मंगलवार, 15 जुलाई 2014

सावन मे आस्था को ढोते कांवरिए






( L. S. Bisht ) - कंधे पर रंग बिरंगे कांवर, उसमे गंगा जल ढोते, रास्ते भर भक्ति और आस्था मे सराबोर नारे । शिवभक्तों की इस भीड को देख सोचना पडता है कि आखिर इनमे कौन सी शक्ति है । बच्चे, बूढे, स्त्री-पुरूष सभी नंगे पैर, पथरीली कच्ची-पक्की सडक पर नदी-नाले पार करते हुए, अंतत: सही समय तक तय कर ही लेते हैं अपना सफर । पांव मे फफोले, पैरों की ऐंठन, जख्म और तलवों की जलन, किसी की भी परवाह न करते हुए भगवान शंकर को अपना जल चढा कर ही दम लेते हैं ।
अटूट आस्था और भक्ति भावना से ओत प्रोत रंग बिरंगी झंडियों, फूल मालाओं से सजी अपनी कांवरों मे रखे ताम्रघट मे यह गंगाजल लेकर चल पड्ते हैं शिव को अर्पित करने के लिए ।माना जाता है कि सावन के महीने में भगवान शंकर का जलाभिषेक करना एक अलग महत्व रखता है । इनमे कठिन यात्रा की यह शक्ति है भक्ति और अटूट आस्था की । हमारे धर्म ग्रंथों मे इस बात का उल्लेख कई जगह मिलता है कि शिव भक्ति से मनोकामनाओं की पूर्ति सहज हो जाती है ।
शिव भक्तों की इस भक्ति और आस्था का एक कारण भगवान शंकर का सरल, सहज और दानी स्वरूप का होना भी है । अगर पल भर मे वह क्रोधित हो तांडव नृत्य कर सकते हैं तो भक्ति भावना से प्रशन्न हो कुछ भी देने मे जरा भी संकोच नही करते । रावण की भक्ति से प्रशन्न होकर उसे अमोघ शक्ति देने वाले तथा भस्मासुर को वर प्र्दान करने वाले भी यही भगवान शंकर हैं ।
इन भोले भंडारी में भारतीय जनमांनस की आस्था की जडें बहुत गहरी हैं । प्रत्येक काल मे यह श्रध्दा का केन्द्र रहे हैं । इन्हें नाराज करने का साहस देवताओं मे नही है । भगवान राम के अनन्य भक्त व रामचरित मानस जैसे महान ग्रंथ के प्रणेता तुलसीदास ने भी शिव वदंना की है ।
भवानी शंकरौ वंदे
श्रध्दाविश्वास रूपिणैं
याम्यां बिना न पश्यंति सिध्दा :
स्वान्त: स्थमीश्वरम ।
कंधों पर आस्था को ढोने वाले इन शिवभक्त कांवरियों का सबसे बडा मेला बिहार के वैधनाथ धाम मे लगता है । यहां सावन के महीने मे श्रावणी मेला के अवसर पर तथा शिवरात्रि मे लाखों कांवरियों की आस्था देखते बनती है । सुदूर गांव- कस्बों से चल कर अपना जल अर्पित करने यहां आते हैं ।
पदमपुराण के अनुसार रावण की कठिन तपस्या से प्रशन्न होकर भगवान शंकर ने अपने बारह ज्योतिर्लिगों में प्रमुख "कामना लिंग" रावण को वरदान स्वरूप दिया । परंतु इसके साथ यह शर्त भी थी कि जमीन पर रखने पर यह उसी स्थान मे स्थापित हो जायेगा । परंतु देवताओं ने चाल चली । रास्ते मे रावण को लघुशंका का आभास हुआ । वह ज्योतिर्लिंग एक ब्राहाम्ण को सौंप कर लघुशंका से निवृत्त होने के लिए कुछ कदम आगे बढा ही था कि ब्राहाम्ण के भेष मे खडे भगवान विष्णु ने वह ज्योतिर्लिंग पृथ्वी पर रख दिया तथा अंतरध्यान हो गये । तब से यह रावणेश्वर वैधनाथ के रूप मे पूजा जाता है ।
इस बारे मे एक और पौराणिक कथा भी है । सतयुग मे दक्ष की पुत्री तथा शिव की पत्नी सती ने अपने पिता के दवारा अपमान किए जाने पर आत्महत्या कर ली थी । भगवान शंकर क्रोधित हो ताडंव नृत्य करने लगे । तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र दवारा सती के शरीर को 52 टुकडों मे खंडित कर दिया । यह अंग देश के विभिन्न हिस्सों मे गिरे । माना जाता है कि सती का ह्रदय इस स्थान पर गिरा था । इसीलिए इस भूमि को ह्र्दयपीठ भी कहा जाता है ।
उत्तरप्रदेश के ही बाराबंकी जिले मे लोधेश्वर महादेव के मंदिर में आसपास जिले के कांवरिए कठिन यात्रा पूरी करते हुये अपना जल भगवान शंकर को अर्पित करते हैं । यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर आने वाले इन शिवभक्तों की संख्या बहुत अधिक है । माना जाता है कि इस शिवमंदिर की स्थापना महाभारत काल मे पांडवों दवारा की गई थी । यहां भक्तों की बढती संख्या को देखते हुए आयोजित किए जाने वाले मेले की प्रबंध व्यवस्था जिला प्रशासन ने अपने हाथों मे ले ली है ।
बुलंदशहर स्थित नानकेशवर मंदिर भी आसपास जिलिं के शिवभक्तों की आस्था का केन्द्र है । यहां भी हजारों की संख्या मे कांवरिए जल अर्पित करने आते हैं ।
यह यात्रा भी तीन प्रकार की होती है । सामान्य यात्रा, खडी कांवर तथा डाक कांवर यात्रा । सामान्य के लिए समय सीमा का बंधन नही होता । यात्रा सुविधानुसार कितने ही दिनों मे पूरी की जा सकती है । खडी यात्रा मे कांवरिये थोडी देर के लिए विश्राम कर सकते हैं । लेकिन कांवर को नीचे नही रख सकते । कोई अन्य शिवभक्त ही उसे अल्प समय के लिए ढो सकता है । डाक कांवर यात्रा सबसे कठिन तपस्या है । इसमें कांवर उठा लेने के चौबीस घंटों के अंदर बिना विश्राम किए यात्रा पूरी करनी पडती है । इस यात्रा को करने वालों को "डाक बम " कहा जाता है ।
इस कठिन तपस्या के पीछे है इन लोगों की अटूट भक्ति । यह शिवभक्ति ही इन्हें यात्रा के कष्टों से उपजी पीडा से  मुक्त रखती है । मन मे भगवान शिव की आस्था लिए हर साल गंगा जल लेकर निकल पड्ते हैं - सडक, जंगल , गांव कस्बों से होते हुए अपनी मंजिल की तरफ । भक्ति की यह धारा उनके मन-ह्र्दय मे हमेशा प्रवाहित होती है साल-दर-साल ।

सोमवार, 7 जुलाई 2014

उठने लगे हैं महिला हितों के कानूनों पर सवाल



( L. S. Bisht )  - अभी हाल मे उच्चतम न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि क्या दो व्यस्क लोगों के बीच सहमति से बना रिश्ता टूटने पर पुरूष के खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाया जा सकता है । इस पर न्यायालय ने कोई आदेश तो पारित नही किया, लेकिन इस तरह के मामलों मे चिंता जरूर जाहिर की । दरअसल इधर कुछ समय से कई मामले देखने को मिले हैं जिनमे रिश्ता खत्म होने के बाद महिलाओं ने पुरूषों के खिलाफ शादी का वादा करके सबंध बनाने पर बलात्कार का मामला दर्ज कराये हैं । 12 जुलाई,2013 को एक मामले मे फैसला सुनाते सुनाते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए टिप्पणी की थी कि ऐसे बहुत सारे मामले देखने को मिल रहे हैं, जिनमें महिलाएं सहमति से संबध बनाती हैं और फिर जब रिश्ता टूटता है तो वे कानून को बदला लेने के हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं । ऐसा पैसा उगाहने या फिर लड्के को शादी के लिए मजबूर करने के लिए भी किया जाता है । ट्रायल कोट्स के जज ऐसे मामलों सावधानी से परखें और चेक करें कि ये आरोप असली हैं या इसके पीछे और मकसद छिपा है ।
इसके ठीक दो दिन बाद दहेज के एक मामले की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने दहेज प्रताड्ना के एक  मामले मे बडी तादाद मे की जाने वाली गिरफ्तारी पर चिंता जताई है । न्यायालय ने क्हा है कि पुलिस जब भी ऐसे मामले मे गिरफ्तारी करे तो उसे निजी आजादी और सामाजिक व्यवस्था के बीच बैलेंस रखना जरूरी है । अदालत ने कहा कि दहेज प्र्ताडना से जुडा मामला चूंकि गैर जमानती है इसलिए कई बार लोग इसे हथियार बना लेते हैं ताकि वह पति और उसके रिश्तेदार को इसके जरिए गिरफ्तार करवा सकें । दहेज प्रताडना के ज्यादातर मामलों मे आरोपी बरी होते हैं और सजा दर सिर्फ 15 फीसदी है ।
अपनी टिप्पणी मे अदालत ने आगे कहा कि हाल के दिनों मे वैवाहिक विवाद मे इजाफा हुआ है । शादी जैसी संस्था प्रभावित जो रही है । दहेज प्रताडना कानून इसलिए बनाया गया कि महिलाओं को प्रताडना से बचाया जा सके । लेकिन कई बार लोग इसे गिरफ्तारी का हथियार बना लेते हैं । कई मामलों मे तो बिस्तर पकड चुके पति के दादा-दादी और विदेश मे रहने वाली बहन तक को निशाना बनाया जाता है और गिरफ्तार किया जाता है ।
दरअसल उच्चतम न्यायालय की यह टिप्णियां समाज के सच को बयां कर रही हैं । बदलते समय के साथ विकास के पथ पर अग्रसर हो रहे इस देश मे ऐसे कानूनों की आवश्यकता अनुभव की गई जिनसे महिला हितों को सरंक्षण मिल सके । इसमे दहेज ह्त्या व उत्पीडन को रोकने के लिए दहेज कानून बनाया गया जिसे गैरजमानती रखा गया । इसके बाद दिल्ली मे हुए बलात्कार कांड ने पूरे देश को हिला कर रख दिया । तब फिर बलात्कार संबधित कडे कानूनों की आवश्यकता महसूस की गई और सामाजिक दवाब मे सरकार ने बलात्कार से जुडे कानूनों को संशोधित कर धारदार बना दिया
लेकिन इस दोनो कानूनों को सख्त बनाये जाने के समय इस बात को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया कि अक्सर इस देश मे ऐसे कानूनों का दुरूपयोग भी होता है । इस चूक का परिणाम यह हुआ कि दहेज कानून ससुराल वालों व पति को प्र्ताडित करने का एक अचूक हथियार बन गया । अक्सर इस एक्ट मे दर्ज मामले फर्जी निकलने लगे । 2012 के आंकडों पर नजर डाली जाए तो देश भर मे धारा 498 ए मे एक लाख 97 हजार लोग गिरफ्तार हुए । यह 2011 के आंकडों से ज्यादा हैं । इनमे 93 फीसदी मामलों मे चार्जशीट भी हुई लेकिन सजा सिर्फ 15 फीसदी मामलों मे ही हो पाई ।
ऐसी ही कुछ बलात्कार संबधित कानूनों के साथ भी है । दिल्ली कांड की गूंज से भयभीत तत्कालीन कमजोर कांग्रेसी सरकार ने आनन फानन मे जो कानून बनाए और जिस तरह से बनाए, वह गैरजरूरी ही नही बल्कि विवादास्पद भी थे । जिसमे देखना, घूरना, छूना, इशारा करना और ऐसे ही न जाने कितनी बातों को जोड दिया गया । जिन्हें साबित करना ही कठिन होगा । देखने और घूरने मे अंतर करना तो और भी टेढी खीर है ।
इस समय आई.पी.सी की धारा 376ए के तहत अधिकतम फांसी की सजा हो सकती है । अगर बलात्कार संवधित कानूनों का गहराई से अध्ययन करें तो सारा मामला महिलाओं के पक्ष मे ही जाता है । दरअसल इस कानून की सबसे मजबूत लेकिन कमजोर कडी भी यह है कि ऐसे मामलों मे लड्की के बयान को अहम सबूत माना गया है । दूसरा यह कि ऐसे मामलों मे चाहे वह बलात्कार का हो या छेडछाड का, शिकायत के बाद पुलिस को अधिकार है कि वह आरोपी को गिरफ्तार कर ले यानी इन्हें संज्ञेय अपराध की परिधि मे माना गया है । इसमे एफ.आई.आर दर्ज करने के बाद बिना वारंट के भी आरोपी को गिरफ्तार किया जा सकता है ।
दरअसल सामाजिक दवाब मे और राजनीतिक लाभ लेने की होड से भी बनाये गये इन कानूनों मे आरोपी को तनिक भी सुरक्षा नही है । महिला वर्ग की वाही वाही लूटने की मानसिकता को रख कर बनाये गये इन कानूनों का दुरूपयोग भी हो सकता है, इस पर सोचने की जरा भी जहमत नही उठाई गई । आज इसका परिणाम सामने है । बात यहां तक पहुंच गई है कि लिव-इन-रिलेशेन मे कुछ समय अपने पुरूष मित्र के साथ, अपनी मर्जी से रहने वाली लड्की, आपसी खटपट होने पर लड्के के विरूध्द बलातकार का आरोप लगा देती है । यह लडकी से कोई नही पूछ्ता कि इस देश का कौन सा धर्म कौन सी संस्कृति किसी लड्की को बिना विवाह के संबध बनाने की आज्ञा देता है । क्या इस स्थिति से बचना उस लड्की का नैतिक कर्तव्य नही बनता । यही इस कानून की कमजोरी है । लड्का ही दोषी समझा जाता है ।
यही नही, नौकरी दिलाने के नाम किए गये शोषण के आरोपों की संख्या तेजी से बढी है । दरअसल यहां भी महिला के स्वार्थ को पूरी तरह से नजर-अदांज करते हुए मामला पुरूष के खिलाफ चला जाता है । अक्सर ऐसे मामले व्लैकमेल करने के लिए भी किए जाने लगे हैं । गांव-कस्बों मे आपसी रंजिस होना आम बात है । बदला लेने के लिए घर की महिला से छेडछाड की फर्जी रपट लिखा कर दूसरे पक्ष को परेशान करने की प्रवत्ति भी इधर देखने को मिली है ।
कुल मिला कर जल्दबाजी, भावुकता और मीडिया के शोर-शराबे के दवाब मे बनाए गए इन कानूनों के दुरूपयोग की बाढ आ जाने से न्यायालय को संज्ञान लेना पडा है । अब जरूरी है कि इन कानूनों का सही पंचनामा कर इन्हें संतुलित बनाया जाए । इसके साथ ही इसमे झूटी रपट लिखाने वाले को भी कडे दंड का प्राविधान रखना जरूरी है तथा जिसका फर्जी मामले के कारण् सामाजिक सम्मान आहत हुआ है उसे मुआवजा दिलाने का भी कानून रखा जाए । इन कानूनों के दुरूपयोग को रोकने के लिए यह जरूरी भी है ।

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

बढती जा रही हैं आत्महत्याओं की घट्नाएं

   

 ( L.S. Bisht )  -  आर्थिक विकास व तेजी से बदल रहे सामाजिक परिवेश के बीच देश मे मानसिक रोगियों व आत्महत्या के मामलों मे तेजी से वृध्दि हो रही है | आज हर पांच मे एक व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार है तथा नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार औसतन एक घंटे मे 15 लोग आत्महत्या कर रहे हैं | अभी तक यह माना जाता रहा है कि विकसित देशो मे ही व्यक्ति मानसिक रोगों का आसानी से शिकार हो जाता है लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि भारत मे ही लगभग 1 करोड लोग मानसिक रूप से बीमार हैं |
     मानसिक रोग सामान्यत: शर्रीर मे धीरे धीरे विकसित होते रहते हैं और समय रहते चेतावनी भी देते रहते हैं | लेकिन जानकारी के अभाव मे इन संकेतों को मनुष्य नही समझ पाता | यदि शुरूआती अवस्था मे ही इन रोगों का उपचार करा लिया जाए तो लगभग सत्तर फ़ीसदी से अधिक मामलों मे आसानी से रोगमुक्त होने की संभावना रहती है |
     विकास के लिए जूझते भारत जैसे विकासशील देश मे सामाजिक-मानसिक असंतुलनों का असर दिखना कोई असाधारण बात नही है | परन्तु चिंताजनक यह है कि अभी तक इस पहलू को गंभीरता से लिया ही नही गया है | वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन के अनुसार भारत अपने स्वास्थ्य बजट का 1 प्रतिशत से भी कम मानसिक स्वास्थ मे खर्च करता है जबकि दूसरे देशों मे यह 10 प्रतिशत, 12 तथा 18 प्रतिशत तक है |
     दर-असल शहरीकरण समाज के फ़ैलाव ने जीवन को जटिल बनाया है | सामाजिक-सांस्कृतिक स्त्रोत शिथिल हुए हैं और पारिवारिक संबधों को भी धक्का पहुंचा है | भारत जैसे विकासशील देशों में भौतिक उपलब्धियों के चलते तेजी से बदलता सामाजिक-आर्थिक परिवेश काफ़ी हद तक जिम्मेदार है | दूसरी तरफ़ इस ओर किए गये प्रयास आगे नही बढ पाये हैं | देश मे मानसिक उलझनें किस गति से लोगों को अपना शिकार बना रही हैं, इसका पता आत्महत्याओं के बढते आंकडों से ही चल जाता है | 2002 से 2012 तक के दशक मे आत्महत्याओं मे 23 प्रतिशत की बढोत्तरी दर्ज की गई है | 2002 मे जहां 1,10,417 लोगों ने इस कदम को उठाया वहीं यह सख्या 2012 मे 1,35,445 तक पहुंच गई |
     देश मे इस समय आत्मह्त्या की दर प्रति एक लाख मे 11.2 है | आत्महत्या के कारणों को जानने के लिए अब तक जो शोध हुए हैं, उनसे प्रमुख रूप से एक बात उभर कर सामने आई है कि मनुष्य भीषण मानसिक विषाद के दौर मे ऐसा करता है | इसमे संदेह नही कि भारतीय समाज मे मानसिक विषाद मे लगातार बढोत्तरी हो रही है | दर-असल जिस तरह से हमारा सामाजिक ताना बाना उपभोक्तावाद के चलते छिन्न-भिन्न हो रहा है, इससे चिंताएं और कुंठाएं बढी हैं | जो अंतत: दिमाग को अपना शिकार बना रही हैं |
     यहां गौरतलब यह भी है कि हमारे देश मे मानसिक विषाद से पीडित हो आत्महत्या करने मे दक्षिण भारत का हिस्सा काफ़ी अधिक है | 2012 के आंकडे बताते हैं कि तमिलनाडू आत्महत्याओं के मामले मे सबसे ऊपर है (16,927 ) उसके बाद महाराष्ट्र (16,112) पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश व कर्नाटक (12,753) | यानी इन पांच राज्यों मे कुल आत्महत्याओं का हिस्सा 55.3 प्रतिशत है | यहां यह अध्ययन का विषय है कि आखिर इन राज्यों मे मानसिक विषाद के कारण क्या हैं | आखिर यहां ऐसा क्यों हो रहा है |
     दक्षिण के इन राज्यों के अलावा उत्तर पूर्व के राज्यों : बंगाल, त्रिपुरा, सिक्किम व मिजोरम मे भी आत्महत्या की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है | उत्तर प्रदेश, पंजाब व बिहार जैसे उत्तरी राज्यों मे यह प्रतिशत औसत से कम है, लगभग 4 प्रतिशत | उत्तर प्रदेश एक इस मामले मे थोडा संतोष देता दिखाई देता है | देश की जनसंख्या मे 16.9 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले इस राज्य की आत्महत्याओं के मामलों मे हिस्सेदारी मात्र 3 प्रतिशत है जबकि राष्ट्रीय दर 11.2 है |
     इस संबध मे गौरतलब यह भी है कि देश के बडे शहरों मे स्थिति लगातार चिंताजनक होती जा रही है | यहां पर भी चैन्नई सबसे अधिक चिंताजनक स्थिति मे दिखाई देता है | इसके बाद बंगलूरू ,  दिल्ली व मुंबई का नम्बर आता है | इसका सीधा सा मतलब है कि देश के बडे शहरों मे तनाव बढता जा रहा है | गौर से देखें तो हमारे शहरों की रोजमर्रा की जिंदगी मे भी यहां तनाव साफ़ झलकने लगा है |
     अपनी ही जिंदगी से मायूस हो दुनिया से अलविदा कहने के कारणों की पडताल करें तो पता चलता है कि इसके दो मुख्य कारण हैं – पारिवारिक समस्याएं व बीमारी | कुल की जाने वाली आत्महत्याओं मे इनका प्रतिशत क्रमश: 25.6 व 20.8 है यानी 46 प्रतिशत आत्महत्याओं के पीछे यही दो मुखय कारण हैं | ऊपरी तौर पर हम जिन कारणों को अधिक जिम्मेदार मानते आये हैं, वह वास्तव मे हैं नही | दहेज ( 1.6 प्रतिशत ) गरीबी (1.9 प्रतिशत ) व प्रेमसंबध (3.2 प्रतिशत ) आदि के कारणों से बहुत कम लोग आत्महत्या करते हैं |
     बहरहाल इसमे कोई संदेह नही कि आर्थिक विकास के साथ जिंदगी की जटिलताएं भी बढ रही हैं और दिमाग की उलझनें भी | बढती महत्वकाक्षाएं, एक्ल परिवार व आत्मकेन्द्रित जीवन शैली आग मे घी का काम कर रही हैं | शहरों मे मष्तिक मे बढता द्वाब रोजमर्रा की जिंदगी मे दिखाई देने लगा है | इसलिए यह जरूरी है कि मानसिक स्वास्थ्य को चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाए तथा दिमागी उलझनों पर अध्ययन किया जाना भी आवश्यक है | इन्हें रोक पाना या कम कर पाना तभी सभव है जब कारणों का सही विश्लेषण हो सके | सबसे जरूरी है मानसिक उपचार की दिशा मे गंभीर प्रयास किए जायें | इससे कई लोगों को उस आखिरी बिन्दु तक जाने से पूर्व ही रोक पाना संभव हो सकेगा 

रविवार, 22 जून 2014

भाषाई राजनीति मे भटक गया गांधी का सपना

      


 ( L.S. Bisht ) -भाषा के सवाल को लेकर एक बार फ़िर वही घमासान दिखाई देने लगा है जो कभी साठ के दशक मे दिखाई दिया था | इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि अंग्रेजों की गुलामी  से मुक्त होने के बाद जब जब अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी को सम्मान व गौरव देने की बात उठाई गई, तब-तब इस देश मे भाषाई राजनीति शुरू हो गई | विरोध के इन स्वरों का केन्द्र हमेशा दक्षिण भारत ही रहा है | आज भी तमिल राजनीति इसके विरोध मे खडी दिखाई दे रही है | इस राज्य की पहल पर फ़िर अन्य भाषाई राज्यों मे भी हिंदी के विरोध की सुगबुगाहट शुरू हो जाती है | तमिल, मलयालम, मराठी, गुजराती व अन्य भाषाओं को लगने लगता है कि उनका वजूद खतरे मे पड रहा है या उन्हें दूसरे दर्जे का स्थान देने का प्रयास किया जा रहा है |
     यहां गौरतलब यह भी है  कि विरोध का यह शोर कहीं से भी तार्किक प्रतीत नही होता | केन्द्र सरकार द्वारा जारी परिपत्र को अगर गंभीरता व ध्यान से, पूर्वाग़ृहों से मुक्त हो कर पढा जाये तो उसमें हिंदी के  प्रचार- प्रसार के लिए प्रयास करने की बात तो कही गई है परन्तु ऐसा कुछ नही है कि अन्य भाषाओं को बलपूर्वक पीछे धकेला जा रहा हो | ऐसे मे यह एक अनावश्यक विवाद ही जान पड्ता है | लोकतंत्र मे भाषा के नाम पर अपनी क्षेत्रीय राजनीति चमकाने व अपने वोट बैंक को मजबूत करने का इससे अच्छा उदाहरण दूसरा नही मिल सकता |
     एक तरफ़ हम देश के विकास की बात करते हैं और प्रत्येक क्षेत्र मे अपने स्वयं के साधनों द्वारा और अपने प्रयासों से ही आगे बढने की वकालत करते हैं | अपनी ‘ पूरब की संस्कृति ‘, धर्म, अध्यात्म व संस्कारों का बखान करते हुए यूरोपीय देशों को कमतर आंकते हैं परन्तु जब बात हिन्दुस्तान मे हिंदी की आती है तो सारा राष्ट्रीय प्रेम उडन छू होता दिखाई देने लगता है | और फ़िर भाषा को लेकर सभी अपनी-अपनी ढपली बजाने लगते हैं | यह कैसा देश प्रेम है, समझ से परे है |
     यहां यह स्मरण करना भी जरूरी है कि यदि हम गांधी  के सपनों का भारत बनाने का संकल्प बार-बार दोहराते हैं तो हमे भाषा के सवाल पर भी उनके विचारों को समझना होगा | 29 मार्च 1918 को इंदौर मे हिंदी साहित्य सम्मेलन के आठवें अधिवेशन मे गांधी जी ने कहा था “ भाषा हमारी मां की तरह है | पर हमारे अंदर मां के लिए जितना प्यार है उतना इसके लिए नही | दर-असल इस तरह के सम्मेलनों मे मुझे कुछ खास दिलचस्पी नही है | तीन दिन का यह तमाशा कर लेने के बाद हम अपनी अपनी जगह वापस चले जायेंगे और यहां जो कुछ कहा और सुना गया है, सब भूल जायेगे | जरूरत तो काम करने की, लगन और निश्चय की है | “
     गौर करें यह बातें आज भी उतनी ही प्रांसगिक हैं जितनी उस समय थी | हिंदी के शुभचिंतक कहे जाने वाले कितने ही आज भी सम्मेल्नों व जलसों तक हिंदी को कैद रखे हुए हैं | गांधी जी ने हिंदी की वकालत की तो इस्के पीछे उनकी अपनी विचारधारा थी |वे देश की, यहां के नागरिकों की जरूरत समझते थे | आज की तरह नही कि हिंदी भाषी इसलिए इसका समर्थन करता है क्यों कि वह हिंदी बोलता है | तमिल या कोई दूसरा इसलिए विरोध करता है क्योंकि वह हिंदी नही बोलता | अंग्रेजी बोलने वाला इसलिए विरोध करता है क्योंकि वह अंग्रेजी ही बोलता-लिखता है |
     कलकत्ता (कोलकता) मे 23 जनवरी,1929 मे दिये गए भाषण मे गांधी जी ने कहा था “ आपको और मुझको और हममें से किसी को भी, सच्ची शिक्षा नही मिलने पाई जो हमे अपने राष्ट्रीय विध्धालयों मे मिलनी चाहिए थी | बंगाल के नौजवानों के लिए, गुजरात के नौजवानों के लिए, दक्षिण के नौजवानों के लिए यह संभव ही नही है कि वह मध्यप्रदेश मे जा सकें, सयुंक्त प्रांत मे जा सकें जो सिर्फ़ हिन्दुस्तानी ही बोलते हैं | इसलिए मैं आपसे कहता हूं कि अपने फ़ुरसत के घंटों मे आप हिन्दुस्तानी सीखा करें| अगर आप सीखना शुरू कर दें तो दो महीने मे सीख लेगें | उसके बाद आपको पूरी छूट है अपने गांवों मे जाने की, पूरी छूट है सिर्फ़ एक मद्रास को छोड बाकी सारे भारत मे खुल कर विचरने की और हर जगह के आम लोगों से अपनी बात कह सकने की | यह तो एक क्षण के लिए भी आप न समझ बैठें कि आम जनता तक अपनी बात पहुंचाने की आम भाषा के रूप मे आप अंग्रेजी का इस्तेमाल कर पाएंगे |
     आज हमे यह सोचना है कि हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने के पक्ष मे दिए गए यह तर्क क्या प्रासंगिक नही हैं ? क्या यह सच नही है कि देश के एक बडे हिस्से मे आज भी हिंदी ही बोली जाती है |
     अंग्रेजी की तरह अन्य प्रान्तीय भाषाओं का भी विरोध गांधी जी ने कभी नही किया बल्कि वे दक्षिण की सभी भाषाओं को संस्कृत की ही बेटियां मानते थे | उनका मानना था कि इन्हें भी फ़लने-फ़ूलने का पूरा अवसर मिलना चाहिए | परन्तु सभी लोगों की संपर्क भाषा हिंदी हो इसका प्रयास वे हमेशा करते रहे |
     अब इसे इस देश का दुर्भाग्य नही तो और क्या कहा जाए कि गांधी के सपनों का भारत बनाने की वकालत करने वाले हिंदी के नाम पर एक अल्ग ही सुर अलापने लगते हैं | क्या यह सच नही कि राष्ट्र्भाषा के रूप मे हिंदी की जो कल्पना गांधी जी ने की थी, उससे अभी हम कोसों दूर हैं बल्कि अंग्रेजी व प्रान्तीय भाषाओं को लेकर आज भी उलझे हुए हैं |

     दर-असल अब हिंदी के नाम पर राजनीति की जाने लगी है | मौजूदा विरोध का एक्मात्र कारण भी यही है | अन्यथा इस तथ्य से मुंह नही मोडा जा सकता कि एक संपर्क भाषा के रूप मे हिंदी ही इस देश मे अधिक प्रभावी है | हमे इस बात को भी स्वीकार करना ही होगा कि यह देश सिर्फ़ अपनी ही भाषा और संस्कृति के बल पर ही आगे बढ सकता है | साथ ही अगर हम गांधी जी के सपनों के भारत की बात करते हैं तो हमे भाषा के सवाल पर भी उनके विचारों को पूरा करना ही होगा | राजनैतिक फ़ायदों के लिए अनावश्यक भाषाई विवाद इस देश के हित मे तो कतई नही है | 

शुक्रवार, 20 जून 2014

पहाड जाने वाली सडक

        
 ( L.S.Bisht ) -चंद दिनों के सैर-सपाटे के बाद, न चाहते हुए भी अंतत: विदाई लेनी ही पडी अपने पहाडों, वादियों और हरे भरे जंगलों से | लौटना ही था इक ऐसे शहर मे जिसका जन्म और कर्म दोनो से ही गहरा जुडाव रहा है मेरी जिंदगी से |  लेकिन उन पहाडों और घाटियों की तरफ़ पीठ करके राजधानी आने वाली सडक पर आना मेरे लिए कभी भी इतना आसान नही रहा | यह हमेशा मेरे लिए बेहद भावुक लम्हे रहे हैं | पहाड के यह सीढीदार खेत और मकान चाहे कितने ही छोटे क्यों न हों , अपनेपन का एहसास तो दिलाते ही हैं | यह हमारे पुरखों की उस इतिहास को जीवंत रखते हैं जो कभी इन घाटियों , जंगलों और पहाडों से जुडे रहे हैं | रिश्तों की विरासत की यह डोर बरसों बरस बाद भी कहीं से कमजोर नही दिखती | शायद अपनी मिट्टी, खेतों, जंगलों, झरनों और नदियों से यह जुडाव  ही मुझे  खींचता रहा है | सिर्फ़ मैं ही नही, मेरी उम्र के तमाम लोग जो हिमालय क्षेत्र की इन वादियों से कहीं दूर आ बसे हैं ,इस संवेदना को पूरी शिद्दत के साथ महसूस करते हैं |
          दर-असल पहाड की यह त्रासदी रही है कि हिमालय का यह अंचल प्राकृतिक सौंदर्य की द्र्ष्टि से चाहे कितना ही समृध्द क्यों न रहा हो लेकिन रोजगारविहीन तथा सुविधाओं की कमी और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां यहां के वाशिंदों के पलायन का कारण बनी हैं | जिस तरह पहाडी नदियां अपने साथ वहां की उपजाऊ मिट्टी को बहा कर मैदानों पर लाती हैं ठीक  वैसे ही रोजगार के लिए लोगों का पलायन आजादी के बाद से बदस्तूर जारी रहा | राजधानी आने वाली सड्कों का मोह उन्हें दिल्ली, लखनऊ और मुंबई जैसे शहरों की तरफ़ ले तो आता है लेकिन फ़िर यह शहर व महानगर उन्हें अपने मोहपाश मे ऐसा बांध लेते हैं कि अपनी मिट्टी से उनका नाता टूटने और बिखरने लगता है | न चाहते ह्ये भी वह वहीं का होकर रह जाता है | और फ़िर अपने ही पहाडों से उसका रिश्ता उन चंद दिनों तक सीमित होकर रह जाता है जब वह गर्मियों मे बच्चों के स्कूल की छुट्टियों मे यहां आता है और फ़िर एकदिन छुट्टियां खत्म होने पर  भारी मन से उसे लौटना ही पडता है अपने उस शहर की ओर जो उसकी बेहतर जिंदगी के सपनों से जुडे हैं |
     वीरांन होते पहाड के गांव इस त्रासदी के गवाह हैं | यह एक ऐसी सच्चाई है जो किसी सरकारी आंकडों की मोहताज नहीं | पुरूष विहीन होते पहाड की ढालों मे बसे हजारों गांव इस  सच के स्वंय गवाह हैं | सपनों के यह शहर रफ़्ता-रफ़्ता उन्हें वह सबकुछ  तो देते हैं जिनकी चाह मे उसने कभी अपने गांव, जंगलों को अलविदा कहा था लेकिन एक उम्र गुजर जाने पर उसे फ़िर अपनी जडों की याद सालने लगती है | याद आने लगते हैं बचपन कि दिन, संगी साथी , सीढीदार छोटे-छोटे खेत, चीड, शाल और देवदार के जंगल, आंचलिक कहानियों को समेटे सुरीले लोकगीत | लेकिन नगरों-महानगरों मे बसे बहुत कम ही लोग अपनी जमीन से दोबारा जुड पाते हैं | एक बडी संख्या उस शहर की होकर रह जाती है जहां बेहतर जिंदगी के जिद्दोजहद मे उसने अपनी उम्र के कई द्शक होम कर दिए और फ़िर आने वाली पीढियों के लिए तो वापसी मानो एक सपना बन कर रह जाती है
      उत्तराखंड कहे जाने वाले हिमालय के इस अचंल के वाशिदों की इस भावनात्मक पीडा की एक अलग ही अनकही कहानी है लेकिन अलग राज्य के बाद कुछ उम्मीदें जगी हैं | धीरे धीरे विकास की सीढियां चढता यह सीमांत प्रदेश एक दिन संभवत: रोजगार की इतनी संभावनाएं विकसित कर सकेगा कि भविष्य मे पहाड से मैदानों की तरफ़ पलायन स्वत: ही खत्म होने लगे | बहरहाल जब तक यह संभव नही, तब तक  मेरी तरह वादियों के इन वाशिदों को भी पहाड जाने वाली सडक हमेशा रोमांचित  और आकर्षित करती रहेगी | 

11/508, Indira Nagar,

Lucknow 

शुक्रवार, 13 जून 2014

हाथों से दूर होती किताबें

      
( L.S. Bisht ) -  हम जानबूझ कर सच्चाई से मुंह न मोडना चाहे तो यह्बात स्वीकार कर ली जानी चाहिए कि आज जो उप्भोक्तावादी संस्क्रृति हमारे चारों तरफ़ विकसित हो रही है उसमे किताबों का बाजार तेजी से सिमटता जा रहा है | कपडों के फ़ैशन की बात हो या फ़िर अपने चेहरे मोहरे को सजाने संवारने की या फ़िर फ़र्राटेदार गाडी मे हवा से बात करने हुए जमाने से भी आगे निकल जाने की, इन सभी के प्रति तो हम काफ़ी जागरूक हुए हैं | लेकिन पढने-पढाने की प्रवत्ति तेजी से घट रही है |वरना और क्या कारण हो सकता है कि जहां एक तरफ़ नये नये उपभोक्ता वस्तुओं का बाजार खूब फ़ल-फ़ूल रहा है वहीं दूसरीतरफ़ रोज एक नया बुक स्टाल खुलता है और जल्द ही परचून की दुकान मे तब्दील हो जाता है |
     आज हालात यह हैं कि पूरा बाज्रार घूम आइए सजी धजी दुकानों मे सबकुछ मिल जाएगा लेकिन कहीं कोई ऐसी दुकान शायद ही मिल सके जहां आप अपनी जरूरत की साहित्यिक किताबें या कुछ स्तरीय पत्रिकाएं खरीद सकें | अल्बत्ता किसी कोने मे फ़ुटपाथ पर लावारिश सी पडी कुछ पत्रिकानुमा चीजें भडकीले कवर पृष्ठों के साथ जरूर दिख जायेगीं |
     बाजार से हट कर अगर हम अपने घर की दुनिया को भी थोडा गौर से देखें तो पता चलेगा कि  यहां भी पत्र-पत्रिकाएं व पुस्तकें गैरजरूरी चीजें समझी जाने लगी हैं| तुर्रा यह कि मंहगाई का रोना रोते ह्ये हम फ़्रीज, टी वी, एअरकंडीशन तो खरीद सकते हैं लेकिन एक किताब नही | बाजार मे उप्भोक्ता वस्तुओं की कीमतों का ग्राफ़ जरा भी ऊपर गया नही कि हम घरेलू खर्चों मे कटौती की बात सोचने लगते हैं और तब सबसे पहले हमारा ध्यान  जाता है हर माह या सप्ताह आने वाली पत्रिकाओं पर | इससे हम नाता तोड लेना ज्यादा बेहतर समझते हैं |
     उसके बाद जरूरी हुआ तो कटौती की कैंची चलती है रोज सुबह आंगन मे गिरने वाले अखबार पर और इस तरह इन्हें अपने घरेलू बजट से बाहर कर हम चैन की सांस लेते हैं मानो मंहगाई की मार पर हमने सफ़ल हमला कर उसे पराजित कर दिया हो | पढने की आदत से छुटकारा पाने की यह प्रवत्ति तेजी से विकसित हुई है और अब तो शायद हम भूल ही गए हैं कि किताबें कभी हमारी जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करती थीं |
     कम्प्यूटर और इंटरनेट ने भी किताबों को कम नुकसान नही पहुंचाया | जब एक क्लिक पर पूरी दुनिया की जानकारी आपकी आंखों के सामने हो तो भला किताबों के पन्ने पलटने की जहमत कौन उठाना चाहेगा | लेकिन छ्पे शब्दों को पढने वाले लोगों को पता है कि कागज पर छ्पे शब्दों और स्क्रीन पर चमकते शब्दों मे क्या अंतर है | वह बात कहां | अगर सिर्फ़ यही कारण होता तो दर्जनों न्यूज चैनलों के रहते अखबार कब का दम तोड चुके होते | लेकिन ऐसा तो नही हुआ | अखबार आज भी सुबह की जरूरत बना हुआ है | इसका सीधा सा मतलब है कारण कहीं और भी हैं |
     थोडा पीछे मुड कर देखें तो बहुत समय नही गुजरा जब प्रदेश मे इलाहाबाद, बनारस व लखनऊ जैसे शहर साहित्यिक गतिविधियों के केन्द्र माने जाते थे | यहां से  न सिर्फ़ श्रेष्ठ व स्तरीय साहित्य का प्रकाशन होता था अपितु उसे पाठकों तक पहुंचाने के लिए पुस्तकालयों व पुस्तक केन्द्रों का एक जाल सा बिछा था | किसी भी नई किताब पर चर्चा न हो यह असंभव था | अब न तो ऐसी दुकाने रहीं और सार्वजनिक पुस्तकालयों की दुर्दशा की तो अपनी कहानी है | आलम यह है कि यह बचे खुचे पुस्तकालय युवक-युवतियों के मिलन स्थल बन कर रह गये हैं |
     इधर कुछ वर्षों से शहरों मे जो बडी बडी आवासीय योजनाएं बनी हैं उनमे दो चीजें नदारत मिलेंगी | एक है सार्वजनिक शौचालय दूसरा पुस्तकालय | बाकी शापिंग माल्स, मल्टी फ़्लैक्स, आइसक्रीम पार्लर, ब्यूटी पार्लर, साइबर कैफ़े और यहां तक कि बार भी आसानी से दिख जायेंगे |
     कुल मिला कर आज स्थिति यह है कि पुस्तकें समाज से दूर हो रही हैं | इसे यह भी कहा जा सकता है कि समाज ही किताबों से दूर हो रहा है | कभी कधार पुस्तक मेलों का आयोजन भी किया जाता है लेकिन वहां भी चहल कदमी करने वालों की ही संख्या ज्यादा दिखाई देती है | किताबों के शौकीन कम ही नज्रर आते हैं | फ़िर भी ऐसे आयोजन जरूरी हैं | कम से कम कुछ पाठकों को तो किताबें सुलभ हो ही जाती हैं |
     सवाल सिर्फ़ किताबों या पैसों का ही नही है बल्कि सम्मूर्ण बौध्दिकता और संस्कृति का है | इससे बडा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि जहां कभी किताबें आम आदमी की जिंदगी का हिस्सा रही हों वहीं आज पाठक अच्छे साहित्य से दूर खडा दिखाई देता हो | यहां तक कि छात्र भी अपनी पाठय पुस्तकों को छोड कुछ और पढना न चाहते हों | समाज और किताबों के बीच बढ्ती इन दूरियों पर आज एक गंभीर चिंतन की आवश्यकता है | प्र्काशन से लेकर बाजार व्यवस्था तक के पूरे तंत्र की पडताल की जानी चाहिए | इस विषय पर भी सोचा जाना चाहिए कि आखिर पुस्तक प्रकाशन क्यों घाटे का व्यवसाय बनता जा रहा है | जब कि हमारे गांव-कस्बों व शहरों मे आज भी करोडों पाठक हैं |
     कुचक्र मे फ़ंसी किताबों की दुनिया की उलझनों को समझने के लिए हमे आज के परिवेश को भी समझना होगा | यह सच है कि आज दूरदर्शन ने एक ऐसा तिलिस्म रच लिया है जिसके बाहर सब्कुछ बदरंग सा दिखने लगा है | रही सही कसर पूरी की है हमारे हिन्दी सिनेमा ने | इसके साथ ही आम भारतीय के सुधरते जीवन स्तर पर पाश्चातय संस्कृति की छाप ने भी कम नुकसान नही पहुंचाया | लेकिन इन रंगीन आकषर्णों व बदलाव के बीच पढने की आदत भी समान्तर रूप से साथ-साथ रही होती अगर लेखक , प्रकाशक व प्रिन्ट मीडिया ने अपनी भूमिका का निर्वाह ईमानदारी से किया होता |  दोष दूरदर्शन  या सिनेमा का नही बल्कि प्रकाशन से जुडे उस तंत्र का है जो बदलाव की बयार मे शुतुर्मुगी सिरगडाऊ युक्तियों से बचने का प्रयास करता रहा है | और आज भी एक विधवा की तरह विलाप कर रहा है |
     आज लेखक को न पढे जाने का दुख है तो प्रकाशक को किताबें न बिक पाने की चिंता | हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का रोना इस बात पर है कि हिन्दी के पाठक स्तरीय और गंभीर साहित्य पढना ही नही चाहते | सवाल उठता है कि यह स्थिति मराठी, मलयालम या बंगला जैसी दूसरू भाषाओं के साथ क्यों नही है | हिन्दी जैसी भाषा जिसके पास एक विराट आकाश है पाठक को नही तलाश पा रही है |
     बहरहाल किताबों की दुनिया कई कुचक्रों मे फ़ंसी दिखाई देती है | अब तो पत्र-पत्रिकाओं का पूरा मिजाज ही बदल चुका है | पाठकों मे पढने के संस्कार डालने जैसी भूमिका से प्रिन्ट मीडिया पूरी तरह से दूर हो चला है | जो बिके वही छापो की नीति अपनाई जा रही है | अब वह चाहे अशलील हो या फ़ूहड, इससे कोई लेना देना नही | कभी अखबारों मे सामयिक लेख, फ़ीचर , कहानी व कविता आदि प्रकाशित हुआ करते थे, अब आधे-अधूरे कपडों मे युवतियों की फ़ोटो , युवाओं के नाम पर सिर्फ़ फ़ैशन या आधुनिकता की बे-सिर पैर की बातें | आखिर यह सब परोस कर क्या उम्मीद की जा सकती है कि यह पीढी आगे चल कर गंभीर साहित्य का पाठक बनेगी | अगर नई पीढी मे अच्छा पढने के संस्कार विकसित करने हैं तो दैनिक पत्रों व पत्रिकाओं को वापस लौटना होगा | अगर इस दिशा मे गंभीरता से न सोचा गया तो एक दिन  किताबो का जादू हमेशा के लिए खत्म हो जाऐगा |

     

रविवार, 8 जून 2014

कुछ दर्द हैं वादियों के भी

     

       ( L.S. Bisht ) - मैदानों की उमस भरी गर्मी से बेदम हमे याद आने लगती हैं पहाड की रूमानी तस्वीर यानी खूबसूरत वादियां, हिमाच्छादित चोटियां और हरे-भरे ज़ंगल | चन्द दिनों के लिए ही सही, हम पहाड की इन खूबसूरत वादियों मे खो जाने का सपना लिए निकल पड्ते हैं | ऐसी ही हर साल सैलानियों की भीड वहां पहुंचती है और पहाड की वादियां देसी विदेशी सैलानियों के कह्कहों से गूंजने लगती हैं | 
     लेकिन रूमानी सपनों से अलग सच्चाई की जमीन पर खडे होकर देखें तो सपनों का यह पहाड अब बहुत बदल गया है | आसपास की वादियां धीरे धीरे अपना सौन्दर्य खो रही हैं | हरे भरे जंगल उजाड हो रहे हैं और साथ ही यहां के सांस्कृतिक परिवेश पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे हैं |
     दर-असल पहाड की यह त्रासदी रही है कि उसकी पहचान हिल स्टेशन के रूप मे बनी | आजादी के पहले भी पहाड हिलस्टेशन थे | अंग्रेजों ने यहां की गर्मी से राहत पाने के लिए कई ठंडे सैरगाहों की खोज की | 1815 से औपनिवेशिक शासन के अंत तक लगभग 80 हिलस्टेशन बनाए | जो यूरोपीय आबादी और व्यापार के प्रमुख केन्द्र थे | जैसे दिल्ली के पास शिमला, मसूरी व नैनीताल, मुम्बई के पास पुणे, महाबलेश्वर और द्क्षिण मे उटकमंड आदि | यह हिलस्टेशन इस तरह से बसाए गए कि स्थानीय आबादी और साधनों पर उनका पूरा अधिकार हो |
     यही नही, इन लोगों ने मकानों, नदी-नालों व स्कूली क्षेत्रों का भी भूगोल ही बदल दिया | यही कारण है कि आज इतने वर्षों बाद भी यहां तमाम नामी पब्लिक स्कूल हैं |
     वस्तुत: आज जितने भी हिल स्टेशन हैं वे सभी अंग्रेजों के सैरगाह थे | परन्तु हिल स्टेशन बने इन पर्वतीय स्थलों के प्रति उनका नजरिया भोगवादी रहा | पहाड की ठंड व सौन्दर्य का भोग लगा उसे कूडेदान की तरह बेतरतीब छोड आना इन हिल स्टेशनों की नियती थी | लेकिन गौरतलब यह है कि आजादी के बाद भी यह नजरिया बहुत बदला नही है |
     पहले पहल अंग्रेजों की इस परंपरा को जारी रखने वाला एक छोटा सा उच्च वर्ग था लेकिन वक्त के साथ यहां आने वाले सैलानियों की संख्या बढ्ती गई | सरकारी नौकरी मे यात्रा भ्रमण की सुविधा का लाभ उठाने वाले बाबूओं से लेकर एअरकंडीशन डिब्बों मे ‘ सरकारी दौरे ‘ मे आने बाले ‘ साहबों ‘ के लिए गर्मियों मे यहां आना अब एक फ़ैशन सा बन गया है |
     पहाड को देखने वाली नजरें भी रोमांटिक रही हैं | यही कारण है कि आज भी पर्यटक चाहे वह किसी भी वर्ग का हो, एक खास नजर से पहाड को देखता है | वहां वह उस दुनिया को तलाशता है जो उसने सिनेमा के पर्दे या बडे घरों की दीवारों पर लगी पेटिंग मे देखा है |
     पहाड की हिमाच्छादित चोटियां और खूबसूरत वादियां उसे रोमांचित करती हैं | वह घोडों पर चढ कर गहरी घाटियों को देखता है, बहते हुए झरनों के साथ खेलता है और कैमरे मे पहाड को कैद करता है | हरे-भरे जंगलों मे हनीमून के एकान्त का सुख भोगता है | इस तरह हिल स्टेशन के रूप मे पहाड को भोग कर सैलानी वापस आ जाता है अपने मुकाम पर | वहां रह जाता है उसके अविवेक क्रियाकलापों का सबूत, रौंदी हुई फ़ूलों की घाटी, जहां तहां पडे डिब्बे व जूठन और शराब की खाली बोतलें |
     यही नही, चंद दिनों के लिए बसने वाली पर्यटकों की इस दुनिया का ही परिणाम है यहां के स्थानीय लोगों मे जी हुजूरी की प्रवत्ति बढती जा रही है | चंद पैसो के लिए अब यहां का वाशिन्दा मुस्कुराहट चिपकाए विनम्र मुद्रा मे खडा आने वाले सैलानियों का इंतजार करता है | तमाम जलालत भुगतने के बाद मिले चद रूपयों, शराब की बोतलों तथा बख्शीश या ‘ ईनाम-किताब ‘ को वह अपनी बडी उपलब्धी मानने लगा है |
     यही नही, पर्यटकों का स्वच्छंद व उन्मुक्त व्यवहार यहां की युवापीढी को आकर्षित करता है | परिणामस्वरूप हिलस्टेशन बने पहाड के छोटे शहरों मे वह सभी बुराईयां आने लगी हैं जो अब तक मैदानी शहरों तक सीमित थीं | पर्यट्कों की चकाचौंध अमीरी व ठाठ से सम्मोहित हो वह भी महानगरों मे आने को मचलने लगता है |
     गर्मियों मे सैरगाह बने पहाड की पीडा को देखना हो तो मसूरी, अल्मोडा या नैनीताल चले आइए लेकिन रोमाटिंक नजरों से देखने वाली आंखों से नही दिखेगी यह पीडा | अपने ‘ साब लोगों ‘ तथा हनीमून मनाने आए जोडों के लिए स्थान जुटाने की चिंता मे किस तरह स्वंय बेघर हो जाते हैं यहां के वाशिंदे | ऊंचे किराये पाने के लोभ मे किस तरह स्वंय कहीं अंधेरे कोने मे दुबक जाते है यह लोग | यह सब चन्द पैसों के लिए | एक तरह से इन शहरों मे स्थानीय लोगों का सामाजिक जीवन बुरी तरह से अस्त व्यस्त हो जाता है | सारी गतिविधियां अपने पर्यट्क मेहमानों को खुश करने तक सीमित हो जाती हैं | लेकिन विडंबना तो यह हैकि पहाड के सैलानी कस्बों व शहरों की इतनी बडी मानवीय त्रासदी पर्यट्न के आधुनिक ग्लैमर की मोटी पर्तों के अंदर से झांक तक नही पा रही |
     इसके साथ ही जैसे जैसे पहाड मे पर्यटन पनप रहा है वहां अपराधों की संख्या मे भी वृध्दि हो रही है | पर्यटन स्थलों मे चोरी, मारपीट, धोखाधडी की घटनाएं आम होती जा रही हैं | अक्सर पर्यट्कों के साथ शहरों से कुछ अपराधी तत्व भी आ जाते हैं जो न सिर्फ़ सैलानियों का अहित करते हैं वल्कि स्थानीय लोगों को भी अपना शिकार बनाते हैं | इस तरह पहाड अप्ने मौलिक परिवेश को भी खोने लगा है |
     जहां तक पर्यटन से पहाड के विकास की बात है वह भी पूरी तरह सच नही है | आज का पर्यटक दिल्ली, लखनऊ, मुम्बई से सीधे वीडियो कोच से पहाड पहुंचता है और यहां से उन तेज रफ़्तार वाहनों के साथ बडे बडे होट्लों मे लंच, डिनर करते हुए यहां चहलकदमी नही बल्कि दौड लगाता है | इसका सीधा असर पडा है पहाडी सड्कों के ढाबों और दुकानों पर | घुमन्तू यात्रियों के रूकने से उन्हे कुछ लाभ मिलता भी था वह भी अब नही रहा | आज सड्कों के किनारे के ढाबों और दुकानों के स्थानीय दुकानदार पर्यट्कों को बस देखते रह जाते हैं | पहाड मे स्थिति यह है कि पर्यटन केन्द्र बन जाने के बाबजूद परम्परागत कलात्मक वस्तुओं के कारीगर बेकारी मे दिन काट रहे हैं |
     तल्ख सच्चाई तो यह है कि सैरगाज बनता पहाड चंद लोगों के लिए बेशक एक सोने के अंडे देने वाली मुर्गी बन गया हो लेकिन यहां के आम स्थानीय लोगों की तो परेशानियां कुछ और बढ जाती हैं | जहां एक्तरफ़ कुछ होट्ल मालिकों, बस कंपनियों तथा बडे व्यापारियों व एजेन्टों की जेबें भारी हो रही हैं वहीं आम वाशिंदा बाजार की मंहगाई से त्रस्त रोज शाम मायूस हो घर लौटता है | +
     इस तरह हिल स्टेशन के रूप मे सैरगाह बनी यहां की वादियों के अपने दर्द है लेकिन सिनेमा के परदे पर वादियों की एक सपनीली दुनिया को देखने की अभ्यस्त हमारी रोमांटिक नजरों से वादियों का यह चेहरा हमे कभी नही दिखाई देता |