शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

समान नागरिक संहिता पर इतना शोर क्यों

वोट बैंक की राजनीति के चलते जिस धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण का राजनीतिक खेल खेला जा रहा था उसका बिगडेल चेहरा अब सतह पर स्पष्ट दिखाई देने लगा है । बहुसंख्यक हिंदुओं ने देश व समाज हित मे बनाये गये कानूनों पर कभी कोई संदेह नही किया । लेकिन अब  जब बात समान नागरिक संहिता की उठ रही है तो कुछ मुस्लिम धर्मगुरूओं को उच्चतम न्यायालय से लेकर सरकार तक की नियत मे खो'ट दिखाई देने लगा है । यहां तक कि मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने साफ कर दिया है कि वह ' एक देश एक कानून ' को नही मानेगा । बोर्ड  और  अन्य मुस्लिम संगठनों ने  भी समान नागरिक संहिता का विरोध कर विधि आयोग की प्रशनावली का बायकाट करने का एलान  किया है ।

बोर्ड के महासचिव मोहम्मद वली रहमानी तो दो कदम आगे चल कर प्रधानमंत्री मोदी को सलाह देते नजर आ रहे हैं कि वह पहले दुश्मनों से निपटें । घर के अंदर दुश्मन न बनाए । यह हाल तब है जब देश की शीर्ष अदालत के निर्देश पर सरकार ने विधि आयोग को महज राय जानने का काम सौंपा है ।

देश मे समान नागरिक संहिता की बात एक  लंबे अरसे से महसूस की जा रही थी । लेकिन इसके लिए अनुकूल सामाजिक परिवेश न होने के कारण इसे ठंडे बस्ते मे रखना ही बेहतर समझा गया । लेकिन इधर मुस्लिम समाज मे तलाक के तरीकों को लेकर इस समाज के अंदर से ही आवाजें उठने लगीं और  तलाक के बाद महिलाओं की दयनीय हालातों को देख कर उच्चतम न्यायालय को सरकार से पूछ्ना पडा कि वह समान नागरिक कानूनों की दिशा मे क्या सोच रही है । लेकिन इतने भर से सियासी घमासान शुरू हो गया । मुस्लिम धर्मगूरूओं व मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड् से जुडे लोगों को इसमें अपनी धार्मिक स्वतंत्रता खतरे मे पडती दिखाई देन लगी । हास्यास्पद  तर्क तो यहां तक दिये जा रहे हैं कि एक कानून के चलते भारत की विविधता ही  खत्म हो जायेगी ।

लेकिन सच यह है कि मुस्लिम समाज के कुछ लोग अपने वर्चस्व को बनाये रखना चाहते हैं । उनके विरोध के पीछे मुख्य कारण उनके अपने स्वार्थ है जिन  पर वह धर्म व परंपरा का लबादा डाल कर लोगों को विरोध के लिए उकसाने की कोशिशों मे लगे हैं । जब कि वास्तविकता यह है कि यही धार्मिक परंपराएं आज उनके विकास मे सबसे बडी बाधक बन कर खडी हैं ।

देखा जाए तो इसमें इतना उग्र व विचलित होने की आवश्यकता ही नही है । यह तो सिर्फ राय जानने  की एक कोशिश भर है और उसके लिए कुछ सवालों की एक प्रशनावली है  जिस पर लोगों से सुझाव मांगे गये हैं  । गौरतलब  यह भी है इस प्रशनावली के सवाल सिर्फ मुस्लिम समुदाय से ही नही बल्कि हिंदु व ईसाई समुदाय से भी संबधित हैं । लेकिन विरोध के स्वर सिर्फ मुस्लिम धर्मगुरूओं व कुछ संगठनों से ही उठ रहे हैं । इसी मे एक अहम सवाल है कि क्या तीन तलाक की प्रथा को रद्द किया जाना चाहिए ? या कुछ बदलाव अथवा इसी रूप मे बरकरार रखा जाए ? इसी तरह बहु विवाह के संबध मे भी  राय जानने की कोशिश की गई है । यही नही हिंदु महिलाओं की संपत्ति के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाये जाने चाहिए इसमे भी विचार मांगे गये हैं । इसी तरह तलाक के लिए ईसाई महिलाओं को दो साल के इंतजार पर भी  पूछा गया है कि क्या यह  दो वर्ष का  समय  इन महिलाओं के समानता के अधिकार को प्रभावित करता है ? इसी तरह कुछ और सवाल हैं । लेकिन सारा शोर और विरोध मुस्लिम समा ज के सवालों को लेकर है । आखिर ऐसा क्यों ?

नि:संदेह यह एक अच्छा कदम है और विशेष कर यह देखते ह्ये कि कुछ समुदायों मे धर्म व परंपराओं के नाम पर महिलाओं के साथ अन्याय हो रहा है । लेकिन धर्मगुरूओं की अपने हितों और वर्चस्व बनाये रखने की राजनीति के चलते एक बेवजह का शोर सुनाई देने लगा है । आग मे घी का काम वह राजनीतिक दल भी कर रहे हैं जो सेक्यूलर राजनीति का लबादा ओढ अपने वोट बैंक की राजनीतिक रोटियां लंबे  समय से सेंक रहे हैं । जबकि सच यह है कि सेक्यूलर राजनीति के इन झंडाबरदारों को मुस्लिम समाज की बदहाली से कभी कोई लेना देना रहा ही नही । ऐसा होता तो वह इन प्रगतिशील कदमों का कुतर्कों के माध्यम से विरोध कदापि न करते ।

बहरहाल धर्म व वोट की राजनीति करने वालों को यह जानना जरूरी है कि हमारे संविधान मे भी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता की बात कही गई है । इसे राज्य के नीति निदेशक तत्वों मे शामिल किया गया है जैसा कि कई और अन्य बातों को । लेकिन यह दीगर बार है कि अभी तक इस दिशा की ओर कभी गंभीरता से सोचा ही नही गया था । न्यायालय के माध्य्म से ही सही यह एक सराहनीय प्रयास है जिसे संकीर्ण धार्मिक भावनाओं से ऊपर उठ कर देखा समझा जाना चाहिए ।

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

उदारता नही आक्रामकता की जरूरत

आखिरकार नाउम्मीदों का वह अंधेरा जिसने पूरे देश को निराशा के गर्त मे डाल दिया था, खत्म हुआ । एकबारगी फिर जयकारों से पूरा देश गूंज रहा है । बार बार के आतंकी हमलों और उसके बाद भारत की कमजोर् राजनीतिक प्रतिकिया से ऊबी देश की जनता को मानो एक नया टानिक मिल गया हो । दर-असल आतंकी हमलों मे शहीद हो रहे अपने सैनिकों के कारण और कुछ न कर पाने की कुंठा ने उसे  देश के राजनैतिक नेतृत्व से कोई उम्मीद ही नही बची थी । लेकिन मोदी सरकार के एक साहसिक निर्णय से अब पूरा देश गर्व महसूस करने लगा है । बेशक हमले मे चंद आतंकवादियों की हत्या से यह समस्या पूरी तरह खत्म नही होने वाली लेकिन इसका एक सांकेतिक महत्व तो है कि भारत अब बर्दाश्त नही करेगा । उसे जरूरत पडी तो वह एल.ओ.सी पार करके भी आतंक का खात्मा करने को तैयार है ।

वैसे इस हमले के बाद एक बार फिर पाकिस्तान के साथ सीधे टकराव की हालात बन रहे हैं । लेकिन ऐसा पहली बार भी नही है । दर-असल भारत और पाकिस्तान का जन्म ही विवाद और झगडे के गर्भ से हुआ । जिन्ना ने रातों रात अपने विचार बदल कर धार्मिक आधार पर अलग राष्ट्र के रूप मे पाकिस्तान की मांग न की होती तो आज दुनिया के मानचित्र पर पाकिस्तान नाम का राष्ट्र न होता । जब दो राष्ट्रो की जन्मकुंडली पर शनिग्रह हो तो उनके बीच नोंक झोक का होना स्वाभाविक ही है । 1947 से ऐसा ही हो रहा है । लेकिन यहां गौरतलब यह है कि दोनो राष्ट्रों के चरित्र, सोच और नीतियों में कोई समानता नही है ।
भारत अपने जन्म से ही एक उदार सोच वाले राष्ट्र के रूप में विकसित हुआ । अगर थोडा पीछे देखें तो विभाजन के समय होने वाले  साम्प्रदायिक हिंसा के संदर्भ में गांधी जी की उदार भूमिका पर आज भी सवाल उठाये जाते हैं । लेकिन वहीं सीमा पार से ऐसी किसी उदार सोच के स्वर नहीं सुनाई दिये थे । इसके फलस्वरूप देश मे एक बडा वर्ग आज भी गांधी जी की उस उदारता का पक्षधर नहीं दिखाई देता ।
इसके बाद तो पाकिस्तान और भारत का इतिहास युध्द और राजनीतिक विवादों का ही इतिहास रहा है । अभी तक दोनो देशों की सेनाएं चार बार रणभूमि में आमने सामने हो चुकी हैं । लेकिन इन युध्दों का और उस संदर्भ में हुए राजनीतिक निर्णयों का यदि बारीकी से पोस्टमार्टम करें तो यह बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि भारत ने यहां भी अपनी उदार सोच का खामियाजा भुगता है ।
आजादी के उपरांत जन्म लेते ही पाकिस्तान ने 22 अक्टूबर 1947 को कश्मीर पर कबिलाईयों के साथ मिल कर हमला किया । लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर दोनो देश युध्द विराम के लिए राजी हो गये । लेकिन चूंकि उस समय कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत थी तथा तत्कालिन राजा हरि सिंह ने उसका विलय भारत के साथ स्वीकार नहीं किया था अत: जब तक भारतीय सेना कश्मीर बचाने के लिए पहुंचती, पाकिस्तान एक हिस्से में अपना कब्जा जमा चुका था । बाद मे विलय होने के बाद भी भारत ने पाक अधिकृत कश्मीर के सवाल पर कभी शोर नहीं मचाया ।
भारत के इस नरम रूख को भांपते हुए उसने 1965 में फिर हमला किया । इस बार भी झगडा कश्मीर को लेकर ही था । अप्रैल 1965 से लेकर सिंतबर 1965 के बीच चलने वाले इस युध्द का अंत भी विश्व बिरादरी के दवाब में युध्द विराम की घोषणा करने से हुई । इसी समय ताशकंद समझौता भी हुआ । इस समझौते के लिए तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्र्पति अयूब खान तुरंत राजी हो गये । दर-असल युध्द मे अपनी खस्ता हालत से वह परिचित थे । उन्हें डर था कि यदि यह समझौता न हुआ तो भारत युध्द मे कब्जा किये गये क्षेत्रों को वापस नहीं करेगा ।
दर-असल इस ताशकंद समझौते में भी हमेशा की तरह भारत को ही घाटे का समझौता करना पडा था । शास्त्री जी जैसे सरल व उदार प्रधानमंत्री अंतराष्ट्रीय राजनीति के खुर्राट लोगों के दवाब को न झेल सके तथा अनचाहे समझौता करना पडा था । कहा जाता है कि उसका दुख उन्हें इतना हुआ कि हार्ट अटैक से उनका वहीं देहांत हो गया ।
उस समय देश मे युध्द विराम किए जाने का तीखा विरोध भी हुआ था । दर-असल जिस समय यह युध्द विराम किया गया भारत युध्द में मजबूत स्थिति में था । पाकिस्तान की स्थिति काफी कमजोर पडती जा रही थी । लेकिन समझौते के तहत भारत को पीछे हटना पडा । तत्कालीन भारतीय सेना के कमांडरों को यह निर्णय जरा भी अच्छा नहीं लगा । उस स्थिति मे भारत दवारा स्वीकार किया गया युध्द विराम पाकिस्तान के पक्ष मे ही गया । यहां पर भी गौरतलब यह है कि भारत ने ही उदारता का परिचय देते हुए समझौते की शर्तों को स्वीकार कर लिया । आज तक ताशकंद समझौता भारत के दिल मे खटकता रहता है
लेकिन पाकिस्तान की फितरत बदलने वाली नहीं थी । भारत को चौथा युध्द 1971 मे करना पडा । वैसे तो शुरूआत में यह पाकिस्तान का सीधा हमला नही था लेकिन बाद मे हालात ऐसे बने कि दोनो देशों के बीच तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और आज के बांगला देश को लेकर युध्द हुआ जो 13 दिनों तक चला । यह युध्द इतिहास का सबसे अल्पकालिक युध्द माना जाता है । भारत ने इन तेरह दिनों मे ही पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर दिया । उसे इस युध्द मे शर्मनाक हार झेलनी पडी ।
16 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तानी जनरल नियाजी को समर्पण के द्स्तावेजों पर हस्ताक्षर करने पडे । भारत ने 90,000 पाकिस्तानी सैनिकों को बंदी बनाया था । इसके बाद 1972 मे शिमला समझौता हुआ । पाकिस्तान ने बांग्लादेश की आजादी को स्वीकार करने के बदले में अपने युधबंदियों की रिहाई की मांग सामने रख दी जिसे भारत ने  स्वीकार कर लिया । लेकिन यहां वही कहानी दोहराई गई । युध्द में कब्जा की गई पश्चिम पाकिस्तान की 13000 किलोमीटर जमीन समझौते के तहत वापस कर दी गई । कहा जाता है कि भुट्टो के कहने पर भारत ने इस समझौते मे नरम रूख अपनाया ।
बात यहीं खत्म नही होती । अटल जी के नरम रूख को देखते पाकिस्तान ने कारगिल पर कब्जा करने की पूरी कोशिश की लेकिन भारतीय सेना की वीरता के आगे वह इसमें सफल न हो सका । यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान के लिए सीधे बस सेवा शुरू करने वाले अटल जी ही थे । कुल मिला कर भारत को अपने उदार रवैये का हमेशा खामियाजा ही भुगतना पडा है । पाकिस्तान भारत के इस नरम और उदार सोच से अच्छी तरह वाकिफ था  और इसीलिए उसका दुस्साहस बढता रहा है ।
लेकिन इस बार उसे अप्रत्याशित रूप से वह जवाब मिला जिसकी उम्मीद उसने कभी नही की थी । दर-असल तमाम छोटे बडे आतंकी हमलों के बाद जिस तरह हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने मुंबई व पठानकोट हमले को लेकर भी बहुत ज्यादा आक्रामक रूख नही अपनाया इससे वह भारत को बेहद ' सोफ्ट टारगेट ' समझने लगा था । रही सही कसर उसके परमाणु हमले की धमकी से पूरी हो रही थी । देश मे कोई भी सरकार हमले जैसी कार्रवाही करने का साहस नही जुटा पा रही  थी  ।यहां तक कि करगिल युध्द मे भी भारतीय सेना ने इंच भर सीमा  पार नही की थी ।  लेकिन उरी के हमले ने सब्र की सीमाएं तोड दी और पूरे देश से हमला करने की आवाजें उठने लगीं । अतत: मोदी सरकार ने जिस सटीक तरीके से 'आपरेशन ' को अंजाम दिया उससे पूरा देश खुशी मे झूम उठा । लोग यही देखना चाहते थे ।

यह एक तरह से संदेश भी है कि भारत की नीति बदल चुकी है। आतंक के विरूध्द अब वह किसी सीमा तक भी जा सकता है । इसके लिए अगर उसे खुले युध्द का भी सामना करना पडे तो वह करेगा । सबसे महत्वपूर्ण यह कि वह परमाणु हमले की गीदड भभकी से भयभीत होने वाला नही । यह संदेश देना जरूरी भी था । इस कार्रवाही से विश्व बिरादरी मे भी भारत का मान बढा ही है । अन्यथा भारत को एक बहुत ही सहनशील देश के रूप मे देखा जाने लगा था ।




मंगलवार, 20 सितंबर 2016

उबरना ही होगा इस लाचारगी से


इस बार उरी सीमा पर गोलियों और बम की आवाजों से किसी को सिहरन नही होती ।लेकिन जब यही आवाजें घर के अंदर जहां हम अपने को सबसे ज्यादा सुरक्षित समझते हैं सुनाई देती हैं तो डरना स्वाभाविक ही है हमारे सुरक्षित समझे जाने वाले सैन्य बेस पर चार आतंकी आए और फिर हमे घाव दे गये सोते हुए हमारे 18 जवानों को अकाल मृर्‍त्यु का ग्रास बनना पडा । अब तो लगता है कि हम इन घावों के अभ्यस्त से होते जा रहे हैं इन घावों से रिसते खून को येनकेन रोकने के लिए मानो हम दवा-पट्टी लेकर हमेशा तैयार बैठे हों
आतंकी घटनाओं मे अकाल मृत्यु के ग्रास बने अपने जवानों, अफसरों और नागरिकों को " शहीद " का दर्जा दे मानो फिर मौत की अगली दस्तक का इंतजार करने लगते हैं रोज--रोज होने वाले यह धमाके और फिर दिल को चीर देने वाली चीखों को मानो हम अपनी नियति मान बैठे हैं लगता है हर ऐसे हादसे के बाद लाशों को गिनने के लिए हम अभिशप्त हैं एक सन्नाटा सा पसरा है जहां किसी को कुछ सूझ नही रहा

इस घटना के बाद हमेशा की तरह उन्हीं शब्दों को फिर दोहराया जाने लगा है जो बार बार कहे जाने के बाद अपनी धार खो चुके हैं । अब तो जनसामान्य को भी महसूस होने लगा है कि यह चुने हुए शब्द मात्र समय को टालने व जनता के आक्रोश को ठंडा करने के हथियार बन कर रह गये हैं । अब फिर कहा जाने लगा है कि पाकिस्तान को बेनकाब किया जायेगा, उसे अलग थलग करने के सभी प्रयास किये जायेंगे, उसे एक आतंकवादी देश घोषित करवाने के प्र्यास जारी रहेंगे आदि आदि । लेकिन लोग इन सभी शब्दों के खोखलेपन को देख और समझ चुके हैं ।

भारी दवाब के बीच सेना प्रमुख दलवीर सिंह ने कहा है कि हम बदला जरूर लेंगे लेकिन समय और स्थान का चुनाव भी हम करेंगे । कुछ ऐसे ही शब्द पठानकोट हमले के बाद भी कहे गये थे । देश की जनता कुछ सख्त कार्रवाही देखना चाहती है जो कहीं नही दिखाई दे रही । देर-सबेर इस प्रवत्ति का दुष्प्रभाव सेना के मनोबल पर भी पडेगा ।

दर-असल गौर से देखें तो पाकिस्तान प्रायोजित यह आतंकवाद हमारी मानसिक कमजोरी पर बार बार चोट कर हमे आहत कर रहा है वह जांनता है कि अतीत की सैनिक असफलताएं अब इतिहास बन गई हैं 1965 हो या फिर 1971 या करगिल युध्द पारंपरिक युध्द शैली मे उसे मुंह की खानी पडी है आज के हालातों मे भी उसे शिकस्त दिवारों पर लिखी साफ दिखाई दे रही है लेकिन एक परमाणु सम्पन देश होने का जो तमगा उसने लगा दिया है, इससे वह अपने को ऊंचाई पर खडा देख रहा है
बार बार भारत को घाव देने के बाबजूद भारतीय सेना ने सीमाओं की हद नही लांघी इसे वह अपनी एक उपलब्धी समझने लगा है यहां तक कि करगिल युध्द मे भी भारतीय सेनाएं अपनी ही जमीन पर खडी थीं यह उसने स्वयं नंगी आंखों से देखा है
कहीं कहीं परमाणु अस्त्रों को वह भारत की लाचारगी का कारण मानने लगा है समय समय पर परमाणु युध्द की धमकी देने मे भी उसे कोई हिचकिचाहट नहीं भारतीय पक्ष को देखें तो शायद लाचारगी का यही कारण समझ मे भी आता है अन्यथा दुनिया की एक बेहतरीन विशाल सेना वाले देश का नित घाव खाना और आहत होना समझ से परे है
इसमे अब कोई संदे नही कि भारत को अगर इस प्रायोजित आतंकवाद को रोकना है तो पडोसी की इस धमकी से पार पाना ही होगा ऐसा भी नही कि युध्द रण्नीतियों की किताबों मे इसका कोई जवाब ही हो महाभारतकालीन चक्र्व्यूह जिसे एक अजेय व्यूह रचना समझा जाता रहा उसको भी भेदने की कला अर्जुन को मालूम थी इसी तरह आधुनिक युध्द कौशल मे भी ऐसा संभव है कि परमाणु शस्त्रों का जखीरा सिर्फ देखने की चीज बन कर रह जाए और उसका उपयोग ही संभव हो सके आक्रामक युध्द शैली अनेक संभावनाओं के रास्ते खोलती है वैसे भी गांधी के पदचिन्हों पर चलने वाले इस देश को अब यह समझ लेना चाहिए कि कभी चीन के राष्ट्र्पति माउत- -तुंग ने यूं ही नही कहा था कि " पीस क्म्स फ्रोम बैरल आफ गन " यानी शांति बदूंक की नाल से आती है आज वह देश सिर्फ समृध्दि के ऊंचे पायदान पर खडा है बल्कि दुनिया की एक ताकत भी है
बहरहाल अब समय गया है कि आतंक की इस दहशत से मुक्ति के लिए नितांत नई संभावनाओं पर विचार करें अगर ऐसा ही होता रहा तो आतंक के खिलाफ हम एक " कमजोर राष्ट्र " समझे जाने लगेंगे और फिर ऐसी घटनाएं कुछ और ज्यादा और भयावह होगीं । इस संदर्भ मे जरूरी है कि भारत दूसरे देशों से कुछ उम्मीद करने के बजाय स्वंय के बल पर कुछ ठोस करने का प्र्यास करे । आखिर देश की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है दुनिया के अन्य देशों की नही । अगर समय रहते न किया गया तो आतंक का काला साया पूरे देश को अपनी गिरफ्त मे ले लेगा और तब हम अपने को लाचारगी की स्थिति मे देख रहे होंगे



शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

सियासत के यह राबिनहुड





भागलपुर जेल से रिहा हुए बाहुबली नेता शहाबुद्दीन की रिहाई ने बिहार  की राजनीति को एक बार फिर गरमा दिया है । इस सियासी घमासान मे सत्तारूढ जेडीयू-आर.जेडी सरकार मे उथल पुथल मची है । बात सिर्फ इतनी भर नही । बल्कि  जेल से छूटते ही शहाबुद्दीन के इस वक्तब्य ने कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो " परिस्थितिवश मुख्यमंत्री " हैं जो जनता के नही, गठबंधन के नेता हैं" राजनीतिक पारे को उच्चतम बिंदु तक पहुंचा दिया है । किसी भी मुख्यमंत्री को यह बात क्यों पसंद आने लगी । अब खबर है कि नीतीश सरकार जमानत के खिलाफ उच्चतम न्यायालय जाने का मन बना रही है।

दर-असल इस बाहुबलि नेता की रिहाई इसलिए भी चर्चा और विरोध का विषय बनी हुई है क्योंकि जो कांड हुआ उसने बिहार सहित पूरे देश को हिला कर रख दिया था । 2004 मे 16 अगस्त को सीवान के एक व्यापारी चंद्रकेश्वर उर्फ चंदा बाबू के दो बेटों को अपहरण के बाद वीभत्स तरीके से तेजाब से नहला कर और उनके शरीर के टुकडे कर ह्त्या कर दी गई थी । कहा जाता है कि सबसे बडे बेटे राजीव रोशन को अपने भाईयों की वीभत्स मौत देखने के लिए मजंबूर किया गया और बाद मे एक्मात्र गवाह् बडे बेटे को सुनवाई के दौरान 16 जून 2014 को गोली मार कर ह्त्या कर दी गई ।

इसके अलावा सीवान मे पत्रकार राजदेव रंजन की दर्दनाक तरीके से हत्या के शक की सुई भी शहाबुद्दीन से ही जुडी थी । यह तो वह घटनाएं हैं जो देशभर मे मीडिया व राजनीतिक गलियारों मे चर्चा का विषय बनीं तथा जिन पर खूब सियासी रोटियां सेंकी गईं । लेकिन इस बाहुबली नेता के खाते मे तो न जाने कितनी हत्याओं, अपहरण व फिरौती के मामले दर्ज हैं जिनका हिसाब रखना भी आसान नहीं ।

बहरहाल बिहार की राजनीति मे शहाबुद्दीन की रिहाई क्या गुल खिलायेगी यह तो समय ही बतायेगा लेकिन इतना अवश्य है कि आतंक का प्रर्याय बने इस नेता ने देश के लोकतंत्र, न्यायापालिका व सरकारी रवैये पर जरूर गंभीर सवाल उठाये हैं । यही नही, मौजूदा राजनीतिक संस्कृर्ति मे अपराध व अपराधियों के बढते वर्चस्व पर भी सोचने के लिए मजबूर किया है । हम स्वीकार करें या न करें इस घटना ने देश के राजनैतिक भविष्य की तस्वीर को भी सामने रखा है ।

गौरतलब है कि आज हम जिस शहाबुद्दीन को राजनीति के मंच पर एक आतंक के रूप मे देख रहे हैं, वह 80 के दशक मे छोटे मोटे अपराध करने वाला एक छुटभैय्या अपराधी भर था । लेकिन किस तरह राजनीति ने उसे अपराध की दुनिया मे एक चमकता सितारा बना दिया, उसकी एक अलग ही कहानी है । यह कहानी देश की राजनीति के उस कुरूप चेहरे को सामने लाती है जिसे अब स्वीकार कर लिया गया है । वोट राजनीति के लोभ ने एक साधारण अपराधी को रातों रात आर.जे.डी का एक ऐसा ताकतवर नेता बना दिया जिसके आगे पूरा प्रशासनिक तंत्र नतमस्तक हो गया । क्या यह कम आश्चर्यजनक नही कि आज इस बाहुबलि के नाम से लोग सीवान को जानते हैं । उसके इजाजत के बिना यहां एक पत्ता भी नही हिल सकता । बडे बडे पुलिस अधिकारी उसे सलाम बजा कर अपनी नौकरी करते हैं ।

आज सवाल सिर्फ शहाबुद्दीन का नही है । ऐसे न जाने कितने अपराधी राजनीति की छतरी तले देश के प्रशासनिक तंत्र को चुनौती दे रहे है ।  आखिर क्यों हमारी ससंद व विधानसभाएं अपराधी तत्वों की शरणगाह बनती जा रही हैं । दरअसल हमने ईमानदारी से स्वंय के गिरेबां में झांकने का प्रयास कभी नही किया । कहीं ऐसा तो नही कि जाने- अनजाने इसमे हमारी भी भागीदारी रही हो ।
दरअसल कई बार हम अपने स्वार्थ में व्यापक सामाजिक हितों की अनदेखी कर देते हैं । हमारी सोच इतनी संकीर्ण हो जाती है कि हमे सिर्फ अपने जिले, शहर या मुहल्ले का ही हित दिखाई देता है और राबिनहुड जैसे दिखने वाले माफियों, गुंडों व बदमाशों को इसका लाभ मिलता है । अगर कोई अपराधी तत्व हमारे मुहल्ले की सड्कों व नालियों आदि का काम करवा लेता है और हमारे मुहल्ले का निवासी होने या किसी अन्य प्रकार के जुडाव से हमारे काम करवा लेता है तो हम उसके पक्ष मे आसानी से खडे हो जाते हैं । यहां हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि समाज के हित मे इसे ससंद या विधानसभा के लिए चुनना इस लोकतंत्र के भविष्य के लिए घातक होगा । ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेगें जहां समाज की नजर मे एक अपराधी,  मोहल्ले या शहर का "भैय्या " बन चुनाव मे जीत हासिल कर लेता है । दरअसल अपने तक सीमित हमारी सोच ऐसे लोगों का काम आसान करती है ।

हमारी इस सोच का इधर कुछ वर्षों मे व्यापक प्रसार हुआ है राजनीतिक अपराधीकरण मे हमारी यही सोच कुछ गलत लोगों को ससंद व विधानसभाओं मे पहुंचाने मे सहायक रही है । यही कारण कि ऐसे कई नाम भारतीय राजनीति के क्षितिज पर हमेशा रहे हैं । जिन्हें समाज का एक बडा वर्ग तो अपराधी , माफिया या बदमाश मानता है लेकिन अपने क्षेत्र से वह असानी से जीत हासिल कर सभी को मुंह चिढाते हैं ।
अब अगर हमे इन बाहुबलियों, माफियों, गुंडों व बदमाशों को रोकना है तो अपने संकीर्ण हितों की बलि देनी होगी । व्यक्ति का चुनाव समाज व देश के व्यापक हित मे सोच कर किया जाना चाहिए । अगर आपके लिए भैय्या बना उम्मीदवार समाज के बहुसंख्यक लोगों के लिए एक अपराधी तत्व है तो उसे आपको भी अपराधी ही मानना होगा । अन्यथा एक दिन यह भैय्ये लोकतंत्र  के चेहरे को पूरी तरह से बदरंग बना देगें ।

रविवार, 28 अगस्त 2016

यह कैसी वीडियो संस्कृति है

अपनी पत्नी की लाश को अपने कंधों पर ढोते दाना मांझी के मामले मे सिर्फ़ शासन-प्रशासन, व्यवस्था ही जिम्मेदार नही बल्कि सवाल उस पत्रकार पर भी जिसने सिर्फ़ अपने पेशेवर जिम्मेदारी का निर्वाह भर किया | माना ऐसे मामलों को बतौर पत्रकार सामने लाने की भी एक नैतिक जिम्मेदारी होती है लेकिन जब बात इस प्रकार की हो तब पीडित की यथा संभव मदद पेशेवर जिम्मेदारी से ऊपर हो जाती है | यहां पर पत्रकार दवारा महज उसका वीडियो बनाना एक अमानवीय कृत्य की श्रेणी मे आ जाता है | नि:संदेह यहां पर मानवीय द्र्ष्टिकोण से चूक हुई है |

     सवाल उन लोगों पर भी जो इस द्र्श्य के महज तमाशबीन बने रहे | उनमे से किसी के भी थोडे प्रयास से उसे मदद मिल सकती थी | लेकिन शायद यह द्र्श्य भी उनके लिए महज एक उत्सुकता भरा मनोरंजन बन कर रह गया  | समाज की यह ह्र्दयहीनता भी आज कटघरे मे खडी है |

     सवाल सिर्फ़ पत्रकार या तमाशबीनों पर ही क्यों ? आए दिन लोग दुर्घटना मे घायल पडे लोगों की मदद करने की बजाए वीडियो बना कर फ़ेसबुक पर वायरल कर लाइक व कमेंट लूट रहे हैं | यहां तक कि आखिरी सांस लेते, जिंदगी से जूझते इंसान का वीडियो बनाने मे भी कोई संस्कार या नैतिकता आडे नही आती | सवाल उठता है कि आखिर तकनीक और मीडिया के इस दौर मे यह कैसी जागरूकता है जो वीडियो बनाने को आतुर दिखाई देती है लेकिन उसकी उखडती सांसों को बचाने के लिए नहीं |


     वीडियो बनाने और सोशल मीडिया मे छा जाने की यह कैसी सोच के शिकार हम हो रहे हैं जो हमे अमानवीय व ह्र्दयहीन चेहरे मे तब्दील कर रही है | तकनीक के माध्यम से हम  करूणा का ‘ शोर मचाने ‘ पर तो सबसे आगे दिखना चाहते हैं लेकिन सही अर्थों मे पीडित की मदद करने मे सबसे पीछे खडे हैं | हमारी यह ह्र्दयहीनता, असंवेदनशीलता व निष्ठुरता क्या भविष्य के लिए भय पैदा नही कर रही ? 

रविवार, 31 जुलाई 2016

एक उलझी, अनसुनी लडाई का मध्यांतर


(L. S. Bisht  ) ईरोम चानू शर्मीला, जी हां यही नाम है मणिपुर की उस महिला का जिसे " आयरन लेडी " यानी लौह महिला भी कहा जाता है । पूर्वोत्तर मे लागू भारत सरकार के विवादास्पद कानून ' आफस्पा ' यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के खिलाफ उसकी लडाई की अपनी कहानी है । राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय मंचों मे चर्चित ईरोम का संघर्ष जनांदोलनों के इतिहास मे एक खास पहचान रखता है । यह इस मायने मे अलग रहा है कि इसकी लडाई सिर्फ और सिर्फ एक अकेली ईरोम की लडाई बन कर रह गई । इस मायने मे इसे एक अकेले सिपाही की जंग भी कहा जा सकता है । यह दीगर बात है कि सुर्खियों मे आने पर इसे सीमित जनसमर्थन भी मिलता रहा है । लेकिन पानी के बुलबुलों की तरह वह समर्थन जल्द ही कहां विलीन हो जाता था, पता नही । और फिर ईरोम झंडा पकडे अकेले ही दिखाई देती रहीं ।

अलग किस्म की इस यौध्दा ने 26 जुलाई, 2016 को यह घोषणा करके सभी को चौंका दिया है कि वह 9 अगस्त से अपना  16 साल से चला आ रहा अनशन खत्म करने जा रही हैं । यही नही, अनशन खत्म कर वह अपने प्रेमी डेसमंड  कौतिन्हों जिनसे वह ई मेल के माध्यम से संपर्क मे आयीं विवाह रचा कर मणिपुर की राजनीति मे सक्रिय रूप से हिस्सा लेकर अपनी इस मांग को एक नई दिशा देंगी

आफस्पा यानी आर्मड फोर्सेस स्पेशल एक्ट के खिलाफ 16 सालों से लडने वाली इस लौह महिला की इस घोषणा ने कई सवाल भी खडे किये हैं और इस लडाई को लेकर जनसमर्थन पर भी । अपने अनशन को खत्म करने के सवाल पर वह जब मीडिया को यह कहती हैं कि इस लडाई मे जनता की बेरूखी व सरकार के जिद्दीपन को लेकर वह बहुत मायूस हैं , तब कई और सवाल उठते हैं । आखिर ऐसा क्यों ? सरकार की उदासीनता तो समझ मे आती है लेकिन जनता का अपेक्षित सहयोग न मिलने की पीडा जरूर सोचने के लिए मजबूर करती है ।

इन सवालों के जवाब तलाशने के प्रयास से पहले थोडा पीछे देख लेना जरूरी है । दर-असल पूर्वोत्तर के राज्य आजादी के बाद से कई कारणों से ' समस्याग्र्स्त राज्य ' रहे हैं ।  उग्रवादी तत्वों से निपटने मे जब सेना को परेशानी महसूस होने लगी तो यह महसूस किया गया कि सेना को कुछ अधिक अधिकार देने से ही इनसे निपटा जा सकता है । ऐसे मे सरकार ने संसद मे  सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून पारित कर इसे उत्तर पूर्व के समस्याग्रस्त राज्यों मे लागू कर दिया । इस कानून से सेना को कुछ अतिरिक्त छूट मिल जाने से वह देशद्रोही व उग्रवादी तत्वों से प्रभावी तरीके से निपटने मे सफल हुई । लेकिन यह कानून बहुत जल्द विवादों के घेरे मे भी आ गया ।

2 नवम्बर 2000 को मणीपुर कस्बे के एक बस स्टाप मे असम राइफल के जवानों ने जिस तरह 10 लोगों को गोलियों से भून कर उनकी हत्या की थी, वह एक अभूतपूर्व घटना बनी । पूरे मणिपुर मे इस कानून के खिलाफ जनाक्रोश भडक गया । लोगों का मानना था कि इस नरसंहार मे सेना ने मासूम लोगों को गोलियों का निशाना बनाया जिसमे बच्चे , बूढे सभी थे । ईरोम जो उस समय सिर्फ 28 वर्ष की थीं इस घटना से इतना आहत हुईं कि इसके खिलाफ उन्होने भूख हडताल शुरू कर दी । लेकिन जैसा होता है सरकार ने इनकी मांग को उचित नही माना । ईरोम भी अपनी मांग से पीछे नही हटीं । इस बीच मानवाधिकार समर्थ्कों की भागीदारी ने  इसे अंतरराष/ट्रीय  चर्चा का विषय बना दिया । लेकिन सरकार ने कोई नरमी नही बरती और  ईरोम का यह अनशन भी लगातार चलता रहा । अब इस अनशन को खत्म करने की घोषणा ने कई सवाल खडे किये हैं ।

यहां गौरतलब यह है कि कभी भी ईरोम की इस मांग को व्यापक समर्थन नही मिल सका जैसा कि दूसरे जनांदोलनों के साथ होता है । इसका एक बडा कारण यह रहा है कि देश मे एक बडा वर्ग यह मानता है कि आज के हालातों मे सेना को इस विशेष अधिकार की सख्त जरूरत है । इसके अभाव मे सेना की धार कमजोर पडती है और अलगाववादी व देश विरोधी तत्व मजबूत हो जाते हैं । जम्मू कश्मीर मे भी ' आफस्पा ' लागू है और वहां भी इसका विरोध जब तब किया जाता है । लेकिन दूसरी तरफ लोग वहां अलगाववादियों के खून खराबे से भी वाकिफ हैं । यही कारण है कि सरकार, सेना और जनता का बहुत बडा वर्ग इसके समर्थन मे दिखाई देता है ।

इसके दुरूपयोग की खबरें भी चर्चा का विषय बनी हैं । कुछ मामलों मे फर्जी मुठभेडों के मामले सही भी पाये गये हैं । लेकिन यह अपवाद ही रहे हैं । आज के हालातों मे कश्मीर घाटी मे सेना को जिस चुनौती का सामना करना पड रहा है उसे देखते हुए लोग इस कानून के पक्ष मे खडे दिखाई दे रहे हैं । उग्रवाद की कुछ ऐसी ही कहानी पूर्वोत्तर राज्यों की भी है । लिहाजा इस कानून को सेना के लिए वहां जरूरी समझा जा रहा है ।

ईरोम के अनशन खत्म करने के पीछे सबसे बडा कारण व्यापक जनसमर्थन न मिलना ही रहा है । बहरहाल वह अपनी लडाई राजनीति के मंच से लडना चाहती हैं और इसके लिए मणिपुर चुनाव सबसे अच्छा मंच है । इसलिए यह कहना कि उन्होने अपनी लडाई खत्म कर दी है , यह गलत होगा । बल्कि यह लडाई के बीच एक मध्यांतर है । देखना है कि राजनीति मे जब वह स्वयं जनता के बीच होगीं  इस मुद्दे पर कितना समर्थन जुटा पाती हैं । 

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

बरसात मेें घायल होता हिमालय क्षेत्र

मौसम की पहली बरसात ने ही केदारनाथ व बदरीनाथ पहुंचने के तमाम रास्ते बंद कर दिये | जगह जगह पहाड़ की चट्टाने टूट कर गिरने लगीं | ऐसा पहली बार नहीं है | बरसात के मौसम मे इसी तरह साल-दर-साल घायल होता हिमालय क्षेत्र आज हमारी उपलब्धियों के तमाम दावों को झुठलाने लगा है | साथ ही विकास नीतियों की खामियों को भी उजागर कर रहा है | वैसे तो पहाड़ की टूट फ़ूट प्रकृति का चक्र है लेकिन जिस तरह से इधर हाल के वर्षों से पहाड़ मे भू-स्खलन की घटनाएं बढी हैं, यह हमारे लिए खतरे का संकेत है | विडंबना तो यह है कि दूसरी तरफ़ हम पर्यावरण की रक्षा की बात करते नही थक रहे |
     अब तो स्थिति यह है कि थोडी सी बरसात मे ही पहाड़ दरकने लगे हैं | आवागमन का ठप होना तो बरसात के मौसम मे रोज की बात है | दरकते हुए पहाड़ इस बात का संकेत हैं कि पर्यावरणीय विनाश की सीमा अब खतरे के निशान को भी पार करने लगी है | इससे पर्वतीय विकास की मूलभूत सरकारी नीतियों तथा नजरिये पर एक प्रशनचिन्ह लग गया है | विकास की यह उल्टी चाल इस तथ्य को भी उजागर कर रही है कि आज पर्वतीय विकास के लिए धन नही वरन नियोजन की अधिक आवश्यक्ता है | साथ ही यह चेतावनी भी कि सिर्फ़ एक माडल के आधार पर पर्वतीय विकास की योजनाएं तैयार नही की जा सकती हैं | इसके लिए जरूरी है इस अंचल की भौगोलिक परिस्थितियों , तराइ-भावर, मध्य हिमालय व उच्च हिमालय श्रेणियों मे विभाजित कर योजनाएं बनाई जानी चाहिए |
     दर-असल आज घायल होते हिमालय क्षेत्र की इस पीडा के पीछे सरकारी गलत नीतियों तथा पर्यावरण के प्रति हमारी घोर उपेक्षा की एक लंबी कहानी है | कभी यह क्षेत्र अपनी वन सपंदा के लिए जाना जाता था |  लेकिन आज स्थिति यह है कि दूर दूर तक वन उजड चुके हैं | यहां तक कि गांवों मे चारे ईधन तक का संकट उपस्थित हो गया है | खनिज दोहन के लोभ ने भी पहाड़ की छाती पर गहरे घाव लगाए हैं | डायनामाइट विस्फ़ोट से कच्चे पडे पहाडों से अब मिट्टी निकल निकल कर बहने लगी है | और परिणामस्वरूप भू-स्खलन व भूक्ष्ररण की गति उत्तरोत्तर तेज हो रही है |
     विनाश की यह प्रकिया आज भी जल, जानवर और जडी बूटी की लूट, सडक और बांधों का क्रूरतापूर्ण निर्माण, निरन्तर हो रहे असंतुलित खनन आदि के रूप मे जारी है | यह विनाश जिस बिंदु पर पहुंचा है उसी का परिणाम है भू-स्खलन से टूटता पहाड़ और थोडी सी बरसात मे पहाड़ी नदी-नालों का ताडंव |
     दर-असल पहाड़ के शोषण की परम्परा एक शताब्दी पूर्व की औपनिवेशक शासकों की देन रही है | खास कर ईस्ट इंडिया कंपनी के काल खंड के दस्तावेजों को देखने से पता चलता है कि इनकी नजर यहां के प्राकृतिक संसाधनों पर थी | फ़्रांसिस ह्वाइट ( 1837 ) के यात्रा विवरणों मे मसूरी की पहाडियों मे चूना खदाने होने का उल्लेख मिलता है | लेकिन काफ़ी समय तक इन्हे कोई नुकसान नही हुआ | य्हां तक की 1883 तक इनसे कोई छेड़छाड़ नही की गई |
     लेकिन इसके बाद वनों के शोषण का काला अध्याय शुरू हुआ | वनों का अंधाधुंध दोहन कर रेलवे स्लीपर बनाये जाने लगे | व्यापारिक द्र्ष्टिकोण से ही चीड़ के वनों का विस्तार किया गया | इससे लीसा निकालने की प्रकिया भी तभी शुरू हुई | एक तरफ़ व्यापारिक उद्देश्यों के लिए वनों का निर्मम दोहन हुआ दूसरी तरफ़ कृषि योग्य भूमि के विस्तार के लिए भी वनों को साफ़ किया जाने लगा परिणाम्वरूप 1930 के आसपास से हिमालय क्षेत्र मे भू-स्खलन और बाढ की घटनाएं शुरू हो गईं |
     1940 के बाद खनिज खनन का कार्य शुरू हुआ | खुलेआम डायनामाइटों का प्रयोग शुरू हुआ | खनन कार्य के फ़लस्वरूप भू-स्खलन की गति और तेज हो गई | यह सब आजादी के पूर्व की बात है परन्तु हिमालय क्षेत्र का दुर्भाग्य यह रहा कि स्वतंत्रता के बाद भी उसके प्रति शासकों का द्र्ष्टिकोण नही बदला | हमारे नीति निर्माता ऐसी विकास योजनाएं बनाने मे असफ़ल रहे जिनसे पर्यावरण के साथ पहाड़ की अर्थव्यवस्था मे भी सुधार होता |
     60 के दशक से विकास के नाम पर सड्कों का निर्माण कार्य शुरू हुआ | इसका परिणाम यह निकला कि ठेकेदारों ने पहाड़ के जंगलों तथा खेतों के साथ खूब मनमानी की | रही सही कसर सरकारी बिजली परियोजनाओं ने पूरी कर दी | टिहरी जैसा विशालकाय बांध बनाना वह भी हिमालय क्षेत्र में, हमारी गलत नीतियों का सबसे अच्छा उदाहरण है |
     बहरहाल इन तमाम गलतियों का परिणाम आज सामने है | परन्तु इससे बडी गलती यह रही कि समय समय पर समितियों की चेतावनियों को बार बार नजर-अंदाज किया जाता रहा जो आज भी जारी है | इस हिमालय क्षेत्र के भू-स्खलन के कारणों और पर्यावरण के असंतुलन पर न जाने कितने  अध्ययन  किए गये और सिफ़ारिशें सरकार को दी गईं लेकिन सभी अलमारियों मे धूल खाती रहीं | उन्हें कभी गंभीरता से लिया ही नही गया | बद्रीनाथ धाम के बिगडते पर्यावरण पर दी गई चेतावनी, नैनीताल मे पहाड धसकने की डा नौटियाल की शंका को भी नजर-अंदाज कर दिया गया |
     दर-असल हिमालय की पहाड़ियां कच्ची और नई हैं और इसलिए संवेदनशील भी | इनके साथ थोड़ी सी लापरवाही भी घातक सिध्द हो सकती है | इधर कुछ समय से उत्तराखंड मे टूरिज्म के विकास को गति मिली है | सड्कों का जाल बिछा है और पहाडियों पर बढते वाहनों का दवाब निरंतर बढ रहा है | इससे भी जरा सी बरसात भू-स्खलन को न्योता देने लगी है | आज यहां पांच सितारा पर्यटन की अवधारणा के तहत तमाम होटल पूरी सज धज के साथ सडक किनारे स्वागत के लिए खडे हैं | इनसे इन पहाडियों पर दवाब लगातार बढता जा रहा है | गाड़ियों का आवागमन पिछ्ले वर्षों  की तुलना मे कई गुना बढ गया है | लेकिन इन सब बातों से यहां किसी को कोई लेना देना नही |
     आज जरूरत इस बात की है कि पहाड़ की योजनाएं यहां के भौगोलिक रचना के हिसाब से संतुलित व सुनियोजित हों | आर्थिक विकास हेतु उठाये जा रहे किसी भी कदम से पूर्व पर्यावरणीय पहलू पर भी उचित ध्यान दिया जाए | अन्यथा  इस तरह तो एक दिन पहाड का अस्तित्व ही खतरे मे पड जाऐगा |
    
एल.एस.बिष्ट,

11/508, इंदिरा नगर, लखनऊ-16