रविवार, 27 नवंबर 2016

गुजरे दौर की यादों का महोत्सव

कभी गोमती के किनारे बसा तहजीब का एक शहर था लखनऊ । नवाबों की नगरी, बागीचों का शहर लखनऊ | नवाबी काल मे अवध की राजधानी का अपना एक अलग चेहरा था परंतु एक महानगर में तब्दील होते इस शहर मे अब सब कुछ खडंहर व उजाड मे बदलने लगा है ।
अब लखनऊ नवाबों की नगरी नहीं, बल्कि ” साहबों ” और ” बाबूओं ” का शहर है । हजरतगंज जैसे आधुनिक बाजार में अब इक्के तांगे नहीं बल्कि चमचमाती कारें नई संस्कृति की पहचान स्वरूप दौडती दिख जायेंगी । इक्के-तांगों का तो य्हां आना वैसी
भी सरकारी रूप से वर्जित हो चुका है | नई हवा के प्रतीक आलीशान माल अब इस शहर की पहचान बन रहे हैं | यहां आपको सुनाई देगी अंग्रेजी की गिटर-पिटर और मेक-अप से लिपेपुते चेहरे | जिन्हें न तो तहजीब से कोई लेना देना है और न ही इस शहर की विरासत से |
कभी अवध की शाम का एक अलग ही रंग हुआ करता था जिसमे इत्र की महक और घुंघरूओं की झंकार सुनाई देती थी | अब इस शाम का मतलब है ” हजरतगंज की गंजिग ” | जहां फ़ैशनेबुल लडकी-लडकियों के झुंड बेतरतीब, बेमतलब घूमते नजर आते हैं | लखनऊ की तहजीब का जनाजा उठता यहां देखा जा सक्ता है |
पहले मैं ‘ मे तब्दील हो रहा है ‘ पहले आप ‘ का शहर | जिस आत्मीयता और सलीके का दुनिया मे कोई सानी नही था अब उसकी जगह है स्वार्थपरता और कपटपूर्ण व्यवहार | वह सादगी और सहजता गये दौर की बातें बन कर रह गई हैं
शहर की मुख्य सडकों के पीछे छोटी संकरी सडकों के खुले मेनहोल किसी भी आने-जाने वालों का स्वागत करने के लिए तैयार मिलेंगे | सडकों के किनारों और उनके बगल से निकलती नालियों मे दुर्गंध इतनी कि रूमाल नाक पर रखे बिना चलना दूभर हो जाए |
बागों के इस शहर का हरियाली से भी एक रिश्ता रहा है लेकिन अब हरियाली को निगल रहा है कंक्रीट का जंगल | पुराने ऐतिहासिक बागों का कोई पुरसाहाल नहीं | कई पुराने बाग तो न जाने कब दफ़न हो चुके हैं | कुछ बाग दिख जायेंगे लेकिन यहां भी सूखे पेड, मुरझाये फ़ूल और टूटे हुए झूले ही दिखाई देंगे | वैसे शहर को सुदंर बनाने के लिए जहां तहां नये बागों को विकसित करने का सिलसिला अब भी जारी है | लेकिन ये सैरगाह नहीं, असमाजिक तत्वों के अड्डे बन कर रह गये हैं | कोढ पर खाज यह कि आम आदमी को इनके अंदर आने के लिए भी टिकट लेना पडता है | यानी पैसा नही तो आपके लिए बाग का कोई मतलब नही |
शहर को आधुनिक बनाने के लिए बहुमंजिली इमारतों के निर्माण का सिलसिला अभी रूका नही है | परंतु इन सुंदर इमारतों के अंदर दीवारों पर जगह-जगह पान की पीक यहां की नई तहजीब के प्रमाण्स्वरूप नजर आयेंगे | समाजवादी व्यवस्था के गवाह के रूप मे इन आलीशान इमारतों के पीछे झुग्गियों की कतारें कभी भी देखी जा सकती हैं | यहां इनकी भी एक दुनिया है जो तेजी से बस रही है |
यह अब मंत्रियों, विधायकों तथा हडतालों व जुलूसों का भी शहर है | गांव-कस्बों से रोज यहां भीड उमडती है लेकिन शहर का वह मिजाज अब नहीं रहा | मंत्री जी या विधायक जी से अप्नी दुख दर्द की दास्तान कहने के लिए यहां वह तरस जाता है | अंत मे दलालों व छुटभैय्यों नेताओं दवारा दिखाये गये सब्जबाग भी सूखने लगते हैं और ये बेचारे वापस लौट जाते हैं अपने गांव , अपने शहर में | सच कितना बेदर्द हो गया है यह शहर|
कभी मेह्मान नवाजी के लिए भी लखनऊ दूर दूर तक जाना जाता था | कहा जाता है कि लखनऊ का वाशिंदा स्वयं तो चने खायेगा लेकिन मेहमान या दोस्त को झट काजू, किशमिश पेश करेगा | लेकिन अब शहर आये मेहमानों का लूट ख्सोट आम हो गई है | सरकारी कार्यालय के बाबू बिना ‘ सुविधा शुल्क ‘ कुछ करने को तैयार नही | यह बेरूखी व गैरपन अब शहर की मेहमाननवाजी का अंग बन गया है | बाहर से आये मेहमान को आश्चर्य होता है कि किताबों मे पढा, वह शहर क्या यही है | या फ़िर गलत जमीन पर उस शहर को तलाश रहा है |
वैसे तो बदलाव प्र्कृति का चक्र है | कुछ भी हमेशा एक सा नही रहता | लेकिन किसी दौर विशेष की यादों को सहेजना, समेटना भी जरूरी है | इसी सहेजना का एक प्रयास रहा है ‘ लखनऊ महोत्सव ‘ | जिसकी शुरूआत 1974 मे हुई थी लेकिन आज तक यह महोत्सव अपने उस मकसद से कोसों दूर दिखाई देता है | व्यावसायिक भोंडापन तक सीमित होकर रह गया है यह उत्सव | लखनऊ की तहजीब, व अवध की सोंधी महक से इस उत्सव का कोई रिश्ता आज तक नहीं बन पाया है |
नौकरशाही के दबदबे के नीचे आयोजित किए जाने वाले इस महोत्सव की इतनी भी पह्चान नही बन पाई है देश-विदेश के पर्यटक यहां आयें | जबकि दूसरी तरफ़ मरू महोत्सव, खजुराहो महोत्सव व सूरजकुंड महोत्सव अपनी पुख्ता पहचान बना पाने मे सफ़ल रहे हैं | यह महोत्सव देसी पर्यटकों के साथ विदेशी पर्यटकों को भी आकर्षित करते हैं |
दर-असल इसके चरित्र को देखते हुए तो ऐसा प्रतीत होता है कि इस उत्सव का असली मक्सद अवध की तहजीब के नाम पर स्टाल लगा कर तहजीब व लखनवी कला तथा व्यजनों को बेचना ्भर  है | संस्कृति का इससे कोई रिश्ता बनता दिखाई नही देता | रही सही कसर पूरी कर देते हैं यहां आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम | इनमे देश के नामी गिरामी महंगे कलाकारों को बुला कर जनता की वाही वाही लुटी जाती है | अवध के लोक नृत्यों व संगीत की सुध लेने वाला कोई नही | अवधी भक्ति संगीत, शास्त्रीय संगीत, धोबिया नृत्य , स्वांग और नौटंकी इन्हें नही याद आती | कभी कधार खाना पूरी का प्र्यासभर होता है | वह भी सतही |
पटेबाजी या लठ्ट्बाजी कभी यहां की पहचान थी | यह अपने दुश्मनों से निपटने की ऐसी कला थी कि एक अच्छा पटाबाज कई कई लोगों से अकेले लोहा ले सक्ता था | लेकिन जरा से चूके तो बस | लेकिन यह कहां गुम हो गई, पता नहीं | अलबत्ता गली गली कुकरमुत्तों की तरह जूडो-कराटे सिखाने और ‘ सिक्स पैक ‘ बनाने की दुकानें जरूर खुल गई हैं |
किन्नरों ( हिजडों ) का भी नवाबी काल मे एक अलग मह्त्व रहा है | इनके विचित्र रस्मो-रिवाज कहानी किस्सों मे आज भी मौजूद हैं | क्भी लखनऊ के ऐशबाग मे इन हिजडों का एक अनोखा मेला भी लगता था | इसे ‘ अलौला का मेला ‘ कहा जाता था | इसकी परंपरा नवाबी काल से रही है | इसमे बहुत बडी संख्या मे हिजडे शरीक हुआ करते थे | अभी हाल के वर्षों तक यह किसी तरह अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए जद्दोजहद कर रहा था लेकिन इधर यह भी इतिहास मे दफ़न हो गया | किसी न किसी रूप मे किन्नरों के इस मेले व उनकी नवाबी दौर की जिंदगी को मेले से जोडा जा सकता है जिससे नई पीढी इनके बारे मे भी समझ सकें लेकिन ऐसा विचार कोसों दूर है
बहरहाल मानवीय संवेदनाओं का कब्रगाह बनता यह शहर फ़िर भी कुछ अलग तो है ही | आज भी यह एक पीढी के दिलो दिमाग मे धडकता है | लेकिन सच यह भी है कि हर साल आयोजित किए जाने वाला ‘ लखनऊ महोत्सव ‘ उन यादों को  समेटने व सहेजने मे कहीं से भी सफ़ल होता नहीं दिखता | हर संवेदनशील लखनऊ का वाशिंदा इस बात से कहीं चिंतित है कि नई पीढी बीते दौर के उस लखनऊ को महसूस भी करे तो आखिर कैसे |



मंगलवार, 15 नवंबर 2016

कहीं हम भी खडे हैं कटघरे मे


  मौजूदा समय मे देश दो बडी समस्याओं से जूझ रहा है । एक तरफ देश मे बढता भ्र्ष्टाचार है तो दूसरी तरफ बढता प्रदूषण  । ऐसा भी नही कि इन्हें गंभीरता से नही लिया गया । सरकारी स्तर पर प्रयास भी किये गये । लेकिन कुल मिला कर वही ढाक के तीन पात । अभी हाल मे सर्द मौसम की शुरूआत मे जिस तरह से दिल्ली मे सांस लेना दूभर हो गया था और लोगों को पूरी दिल्ली एक गैस चैम्बर मे रूप मे नजर आने लगी थी , उसने पूरे देश का ध्यान इस ओर खींचा । सिर्फ दिल्ली ही नही उत्तर प्रदेश , पंजाब, हरियाणा मे भी कई स्थानों मे यही हालात बने । लेकिन आम प्रचलित भारतीय त्रासदी यह है कि हालात थोडा ठीक हो जाने पर सबकुछ भुला दिया जाता है । कुछ ऐसी ही कहानी है देश मे बढते भ्र्ष्टाचार की । आजादी के कुछ समय बाद लगभग सत्तर के दशक से ही भ्र्ष्टाचार पर बातें की जाने लगी थीं । देश मे बढते राजनीतिक भ्र्ष्टाचार के साथ नौकरशाही के भ्रष्टाचार पर भी संसद के अंदर व बाहर चर्चायें व बहस शुरू हो चुकी थी । लेकिन इधर हाल के वर्षों मे देश की अर्थव्यवस्था को जिस प्रकार काले धन के व्यापक प्रसार ने चोट पहुंचाई उसने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया । लेकिन त्रासदी यह रही कि काले धन व बढते प्रदुषण पर  बातें तो बहुत की जाने लगीं लेकिन ठोस और प्रभावी सार्थक प्रयासों के अभाव मे हालात जस के तस बने रहे ।

इधर  पूरी दुनिया मे बिगडते प्रर्यावरण को लेकर  जो गहरी चिंता जाहिर की गई उसने भारत जैसे सोये हुए देश को भी जगाने का काम किया । फलस्वरूप  प्रर्यावरण को बचाने के लिए कुछ ठोस प्रयासों की शुरूआत भी की गई लेकिन यहां तो हर कुंए मे भांग पडी थी  । सामाजिक हित वाले इन प्रयासों के संदर्भ मे जब हमने  समाज की ओर देखा तो यहां एक आत्मकेन्द्रित, स्वार्थपूर्ण समाज ही दिखाई दिया  । जिसे देश मे लोगों को समाज  हित से ज्यादा अपने हित सुहाते हों    वहां  अच्छे प्रयासों की अकाल मौत का होना कोई अचरज की बात नही ।


सामाजिक  हित के लिए किये गये  तमाम प्रयासों मे  शायद ही आशातीत परिणाम मिले हों । बढते प्रदूषण को रोकने के लिए प्लास्टिक के उपयोग पर रोक लगाने के प्रयास किये गये । थोडे समय के लिए कुछ अच्छे संकेत मिले भी लेकिन बहुत जल्द सबकुछ भुला दिया गया । बाजारों व दुकानों मे तथा दैनिक उपयोग मे प्लास्टिक की पन्नियों का धडल्ले से उपयोग आज भी जारी है । चुनाव प्रचार मे भी प्लास्टिक से बनी सामग्री का उपयोग बद्स्तूर जारी है । इसी तरह सार्वजनिक स्थलों मे ध्रुमपाम न करने के लिए कानून बनाया गया । इसके लिए दंड का भी प्राविधान है लेकिन लचर क्रियांवयन के चलते यह भी बस एक कानून बन कर रह गया है । लोगों को सार्वजनिक स्थलों पर ध्रुमपान करते देखा जा सकता है । तंबाकू गुटका पर रोक लगाई गई लेकिन कानून को बाई पास करके आज भी लोग धडल्ले से उसका उपयोग कर रहे हैं । बस फर्क यह है कि तम्बाकू पाउच  और सादे  मसाले के पाउच को अलग  अलग करके बेचा जा रहा है ।



अब रही बात देश को स्वच्छ रखने की तो वह देश साफ सुथरे रह सकते हैं  जहां के नागरिक कूडेदान न मिलने पर केले का छिलका या पैकेट का रेपर अपनी जेब मे डालना बेहतर समझते हैं बजाय इसके कि उसे सडक पर फेंक दें । आज हम जिन यूरोपीय देशों के अनुसरण करने की बात करते हैं वहां की बेहतरी मे कानून से ज्यादा नागरिकों के ' सिविक सेंस ' की भूमिका महत्वपूर्ण है ।  लेकिन यहां तो अपना कूडा पडोसी के घर के सामने डाल देने मात्र से ही सफाई का कर्तव्य पूरा हो जाता है । बाकी सफाई तो बहुत दूर की बात है । अब ऐसे मे कैसे पूरा हो स्वच्छ भारत का सपना । चार दिन का तमाशा करना एक अलग बात है ।

प्रदूषण से ज्यादा जहां दिखावे की प्रवत्ति सोच मे प्रभावी हो तथा कार एक स्टेटस सिम्बल हो और रिश्तेदारों को दिखाने की चीज हो वहां सडकों पर कारों की संख्या को सीमित किया जा सकेगा, मुश्किल ही लगता है ।

हमारी स्वार्थी मानसिकता का नजारा आजकल बैकों के बाहर भी देखा जा सकता है । काले धन को लेकर सरकार ने 500 व 1000 रूपये के नोट बंद करके एक साहसिक फैसला लिया । जनता को परेशानी न हो इसलिए इन नोटो के बदले नये नोटो को बदलने की सुविधा भी प्रदान की और साथ ही किसी भी सीमा तक बैंक मे पुराने नोटों को जमा करने की सुविधा भी । लेकिन जल्दी ही इन सुविधाओं मे हमारी स्वार्थी सोच का ग्रहण लगना शुरू हो गया । ' ईमानदार ' कहे जाने वाले लोगों ने कमीशन लेकर अपनी पहचान पर ( आई. डी ) काले कारोबारियों के काले पैसों को नये नोटों से बदलना शुरू कर दिया । यही नही  कई ने तो बहती गंगा मे हाथ धोते हुए अपने खातों मे भ्र्ष्टाचारियों के पैसे भी जमा करने का काम बखूबी शुरू कर दिया । यानी जिन काले धन धारकों के विरूध्द यह मुहिम शूरू की गई थी पैसे लेकर उनकी ही मदद की जाने लगी । तुर्रा यह कि यही लोग यह कहते नही थक रहे कि मोदी सरकार ने बहुत अच्छा काम किया है । यह ईमानदारी की एक अलग किस्म है जो अब दिखाई दे रही है ।



दर-असल देखा जाए तो  आजादी के बाद से ही  हमें वह संस्कार ही नही मिले जिनसे राष्ट्रहित हमारी सोच मे सर्वोपरि होता  । जिन देशों का  अनुसरण करने का प्र्यास किया जा रहा है वहां लोगों को राष्ट्र्भक्ति , राष्ट्रहित व सामाजिक सरोकार जन्म से ही  घुट्टी मे पिलाये गये हैं । यहां तो विकास और समृध्दि को जो दिशा दी गई उसमें इन विचारों का कोई स्थान ही नही है । भारतीय समाज मे  आत्मकेन्द्रित खुशहाली की सोच के बीच भला राष्ट्रहित से किसी को  क्या मतलब ।

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

चकाचौंध मे खोता त्योहार


      समय  के साथ हमारे  त्योहारों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है |  यह बदलता स्वरूप हमें त्योहार के सच्चे उल्लास से कहीं दूर ले जा रहा है | यही कारण है कि आज तीज त्योहारों के अवसर पर वह खुशी चेहरों मे नही दिखाई देती जो कभी नजर आया करती थी ।  सच् तो यह है कि अपने  बदल रहे चरित्र में यह रोशनी का पर्व सामर्थ्यवान लोगों के लिए धूम-धडाके, फ़ूहड नाच-गाने, होटलों के हंगामे और हजारों लाखों के जुआ खेलने का त्योहार बन कर रह गया है | कुल मिला कर देखें तो इस त्योहार पर जो उत्साह, उल्लास कभी हमारे दिलो-दिमाग में बरबस घुल जाया करता था, अब चोर दरवाजे से बस एक परम्परा का निर्वाह करते हुए आता है

     अगर थोडा पीछे देखें तो पता चलता है कि कुछ समय पहले तक दीपावली की तैयारियां महीना भर पहले से ही शुरू हो जाया करती थी | महिलाएं दीवारों, दरवाजों और फ़र्श को सजाने का काम स्वयं करती थीं | पूरा घर अल्पना व रंगोली से सजाया करतीं लेकिन आज कहां है हाथों की वह सजावट | बडे उत्साह के साथ दीये खरीदे जाते | उन्हें तैयार किया जाता और फ़िर तेल और बाती डाल कर उनसे पूरे घर को दुल्हन की तरह सजा दिया जाता था | लेकिन अब किसे है इतनी फ़ुर्सत | बिजली के रंगीन बल्बों की एक झालर डाल सजावट कर दी जाती है | लेकिन कहां दीये की नन्ही लौ का मुण्डेर-मुण्डेर टिमटिमाते जलना और कहां बिजली के गुस्सैल बलबों का जलना- बुझना | परंतु यही तो है बदलाव की वह बयार जिसने इस त्योहार के पारंपरिक स्वरूप को डस लिया है | यही नही, अब कहां है पकवानों की वह खुशबू और खील, गट्टों से भरी बडी-बडी थालियां जो बच्चों को कई कई दिन तक त्योहार का मजा देते थे |

     दर-असल आज हमारे जीने का तरीका ही बदल गया है | इस नई जीवन शैली ने हमें अपने त्योहारों मे निहित स्वाभाविक उल्लास से काट दिया है | अब तो लोग दीपावली के दिन ही पटाखे और मिठाइयां खरीदने दौडते हैं | मिठाई भी ऐसी कि चार दिन तक रखना मुश्किल हो जाए |

     खुशियों का यह पर्व अब फ़िजूलखर्ची का पर्व भी बन कर रह गया है | शहरों मे बाजार ह्फ़्ता भर पहले से ही जगमगा उठते हैं | चारों ओर तामझाम और मंहगी आधुनिक चीजों से बाजार पट सा जाता है | महंगी मिठाइयां, मेवे, गिफ़्ट पैक, खेल-खिलौने, चांदी-सोने की मूर्तियां और सिक्के और भी न जाने क्या-क्या | इन सबके बीच दीपावली से जुडी पारंपरिक चीजें धीरे-धीरे गायब हो रही हैं |

     पारम्परिक आतिशबाजी का स्थान ले लिया है दिल दहला देने वाले बमों और पटाखों ने | एक से बढ कर एक महंगे पटाखे | हर साल करोडों रूपये के पटाखे दीपावली के नाम फ़ूंक दिए जाते हैं | सरकार और गैर सरकारी संगठनों की तमाम अपीलें भुला दी जाती हैं | बल्कि अब तो मुहल्ले स्तर पर आतिशबाजी की होड सी लगने लगी है कि कौन कितने तेज और देर तक आतिशबाजी कर सकता है | यह एक तरह से पटाखों की नही बल्कि दिखावे की होड है जिसे बाजार संस्कृति ने विकसित किया है |
            कुछ ऐसा ही बदल गया है इस दिन घर-मकान की सजावट का स्वरूप | अब दीये की झिलमिलाती बती का स्थान ले लिया है बिजली की सजावट ने | किस्म किस्म की लकदक झालरें और सजावटी कलात्मक मंहगी मोमबत्तियां | बेचारे मिट्टी के दियों का कोई पुरसाहाल नहीं | कुछ तो तेल महंगा और कुछ बदली रूचियों व अधुनिकता की मार |

     दीपावली पर उपहार देने की भी परम्परा रही है | लेकिन उपहार व तोहफ़ों का यह स्वरूप भी मिठाई अथवा खील बताशों तक सीमित नहीं रहा | सजावटी घडी, चांदी के खूबसूरत सिक्के, कलात्मक मूर्तियां व गहने, डिब्बाबंद मेवे और भी तमाम चीजें जुड गई है उपहार-तोहफ़ों से | यही नही, विदेशी शराब की बोतलों को भी उपहार मे देने की संस्कृति तेजी से विकसित हुई है | विदेशी चाकलेट के महंगे गिफ़्ट पैक भी उपहार मे दिये जाने लगे हैं | विज्ञापन संस्कृती ने इसकी जडें जमाने मे मह्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है |
    | सच तो यह है कि त्योहार के नाम पर हम अपने संस्कारों व परम्परा का निर्वाह भर कर रहे हैं और वह भी इसलिए कि सदियों से पोषित विचारों से हम अपने को एक्दम से अलग नहीं कर पा रहे हैं | आधुनिकता और परंपरा के बीच हम संतुलन बनाने की जिद्दोजहद मे में उलझे हुऐ हैं | महंगे होते इस त्योहार के साथ मध्यम वर्ग तो येन-केन अपने कदम मिलाने मे समर्थ हो पा रहा है लेकिन कामगारों से पूछिए कि महंगा होता यह त्योहार उनकी जिंदगी को कितना छू पा रहा है | उनके चेहरे की मायूसी बता देगी कि रोशनी का यह त्योहार बदलते स्वरूप में उनकी अंधेरी जिंदगी के अंधेरों को कहीं से भी छू तक नहीं पा रहे हैं |

      लेकिन तेजी से आ रहे बदलाव के बाबजूद एक बडा वर्ग है जो अपने तरीके से निश्छ्ल खुशी के साथ इसे मना रहा है | यह दीगर बत है कि उसके सांस्कृतिक मूल्य भी जमाने की हवा से अछूते नही रहे | फ़िर भी इस पर्व से जुडे उसके मूल संस्कार बहुत बदले नही हैं | आज भी वह घर आंगन की झाड-बुहार करने में बहुत पहले से ही व्यस्त हो जाता है | मिठाई खरीदना और मित्र-रिश्तेदारों में बांटना वह नही भूलता | इस अवसर पर बच्चों के लिए नये कपडे खरीदना भी उसकी परम्परा का हिस्सा है |

     बहरहाल तेजी से बदल रहा है दीपावली का स्वरूप | लेकिन जिस तरह से ह्मरी आस्था से जुडे इस पर्व का सांस्कृतिक स्वरूप बिगड रहा है, उसे अच्छा तो नही कहा जा सकता | धन-वैभव, सामर्थ्य प्रदर्शन, चकाचौंध, दिखावा व स्वार्थ की जो प्रवत्ति तेजी से विकसित हो रही है इससे तो इस पर्व का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाऐगा | दूसरे पर्वों व उत्सवों की तरह इसे तो एक त्योहार की तरह ही हमारी जिंदगी से जुडना चाहिए |
   
   

शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

समान नागरिक संहिता पर इतना शोर क्यों

वोट बैंक की राजनीति के चलते जिस धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण का राजनीतिक खेल खेला जा रहा था उसका बिगडेल चेहरा अब सतह पर स्पष्ट दिखाई देने लगा है । बहुसंख्यक हिंदुओं ने देश व समाज हित मे बनाये गये कानूनों पर कभी कोई संदेह नही किया । लेकिन अब  जब बात समान नागरिक संहिता की उठ रही है तो कुछ मुस्लिम धर्मगुरूओं को उच्चतम न्यायालय से लेकर सरकार तक की नियत मे खो'ट दिखाई देने लगा है । यहां तक कि मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने साफ कर दिया है कि वह ' एक देश एक कानून ' को नही मानेगा । बोर्ड  और  अन्य मुस्लिम संगठनों ने  भी समान नागरिक संहिता का विरोध कर विधि आयोग की प्रशनावली का बायकाट करने का एलान  किया है ।

बोर्ड के महासचिव मोहम्मद वली रहमानी तो दो कदम आगे चल कर प्रधानमंत्री मोदी को सलाह देते नजर आ रहे हैं कि वह पहले दुश्मनों से निपटें । घर के अंदर दुश्मन न बनाए । यह हाल तब है जब देश की शीर्ष अदालत के निर्देश पर सरकार ने विधि आयोग को महज राय जानने का काम सौंपा है ।

देश मे समान नागरिक संहिता की बात एक  लंबे अरसे से महसूस की जा रही थी । लेकिन इसके लिए अनुकूल सामाजिक परिवेश न होने के कारण इसे ठंडे बस्ते मे रखना ही बेहतर समझा गया । लेकिन इधर मुस्लिम समाज मे तलाक के तरीकों को लेकर इस समाज के अंदर से ही आवाजें उठने लगीं और  तलाक के बाद महिलाओं की दयनीय हालातों को देख कर उच्चतम न्यायालय को सरकार से पूछ्ना पडा कि वह समान नागरिक कानूनों की दिशा मे क्या सोच रही है । लेकिन इतने भर से सियासी घमासान शुरू हो गया । मुस्लिम धर्मगूरूओं व मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड् से जुडे लोगों को इसमें अपनी धार्मिक स्वतंत्रता खतरे मे पडती दिखाई देन लगी । हास्यास्पद  तर्क तो यहां तक दिये जा रहे हैं कि एक कानून के चलते भारत की विविधता ही  खत्म हो जायेगी ।

लेकिन सच यह है कि मुस्लिम समाज के कुछ लोग अपने वर्चस्व को बनाये रखना चाहते हैं । उनके विरोध के पीछे मुख्य कारण उनके अपने स्वार्थ है जिन  पर वह धर्म व परंपरा का लबादा डाल कर लोगों को विरोध के लिए उकसाने की कोशिशों मे लगे हैं । जब कि वास्तविकता यह है कि यही धार्मिक परंपराएं आज उनके विकास मे सबसे बडी बाधक बन कर खडी हैं ।

देखा जाए तो इसमें इतना उग्र व विचलित होने की आवश्यकता ही नही है । यह तो सिर्फ राय जानने  की एक कोशिश भर है और उसके लिए कुछ सवालों की एक प्रशनावली है  जिस पर लोगों से सुझाव मांगे गये हैं  । गौरतलब  यह भी है इस प्रशनावली के सवाल सिर्फ मुस्लिम समुदाय से ही नही बल्कि हिंदु व ईसाई समुदाय से भी संबधित हैं । लेकिन विरोध के स्वर सिर्फ मुस्लिम धर्मगुरूओं व कुछ संगठनों से ही उठ रहे हैं । इसी मे एक अहम सवाल है कि क्या तीन तलाक की प्रथा को रद्द किया जाना चाहिए ? या कुछ बदलाव अथवा इसी रूप मे बरकरार रखा जाए ? इसी तरह बहु विवाह के संबध मे भी  राय जानने की कोशिश की गई है । यही नही हिंदु महिलाओं की संपत्ति के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाये जाने चाहिए इसमे भी विचार मांगे गये हैं । इसी तरह तलाक के लिए ईसाई महिलाओं को दो साल के इंतजार पर भी  पूछा गया है कि क्या यह  दो वर्ष का  समय  इन महिलाओं के समानता के अधिकार को प्रभावित करता है ? इसी तरह कुछ और सवाल हैं । लेकिन सारा शोर और विरोध मुस्लिम समा ज के सवालों को लेकर है । आखिर ऐसा क्यों ?

नि:संदेह यह एक अच्छा कदम है और विशेष कर यह देखते ह्ये कि कुछ समुदायों मे धर्म व परंपराओं के नाम पर महिलाओं के साथ अन्याय हो रहा है । लेकिन धर्मगुरूओं की अपने हितों और वर्चस्व बनाये रखने की राजनीति के चलते एक बेवजह का शोर सुनाई देने लगा है । आग मे घी का काम वह राजनीतिक दल भी कर रहे हैं जो सेक्यूलर राजनीति का लबादा ओढ अपने वोट बैंक की राजनीतिक रोटियां लंबे  समय से सेंक रहे हैं । जबकि सच यह है कि सेक्यूलर राजनीति के इन झंडाबरदारों को मुस्लिम समाज की बदहाली से कभी कोई लेना देना रहा ही नही । ऐसा होता तो वह इन प्रगतिशील कदमों का कुतर्कों के माध्यम से विरोध कदापि न करते ।

बहरहाल धर्म व वोट की राजनीति करने वालों को यह जानना जरूरी है कि हमारे संविधान मे भी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता की बात कही गई है । इसे राज्य के नीति निदेशक तत्वों मे शामिल किया गया है जैसा कि कई और अन्य बातों को । लेकिन यह दीगर बार है कि अभी तक इस दिशा की ओर कभी गंभीरता से सोचा ही नही गया था । न्यायालय के माध्य्म से ही सही यह एक सराहनीय प्रयास है जिसे संकीर्ण धार्मिक भावनाओं से ऊपर उठ कर देखा समझा जाना चाहिए ।

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

उदारता नही आक्रामकता की जरूरत

आखिरकार नाउम्मीदों का वह अंधेरा जिसने पूरे देश को निराशा के गर्त मे डाल दिया था, खत्म हुआ । एकबारगी फिर जयकारों से पूरा देश गूंज रहा है । बार बार के आतंकी हमलों और उसके बाद भारत की कमजोर् राजनीतिक प्रतिकिया से ऊबी देश की जनता को मानो एक नया टानिक मिल गया हो । दर-असल आतंकी हमलों मे शहीद हो रहे अपने सैनिकों के कारण और कुछ न कर पाने की कुंठा ने उसे  देश के राजनैतिक नेतृत्व से कोई उम्मीद ही नही बची थी । लेकिन मोदी सरकार के एक साहसिक निर्णय से अब पूरा देश गर्व महसूस करने लगा है । बेशक हमले मे चंद आतंकवादियों की हत्या से यह समस्या पूरी तरह खत्म नही होने वाली लेकिन इसका एक सांकेतिक महत्व तो है कि भारत अब बर्दाश्त नही करेगा । उसे जरूरत पडी तो वह एल.ओ.सी पार करके भी आतंक का खात्मा करने को तैयार है ।

वैसे इस हमले के बाद एक बार फिर पाकिस्तान के साथ सीधे टकराव की हालात बन रहे हैं । लेकिन ऐसा पहली बार भी नही है । दर-असल भारत और पाकिस्तान का जन्म ही विवाद और झगडे के गर्भ से हुआ । जिन्ना ने रातों रात अपने विचार बदल कर धार्मिक आधार पर अलग राष्ट्र के रूप मे पाकिस्तान की मांग न की होती तो आज दुनिया के मानचित्र पर पाकिस्तान नाम का राष्ट्र न होता । जब दो राष्ट्रो की जन्मकुंडली पर शनिग्रह हो तो उनके बीच नोंक झोक का होना स्वाभाविक ही है । 1947 से ऐसा ही हो रहा है । लेकिन यहां गौरतलब यह है कि दोनो राष्ट्रों के चरित्र, सोच और नीतियों में कोई समानता नही है ।
भारत अपने जन्म से ही एक उदार सोच वाले राष्ट्र के रूप में विकसित हुआ । अगर थोडा पीछे देखें तो विभाजन के समय होने वाले  साम्प्रदायिक हिंसा के संदर्भ में गांधी जी की उदार भूमिका पर आज भी सवाल उठाये जाते हैं । लेकिन वहीं सीमा पार से ऐसी किसी उदार सोच के स्वर नहीं सुनाई दिये थे । इसके फलस्वरूप देश मे एक बडा वर्ग आज भी गांधी जी की उस उदारता का पक्षधर नहीं दिखाई देता ।
इसके बाद तो पाकिस्तान और भारत का इतिहास युध्द और राजनीतिक विवादों का ही इतिहास रहा है । अभी तक दोनो देशों की सेनाएं चार बार रणभूमि में आमने सामने हो चुकी हैं । लेकिन इन युध्दों का और उस संदर्भ में हुए राजनीतिक निर्णयों का यदि बारीकी से पोस्टमार्टम करें तो यह बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि भारत ने यहां भी अपनी उदार सोच का खामियाजा भुगता है ।
आजादी के उपरांत जन्म लेते ही पाकिस्तान ने 22 अक्टूबर 1947 को कश्मीर पर कबिलाईयों के साथ मिल कर हमला किया । लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर दोनो देश युध्द विराम के लिए राजी हो गये । लेकिन चूंकि उस समय कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत थी तथा तत्कालिन राजा हरि सिंह ने उसका विलय भारत के साथ स्वीकार नहीं किया था अत: जब तक भारतीय सेना कश्मीर बचाने के लिए पहुंचती, पाकिस्तान एक हिस्से में अपना कब्जा जमा चुका था । बाद मे विलय होने के बाद भी भारत ने पाक अधिकृत कश्मीर के सवाल पर कभी शोर नहीं मचाया ।
भारत के इस नरम रूख को भांपते हुए उसने 1965 में फिर हमला किया । इस बार भी झगडा कश्मीर को लेकर ही था । अप्रैल 1965 से लेकर सिंतबर 1965 के बीच चलने वाले इस युध्द का अंत भी विश्व बिरादरी के दवाब में युध्द विराम की घोषणा करने से हुई । इसी समय ताशकंद समझौता भी हुआ । इस समझौते के लिए तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्र्पति अयूब खान तुरंत राजी हो गये । दर-असल युध्द मे अपनी खस्ता हालत से वह परिचित थे । उन्हें डर था कि यदि यह समझौता न हुआ तो भारत युध्द मे कब्जा किये गये क्षेत्रों को वापस नहीं करेगा ।
दर-असल इस ताशकंद समझौते में भी हमेशा की तरह भारत को ही घाटे का समझौता करना पडा था । शास्त्री जी जैसे सरल व उदार प्रधानमंत्री अंतराष्ट्रीय राजनीति के खुर्राट लोगों के दवाब को न झेल सके तथा अनचाहे समझौता करना पडा था । कहा जाता है कि उसका दुख उन्हें इतना हुआ कि हार्ट अटैक से उनका वहीं देहांत हो गया ।
उस समय देश मे युध्द विराम किए जाने का तीखा विरोध भी हुआ था । दर-असल जिस समय यह युध्द विराम किया गया भारत युध्द में मजबूत स्थिति में था । पाकिस्तान की स्थिति काफी कमजोर पडती जा रही थी । लेकिन समझौते के तहत भारत को पीछे हटना पडा । तत्कालीन भारतीय सेना के कमांडरों को यह निर्णय जरा भी अच्छा नहीं लगा । उस स्थिति मे भारत दवारा स्वीकार किया गया युध्द विराम पाकिस्तान के पक्ष मे ही गया । यहां पर भी गौरतलब यह है कि भारत ने ही उदारता का परिचय देते हुए समझौते की शर्तों को स्वीकार कर लिया । आज तक ताशकंद समझौता भारत के दिल मे खटकता रहता है
लेकिन पाकिस्तान की फितरत बदलने वाली नहीं थी । भारत को चौथा युध्द 1971 मे करना पडा । वैसे तो शुरूआत में यह पाकिस्तान का सीधा हमला नही था लेकिन बाद मे हालात ऐसे बने कि दोनो देशों के बीच तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और आज के बांगला देश को लेकर युध्द हुआ जो 13 दिनों तक चला । यह युध्द इतिहास का सबसे अल्पकालिक युध्द माना जाता है । भारत ने इन तेरह दिनों मे ही पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर दिया । उसे इस युध्द मे शर्मनाक हार झेलनी पडी ।
16 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तानी जनरल नियाजी को समर्पण के द्स्तावेजों पर हस्ताक्षर करने पडे । भारत ने 90,000 पाकिस्तानी सैनिकों को बंदी बनाया था । इसके बाद 1972 मे शिमला समझौता हुआ । पाकिस्तान ने बांग्लादेश की आजादी को स्वीकार करने के बदले में अपने युधबंदियों की रिहाई की मांग सामने रख दी जिसे भारत ने  स्वीकार कर लिया । लेकिन यहां वही कहानी दोहराई गई । युध्द में कब्जा की गई पश्चिम पाकिस्तान की 13000 किलोमीटर जमीन समझौते के तहत वापस कर दी गई । कहा जाता है कि भुट्टो के कहने पर भारत ने इस समझौते मे नरम रूख अपनाया ।
बात यहीं खत्म नही होती । अटल जी के नरम रूख को देखते पाकिस्तान ने कारगिल पर कब्जा करने की पूरी कोशिश की लेकिन भारतीय सेना की वीरता के आगे वह इसमें सफल न हो सका । यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान के लिए सीधे बस सेवा शुरू करने वाले अटल जी ही थे । कुल मिला कर भारत को अपने उदार रवैये का हमेशा खामियाजा ही भुगतना पडा है । पाकिस्तान भारत के इस नरम और उदार सोच से अच्छी तरह वाकिफ था  और इसीलिए उसका दुस्साहस बढता रहा है ।
लेकिन इस बार उसे अप्रत्याशित रूप से वह जवाब मिला जिसकी उम्मीद उसने कभी नही की थी । दर-असल तमाम छोटे बडे आतंकी हमलों के बाद जिस तरह हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने मुंबई व पठानकोट हमले को लेकर भी बहुत ज्यादा आक्रामक रूख नही अपनाया इससे वह भारत को बेहद ' सोफ्ट टारगेट ' समझने लगा था । रही सही कसर उसके परमाणु हमले की धमकी से पूरी हो रही थी । देश मे कोई भी सरकार हमले जैसी कार्रवाही करने का साहस नही जुटा पा रही  थी  ।यहां तक कि करगिल युध्द मे भी भारतीय सेना ने इंच भर सीमा  पार नही की थी ।  लेकिन उरी के हमले ने सब्र की सीमाएं तोड दी और पूरे देश से हमला करने की आवाजें उठने लगीं । अतत: मोदी सरकार ने जिस सटीक तरीके से 'आपरेशन ' को अंजाम दिया उससे पूरा देश खुशी मे झूम उठा । लोग यही देखना चाहते थे ।

यह एक तरह से संदेश भी है कि भारत की नीति बदल चुकी है। आतंक के विरूध्द अब वह किसी सीमा तक भी जा सकता है । इसके लिए अगर उसे खुले युध्द का भी सामना करना पडे तो वह करेगा । सबसे महत्वपूर्ण यह कि वह परमाणु हमले की गीदड भभकी से भयभीत होने वाला नही । यह संदेश देना जरूरी भी था । इस कार्रवाही से विश्व बिरादरी मे भी भारत का मान बढा ही है । अन्यथा भारत को एक बहुत ही सहनशील देश के रूप मे देखा जाने लगा था ।




मंगलवार, 20 सितंबर 2016

उबरना ही होगा इस लाचारगी से


इस बार उरी सीमा पर गोलियों और बम की आवाजों से किसी को सिहरन नही होती ।लेकिन जब यही आवाजें घर के अंदर जहां हम अपने को सबसे ज्यादा सुरक्षित समझते हैं सुनाई देती हैं तो डरना स्वाभाविक ही है हमारे सुरक्षित समझे जाने वाले सैन्य बेस पर चार आतंकी आए और फिर हमे घाव दे गये सोते हुए हमारे 18 जवानों को अकाल मृर्‍त्यु का ग्रास बनना पडा । अब तो लगता है कि हम इन घावों के अभ्यस्त से होते जा रहे हैं इन घावों से रिसते खून को येनकेन रोकने के लिए मानो हम दवा-पट्टी लेकर हमेशा तैयार बैठे हों
आतंकी घटनाओं मे अकाल मृत्यु के ग्रास बने अपने जवानों, अफसरों और नागरिकों को " शहीद " का दर्जा दे मानो फिर मौत की अगली दस्तक का इंतजार करने लगते हैं रोज--रोज होने वाले यह धमाके और फिर दिल को चीर देने वाली चीखों को मानो हम अपनी नियति मान बैठे हैं लगता है हर ऐसे हादसे के बाद लाशों को गिनने के लिए हम अभिशप्त हैं एक सन्नाटा सा पसरा है जहां किसी को कुछ सूझ नही रहा

इस घटना के बाद हमेशा की तरह उन्हीं शब्दों को फिर दोहराया जाने लगा है जो बार बार कहे जाने के बाद अपनी धार खो चुके हैं । अब तो जनसामान्य को भी महसूस होने लगा है कि यह चुने हुए शब्द मात्र समय को टालने व जनता के आक्रोश को ठंडा करने के हथियार बन कर रह गये हैं । अब फिर कहा जाने लगा है कि पाकिस्तान को बेनकाब किया जायेगा, उसे अलग थलग करने के सभी प्रयास किये जायेंगे, उसे एक आतंकवादी देश घोषित करवाने के प्र्यास जारी रहेंगे आदि आदि । लेकिन लोग इन सभी शब्दों के खोखलेपन को देख और समझ चुके हैं ।

भारी दवाब के बीच सेना प्रमुख दलवीर सिंह ने कहा है कि हम बदला जरूर लेंगे लेकिन समय और स्थान का चुनाव भी हम करेंगे । कुछ ऐसे ही शब्द पठानकोट हमले के बाद भी कहे गये थे । देश की जनता कुछ सख्त कार्रवाही देखना चाहती है जो कहीं नही दिखाई दे रही । देर-सबेर इस प्रवत्ति का दुष्प्रभाव सेना के मनोबल पर भी पडेगा ।

दर-असल गौर से देखें तो पाकिस्तान प्रायोजित यह आतंकवाद हमारी मानसिक कमजोरी पर बार बार चोट कर हमे आहत कर रहा है वह जांनता है कि अतीत की सैनिक असफलताएं अब इतिहास बन गई हैं 1965 हो या फिर 1971 या करगिल युध्द पारंपरिक युध्द शैली मे उसे मुंह की खानी पडी है आज के हालातों मे भी उसे शिकस्त दिवारों पर लिखी साफ दिखाई दे रही है लेकिन एक परमाणु सम्पन देश होने का जो तमगा उसने लगा दिया है, इससे वह अपने को ऊंचाई पर खडा देख रहा है
बार बार भारत को घाव देने के बाबजूद भारतीय सेना ने सीमाओं की हद नही लांघी इसे वह अपनी एक उपलब्धी समझने लगा है यहां तक कि करगिल युध्द मे भी भारतीय सेनाएं अपनी ही जमीन पर खडी थीं यह उसने स्वयं नंगी आंखों से देखा है
कहीं कहीं परमाणु अस्त्रों को वह भारत की लाचारगी का कारण मानने लगा है समय समय पर परमाणु युध्द की धमकी देने मे भी उसे कोई हिचकिचाहट नहीं भारतीय पक्ष को देखें तो शायद लाचारगी का यही कारण समझ मे भी आता है अन्यथा दुनिया की एक बेहतरीन विशाल सेना वाले देश का नित घाव खाना और आहत होना समझ से परे है
इसमे अब कोई संदे नही कि भारत को अगर इस प्रायोजित आतंकवाद को रोकना है तो पडोसी की इस धमकी से पार पाना ही होगा ऐसा भी नही कि युध्द रण्नीतियों की किताबों मे इसका कोई जवाब ही हो महाभारतकालीन चक्र्व्यूह जिसे एक अजेय व्यूह रचना समझा जाता रहा उसको भी भेदने की कला अर्जुन को मालूम थी इसी तरह आधुनिक युध्द कौशल मे भी ऐसा संभव है कि परमाणु शस्त्रों का जखीरा सिर्फ देखने की चीज बन कर रह जाए और उसका उपयोग ही संभव हो सके आक्रामक युध्द शैली अनेक संभावनाओं के रास्ते खोलती है वैसे भी गांधी के पदचिन्हों पर चलने वाले इस देश को अब यह समझ लेना चाहिए कि कभी चीन के राष्ट्र्पति माउत- -तुंग ने यूं ही नही कहा था कि " पीस क्म्स फ्रोम बैरल आफ गन " यानी शांति बदूंक की नाल से आती है आज वह देश सिर्फ समृध्दि के ऊंचे पायदान पर खडा है बल्कि दुनिया की एक ताकत भी है
बहरहाल अब समय गया है कि आतंक की इस दहशत से मुक्ति के लिए नितांत नई संभावनाओं पर विचार करें अगर ऐसा ही होता रहा तो आतंक के खिलाफ हम एक " कमजोर राष्ट्र " समझे जाने लगेंगे और फिर ऐसी घटनाएं कुछ और ज्यादा और भयावह होगीं । इस संदर्भ मे जरूरी है कि भारत दूसरे देशों से कुछ उम्मीद करने के बजाय स्वंय के बल पर कुछ ठोस करने का प्र्यास करे । आखिर देश की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है दुनिया के अन्य देशों की नही । अगर समय रहते न किया गया तो आतंक का काला साया पूरे देश को अपनी गिरफ्त मे ले लेगा और तब हम अपने को लाचारगी की स्थिति मे देख रहे होंगे



शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

सियासत के यह राबिनहुड





भागलपुर जेल से रिहा हुए बाहुबली नेता शहाबुद्दीन की रिहाई ने बिहार  की राजनीति को एक बार फिर गरमा दिया है । इस सियासी घमासान मे सत्तारूढ जेडीयू-आर.जेडी सरकार मे उथल पुथल मची है । बात सिर्फ इतनी भर नही । बल्कि  जेल से छूटते ही शहाबुद्दीन के इस वक्तब्य ने कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो " परिस्थितिवश मुख्यमंत्री " हैं जो जनता के नही, गठबंधन के नेता हैं" राजनीतिक पारे को उच्चतम बिंदु तक पहुंचा दिया है । किसी भी मुख्यमंत्री को यह बात क्यों पसंद आने लगी । अब खबर है कि नीतीश सरकार जमानत के खिलाफ उच्चतम न्यायालय जाने का मन बना रही है।

दर-असल इस बाहुबलि नेता की रिहाई इसलिए भी चर्चा और विरोध का विषय बनी हुई है क्योंकि जो कांड हुआ उसने बिहार सहित पूरे देश को हिला कर रख दिया था । 2004 मे 16 अगस्त को सीवान के एक व्यापारी चंद्रकेश्वर उर्फ चंदा बाबू के दो बेटों को अपहरण के बाद वीभत्स तरीके से तेजाब से नहला कर और उनके शरीर के टुकडे कर ह्त्या कर दी गई थी । कहा जाता है कि सबसे बडे बेटे राजीव रोशन को अपने भाईयों की वीभत्स मौत देखने के लिए मजंबूर किया गया और बाद मे एक्मात्र गवाह् बडे बेटे को सुनवाई के दौरान 16 जून 2014 को गोली मार कर ह्त्या कर दी गई ।

इसके अलावा सीवान मे पत्रकार राजदेव रंजन की दर्दनाक तरीके से हत्या के शक की सुई भी शहाबुद्दीन से ही जुडी थी । यह तो वह घटनाएं हैं जो देशभर मे मीडिया व राजनीतिक गलियारों मे चर्चा का विषय बनीं तथा जिन पर खूब सियासी रोटियां सेंकी गईं । लेकिन इस बाहुबली नेता के खाते मे तो न जाने कितनी हत्याओं, अपहरण व फिरौती के मामले दर्ज हैं जिनका हिसाब रखना भी आसान नहीं ।

बहरहाल बिहार की राजनीति मे शहाबुद्दीन की रिहाई क्या गुल खिलायेगी यह तो समय ही बतायेगा लेकिन इतना अवश्य है कि आतंक का प्रर्याय बने इस नेता ने देश के लोकतंत्र, न्यायापालिका व सरकारी रवैये पर जरूर गंभीर सवाल उठाये हैं । यही नही, मौजूदा राजनीतिक संस्कृर्ति मे अपराध व अपराधियों के बढते वर्चस्व पर भी सोचने के लिए मजबूर किया है । हम स्वीकार करें या न करें इस घटना ने देश के राजनैतिक भविष्य की तस्वीर को भी सामने रखा है ।

गौरतलब है कि आज हम जिस शहाबुद्दीन को राजनीति के मंच पर एक आतंक के रूप मे देख रहे हैं, वह 80 के दशक मे छोटे मोटे अपराध करने वाला एक छुटभैय्या अपराधी भर था । लेकिन किस तरह राजनीति ने उसे अपराध की दुनिया मे एक चमकता सितारा बना दिया, उसकी एक अलग ही कहानी है । यह कहानी देश की राजनीति के उस कुरूप चेहरे को सामने लाती है जिसे अब स्वीकार कर लिया गया है । वोट राजनीति के लोभ ने एक साधारण अपराधी को रातों रात आर.जे.डी का एक ऐसा ताकतवर नेता बना दिया जिसके आगे पूरा प्रशासनिक तंत्र नतमस्तक हो गया । क्या यह कम आश्चर्यजनक नही कि आज इस बाहुबलि के नाम से लोग सीवान को जानते हैं । उसके इजाजत के बिना यहां एक पत्ता भी नही हिल सकता । बडे बडे पुलिस अधिकारी उसे सलाम बजा कर अपनी नौकरी करते हैं ।

आज सवाल सिर्फ शहाबुद्दीन का नही है । ऐसे न जाने कितने अपराधी राजनीति की छतरी तले देश के प्रशासनिक तंत्र को चुनौती दे रहे है ।  आखिर क्यों हमारी ससंद व विधानसभाएं अपराधी तत्वों की शरणगाह बनती जा रही हैं । दरअसल हमने ईमानदारी से स्वंय के गिरेबां में झांकने का प्रयास कभी नही किया । कहीं ऐसा तो नही कि जाने- अनजाने इसमे हमारी भी भागीदारी रही हो ।
दरअसल कई बार हम अपने स्वार्थ में व्यापक सामाजिक हितों की अनदेखी कर देते हैं । हमारी सोच इतनी संकीर्ण हो जाती है कि हमे सिर्फ अपने जिले, शहर या मुहल्ले का ही हित दिखाई देता है और राबिनहुड जैसे दिखने वाले माफियों, गुंडों व बदमाशों को इसका लाभ मिलता है । अगर कोई अपराधी तत्व हमारे मुहल्ले की सड्कों व नालियों आदि का काम करवा लेता है और हमारे मुहल्ले का निवासी होने या किसी अन्य प्रकार के जुडाव से हमारे काम करवा लेता है तो हम उसके पक्ष मे आसानी से खडे हो जाते हैं । यहां हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि समाज के हित मे इसे ससंद या विधानसभा के लिए चुनना इस लोकतंत्र के भविष्य के लिए घातक होगा । ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेगें जहां समाज की नजर मे एक अपराधी,  मोहल्ले या शहर का "भैय्या " बन चुनाव मे जीत हासिल कर लेता है । दरअसल अपने तक सीमित हमारी सोच ऐसे लोगों का काम आसान करती है ।

हमारी इस सोच का इधर कुछ वर्षों मे व्यापक प्रसार हुआ है राजनीतिक अपराधीकरण मे हमारी यही सोच कुछ गलत लोगों को ससंद व विधानसभाओं मे पहुंचाने मे सहायक रही है । यही कारण कि ऐसे कई नाम भारतीय राजनीति के क्षितिज पर हमेशा रहे हैं । जिन्हें समाज का एक बडा वर्ग तो अपराधी , माफिया या बदमाश मानता है लेकिन अपने क्षेत्र से वह असानी से जीत हासिल कर सभी को मुंह चिढाते हैं ।
अब अगर हमे इन बाहुबलियों, माफियों, गुंडों व बदमाशों को रोकना है तो अपने संकीर्ण हितों की बलि देनी होगी । व्यक्ति का चुनाव समाज व देश के व्यापक हित मे सोच कर किया जाना चाहिए । अगर आपके लिए भैय्या बना उम्मीदवार समाज के बहुसंख्यक लोगों के लिए एक अपराधी तत्व है तो उसे आपको भी अपराधी ही मानना होगा । अन्यथा एक दिन यह भैय्ये लोकतंत्र  के चेहरे को पूरी तरह से बदरंग बना देगें ।