात परदे डालने की ' दुनियादार प्रथा ' आज भी कायम है । उसे एक ऐसी जिंदगी जीने को अभिशप्त होना पडा जहां सिसकियां भी दम तोड देती हैं ।
लेकिन महत्वाकांक्षाओं के रथ पर सवार उस लडकी ने अपने लिए एक ऐसी दुनिया रच डाली जो उसकी उम्र की लडकियों के लिए दिवास्वप्न देखने जैसा ही है । लेकिन इंद्राणी के लिए यह एक हकीकत की दुनिया थी जहां उसने वह सबकुछ पाया जिसकी चाह उसे अपने किशोरवय उम्र के सपनों मे रही होगी
लेकिन सपनों सरीखी इस जिंदगी को जिन मूल्यों पर हासिल किया यही इस ह्त्याकांड का सबसे भयावह सच है । पति परमेश्वर की अवधारणा पर टिके समाज को जिस तरह वह ठेंगा दिखाती हुई , कपडों की तरह अपने लिए पति बदलती रही, इसने एक बडा सवाल हमारे सामाजिक मूल्यों पर उठाया है । यही नही, दया और ममता की जीती जागती मूर्ति समझे जाने वाली मां के किरदार मे जिन रंगों को भरा उसने सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि आखिर हम किस दिशा की ओर बढने लगे हैं ।
दर-असल गौर करें तो इधर उपभोक्ता संस्कृर्‍ति ने एक ऐसे सामाजिक परिवेश को तैयार किया है जहां हमारे परंपरागत सामाजिक मूल्यों का तेजी से अवमूल्यन हुआ है । नैतिक-अनैतिक जैसे शब्द अपना महत्व खोने लगे हैं । महत्वाकांक्षाओं और सबकुछ पा लेने की होड मे अच्छे बुरे के भेद की लकीर न सिर्फ कमजोर बल्कि खत्म सी होती दिखाई देने लगी है । समाज के हर स्तर और पहलू पर यह गिरावट साफ तौर पर देखी जा सकती है ।
देश के किसी भी शहर के अखबार पर नजर डालें तो एहसास हो जाता है कि हम एक ऐसी बदलती दुनिया का हिस्सा बन चुके हैं जहां वासना और ख्वाहिशों की मिनारें रोज--रोज ऊंची होती जा रही हैं । पत्नी अपने प्रेमी के लिए और पति अपने ' सपनों की रानी ' के लिए उन हदों को भी लांघ सकता या सकती है, जिनके मजबूत बंधनों पर भारतीय समाज गर्व करता रहा है । ऐसी घटनाएं अब किसी अखबार की सुर्खियां भी नही बनतीं क्योंकि यह हर शहर गांव कस्बे का सच बनती दिखाई दे रही है ।
अभी हाल के वर्षों की कुछ घटनाओं पर नजर डालें तो वासना की आंधी मे गिरते हुए मूल्यों की हकीकत को समझा जा सकता है । यही नही, प्यार और कामवासना मे अपना विवेक खो देने वाली अमरोहा ( .प्र. ) की उस लडकी को लोग अभी भूले नही हैं जिसने प्रेमी के साथ मिल कर पूरे अपने परिवार की ही ह्त्या कर दी थी । अभी हाल मे लखनऊ शहर के मडियाव मे एक महिला ने छ्ह साल के एक मासूम की जान सिर्फ इसलिए ली कि वह अपने प्रेमी के साथ फिरौती से मिले पैसों से ऐश कर सके । वह महिला रिश्ते मे उस बच्चे की सगी चाची थी ।
इस तरह की घटनाएं किसी एक शहर या राज्य तक सीमित नही हैं । इनका चंहुमुखी विस्तार हुआ है । ऐसा भी नही कि यह वर्ग विशेष तक् सीमित हो बल्कि यह जहर हर वर्ग को अपनी चपेट मे ले चुका है । अगर एक तरफ शहरी मध्यम वर्ग के आकाश छूते सपने हैं तो दूसरी तरफ उच्चवर्ग मे ऐशो आराम की ग्लैमर भरी जिंदगी की ख्वाहिशें कम हिलोरें नही मारतीं । किसी को पावर की भूख है तो किसी को खूबसूरत जिस्मों की तो कोई सपनों सी जिंदगी जीने को आतुर दिखाई देता है । यानी कुल मिला कर जिंदगी जीने की वह पुरानी सामाजिक अवधारणाएं अब कहीं हाशिए पर आती नजर आ रही हैं ।
बात यहीं तक नही है । बल्कि इन्हें पाने की एक ऐसी होड भी जिसमे सबकुछ लुटा कर भी पाने का दुस्साहस दिखाई दे रहा है । इस तरह देखा जाए तो बात चाहे इंद्राणी मुखर्जी की महत्वाकांक्षा भरी जिंदगी की हो या फिर उन महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढती शीना की जिंदगी की या फिर एक गुमनाम सी जिंदगी जीते मिखाइल या फिर मां बाप के अजीब रिश्तों की सजा भुगतने वाली विधि की , सभी को कहीं न कहीं बदले हुए उन मूल्यों ने ही डसा है जिनमे रिश्ते-नातों का कोई मूल्य नही रह जाता । भावनाएं महत्वाकांक्षाओं की बलि चढ जाती हैं ।

यह वह मूल्य हैं जो उपभोक्ता संस्कृति से उपजे हैं । और जिनका नशा सर चढ कर बोलता है और अंतत: उस मोड पर आकर खत्म हो जाता है जहां जिंदगी अपना अर्थ खो देती है । दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि इस अंधेरे का घेरा हमारी जिंदगी मे कसता ही जा रहा है । हम इससे मुक्त हो सकेंगे या नही, यही एक बडा सवाल है । 

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

बैसाखियों की दरकार


( एल.एस. बिष्ट ) - यह कहीं अच्छा और सुखद होता अगर गुजरात मे यह आंदोलन आरक्षण पाने के लिए नही बल्कि आरक्षण खत्म करने के लिए किया जाता । लेकिन जब देश की नसों मे स्वार्थ का रक्त संचारित होने लगा हो तो ऐसी आशा करना दिवास्वप्न देखने जैसा हो जाता है । दरअसल इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि पिछ्ले कुछ दशकों से भारतीय समाज व्यापक हितों से हट कर संकीर्ण स्वार्थों की सोच का शिकार बन कर रह गया है । राजनीतिक परिद्रश्य को ही देखें तो यहां भी व्पापक हित की सोच सिरे से नदारत है ।महज अपने हित की राजनीति को ही राजनीति का उद्देश्य मान लिया गया है । गौर करें तो स्वार्थ की यह सोच राजनीति के गलियारों से होती हुई सामाजिक जीवन के हर पहलू मे समाहित हो गई है ।
गुजरात जिसने विकास के एक माडल के रूप मे अपनी पहचान बनाई और दूसरों के लिए भी समृर्‍ध्दि के नये मुहावरे गढे, रातों रात असंतोष की आग मे जलने लगा । आश्चर्य यह कि वह उस समुदाय के कोप का शिकार बना जिसकी राजनीति से लेकर आर्थिक व सामाजिक सभी क्षेत्रों मे एक महत्वपूर्ण भागीदारी रही है । पटेलों का यह समाज एक ताकतवर व समृर्‍ध्द समाज के रूप मे जाना जाता है । यही नही, गुजरात की क्षेत्रीय राजनीति भी इनके इर्द गिर्द ही घूमती दिखाई देती है। फिर ऐसा क्या हो गया कि यह समुदाय अपने आप को पिछ्डा समझने लगा है । नब्बे के दशक मे हुए आरक्षण विरोधी आंदोलन एक हिस्सा बने इस पटेल समुदाय को ही आरक्षण की बैसाखी क्यों रास आने लगी है ।
इतिहास मे थोडा पीछे जांए तो पता चलता है कि संविधान सभा मे शामिल सदस्यों के बीच इस आरक्षण व्यवस्था को लेकर मतभेद था । लेकिन दलित समाज व जन-जातियों की जो दयनीय सामाजिक-आर्थिक स्थिति उस दौर मे थी उसे देखते हुए इन जाति समुदायों के लिए संविधान मे 15 7.5 प्रतिशत के आरक्षण की व्यवस्था पर सहमति बन ही गई । लेकिन दस वर्ष उपरांत इसकी समीक्षा की जानी थी । बस यहीं से देश का दुर्भाग्य इससे जुड गया और वोट की राजनीति से जुड आरक्षण व्यवस्था ने स्थायी रूप ले लिया
भारतीय राजनीति दलित आरक्षण के इस प्रेत से अभी मुक्त हो भी न सकी थी कि संकीर्ण राजनीति ने कोढ पर खाज का काम कर दिया । कमंडल के प्रभाव को खत्म करने के उद्देश्य से वी.पी.सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए पिछ्डी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा कर दी । बस यहीं से शुरू हुई सरकारी सेवाओं मे आरक्षण पाने की चुहा दौड जो आज भी जारी है ।
उत्तर भारत ही नही, दक्षिण भारत मे भी राजनीतिक हितों को देखते हुए पिछ्डी जातियों का चयन किया जाने लगा । ऐसे मे उत्तर व दक्षिण मे कई ताकतवर जातियां राजनीतिक समीकरणों के चलते पिछ्डे वर्ग मे शामिल कर दी गईं । देखा देखी दूसरी जातियों ने भी इसके लिए संगठित होना शुरू किया ।
उत्तर भारत मे राजस्थान, हरियाणा व प. उत्तर प्रदेश के एक ताकतवर जाट समाज ने भी आरक्षण के लिए गुहार लगाना शुरू कर दिया है । जब कि कभी अपने को पिछ्डा कहे जाने पर इन्हें सख्त विरोध था । यही स्थिति पटेलों की भी रही है । लेकिन आज यह भी इस ठ्सक को किनारा कर पिछ्डा कहलाने की होड मे लग गये हैं । यह हिंसक आंदोलन इसी का प्रतिफल है ।
यह सबकुछ नही होता अगर समय रहते इस आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने की पहल कर दी जाती । लेकिन वोट राजनीति के चलते ऐसा संभव न हो सका । बल्कि इसे वोट् कमाने का एक माध्यम बना दिया गया । आरक्षण को लेकर की गई स्वार्थपरक राजनीति ने देश के सामाजिक ताने बाने को ही छिन्न भिन्न कर दिया । गुजरात तो महज एक बानगी भर है ।
आसानी से सरकारी नौकरी मिल जाने के लोभ ने जातीय समुदायों को संगठित कर लडने का साहस दिया । जाट आंदोलन और अब गुजरात मे पटेल समुदाय की लडाई इसका उदाहरण है । यही नही, आरक्षण अब एक ऐसा मुद्दा बन गया है कि इस लालीपाप को दिखा कर कोई भी रातों रात नेता बन सकता है । हार्दिक पटेल उन्हीं नेताओं मे एक हैं ।
आरक्षण की इस बैसाखी को पाने के लिए अभी कई और जातीय समूह अपनी जमीन तलाश रहे हैं । समय रहते इस खतरे को न समझा गया तो इसका गंभीर परिणाम देश को भुगतना पड सकता है । इसलिए यह समय है कि राजनीतिक स्वार्थों को छोड कर आरक्षण को खत्म करने की पहल राजनीतिक स्तर पर की जानी चाहिए । वरना आरक्षण का यह दैत्य देश के भविष्य पर एक बडा सवाल बना रहेगा ।



मंगलवार, 28 जुलाई 2015

ऐसे तो खत्म न होगी आतंकी दहशत


( L. S. Bisht ) - इस बार गुरदासपुर । पांच नदियों का प्रदेश जिसने हिंसा का एक दौर देखा है, फिर दहल गया है । एक पीढी गुजर गई जिसने पंजाब के उस लहुलुहान चेहरे को देखा और दर्द की चीखें सुनीं । आज फिर चेहरे पर भय की रेखायें । इसलिए नही कि फिर हिंसा के दानवों ने हमारी चौखट पार की है, बल्कि इसलिए कि कहीं यह उस स्याह दौर की दस्तक तो नही जिसे भुलाये जाने की पुरजोर कोशिशें अब भी जारी हैं ।
सीमा पर गोलियों और बम की आवाजों से किसी को सिहरन नही होती ।लेकिन जब यही आवाजें घर के अंदर जहां हम अपने को सबसे ज्यादा सुरक्षित समझते हैं सुनाई देती हैं तो डरना स्वाभाविक ही है । तीन आतंकी आए और फिर हमे घाव दे गये । अब तो लगता है कि हम इन घावों के अभ्यस्त से होते जा रहे हैं । इन घावों से रिसते खून को येनकेन रोकने के लिए मानो हम दवा-पट्टी लेकर हमेशा तैयार बैठे हों ।
आतंकी घटनाओं मे अकाल मृत्यु के ग्रास बने अपने जवानों, अफसरों और नागरिकों को " शहीद " का दर्जा दे मानो फिर मौत की अगली दस्तक का इंतजार करने लगते हैं । रोज--रोज होने वाले यह धमाके और फिर दिल को चीर देने वाली चीखों को मानो हम अपनी नियति मान बैठे हैं । लगता है हर ऐसे हादसे के बाद लाशों को गिनने के लिए हम अभिशप्त हैं । एक सन्नाटा सा पसरा है । जहां किसी को कुछ सूझ नही रहा ।
दर-असल गौर से देखें तो पाकिस्तान प्रायोजित यह आतंकवाद हमारी मानसिक कमजोरी पर बार बार चोट कर हमे आहत कर रहा है । वह जांनता है कि अतीत की सैनिक असफलताएं अब इतिहास बन गई हैं । 1965 हो या फिर 1971 या करगिल युध्द पारंपरिक युध्द शैली मे उसे मुंह की खानी पडी है । आज के हालातों मे भी उसे शिकस्त दिवारों पर लिखी साफ दिखाई दे रही है । लेकिन एक परमाणु सम्पन देश होने का जो तमगा उसने लगा दिया है, इससे वह अपने को ऊंचाई पर खडा देख रहा है ।
बार बार भारत को घाव देने के बाबजूद भारतीय सेना ने सीमाओं की हद नही लांघी । इसे वह अपनी एक उपलब्धी समझने लगा है । यहां तक कि करगिल युध्द मे भी भारतीय सेनाएं अपनी ही जमीन पर खडी थीं । यह उसने स्वयं नंगी आंखों से देखा है ।
कहीं न कहीं परमाणु अस्त्रों को वह भारत की लाचारगी का कारण मानने लगा है । समय समय पर परमाणु युध्द की धमकी देने मे भी उसे कोई हिचकिचाहट नहीं । भारतीय पक्ष को देखें तो शायद लाचारगी का यही कारण समझ मे भी आता है । अन्यथा दुनिया की एक बेहतरीन विशाल सेना वाले देश का नित घाव खाना और आहत होना समझ से परे है ।
इसमे अब कोई संदे ह नही कि भारत को अगर इस प्रायोजित आतंकवाद को रोकना है तो पडोसी की इस धमकी से पार पाना ही होगा । ऐसा भी नही कि युध्द रण्नीतियों की किताबों मे इसका कोई जवाब ही न हो । महाभारतकालीन चक्र्व्यूह जिसे एक अजेय व्यूह रचना समझा जाता रहा उसको भी भेदने की कला अर्जुन को मालूम थी । इसी तरह आधुनिक युध्द कौशल मे भी ऐसा संभव है कि परमाणु शस्त्रों का जखीरा सिर्फ देखने की चीज बन कर रह जाए और उसका उपयोग ही संभव न हो सके । आक्रामक युध्द शैली अनेक संभावनाओं के रास्ते खोलती है । वैसे भी गांधी के पदचिन्हों पर चलने वाले इस देश को अब यह समझ लेना चाहिए कि कभी चीन के राष्ट्र्पति माउत--तुंग ने यूं ही नही कहा था कि " पीस क्म्स फ्रोम बैरल आफ गन " यानी शांति बदूंक की नाल से आती है । आज वह देश न सिर्फ समृध्दि के ऊंचे पायदान पर खडा है बल्कि दुनिया की एक ताकत भी है ।


बहरहाल अब समय आ गया है कि आतंक की इस दहशत से मुक्ति के लिए नितांत नई संभावनाओं पर विचार करें । अन्यथा इसका काला साया पूरे देश को अपनी गिरफ्त मे ले लेगा और तब हम अपने को लाचारगी की स्थिति मे देख रहे होंगे ।

सोमवार, 20 जुलाई 2015

घाटी मे आतंक का बदलता चेहरा



( एल. एस. बिष्ट ) दिल्ली की राजनीति मे राजनीतिक दलों के बीच नित नये आरापों-प्रत्यारोपों से थोडा अलग हट कर देखें तो घाटी मे आतंक का एक नया चेहरा उभरता दिखाई देने लगा है । रूबिया अपहरण कांड के बाद हिंसा और अलगाव की जिस लहर ने पूरी घाटी को अपने चपेट मे ले लिया था, अब एक बार फिर वही हालात बनते दिखाई दे रहे हैं । अभी तक देश घाटी मे आतंक के जिस चेहरे व तेवर से परिचित रहा है उसमे तेजी से बदलाव आता दिख रहा है । युवाओं की बढती भागीदारी स्प्ष्ट दिखाई देने लगी है । बडी संख्या मे कश्मीरी युवा विरोध प्रदर्शनों मे आने लगे हैं । यही नही, इधर कुछ समय से घाटी के प्रदर्शनों मे इस्लामिक स्टेट और फिलस्तीन के झंडे भी कुछ ज्यादा ही नजर आने लगे हैं । इन झंडों का कुछ समय पहले तक घाटी से कोई रिश्ता नही था ।

इधर हाल मे अमेरिका के विदेश विभाग ने आतंकवाद की अपनी 2014 की जो वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित की है इसमे इस्लामिक स्टेट के बढते प्रभाव पर चिंता व्यक्त की है । इस रिपोर्ट मे यह भी बताया गया है कि वैसे अभी तक बहुत कम भारतीय इस आतंकी संगठन से जुडे हैं परंतु भारत मे मुस्लिम आबादी को देखते हुए अधिक संख्या मे लोगों के इस्लामिक स्टेट से जुडने की संभावनाओं से इंकार नही किया जा सकता ।

इस संदर्भ मे देखें तो यहां पाकिस्तान के झंडों का लहराया जाना व पाकिस्तान समर्थक बैनरों का दिखाई देना कोई बडी बात नही रही । लेकिन जिस तरह से अब आए दिन इस्लामिक स्टेट के झंडे दिखाई देने लगे हैं , यह आने वाले खतरे की द्स्तक है । बहुत संभव है आतंक का यह नया चेहरा कश्मीर घाटी के रास्ते देश मे अपनी जडें जमाने की संभावनाओं को तलाशने लगा हो । युवाओं की बढती भागीदारी तो इसी तरफ इशारा कर रही है । अगर ऐसा है तो यह वास्तव मे एक बडा खतरा है जिसे समय रहते समझना और खत्म करना होगा । अगर इन झंडों के प्रदर्शन और उनको लेकर लगाए जाने वाले अलगाववादी नारों पर गंभीरता से ध्यान नही दिया गया तो बहुत संभव है देश के दूसरे हिस्सों मे भी इसका विस्तार दिखाई देने लगे ।
वैसे भी इस संगठन के मुखिया अबु बकर अल बगदादी मुस्लिम युवाओं को दुनिया में इस्लामिक स्टेट का सपना दिखा कर अपनी लडाई में शामिल करते आये हैं । बगदादी अपने मजहबी भाषणों और वीडियो के जरिये मुस्लिम युवाओं को यह समझाने में सफल रहा है कि दुनिया में इस्लाम खतरे मे है और शरीयत के अनुसार एक इस्लामिक देश बनाया जा सकता है जो दुनिया पर राज करे लेकिन इसके लिए एकजुट होकर लडना होगा । कई देशों के युवा उसकी बातों से प्र्भावित हो उसके साथ शामिल हो चुके हैं ।

   अगर सीरियन आब्जर्बेटरी फार ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के आंकडों पर विश्वास करें तो इस संगठ्न के पास लगभग 50 हजार लडाके इरान में और 30 हजार सीरिया में हैं । इनमें अच्छी खासी संख्या विदेशी लडाकों की भी है । इनमें मुख्य रूप से फ्रांस, ब्रिटेन, चेचेन्या आदि देशों के युवा शामिल हैं । यह खतरा भारत मे भी मंडराने लगा है ।
यही नही, यह संगठन अब मासूम बच्चों को अपना मोहरा बनाने लगा है । पांच साल से 14 साल तक के बच्चों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देकर इन्हें लडाई में झोंका जा रहा है । दर-असल बच्चों को शामिल करना इस संगठन की बहुत सोची समझी रणनीति है । यह एक पीढी के मासूम दिलो-दिमाग में अभी से नफरत पैदा कर इस्लाम के लिए लडने वाले जेहादियों की एक खतरनाक फौज तैयार कर रहा है । उसका मकसद आने वाले समय के लिए इन्हें तैयार करना है ।
यही नही, इन बच्चों को लडाई के मोर्चों पर एक ढाल के रूप में भी इस्तेमाल करने की उसकी सोची समझी योजना है । इसलिए जरूरी है कि भारत मे इस खतरे को समय रहते महसूस किया जाए तथा ऐसा न हो इसके लिए कारगर रणनीति बना कर इस आतंकी संगठन के इरादों को पूरा न होने दिया जाए ।


     इधर घाटी मे कुछ आतंकी युवाओं ने आतंक के लिए भारतीय सेना की वर्दी का इस्तेमाल करने की भी योजना को अमल मे लाने का प्रयास शुरू किया है । आतंक का यह चेहरा बेहद डरावना है । इसकी शुरूआत अभी हाल मे ही हुई है । इस तरह कुल मिला कर घाटी मे आतंक का एक नया चेहरा अपनी शक्ल लेने लगा है । इस्लामिक स्टेट और फिलिस्तीन के झडे इस ओर साफ इशारा कर रहे हैं और युवाओं की बढती भागीदारी भी । जरूरी है कि इन प्रयासों को शुरूआती दौर मे ही खत्म कर दिया जाए । अन्यथा एक बार जडे जमा लेने के बाद इसे रोक पाना इतना आसान नही रहेगा ।  

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

मां के सम्मान का फैसला

(एल. एस. बिष्ट ) - अभी हाल मे उच्चतम न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले मे कहा है कि अब बिन ब्याही मां अपने बच्चों की कानूनी रूप से अभिभावक ( गार्जियन ) हो सकती है । इसके लिए बच्चे के पिता से अनुमति लेने की जरूरत नही होगी । अदालत ने अपने ;फैसले मे कहा है कि अगर कोई अविवाहित मां बच्चे का बर्थ सर्टिफिकेट बनवाने की अर्जी लगाए तो उसे यह सर्टिफिकेट दिया जाए । अदालत ने आगे यह भी स्पष्ट किया है कि समाज बदल रहा है । ऐसी महिलाओं की संख्या बढ रही है जो स्वंय बच्चे की परवरिश करना चाहती हैं । यह सही नही होगा कि ऐसे पिता की अनुमति को जरूरी माना जाए जो बच्चे को न तो  कानूनी तौर पर रखने को तैयार है और न ही बच्चे से वह कोई मतलब रखना चाहता है ।

देखा जाए तो न्यायालय का यह फैसला मां के रूप मे एक औरत के सम्मान से जुडा ऐतिहासिक फैसला है । यह सच है कि पिता चाहे कोई भी हो लेकिन मां हमेशा मां रहती है । ऐसे समय मे जब भारतीय समाज मे परंपरागत मूल्य तेजी से बदल रहे हों तथा स्त्री-पुरूष संबधों मे खुलेपन की नित नई खिडकियां खुलने लगी हों, इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए ।

दर-असल भारतीय समाज परंपरागत रूप से पुरूष प्रधान रहा है । इस द्र्ष्टि से महिलाओं की सामाजिक भूमिका बहुत ही सीमित रही है । एक महिला का जीवन घर-परिवार की चाहरदीवारी तक ही सीमित होकर रहा है । बरसों बरस तक हमारे समाज मे महिलाओं ने इसे एक परंपरा के रूप मे सहर्ष स्वीकार किया है । इसलिए भूमिका को लेकर कभी भी अहम के टकाराव जैसी  बात देखने को नही मिली । लेकिन इधर विकास व उन्नति की सीढियां चढते भारतीय समाज मे बहुत कुछ ऐसा नया जुडा है जिसकी कल्पना साठ या सत्तर के दशक मे संभव नही थी ।

घर के चारदीवारी तक सीमित रहने वाली औरत ने बाहर की दुनिया मे भी अपनी भूमिका को तलाशा तथा उसे निर्वाह करने कि लिए अपने को एक अलग ही मानसिक सांचे मे ढालने का सफल प्रयास किया । रसोई व बच्चों से हट कर जब वह दूसरे क्षेत्रों मे भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगी तो कई पारंपरिक मूल्य व विचार यकायक दरकने लगे । खुली हुई खिडकियों से उसने अपने अलग वजूद को देखा और समझा । यहीं से शुरू हुई उसके अपने अधिकारों व सम्मान के लिए लडाई जो अब भी जारी है । अस्सी के दशक मे चर्चित टी वी कलाकार नीना गुप्ता  वेस्ट इंडिज के क्रिकेटर विवियन रिचडर्स से संबधों के चलते बिन ब्याही मां बनी थीं और तब इस मामले ने सामाजिक क्षेत्र मे एक तहलका मचा दिया था । लेकिन इधर समय चक्र के साथ सामाजिक जीवन मे बहुत कुछ बद्ला है ।

खुलेपन व समाज मे महिलाओं की बढती भागीदारी के फलस्वरूप वह सवाल भी   सामने आने लगे हैं जिन पर कभी सोचा ही नही गया । स्त्री पुरूष दैहिक संबधों की तमाम उलझनें मुखरता से अपने जवाब तलाश रही हैं । वे तमाम सामाजिक बातें जिन पर परदेदारी रही हैं, बेपर्दा हो गईं । प्यार, सेक्स व विवाह संबधों से उपजे सवालों पर जो बेबसी व लाचारगी की स्थिति को वह झेलती रही है उससे मुक्त होने के प्रयास मे वह पूरे जी जान से जुट गई है । मानवीय भूलों या अनचाही दुर्घटनाओं की स्थिति मे चाहे बलात्कार के बाद अनचाहे गर्भधारण की बात हो या फिर सहमति से बनाये गये रिश्तों के फलस्वरूप जन्म लेने वाले बच्चे का सवाल हो, उसकी स्थिति हमेशा निरीह रही मानो सारा दोष उसी का रहा हो ।

आज बेबसी व लाचारी के इस अंधेरे से ही उसे उजाले मे लाने के प्र्यास किये जा रहे हैं । जिससे वह भी समाज मे सम्मान के साथ जी सके । न्यायालय का यह फैसल्ल उसी उजाले की ओर ले जाने का एक प्र्यास है जहां उसे किसी पुरूष का मोहताज न रहना पडे । सही अर्थों मे यह एक मां का सम्मान है चाहे उसकी संतान के पिता का  रिश्ता कानूनी रूप से स्वीकार्य हो या न हो लेकिन चूंकि वह उस बच्चे की मां है इसलिए उस पर उसका पूरा अधिकार है । आने वाले समय मे तेजी से बदलते समाज मे इसका बडा दूरगामी प्रभाव पडेगा ।    

सोमवार, 22 जून 2015

शराब कांड / भ्रष्ट तंत्र ने बुलाई अकाल मौतें



 ( L. S. Bisht )    स्वतंत्रता के बाद की राजनीति पर नजर डालें तो एक बात पूरी तरह से साफ़ हो जाती है कि चुनाव दर चुनाव भारतीय राजनीति मे सामाजिक मुद्दों व विकास की चिंताओं की धार कुंद होती गई है | राजनीतिक दलों की चिंता का विषय देश का विकास नही अपितु वोट का विस्तार रही है | यह प्रवत्ति साल-दर-साल प्रत्येक राज्य व राजनीतिक दल मे कुछ और मजबूती से विस्तारित होती दिखाई दे रही है | वोट पर केन्द्रित इस राजनीतिक चिंतन ने समाज से जुडे उन सवालों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया है जिन पर गहराई से सोचा जाना चाहिए था | आज स्थिति यह है कि तमाम सामाजिक मुद्दे हमारी राजनीतिक चिंता के दायरे से बाहर हैं |
     अभी हाल की कुछ घटनाओं को ही लें तो बात समझ मे आती है | मुंबई मे जहरीली शराब के कारण लगभग 100 लोगों को असामयिक मृत्यु का ग्रास बनना पडा | एक ही शहर मे बल्कि यूं कहें कि शहर के एक ही क्षेत्र मे इतनी मौतें क्या किसी को सुन्न कर देने के लिए प्रर्याप्त नहीं हैं |
     तमाम टी वी चैनलों पर दिन दिन भर इन मौतों से उपजे करूण द्र्श्यों को दिखाया जाता रहा | रोते बिलखते परिवारों के मार्मिक द्र्श्यों के साथ पुलिस के “ कडे कदमों “ व “ आवश्यक कार्रवाहियों “ के द्र्श्य भी तमाम सवाल उठाते रहे | लेकिन लाख टके का सवाल आज भी अपनी जगह पर है कि क्या अब हम फ़िर किसी शहर मे जहरीली शराब का तांडव होने का समाचार नही सुनेंगे |
     लेकिन हम जानते हैं कि ऐसा नही होगा | पहले भी जहरीली शराब देश मे कहीं न कहीं लोगों को काल का ग्रास बनाती रही है और मौत के इस ताडंव के बाद भी बनाएगी | यह सिलसिला रूकेगा ऐसा सोचना दिवा स्वप्न से ज्यादा कुछ नही | दर-असल देश के भीतर होने वाली इस तरह की मौतें हमारे राजनीतिक तंत्र को विचलित नही करतीं | यह निष्ठुर तंत्र जानता है कि उसके अंदर से ही एक ऐसा भ्र्ष्ट नौकरशाही तंत्र विकसित होकर भस्मासुर बन चुका है जो इतनी आसानी से ख्त्म होने वाला नही | यह भ्र्ष्ट तंत्र राजनीतिक तंत्र से ही जन्मा और विकसित होकर आज ताकतवर होकर अजेय सा दिखने लगा है |
     दर-असल इस देश मे अब यह भ्र्ष्ट तंत्र उस मेढ की तरह है जो स्वयं ही खेतों को निगलने लगे | पुलिस और आबकारी विभाग जिन्हें ऐसे काले कारोबार पर नजर रखनी चाहिए, स्वयं ही उसके संरक्षक बने हुए हैं | उनके ही आर्शीवाद की छ्तरी तले यह जहरीला कारोबार प्रत्येक राज्य, शहर और गांव-कस्बों मे फ़लता फ़ूलता है | भ्र्ष्ट राजनीतिक तंत्र से जन्मे इस नौकरशाही तंत्र के आगे अब स्वयं राजनीति बेबस नजर आने लगी है | यह बेबसी ही इन अकाल मौतों के लिए सीधी तौर पर जिम्मेदार है | यह दीगर बात है कि हमें इसका वह चेहरा दिखाई नही देता बल्कि हमे दिखाई देते हैं शराब के पाउच या बोतलें | हमारा सारा आक्रोश उन बेजान पाउच व बोतलों पर केन्द्रित होकर रह जाता है और राजनीति व नौकरशाही का भ्र्ष्ट चेहरा कटघरे से बाहर खडा दिखाई देता है |

     यहां यह समझ लेना जरूरी है कि जब तक हम इस राजनीतिक व नौकरशाही तंत्र को कटघरे मे खडा नही करते और उसके विरूध्द अपनी आवाज बुलंद नही करते, इस तरह के हादसे बार बार होते रहेंगे | इसलिए जरूरी है कि इंसानी जिंदगी को चंद रूपयों के बदले मौत के सौदागरों के हाथों गिरवी रखने वाले इस तंत्र अथवा सिस्टम को खत्म किया जाना चाहिए और यह कार्य लोकतंत्र मे मुश्किल नही  बशर्ते हम पूरी ताकत और इच्छाशक्ति से आगे आने का साहस करें | 

बुधवार, 17 जून 2015

संकट मे परीक्षाओँ की साख

                       ( L.S. Bisht )    फ़र्जी डिग्री का राजनीतिक मुद्दा अभी ठंडा भी नही हुआ था कि प्रतियोगी परीक्षाओं की पवित्रता व विश्वसनीयता सवालों के घेरे मे आ गई | देश के लिए भावी डाक्टरों का चयन करने वाली प्रतिष्ठित परीक्षा आल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट ,2015 को उच्चतम न्यायालन ने रद्द कर दिया है | साथ ही सी बी एस सी बोर्ड को निर्देश दिये हैं कि चार सप्ताह के अंदर दोबारा परीक्षा कराई जाए | देश के 1050 परीक्षा केन्द्रों मे लगभग 6 लाख छात्रों दवारा दी गई इस परीक्षा का अभी हाल के वर्षों तक काफ़ी प्रतिष्ठा रही है | लेकिन इधर इस पर भी उंगलियां उठने लगी हैं | गत तीन मई को सम्पन्न हुई इस परीक्षा मे बडे पैमाने पर नकल का पर्दाफ़ाश हुआ था | अदालत के सामने भी इस परीक्षा को रद्द करने का निर्णय लेना इतना आसान नही था | इस परीक्षा के दोबारा होने से मेडिकल कालेजों मे प्रवेश की पूरी  प्रकिया ही प्रभावित हो सकती है |
      दर-असल इस अखिल भारतीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा के माध्यम से राज्यों के मेडिकल कालेजों की 15 प्रतिशत सीटें भरी जाती हैं | छात्र अपने राज्य की मेडिकल प्रवेश परीक्षा से ज्यादा महत्व इस परीक्षा को देते हैं | इस परीक्षा मे चयन हो जाने पर अक्सर राज्य मेडिकल प्र्वेश परीक्षा की सीट छोड देने के विकल्प को ही प्रमुखता देते हैं | लेकिन अब जब यह परीक्षा ही रद्द हो गई है, सबकुछ गडमड हो गया है | अब या तो छात्र राज्य मेडिकल परीक्षा के आधार पर मिल रही सीट को छोड कर इस परीक्षा मे चयन होने का जोखिम लें या फ़िर इस परीक्षा को अपने दिमाग से ही निकाल कर राज्य प्री मेडिकल प्रवेश परीक्षा मे मिल रही सीट से अपने डाक्टर बनने के सपने को पूरा करें |
      वैसे यहां गौरतलब यह भी है कि इस बार उत्तर प्रदेश प्री मेडिकल परीक्षा भी संदेह के घेरे मे है | पुलिस की स्पेशल टास्क फ़ोर्स ने लखनऊ मे लगभग एक दर्जन लोगों को पर्चा आउट करते हुए पकडा था | उनके पास से पर्चे की फ़ोटोकापी भी बरामद हुई थी | लेकिन शासन स्तर पर कुछ न होने के कारण कुछ छात्र इलाहाबाद उच्च न्यायालय गये जहां 28 जुलाई को सुनवाई होनी है | लेकिन पता नही क्यों अतिरिक्त तेजी दिखाते हुए परीक्षा के परिणाम समय से पहले ही घोषित कर दिये गये हैं | इससे शंका और गहरा गई है | बहरहाल इस परीक्षा के ऊपर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं |

      देश के गाँव-कस्बोँ और शहरोँ मे माता-पिता अपने बच्चोँ को हमेशा कहते आए हैँ कि ' पढोगे लिखोगे बनोगे साहब, खेलोगे कूदोगे होगे खराब '
देश मे आज के सँदर्भ मे खेलंते कूदने से बिगडने वाली बात चाहे पूरी तरह से सत्य न भी हो लेकिन पढ लिख कर साहब बनने के सपनोँ मे भ्र्ष्टाचार व नकल का काला साया जरूर मँडराने लगा है ।
      अभी हाल मे उत्तरप्र्देश लोकसेवा आयोग की सबसे प्रतिष्ठित पी.सी.एस. परीक्षा के प्रारँभिक चरण के प्रशन पत्र लीक होकर बाजार मे आ गए । वाटसऐप के माध्यम से पाँच-पाँच लाख रूपये मे इन्हेँ बेचा गया । यह सबकुछ् परीक्षा प्रारंम्भ होने के एक घंटे के अंदर हुआ ।
      ऐसा पहली बार नही हुआ है । इसके पूर्व प्रदेश की प्री-मेडिकल परीक्षाओं मे व्यापक स्तर पर नकल और संगठित भ्र्ष्टाचार के मामले प्रकाश मे आए हैं । प्रतिवर्ष इस मेडिकल परीक्षा मे मुन्ना भाई पकडे जाते हैं लेकिन यह सिलसिला बदस्तूर जारी है । इंजीनियरिंग परीक्षा मे भी नकल का आरोप लगता रहा है । कर्मचारी चयन आयोग व रेलवे बोर्ड की परीक्षाओं मे भी कई बार ' मुन्ना भाई ' पकडे गये हैं और प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं सामने आई हैं ।
      इधर कुछ वर्षों मे प्रतियोगी परीक्षाओँ मे यह बीमारी तेजी से बढी है । तीन साल पहले अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के परास्नातक दाखिले के लिए होने वाली परीक्षाओं मे अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग कर नकल करने के प्रयास किए गये थे । इसका सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि नकल के यह प्रयास अब बहुत ही संगठित व अत्याधुनिक तकनीक के उपयोग से किए जा रहे हैं । इनमें उच्चस्तर के लोगों की भूमिका भी संदेह के घेरे मे है । लेकिन विडंबना यह है कि ऐसे मामलों मे कुछ दिन शोर मचने की बाद जांच के परिणामों के बारे मे कोई जानकारी नही मिलती ।
      शिक्षा व रोजगार से जुडे इस पहलू का एक स्याह पक्ष यह भी है कि कालेज व विश्वविधालय स्तर की परीक्षाएं भी नकल व भ्ष्टाचार से मुक्त नही हैं । अभी हाल मे बिहार की हाईस्कूल व इंटरमीडिएट परीक्षा मे नकल का जो नजारा पूरे देश ने देखा वह अदभुत था । यानी एक तरह से शिक्षा का पूरा क्षेत्र ही भ्रष्टाचार का शिकार है । थोडा और पीछे जाएं तो स्कूल कालेजों मे होने वाले प्रवेश व प्रवेश परीक्षाएं भी हेरा फेरी से मुक्त नही हैं । कुल मिला कर ऐसा कुचक्र बन गया है कि मेधावी छात्रों का भविष्य खतरे मे दिखाई देने लगा है ।

      नकल और भ्र्ष्टाचार के दलदल मे गहरी धंसती हुई इन प्रतियोगी परीक्षाओं की साख साल-दर-साल खत्म हो रही है । इससे सबसे बडा अहित उन छात्रों का हो रहा है जो इन परीक्षाओं के माध्यम से सरकारी सेवा मे आने का सपना देखते हैं । इसके लिए वह अपने गांव-कस्बों को छोड शहरों मे रह कर कोचिंग और किताबों मे पैसा खर्च करते हैं । रात दिन की मेहनत के बाद उन्हें पता चलता है कि जिस प्रश्नपत्र को वह देकर आए हैं वह तो पहले से ही लीक है । ऐसे मे उनकी मनोदशा क्या होगी, इसे सिर्फ सोचा जा सकता है ।
      बार बार परीक्षाओं मे नकल होने का बखेडा व उच्च स्तर पर धांधली की खबरें इनके उत्साह और मनोबल को भी तोडती हैं । उनका विश्वास इन परीक्षाओं से उठने लगता है । एकदिन वह कुंठित हो जाते हैं । यही हालात रहे तो एकदिन मेधावी छात्र सरकारी सेवाओं मे प्रदेश  की इन प्रतियोगी परीक्षाओं से ही किनारा कर लेंगे और निजी क्षेत्र मे अपने भविष्य की तलाश करेंगे । ऐसे मे सरकारी सेवा के विभिन्न क्षेत्रों के लिए दोयम दर्जे के अभ्यर्थी ही मिल सकेंगे और उनके हाथों मे देश व प्रदेश के शासन की जिम्मेदारी होगी । तब देश किस दिशा को अग्रसर होगा, आसानी से सोचा जा सकता है ।
      देश व समाज मे जरूरी है कि शिक्षा व रोजगार के क्षेत्र को भ्र्ष्टाचार से पूरी तरह से मुक्त किया जाए । इसके लिए कडे दंड की व्यवस्था बेहद जरूरी है । अभी तक इन मामलों मे अपराधी के पकडे जाने पर उसे बामुश्किल दो -एक साल की ही सजा हो पाती है । ऐसे मे अपराधियों को यह घाटे का सौदा नजर नही आता । किस्मत साथ दे गई तो लाखों-करोडों की कमाई और अगर पकडे गये तो मात्र दो-एक साल की सजा । जरूरी है कि सजा सख्त और लंबी हो । यहां तक कि इसमे आजीवन कारावास का भी प्रावधान हो ।
      इसके अतिरिक्त अब आधुनिक तकनीक ने भी इस समस्या को और भी पेचीदा बना दिया है । अपराधी अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग कर  साफ बच निकलते हैं । इसलिए जरूरी है कि साइबर अपराध से निपटने के लिए पुलिस व प्रशासन को भी नये तरीकों से लैस होना होगा । ऐसे तरीके खोजने होंगे कि नकल व पर्चा लीक होने की संभावना ही न रहे । इसमे कोई संदेह नही कि  अगर हमे सरकारी सेवा मे प्रतिभाओं की जरूरत है तो हमे इन प्रतियोगी परीक्षाओं की साख को हर कीमत पर बनाए रखना होगा ।