गुरुवार, 20 मार्च 2014

कैसी हो देश की राजनीति में छात्रसंघों व युवाओं की भूमिका

                    
 नाव के समय हमें अपनी युवा शक्ति की याद आती है ।          { एल. एस. बिष्ट }  - छात्रो और  युवाओं की राजनीति में भागीदारी का सवाल पिछले कई वर्षों से चर्चा का विषय रहा है विशेष कर जब जब देश में चुनाव की रणभेरी बजी है या जब कभी इस  युवा  शक्ति  ने  किसी बडे आंदोलन को जन्म दिया या फिर किसी घटना विशेष पर अपने तीखे आक्रोश से लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने मे सफल हुए , यह सवाल बहस का विषय बना यह दीगर बात है कि चंद

दिनों के बाद इस पर गंभीर चिंतन की जहमत कभी नही उठाई गई छात्रसंघों व  युवा संगठनों  में  राजनीति किस सीमा तक होनी चाहिये यह अभी तक तय नही हो सका है। क्या यह कम आश्चर्यजनक नही कि जहां दुनिया के दूसरे देशों में यह भूमिका स्पष्ट है वहीं दुनिया के सबसे बडे इस लोकतांत्रिक देश मे जहां युवा  निर्णायक  भूमिका  मे  हैं तस्वीर अभी तक साफ नही हो पायी है।
          देश के अधिकांश विश्वविधालयों कालेजों में छात्रसंघों के चुनाव होते हैं रंगीन पोस्टर बैनरों से कुछ दिन के लिए पूरा शहर पट सा जाता है प्र्चार युध्द भी कम आक्रामक नही होता अब तो परिसर के अंदर कम बाहर शोर अधिक सुनाई देता है हिंसात्मक घटनाओं से लेकर उम्मीदवार के अपहरण हत्या तक की वारदातों को देख सुन अब किसी को हैरत नही होती। विजयी उम्मीदवारों के जुलूस पूरे शहर को मंत्रमुग्ध कर आकर्षण तथा चर्चा का विषय बनते हैं लेकिन इसके बाद यह छात्र नेता और छात्रसंघ क्या कर रहे हैं इसका पता किसी को नही लगता इतना अवश्य है कि समय समय पर दुकानों को लूट्ने, होट्लों में बिल अदा करने, स्थानीय ठेकों को हथियाने के प्र्यास में मारपीट करने के कारण छात्र शक्ति चर्चा का विषय बंनती है । या  फिर  चुनाव  के  समय  हमें   अपनी युवा शक्ति की  याद  आती  है ।
                   वर्तमान से उठते इन सवालों पर जरा गहराई से विचार करें तो पता चलता है कि नाउम्मीदी के बादल इतने घने भी नही हैं अतीत गवाह है कि महात्मा गांधी, सुभाष च्न्द्र बोस और जय प्र्काश नरायण के आहवान पर छात्र संगठन जो कर गुजरे वह आज इतिहास बन गया है
          स्वतंत्रता पूर्व की इस युवा राज्नीति का सुनहला इतिहास रहा है 1905 में कलकत्ता विश्वविधालय के दीझांत समारोह में लार्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन की बात बडे ह्ल्के ढंग से कही थी लेकिन छात्रों को समझते देर लगी जल्द ही पूरे राज्य मे इसके विरूद आंदोलन शुरू हुए। एकबारगी अंग्रेज सरकार हैरत मे पड गई बंगाल से उपजी यह चेतना जल्द ही दूसारे राज्यों में भी फैल गयी 1920 मे नागपुर में अखिल भारतीय कालेज विधार्थी सम्मेलन हुआ और नेहरू के प्र्यासों से छात्र संगठनों को सही अर्थों मे अखिल भारतीय स्वरूप मिला इसके बाद वैचारिक मतभेदों को लेकर संगठनों में टूट फ़ूट होती रही
          कुछ वर्षों तक कुछ भी सार्थक हो सका सत्तर के दशक में दो महत्वपूर्ण घट्नाएं अवश्य युवा राजनीति के क्षितिज मे उभरीं पहला 1974 मे ज़े.पी. आंदोलन जो व्यापक राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर शुरू हुआ। दूसरा असम छात्रों का आंदोलन जिसकी सुखद परिणति हुई तथा युवा छात्र सत्ता में भागीदार बने बाकी याद करने लायक कुछ दिखाई नही देता मंडल आयोग को लेकर युवा आक्रोश जिस रूप मे प्र्कट हुआ इससे तो एक्बारगी पूरा देश हतप्र्भ रह गया ।



          इधर कुछ वर्षों से छात्र राजनीति मे राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप इस सीमा तक बढा है कि इसमे वे छात्र ही उभर सकते हैं जो किसी किसी राजनीतिक दल से जुडे होने और सभी चुनावी पैतरों का इस्तेमाल कर सकते हों
          दलगत राजनीति के साथ ही जातीय , क्षेत्रीय साम्प्र्दायिक समीकरणों को भी बल मिला है बिहार उत्तर प्र्देश के अधिकांश कालेजों में चुनाव जातीय समीकरणों के आधार पर लडे जा रहे हैं इस तरह स्थिति बद से बदतर हो रही है। जिस तरह से परिसर मे दलीय राजनीति अपना रंग दिखाने लगी है इससे यह बात साफ हो चली है अब निर्णय लेना होगा कि परिसर की राजनीति संसद या विधानसभाओं को मद्देनजर च्लाई जानी चाहिये या सिर्फ छात्रों द्दारा परिसर के लिऐ क्योंकि इन दो अलग अलग उदेश्यों के लिऐ भिन्न राजनीतिक चरित्र का होना जरूरी है
          ऐसा नही कि छात्र व युवा राजनीति में संभावनाओं का आकाश बहुत सीमित है ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जिन्होने आगे चल कर राष्ट्रीय राजनीति मे महत्वपूर्ण योगदान दिया लेकिन छात्र जीवन मे उन्हे किसी राजनैतिक दल की छ्तरी की आवश्यकता महसूस नही हुई डा. जाकिर हुसैन अलीगढ विश्वविधालय की ही उपज थे। इनके अलावा डा. मौलाना आजाद, शेख अब्दुल्ला , फखरूदीन अली अहमद भी अपने छात्र जीवन मे यहां के छात्र संगठन से जुडे रहे इलाहाबाद  विश्वविधालय के छात्र संघ ने भी कई राजनेता देश को दिये । हेमवती नंदन बहुगुणा , वी.पी.सिंह , चंद्र्शेखर, नुरूल हसन, जनेश्वर मिश्र , मोहन सिंह आदि ने राष्र्टीय राजनीति मे अपनी पुख्ता पहचान बनाई। लखनउ विश्वविधालय और दिल्ली  विश्वविधालय ने तो कई नेताओं को संसद पहुंचाया ।
          लेकिन यह उपलब्धियां उस दौर की हैं जब सिद्दांत परक राजनीति का ही परिसर मे वर्चस्व था आज फिजा बहुत बदल गई है। युवा राजनीति बुनियादी उद्देश्यों से भटक गई है। आज के संगठन जातिवाद, क्षेत्रवाद तथा द्लगत राजनीति के शिकार होकर रह गये हैं। यही नही, राजनीतिक दलों द्दारा इनका इस्तेमाल किया जाने लगा है ।

      सोचा जाना चाहिए कि यह किस प्र्कार की राजनीति है जो लोहिया जय प्र्काश का नारा देकर आगजनी लूटपाट को बढावा दे रही है। इसी राजानीति का ही परिणाम है कि छात्र आंदोलन आम छात्र से कटने लगा है। ' आई हेट पालिटिक्स ' कहने वाले व्रर्ग का जन्म इसी राजनीति के गर्भ से हुआ है । इधर कुछ समय से युवा वर्ग मे सुखद बदलाव के संकेत दिखाई देने लगे हैं वह राजनीति को समझ्ने की कोशिश करने लगा है और उसमे भागीदारी भी वह आवाज उठाने लगा है। अपने वोट के महत्व को वह समझने लगा है । स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह जरूरी भी है

एल.एस.बिष्ट,
11/508, इंदिरा नगर,                                                         मो.  9450911026
लखनऊ


मंगलवार, 18 मार्च 2014

कलमुंही तू मर क्यों न गई

       
{ एल. एस. बिष्ट }   -    देश में बढती बलात्कार की घटनाओं और फिर पीड़िता द्वारा आत्महत्या कर लेने का खौफनाक सच कब खत्म होगा , कह पाना मुश्किल है लेकिन इतना जरूर है कि इसके पीछे हमारी पारिवारिक व सामाजिक सोच कम जिम्मेदार नहीं ।

           चंद महानगरों में बेशक थोड़ा स्थिति बदली हो लेकिन हमारे छोटे शहरों , गांव-कस्बों में आज भी जब कोई लड़की लुटी पिटी किसी तरह साहस बटोर कर अपने घर की चौखट पर कदम रखती है तो उसे अक्सर सुनाई देते हैं वे शब्द जो उसे अंदर तक हिला देते हैं “ कलमुही तू मर क्यों न गई “ बेशक यह शब्द किसी मां की बेबसी , खीज और सामाजिक भय के गर्भ से निकलता हो लेकिन दरअसल लड़की को अंदर तक भेंद जाते हैं ।

      दूसरी तरफ समाज भी चंद दिनों की झूटी सहानुभूति व्यक्त करने के बाद ऐसा व्यवहार करने लगता है मानो अपराधी बलात्कारी नही वह स्वयं हो । और जब वह कानून की तरफ निहारती है तो वहां भी उसे कानून के हाथों से ज्यादा अपराधी के हाथ लंबे दिखाई देते हैं । यह स्थितियां उसे अवसाद के ऐसे गहरे अंधेरे में ढकेल देती हैं जहां किन्ही कमजोर क्षणों में उसके अंदर आत्महत्या का विचार पनपने लगता है और अक्सर वह कर बैठती है । 
   
      सवाल उठता है कि अगर परिवार से उसे भावनात्मक व मानसिक संबल मिला होता तथा समाज की नजरें उसे ही कटघरे मे न खड़ा कर रही होती तो क्या वह ऐसा करती , शायद नहीं । यही कारण है कि शायद ही कभी किसी बलात्कारी ने आत्मग्लानी में आत्महत्या की हो । हमेशा पीड़ित लड़की ही इसका शिकार बनती है । जब तक यह सोच नही बदलेगी हमेशा लड़की ही आत्महत्या जैसे विचार का शिकार बनती रहेगी ।

एल.एस.बिष्ट,
11/508, इंदिरा नगर,

लखनऊ- 226016

रविवार, 16 मार्च 2014

कभी बडे नटखट थे ऋषिकेश के बंदर ( उत्तराखंड की भूली बिसरी यादें )

                                                   
                     

{ एल.एस.बिष्ट }      पहाडों की गोद में, गंगा तट पर बसा ऋषिकेश एक साधुओं की नगरी हे लेकिन मेरी यादों में यह नटखट बंदरों का भी शहर हे  यहां के बंदरों की बात ही अलग थी । यहां कदम रखते ही सैकड़ों की संख्या में उछलते कूदते बंदर आने वालों को यह आभास करा देते थे कि यहां उनका भी हक बनता है ।

     उस समय लगता था यहां आदमी कम बंदर ज्यादा हैं । उन नटखट बंदरों के तमाम किस्से आज बीती बातें बन कर रह गई हैं । ऋषियों के लिए कपड़े धूप में सुखाना एक जोखिम का काम हुआ करता था । कब कौन ले उड़े पता नहीं । और फिर शुरू होता लुकाछिपी का खेल ।लेकिन एक खूबी थी कपड़े कभी नही फाड़ते । काफी परेशान करने और खाने का सामान लेने के बाद कपड़े वापस कर देते । रसोई में घुस खाने की चीजों को चट कर जाना इनके बाएं हाथ का खेल था ।

     खिलौनों के भी यह बड़े शौकीन थे । बच्चे अपने खिलौनों को इनसे बचाते । यही नही, बच्चों को छेड़ना, उन्हें रूलाना इन्हे बेहद पसंद था । यात्रियों की अटैची या थैला छीन लेना आम बात थी । यहां तक की यह बकायदा पीछा करके सामान छीन लेते । लेकिन यहां के बच्चे भी इनको खूब चिढाते । जब कोई बंदर जमीन मे कुछ ढूंढता तो बच्चे भी उन्हें चिढाते ‘ गूणीं, गुणीं (बंदर बंदर ) तू क्या ढूंढणू, अपण मां की सुई ‘ (तू क्या अपनी मां की सुई ढूंढ रहा है ) यह बंदर यहां के जन जीवन के हिस्सा थे ।

     लेकिन 80 के दशक के बाद से इनकी संख्या तेजी से घटने लगी है । अब जगह जगह बस्तियां हैं । पेड़ों के झुरमुटों के स्थान पर दुकानें खुल गई हैं । सड़कें इतनी ब्यस्त कि बंदर रहते भी तो कहां । जंगलों के दोहन ने भी इन्हें बेदखल कर दिया । अब तो यहां कहने भर को बंदर हैं । बहरहाल मेरी यादों में वह बंदर आज भी जिंदा हैं । कभी यहां आएं तो इन नटखट बंदरों के किस्से जरूर सुनें ।


 एल.एस.बिष्ट,
11/508, इंदिरा नगर,
लखनऊ-16
मो. 9450911026


   

शनिवार, 15 मार्च 2014

अश्लीलता की भी प्राचीन परंपरा है होली में

                      जब खेतों में सरसों के रंग बिखरने लगे हों , पीले फूलों पर तितलियां और भौरें मंडराने लगे हों , अमराई बौराई बौराई सी लगने लगी हो , टेसू धहकने लगे हों , हवा के अलमस्त झोके मदहोस करने लगे हों , युवा मन कुलांचे भरने लगे तो समझिये फागुन आ गया ।

      फागुन चाहे-अनचाहे, अनायास-अकस्मात हमेशा आता है लेकिन चुपके से नही बल्कि पूरी सजधज के साथ, अपने इन्द्रधनुषी रंगों को बिखेरता हुआ और देखते देखते छा जाता है मन मस्तिष्क में , सारी वर्जनाओं की अनदेखी करते हुए । फागुन का यह चरित्र सदियों से ऐसा ही है । यह कभी नही बदला और न ही कभी बदलेगा ।चारों दिशाओं को मदहोस कर देने वाले इस फागुन से जुड़ी है लोक उत्सव की हमारी पुरातन परंपरा ।

      फाग और गीतों का चरम ही तो है होली । यही तो एक ऐसा त्योहार है जिसमें सदियों से पाली पोसी नैतिकता एक ही झटके में टूट कर बिखर जाती है और शेष रह जाता है हमारा आदिमपन जहां न कोई कानून है न सामाजिक वर्जनाएं ।

      आदिमपन के उल्लास को पा लेने की होड़ में हम सराबोर हो जाते हैं रंगों में । सच पूछिए तो सभी को एक दिन का स्वर्ग उपलब्धकराता है यह त्योहार । इसीलिए तो त्योहारों त्योहार कहा गया है होली को ।

      उम्र और रिस्तों की सीमाओं से परे है होली । तभी तो कहा गया है “ भर फागुन बुढ़वा देवर लागे “ । साल के बाकी महीने तो उम्र व रिस्तों के बंधनों का एहसास कराते ही हैं । यही तो होली है जो किसी परिचय की मोहताज नहीं ।हाथों में रंग हो और सामने किसी का चेहरा तो समझाने बुझाने का कोई मतलब नही । होली ही तो है जिसमे बात बात पर अंगिया और चोली याद आ जाती है । वह पिचकारी की धार ही क्या जो अंगिया के पार तक न पहुंच सके ।

      यही वह त्योहार है जिसमें वह सभी बातें जो कभी कही और लिखी नही जा सकती , होली के नाम पर सार्वजनिक हो जाती हैं । इस दिन बड़े बूढे, जवान बच्चे सभी बिना किसी शर्म और लोकलाज के बड़े चाव सुनते और सुनाते हैं । इस दिन सभी नैतिक व्यवस्थाएं खुले आम तोड़ी जाती हैं । कबीर को गाली पुराण का रचयिता मानते हुऐ प्रत्येक गाली ‘ बोल कबीरा ‘ से शुरू की जाती है ।

      आज बेशक गालियों के सरताज कबीर मान लिए गये हो परन्तु फागुन व होली में अश्लीलता की परंपरा इससे भी कहीं पुरानी है । महाभारत के शांति पर्व की एक कथा के अनुसार महाभारत युध्द के बाद जब युधिष्टर ने सत्ता संभाली तो उन्होने अपनी प्रजा को होली के दिन यह छूट दी कि कोई भी किसी से भी हंसी मजाक , छेड़छाड़ कर सकता है ।इससे उसके अंदर की सारी कुंठाएं दूर हो जायेंगी और वह वर्ष भर एक अच्छे चरित्र का निर्वाह कर सकेगा ।

      अश्लीलता के संदर्भ में एक पौराणिक कथा भी है । इस कथा के अनुसार दैत्यों के कुलगुरू शुक्राचार्य की कन्या जिसका नाम ढुंढिका था बहुत ही कामांध थी । उसकी कामवासना इतनी प्रबल थी कि वह हजारों पुरूषों से संबध स्थापित करने के पश्चात भी तृप्त न हुई । हजारों पुरूषों को उसने अपमानजनक ढंग से यातनाएं दी क्यों कि वह उसे कामतृप्ति न दिला सके थे । उसकी इस कामपिपासा को देखते पुरूष उससे भयभीत रहने लगे ।      काम भावना के वशीभूत उसके कृत्यों से सारा समाज शर्मसार होने लगा । तब सभी ने मिल कर उसका ऐसा बहिष्कार किया कि वह हार कर भाग खड़ी हुई । इस विजय की याद में होली को ‘ कामपर्व ‘ उत्सव के रूप मे मनाने का निर्णय लिया गया । तभी से इस लोकपर्व में अश्लीलता का भी समावेश हो गया । अश्लील गालियों की परंपरा तभी से शुरू मानी जाती है ।

      होलिकोत्सव के संदर्भ में यह पौराणिक कथा कितनी कितनी सच है , कहना मुश्किल है परन्तु यह जरूरी है कि हास्य व छेड़छाड़ एक सीमा के अंदर ही हो । होली के बहाने हास्य व मजाक का जो रूप आज विकसित हो रहा है इससे इस लोक उत्सव का स्वरूप विकृत ही होगा तथा प्रेम की रसधारा बहाने वाला यह पर्व अपने मूल उद्देश्य से भटक जायेगा ।




एल.एस.बिष्ट,11/508, इंदिरा नगरलखनऊ-16

गुरुवार, 6 मार्च 2014

तलाश है एक अदद प्रधानमंत्री की (चुनाव चकल्लस


              

कुछ भी कहिऐ इन आम चुनावों ने फेसबुक का मजा किरकिरा कर दिया है । प्रेमरस में डूबी कविताएं जिन्हें पढ  कर मन कुलांचें भरने लगता था दिखाई देनी बंद हो गई । विरह की आग में जलते गीतों की तपिश भी महसूस नही हो रही । पता नही कहां खो गईं विरह की वेदना । मित्रों की सारी कल्पना शक्ति और उर्जा  चुनाव के घिसे पिटे चुनावी बुलेटिनों तक सीमित हो कर रह गई है । लेकिन तमाम कसरतों के बाबजूद एक अदद प्र्धानमंत्री की तलाश अब भी जारी है ।

मित्रों की लेखनी से उपजे उदगारों के आधार पर जो कुछ निष्कर्ष निकले हैं उंनके अनुसार यह कहा जा सकता है कि चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में सबसे ऊपर के पायदान पर खडे मोदी जी के आलोचकों की संख्या भी कम नही । उनके अनुसार अगर मोदी प्र्धानमंत्री बने तो देश टूट जाएगा । देश मे दंगे ही होते रहेगें । धर्मनिरपेक्षता का तमगा लगाये उनके आलोचक उन्हें ठंडा पानी पी पी कर 'फेकू' , बड्बोला, और साम्प्र्दायिक जैसे तमाम श्ब्दों से सुशोभित कर रहे हैं । और कुछ तो सर्वेक्षण को ही झूट का पुलिन्दा मान रहे हैं ।

अब रही बात हमारे राहुल जी की तो यहां भी ऐसे लोगों की संख्या कम नही जो उनके दलित व कुली प्रेम को महज नौट्की मान रहे हैं और राजनीति में उन्हे 'कच्चा खिलाडी' मान  खारिज भी कर रहे हैं । कुछ तो मानते हैं कि उनमे कूबत ही नही है देश चलाने की ।  वैसे भी राहुल बेचारे सर्वेक्षण के हिसाब से सबसे निच्ले पायदान पर खडे हैं । और उंनके आलोचक वैसे भी पिछ्ले दस वर्षों का हिसाब दिखा रहे हैं ।अब अकेली जान क्या क्या करे ।दल के दूसरे लोग तो मानो पहले से हार मान कर बैठे हों । लेकिन फेसबुक पर मित्र उंनकी दयनीय स्थिती को देख्ते हुए थोडा रहम जरूर कर रहे हैं ।

अब बचे ईमानदारी का आयकन बने केजरीवाल जी । सबसे ज्यादा दुर्गत उन्ही की हो रही है । कोई भगोडा तो कोई बहुरूपिया तो कोई अति महत्वाकांक्षी कह रहा है । उंनके खांटीपन को भी बेबकूफी का लेबल लगा दिया गया है ।जिस झाडू ने सत्ता पर बैठाया उसी झाडू को लेकर अब  लोग उन्हे तलाश रहे हैं कहीं मिल तो जाएं। कम से कम फेसबुक पर मित्रों की पोस्ट पढ् कर तो ऐसा ही लगता है ।  उंनके किए वादों की फेसबुक पर अच्छी पोस्ट्मार्टम भी हो रही है । गुजरात जाकर तो उन्होनें अपनी गत और बिगाड दी । अपना तो बच गए दिल्ली , लखनऊ और इलाहाबाद में साथियों की धुलाई करवा दी ।

अब समझ्ना मुशिकल हो रहा है कि आखिर प्र्धानमंत्री के लायक है कौन । इस देश का कोई प्र्धानमंत्री बनेगा भी कि नही । मित्र किसी दूध के धुले का नाम भी तो नही बता पा रहे हैं जो पूरा ईमानदार , सच्चा , और लायक हो । वह न तो साम्प्र्दायिक हो , न ही नौट्कीबाज और न ही भगोडा बहुरूपिया । और अब अगर मुलायम और बहन जी की तरफ देखें तो कुछ प्र्गतिशील मित्र उनकी जातीय राजनीति के कारण उन्हें भी कच्चा चबाने के लिए बैठे हैं । रही बात बगांल की बहन जी की तो सभी जानते हैं कि एक तो उन्हें " हमार सोनार बांगला " के सिवाय कुछ दिखता नही और दूसरा तुनकमिजाजी इतनी कि कब राष्ट्र्पति जी से भी भिड जाएं, पता नही । दक्षिण की बहन जी का देश प्रेम तो अभी जगजाहिर ही हो गया । प्र्धानमंत्री के हत्यारों को भी रिहा कर सकती हैं ।

फेसबुक पर मित्र तलवारें भांज रहे हैं । युद्ध की स्थिती बनी हुई है । अपने अपने दलों के समर्थन में उठा पटक चल रही है ।  लेकिन सवाल जहां का तहां कि सर्व गुण सम्पन्न,  प्र्धानमंत्री मिलेगा कहां से । कम से कम फेसबुक में तो नही मिल रहा । अब भय सताने लगा है कि कहीं प्र्धानमंत्री भी बाहर से आयात न करना पडे । बहरहाल अगर कहीं मिलें तो हमे भी जरूर बताईगा । चिंता हमे भी है ।

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शनिवार, 1 मार्च 2014

ऐसी भी हैं जिंदगी की अनकही कहानियां

            

     यह भाग्य की अजीब विडंबना ही तो है कि जिन लोगों ने अपने महान कार्यों पूरी दुनिया में नाम कमाया उनमें से कई को परिवार से तिरस्कार और अपमान ही मिला । दूसरे लोगों की तरह अपनी पत्नी से प्यार और समपर्ण की चाह रखने वाले ऐसे महान लेकिन दुर्भाग्यशाली लोगों का पूरा दाम्पत्य जीवन घोर कलह और टकराव की नियती बन गया ।      लेकिन ताउम्र भावनात्मक पीड़ा झेलने के बाबजूद इस दुनिया मे ऐसा कुछ किया कि दुनिया उन्हे कभी नही भुला सकती।
     ‘ वार एंड पीस ‘ जैसी महान रचना को साकार करने वाले रचनाकार लियो टाल्सटाय को कौन नही जानता । जब तक यह दुनिया है उनकी यह कालजयी कृति भी अमर रहेगी। लेकिन इस महान रचनाकार का पारिवारिक जीवन कभी सुखमय नही रहा। 1862 मे उन्होने अपने एक मित्र की बेटी सोफिया से प्रेम विवाह किया था । कुछ समय तो अच्छा गुजरा लेकिन जल्द ही हालात बिगड़ने लगे । दोनो के बीच तनाव बढ़ने लगा । तनाव इतना बढता कि कई बार टाल्सटाय घर छोड़ कर कहीं निकल जाते । लगभग 80 वर्ष की उम्र मे उन्हे आखिरी बार घर छोड़ना पड़ा ।
     तब सोफिया ने काफी विनती भी की थी ।अपने आखिरी पत्र में टाल्सटाय ने लिखा था ‘ हम दोनो का मिल सकना और उससे भी ज्यादा मेरा वापस लौटना अब नामुमकिन है।‘ आखिर ऐसा ही हुआ वह घर से बाहर बीमार पड़ गये और अपने दुखी वैवाहिक जीवन व जिंदगी से अलविदा कह दिया।
     अमरीका के स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व करने वाले वहां के पहले राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने एक इतिहास रचा । लेकिन इतिहास रचने वाले इस महान व्यक्ति को अपने निजी जीवन मे वह खुशियां कभी नसीब नही हुईं जिनकी उन्हें चाहत थी । 1842 में मेरी टोडसे से उनका विवाह हुआ । बड़े अरमानों से विवाह सूत्र मे बंधने वाले इस इतिहास पुरूष के भाग्य मे तो कुछ और ही लिखा था ।चंद दिनों की खुशियों के बाद कटुता और तकरारों का जो सिलसिला शुरू हुआ वह अंत तक चलता रहा । अपने रूखे स्वभाव के कारण मेरी उनकी अच्छी जीवन संगिनी कभी नही बन सकी ।यही नही, आगे चल कर उनके जीवन में आने वाली प्रेयसी भी उनसे वफा न कर सकीं । और वह ताउम्र प्यार को तरसते रहे ।
     चारल्स डिकिन्स यानी ‘ओलिवर टिवस्ट’  ‘ए टेल आफ टू सिटीज’ जैसी अमर कृतियों के रचनाकार । स्काटिस खूबसूरत लड़की केटी से प्रेम विवाह कर जीवन में खुशियों का रंग भर देने की चाहत रखने वाले डिकिन्स को फूलों की जगह कांटे मिले । दैहिक सौंदर्य मे लाजवाब केटी डिकिन्स का मन कभी नही जीत पायी ।लेखन कर्म को व्यर्थ का काम समझने वाली केटी से उन्हे हमेशा मानसिक पीड़ा ही मिली ।लेकिन लंदन में जब वह साथ रहते थे, केटी की बहन मेरी डिकिन्स की तरफ आकर्षित हुई और दोनो एक दूसरे को प्यार करने लगे । लेकिन एक रात मेरी की अचानक मृत्यु हो गई। इस हादसे से डिकिन्स को भावनात्मक रूप से काफी आघात लगा। उन्होने उसके शव से हाथ की अंगूठी निकाल कर पहन ली और अपनी मृत्यु तक उसे पहने रहे ।
     सिनेमा के पर्दे पर अपने अभिनय से पूरी दुनिया को हंसाने वाले चार्ली चैप्लीन को कौन नही जानता । सभी को हंसा हंसा कर लोट पोट कर देने वाले इस महान कलाकार की स्वयं की जिंदगी बेहद तनाव भरी रही ।

   एक भोज मे चार्ली की मुलाकात सोलह वर्षीय अभिनेत्री मिल्डिरेड से हो गयी। आंखे चार हुई और वे दाम्पत्य सूत्र मे बंध गए । एक पुत्र का जन्म हुआ जो तीन दिन बाद ही चला गया। आपसी समझ के अभाव में इनके बीच की दूरियां बढती गयीं । मिल्डिरेड कभी चार्ली को न समझ सकी ।अंतत: 1920 मे तलाक द्रारा इस अनचाहे रिश्ते का अंत हुआ ।1924 मे चार्ली ने फिर एक अभिनेत्री लिटा ग्रेसी से विवाह किया। लेकिन ज्यादा दिन निभ न सकी ।बाद मे दोनो का तलाक हो गया ।लेकिन भावनात्मक पीड़ाओं का अंत यहीं नही हुआ ।अभी बहुत कुछ महसूस करना बाकी था ।
     चार्ली ने तीसरा विवाह 54 वर्ष की उम्र मे किया । लेकिन अंतत: तलाक ही इस संबध की नियती बना । चौथी शादी होने तक चार्ली पूरी दुनिया में एक महान हास्य अभिनेता के रूप में चर्चित हो गये थे और साथ में बूढ़े भी ।
     इतिहास के पन्नों में ऐसी न जाने कितनी मार्मिक कहानियां दफन हैं जहां शोहरत की बुलंदियों को छूने वाले ताउम्र प्यार को तरसते रहे लेकिन वह उनसे हमेशा दो कदम दूर ही रहा । और अपनी प्यार की चाहत को लेकर इस दुनिया को ही अलविदा कह दिया ।
संपर्क :
एल.एस.बिष्ट
11/508 , इंदिरा नगर
लखनऊ
मो. 9450911026