शुक्रवार, 13 जून 2014

हाथों से दूर होती किताबें

      
( L.S. Bisht ) -  हम जानबूझ कर सच्चाई से मुंह न मोडना चाहे तो यह्बात स्वीकार कर ली जानी चाहिए कि आज जो उप्भोक्तावादी संस्क्रृति हमारे चारों तरफ़ विकसित हो रही है उसमे किताबों का बाजार तेजी से सिमटता जा रहा है | कपडों के फ़ैशन की बात हो या फ़िर अपने चेहरे मोहरे को सजाने संवारने की या फ़िर फ़र्राटेदार गाडी मे हवा से बात करने हुए जमाने से भी आगे निकल जाने की, इन सभी के प्रति तो हम काफ़ी जागरूक हुए हैं | लेकिन पढने-पढाने की प्रवत्ति तेजी से घट रही है |वरना और क्या कारण हो सकता है कि जहां एक तरफ़ नये नये उपभोक्ता वस्तुओं का बाजार खूब फ़ल-फ़ूल रहा है वहीं दूसरीतरफ़ रोज एक नया बुक स्टाल खुलता है और जल्द ही परचून की दुकान मे तब्दील हो जाता है |
     आज हालात यह हैं कि पूरा बाज्रार घूम आइए सजी धजी दुकानों मे सबकुछ मिल जाएगा लेकिन कहीं कोई ऐसी दुकान शायद ही मिल सके जहां आप अपनी जरूरत की साहित्यिक किताबें या कुछ स्तरीय पत्रिकाएं खरीद सकें | अल्बत्ता किसी कोने मे फ़ुटपाथ पर लावारिश सी पडी कुछ पत्रिकानुमा चीजें भडकीले कवर पृष्ठों के साथ जरूर दिख जायेगीं |
     बाजार से हट कर अगर हम अपने घर की दुनिया को भी थोडा गौर से देखें तो पता चलेगा कि  यहां भी पत्र-पत्रिकाएं व पुस्तकें गैरजरूरी चीजें समझी जाने लगी हैं| तुर्रा यह कि मंहगाई का रोना रोते ह्ये हम फ़्रीज, टी वी, एअरकंडीशन तो खरीद सकते हैं लेकिन एक किताब नही | बाजार मे उप्भोक्ता वस्तुओं की कीमतों का ग्राफ़ जरा भी ऊपर गया नही कि हम घरेलू खर्चों मे कटौती की बात सोचने लगते हैं और तब सबसे पहले हमारा ध्यान  जाता है हर माह या सप्ताह आने वाली पत्रिकाओं पर | इससे हम नाता तोड लेना ज्यादा बेहतर समझते हैं |
     उसके बाद जरूरी हुआ तो कटौती की कैंची चलती है रोज सुबह आंगन मे गिरने वाले अखबार पर और इस तरह इन्हें अपने घरेलू बजट से बाहर कर हम चैन की सांस लेते हैं मानो मंहगाई की मार पर हमने सफ़ल हमला कर उसे पराजित कर दिया हो | पढने की आदत से छुटकारा पाने की यह प्रवत्ति तेजी से विकसित हुई है और अब तो शायद हम भूल ही गए हैं कि किताबें कभी हमारी जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करती थीं |
     कम्प्यूटर और इंटरनेट ने भी किताबों को कम नुकसान नही पहुंचाया | जब एक क्लिक पर पूरी दुनिया की जानकारी आपकी आंखों के सामने हो तो भला किताबों के पन्ने पलटने की जहमत कौन उठाना चाहेगा | लेकिन छ्पे शब्दों को पढने वाले लोगों को पता है कि कागज पर छ्पे शब्दों और स्क्रीन पर चमकते शब्दों मे क्या अंतर है | वह बात कहां | अगर सिर्फ़ यही कारण होता तो दर्जनों न्यूज चैनलों के रहते अखबार कब का दम तोड चुके होते | लेकिन ऐसा तो नही हुआ | अखबार आज भी सुबह की जरूरत बना हुआ है | इसका सीधा सा मतलब है कारण कहीं और भी हैं |
     थोडा पीछे मुड कर देखें तो बहुत समय नही गुजरा जब प्रदेश मे इलाहाबाद, बनारस व लखनऊ जैसे शहर साहित्यिक गतिविधियों के केन्द्र माने जाते थे | यहां से  न सिर्फ़ श्रेष्ठ व स्तरीय साहित्य का प्रकाशन होता था अपितु उसे पाठकों तक पहुंचाने के लिए पुस्तकालयों व पुस्तक केन्द्रों का एक जाल सा बिछा था | किसी भी नई किताब पर चर्चा न हो यह असंभव था | अब न तो ऐसी दुकाने रहीं और सार्वजनिक पुस्तकालयों की दुर्दशा की तो अपनी कहानी है | आलम यह है कि यह बचे खुचे पुस्तकालय युवक-युवतियों के मिलन स्थल बन कर रह गये हैं |
     इधर कुछ वर्षों से शहरों मे जो बडी बडी आवासीय योजनाएं बनी हैं उनमे दो चीजें नदारत मिलेंगी | एक है सार्वजनिक शौचालय दूसरा पुस्तकालय | बाकी शापिंग माल्स, मल्टी फ़्लैक्स, आइसक्रीम पार्लर, ब्यूटी पार्लर, साइबर कैफ़े और यहां तक कि बार भी आसानी से दिख जायेंगे |
     कुल मिला कर आज स्थिति यह है कि पुस्तकें समाज से दूर हो रही हैं | इसे यह भी कहा जा सकता है कि समाज ही किताबों से दूर हो रहा है | कभी कधार पुस्तक मेलों का आयोजन भी किया जाता है लेकिन वहां भी चहल कदमी करने वालों की ही संख्या ज्यादा दिखाई देती है | किताबों के शौकीन कम ही नज्रर आते हैं | फ़िर भी ऐसे आयोजन जरूरी हैं | कम से कम कुछ पाठकों को तो किताबें सुलभ हो ही जाती हैं |
     सवाल सिर्फ़ किताबों या पैसों का ही नही है बल्कि सम्मूर्ण बौध्दिकता और संस्कृति का है | इससे बडा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि जहां कभी किताबें आम आदमी की जिंदगी का हिस्सा रही हों वहीं आज पाठक अच्छे साहित्य से दूर खडा दिखाई देता हो | यहां तक कि छात्र भी अपनी पाठय पुस्तकों को छोड कुछ और पढना न चाहते हों | समाज और किताबों के बीच बढ्ती इन दूरियों पर आज एक गंभीर चिंतन की आवश्यकता है | प्र्काशन से लेकर बाजार व्यवस्था तक के पूरे तंत्र की पडताल की जानी चाहिए | इस विषय पर भी सोचा जाना चाहिए कि आखिर पुस्तक प्रकाशन क्यों घाटे का व्यवसाय बनता जा रहा है | जब कि हमारे गांव-कस्बों व शहरों मे आज भी करोडों पाठक हैं |
     कुचक्र मे फ़ंसी किताबों की दुनिया की उलझनों को समझने के लिए हमे आज के परिवेश को भी समझना होगा | यह सच है कि आज दूरदर्शन ने एक ऐसा तिलिस्म रच लिया है जिसके बाहर सब्कुछ बदरंग सा दिखने लगा है | रही सही कसर पूरी की है हमारे हिन्दी सिनेमा ने | इसके साथ ही आम भारतीय के सुधरते जीवन स्तर पर पाश्चातय संस्कृति की छाप ने भी कम नुकसान नही पहुंचाया | लेकिन इन रंगीन आकषर्णों व बदलाव के बीच पढने की आदत भी समान्तर रूप से साथ-साथ रही होती अगर लेखक , प्रकाशक व प्रिन्ट मीडिया ने अपनी भूमिका का निर्वाह ईमानदारी से किया होता |  दोष दूरदर्शन  या सिनेमा का नही बल्कि प्रकाशन से जुडे उस तंत्र का है जो बदलाव की बयार मे शुतुर्मुगी सिरगडाऊ युक्तियों से बचने का प्रयास करता रहा है | और आज भी एक विधवा की तरह विलाप कर रहा है |
     आज लेखक को न पढे जाने का दुख है तो प्रकाशक को किताबें न बिक पाने की चिंता | हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का रोना इस बात पर है कि हिन्दी के पाठक स्तरीय और गंभीर साहित्य पढना ही नही चाहते | सवाल उठता है कि यह स्थिति मराठी, मलयालम या बंगला जैसी दूसरू भाषाओं के साथ क्यों नही है | हिन्दी जैसी भाषा जिसके पास एक विराट आकाश है पाठक को नही तलाश पा रही है |
     बहरहाल किताबों की दुनिया कई कुचक्रों मे फ़ंसी दिखाई देती है | अब तो पत्र-पत्रिकाओं का पूरा मिजाज ही बदल चुका है | पाठकों मे पढने के संस्कार डालने जैसी भूमिका से प्रिन्ट मीडिया पूरी तरह से दूर हो चला है | जो बिके वही छापो की नीति अपनाई जा रही है | अब वह चाहे अशलील हो या फ़ूहड, इससे कोई लेना देना नही | कभी अखबारों मे सामयिक लेख, फ़ीचर , कहानी व कविता आदि प्रकाशित हुआ करते थे, अब आधे-अधूरे कपडों मे युवतियों की फ़ोटो , युवाओं के नाम पर सिर्फ़ फ़ैशन या आधुनिकता की बे-सिर पैर की बातें | आखिर यह सब परोस कर क्या उम्मीद की जा सकती है कि यह पीढी आगे चल कर गंभीर साहित्य का पाठक बनेगी | अगर नई पीढी मे अच्छा पढने के संस्कार विकसित करने हैं तो दैनिक पत्रों व पत्रिकाओं को वापस लौटना होगा | अगर इस दिशा मे गंभीरता से न सोचा गया तो एक दिन  किताबो का जादू हमेशा के लिए खत्म हो जाऐगा |

     

रविवार, 8 जून 2014

कुछ दर्द हैं वादियों के भी

     

       ( L.S. Bisht ) - मैदानों की उमस भरी गर्मी से बेदम हमे याद आने लगती हैं पहाड की रूमानी तस्वीर यानी खूबसूरत वादियां, हिमाच्छादित चोटियां और हरे-भरे ज़ंगल | चन्द दिनों के लिए ही सही, हम पहाड की इन खूबसूरत वादियों मे खो जाने का सपना लिए निकल पड्ते हैं | ऐसी ही हर साल सैलानियों की भीड वहां पहुंचती है और पहाड की वादियां देसी विदेशी सैलानियों के कह्कहों से गूंजने लगती हैं | 
     लेकिन रूमानी सपनों से अलग सच्चाई की जमीन पर खडे होकर देखें तो सपनों का यह पहाड अब बहुत बदल गया है | आसपास की वादियां धीरे धीरे अपना सौन्दर्य खो रही हैं | हरे भरे जंगल उजाड हो रहे हैं और साथ ही यहां के सांस्कृतिक परिवेश पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे हैं |
     दर-असल पहाड की यह त्रासदी रही है कि उसकी पहचान हिल स्टेशन के रूप मे बनी | आजादी के पहले भी पहाड हिलस्टेशन थे | अंग्रेजों ने यहां की गर्मी से राहत पाने के लिए कई ठंडे सैरगाहों की खोज की | 1815 से औपनिवेशिक शासन के अंत तक लगभग 80 हिलस्टेशन बनाए | जो यूरोपीय आबादी और व्यापार के प्रमुख केन्द्र थे | जैसे दिल्ली के पास शिमला, मसूरी व नैनीताल, मुम्बई के पास पुणे, महाबलेश्वर और द्क्षिण मे उटकमंड आदि | यह हिलस्टेशन इस तरह से बसाए गए कि स्थानीय आबादी और साधनों पर उनका पूरा अधिकार हो |
     यही नही, इन लोगों ने मकानों, नदी-नालों व स्कूली क्षेत्रों का भी भूगोल ही बदल दिया | यही कारण है कि आज इतने वर्षों बाद भी यहां तमाम नामी पब्लिक स्कूल हैं |
     वस्तुत: आज जितने भी हिल स्टेशन हैं वे सभी अंग्रेजों के सैरगाह थे | परन्तु हिल स्टेशन बने इन पर्वतीय स्थलों के प्रति उनका नजरिया भोगवादी रहा | पहाड की ठंड व सौन्दर्य का भोग लगा उसे कूडेदान की तरह बेतरतीब छोड आना इन हिल स्टेशनों की नियती थी | लेकिन गौरतलब यह है कि आजादी के बाद भी यह नजरिया बहुत बदला नही है |
     पहले पहल अंग्रेजों की इस परंपरा को जारी रखने वाला एक छोटा सा उच्च वर्ग था लेकिन वक्त के साथ यहां आने वाले सैलानियों की संख्या बढ्ती गई | सरकारी नौकरी मे यात्रा भ्रमण की सुविधा का लाभ उठाने वाले बाबूओं से लेकर एअरकंडीशन डिब्बों मे ‘ सरकारी दौरे ‘ मे आने बाले ‘ साहबों ‘ के लिए गर्मियों मे यहां आना अब एक फ़ैशन सा बन गया है |
     पहाड को देखने वाली नजरें भी रोमांटिक रही हैं | यही कारण है कि आज भी पर्यटक चाहे वह किसी भी वर्ग का हो, एक खास नजर से पहाड को देखता है | वहां वह उस दुनिया को तलाशता है जो उसने सिनेमा के पर्दे या बडे घरों की दीवारों पर लगी पेटिंग मे देखा है |
     पहाड की हिमाच्छादित चोटियां और खूबसूरत वादियां उसे रोमांचित करती हैं | वह घोडों पर चढ कर गहरी घाटियों को देखता है, बहते हुए झरनों के साथ खेलता है और कैमरे मे पहाड को कैद करता है | हरे-भरे जंगलों मे हनीमून के एकान्त का सुख भोगता है | इस तरह हिल स्टेशन के रूप मे पहाड को भोग कर सैलानी वापस आ जाता है अपने मुकाम पर | वहां रह जाता है उसके अविवेक क्रियाकलापों का सबूत, रौंदी हुई फ़ूलों की घाटी, जहां तहां पडे डिब्बे व जूठन और शराब की खाली बोतलें |
     यही नही, चंद दिनों के लिए बसने वाली पर्यटकों की इस दुनिया का ही परिणाम है यहां के स्थानीय लोगों मे जी हुजूरी की प्रवत्ति बढती जा रही है | चंद पैसो के लिए अब यहां का वाशिन्दा मुस्कुराहट चिपकाए विनम्र मुद्रा मे खडा आने वाले सैलानियों का इंतजार करता है | तमाम जलालत भुगतने के बाद मिले चद रूपयों, शराब की बोतलों तथा बख्शीश या ‘ ईनाम-किताब ‘ को वह अपनी बडी उपलब्धी मानने लगा है |
     यही नही, पर्यटकों का स्वच्छंद व उन्मुक्त व्यवहार यहां की युवापीढी को आकर्षित करता है | परिणामस्वरूप हिलस्टेशन बने पहाड के छोटे शहरों मे वह सभी बुराईयां आने लगी हैं जो अब तक मैदानी शहरों तक सीमित थीं | पर्यट्कों की चकाचौंध अमीरी व ठाठ से सम्मोहित हो वह भी महानगरों मे आने को मचलने लगता है |
     गर्मियों मे सैरगाह बने पहाड की पीडा को देखना हो तो मसूरी, अल्मोडा या नैनीताल चले आइए लेकिन रोमाटिंक नजरों से देखने वाली आंखों से नही दिखेगी यह पीडा | अपने ‘ साब लोगों ‘ तथा हनीमून मनाने आए जोडों के लिए स्थान जुटाने की चिंता मे किस तरह स्वंय बेघर हो जाते हैं यहां के वाशिंदे | ऊंचे किराये पाने के लोभ मे किस तरह स्वंय कहीं अंधेरे कोने मे दुबक जाते है यह लोग | यह सब चन्द पैसों के लिए | एक तरह से इन शहरों मे स्थानीय लोगों का सामाजिक जीवन बुरी तरह से अस्त व्यस्त हो जाता है | सारी गतिविधियां अपने पर्यट्क मेहमानों को खुश करने तक सीमित हो जाती हैं | लेकिन विडंबना तो यह हैकि पहाड के सैलानी कस्बों व शहरों की इतनी बडी मानवीय त्रासदी पर्यट्न के आधुनिक ग्लैमर की मोटी पर्तों के अंदर से झांक तक नही पा रही |
     इसके साथ ही जैसे जैसे पहाड मे पर्यटन पनप रहा है वहां अपराधों की संख्या मे भी वृध्दि हो रही है | पर्यटन स्थलों मे चोरी, मारपीट, धोखाधडी की घटनाएं आम होती जा रही हैं | अक्सर पर्यट्कों के साथ शहरों से कुछ अपराधी तत्व भी आ जाते हैं जो न सिर्फ़ सैलानियों का अहित करते हैं वल्कि स्थानीय लोगों को भी अपना शिकार बनाते हैं | इस तरह पहाड अप्ने मौलिक परिवेश को भी खोने लगा है |
     जहां तक पर्यटन से पहाड के विकास की बात है वह भी पूरी तरह सच नही है | आज का पर्यटक दिल्ली, लखनऊ, मुम्बई से सीधे वीडियो कोच से पहाड पहुंचता है और यहां से उन तेज रफ़्तार वाहनों के साथ बडे बडे होट्लों मे लंच, डिनर करते हुए यहां चहलकदमी नही बल्कि दौड लगाता है | इसका सीधा असर पडा है पहाडी सड्कों के ढाबों और दुकानों पर | घुमन्तू यात्रियों के रूकने से उन्हे कुछ लाभ मिलता भी था वह भी अब नही रहा | आज सड्कों के किनारे के ढाबों और दुकानों के स्थानीय दुकानदार पर्यट्कों को बस देखते रह जाते हैं | पहाड मे स्थिति यह है कि पर्यटन केन्द्र बन जाने के बाबजूद परम्परागत कलात्मक वस्तुओं के कारीगर बेकारी मे दिन काट रहे हैं |
     तल्ख सच्चाई तो यह है कि सैरगाज बनता पहाड चंद लोगों के लिए बेशक एक सोने के अंडे देने वाली मुर्गी बन गया हो लेकिन यहां के आम स्थानीय लोगों की तो परेशानियां कुछ और बढ जाती हैं | जहां एक्तरफ़ कुछ होट्ल मालिकों, बस कंपनियों तथा बडे व्यापारियों व एजेन्टों की जेबें भारी हो रही हैं वहीं आम वाशिंदा बाजार की मंहगाई से त्रस्त रोज शाम मायूस हो घर लौटता है | +
     इस तरह हिल स्टेशन के रूप मे सैरगाह बनी यहां की वादियों के अपने दर्द है लेकिन सिनेमा के परदे पर वादियों की एक सपनीली दुनिया को देखने की अभ्यस्त हमारी रोमांटिक नजरों से वादियों का यह चेहरा हमे कभी नही दिखाई देता |
    

     

गुरुवार, 29 मई 2014

कैसी हो देश के विकास की तस्वीर

                
( एल. एस. बिष्ट ) - इसमें दो राय नही कि मोदी सरकार की इस ऐतिहासिक जीत के पीछे विकास के नारे की ही मह्त्वपूर्ण भूमिका रही है | मंदिर, धारा 370 व समान नागरिक कानून जैसे मुद्दे कहीं पृष्ठभूमि मे ही रखे गये | भाजपा प्र्चार की पंच लाईन “ अच्छे दिन आने वाले हैं “ ने विकास के वादे को ही जन जन तक पहुंचाया | यहां गौरतलब यह भी है कि युवाओं का एक बडा वर्ग विकास के नारे से ही आकर्षित होकर भाजपा के पक्ष मे दिखाई दिया |
     लेकिन यहां सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि  आखिर विकास की यह अवधारणा कैसी हो | क्या विकास का मतलब सिर्फ़ रोजगार सृजन, उत्पादन व सुविधाओं का व्यापक प्रसार ही होगा या फ़िर इसका हमारे सामाजिक जीवन व मूल्यों से भी कोई रिश्ता बनेगा |
     अगर आर्थिक विकास के नजरिये से थोडा पीछे देखें तो नि:संदेह देश ने एक लंबा सफ़र तय किया है | 60 के दशक का भारत और आज जो तस्वीर है इसमे कहीं कोई समानता नहीं दिखती | यह आर्थिक विकास न सिर्फ़ आंकडों मे दिखाई देता है बल्कि आम जन की बेहतर होती जिंदगी मे भी नजर आता है | चूल्हे से गैस चूल्हा, साइकिल से कार, फ़िक्स फ़ोन से मोबाइल , पंसारी की दुकान से शापिंग माल्स और सिंगल पर्दे के सिनेमाघर से मल्टीफ़्लैक्स तक का सफ़र विकास की कहानी का स्वंय गवाह है | यह बदलते भारत की ऐसी तस्वीर है जो किसी आंकडें की मोहताज नहीं |
     लेकिन जैसा कि अक्सर होता है नदी का तेज प्रवाह अपने साथ  बहुत कुछ बहा ले जाता है, ठीक उसी प्रकार आर्थिक विकास की धारा मे भी बहुत कुछ स्वत: बहने लगता है या फ़िर पीछे छूट जाता है | लेकिन सिर्फ़ प्रवाह पर गढी हमारी नजरें उन चीजों को चाहे-अनचाहे अनदेखा कर लेती हैं | यह स्थिति तब और भी विकट होती है जब हम अपनी समृध्दी के लिए विकास का सही ढांचा या माडल चुन पाने मे कहीं चूक कर जाते हैं | आज इस पर सोचा जाना जरूरी है कि आखिर इस देश के लिए विकास का माडल कैसा हो |
     यूरोपीय देशों की उन्नति हमें ललचाती, लुभाती और अपने मोहपाश मे बांधती है लेकिन हम शिखर के पीछे के उस अंधेरेपन को नहीं देख पाते जिनसे आज वहां का समाज जूझ रहा है और भारत की प्राचीन संस्कृति मे निहित ‘ सामाजिक सुखों ‘ को पुलक भरी द्र्ष्टि से देखता है | विकास की होड मे यहां हमे यह समझना होगा कि विकास का जो ढांचा यूरोपीय देशों के लिए अनुकूल प्रतीत होता है, यह जरूरी नही कि वह हमारे लिए भी समृध्दि का वाहक बने |
     अतीत मे हम इस त्रासदी को भोग चुके हैं | अंग्रेजी शासन का कालखंड इस सच का गवाह है | जब उनके आर्थिक विकास के माड्ल ने हमारे ग्रामीण भारत की रीढ कहे जाने वाले लघु व कुटीर धंधों पर कुठाराघात कर पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ही छिन्न भिन्न कर दिया था |
     यहां गौरतलब यह भी यह है कि इधर 80 के द्शक से विकास का जो ढांचा हमने तय किया, वह विवादों और शंकाओं से परे नही रहा | जंगल, जमीन और इंसान के  आपसी संबधों को नकारते हुए हमने जो पाने की कोशिश की उसने एक नई बहस को भी जन्म दिया | तमाम जन-आंदोलनों के गर्भ मे यही असंतोष जब तब मुखर होता रहा है |
     इस तथाकथित आर्थिक विकास ने जहां एक तरफ़ एक वर्ग के लिए उन्नति के नये क्षितिज खोले तो वहीं अपने जंगलों और जमीन से बेदखल हुए लोग गरीबी और विस्थापन के गहरे जख्मों से पस्त हो बेचारगी की स्थिति मे भी दिखाई दिये |यह सिलसिला देश के किसी न किसी हिस्से मे विकास के नाम पर बदस्तूर जारी है |
     यही नही, नब्बे के दशक से आर्थिक विकास का जो चक्र हमने चलाया, उसने हमारे गांवों की समृध्दि, संस्कृति और यहां तक कि बुनियादी स्वरूप को कम आहत नही किया | शहरीकरण और विकास के नाम पर कृषि भूमि को लील कर कंक्रीट के जंगल मे बदल दिया है | दूसरी तरफ़ वैश्विक पूंजी और भूमंडलीकरण की सोच ने ह्मारी पारंपरिक  खेती को नये प्रयोगों की प्रयोगशाला के रूप मे भी तब्दील कर दिया है | यही नही, हमारे विकास की अवधारणा नगर केन्द्रित रही है और फ़लस्वरूप उसने हमारे शहरों मे ही समृध्दि व रोजगार के नये क्े क्ष्क्ष्ही समृध्दि व रोजगार के नये ेती को नये प्रयोगोंद्वार खोले हैं और शहरी युवाओं को नये सपनों की सौगात दी है |  की प्रयोगशाला के रूप मे भी तब्दील कर दिया हमारा ग्रामीण युवा इस बदली हवा और संभावनाओं से लगभग अछूता ही रह गया | इसका सीधा प्रभाव  यह पडा है कि गांव वीरांन और शहर चिंताजनक स्थिति तक आबाद होने लगे है |
इस तरह देखें तो विकास की यह ऐसी धारा रही है जिसमे समृध्दि और विनाश दोनो साथ साथ चलते रहे हैं | आर्थिक विकास का यह मौजूदा ढांचा न बदला गया तो हमारे शहर गांवों और ग्रामीण आबादी को पूरी तरह लीलने के कगार पर होगें | इसलिए इस  आर्थिक विकास की दशा और दिशा दोनो पर अभी से सोचा जाना जरूरी है | हमे ऐसा ढांचा तय करना होगा जो सिर्फ़ शहरों, महानगरों और वहां के वाशिदों की जिंदगी मे ही चमक पैदा न करे बल्कि ग्रामीण भारत को भी विकास की धारा से जोड सुख और समृध्दि मे भागीदार बनाये |
    


गुरुवार, 22 मई 2014

बिहार के हित मे नही नीतीश की यह राजनीति



( एल.एस.बिष्ट ) - बिहार की पूरे देश मे एक अलग पहचान रही है | एक तरफ़ यह पिछ्डेपन का प्रतीक रहा है तो दूसरी तरफ़ जातीयता की नर्सरी के रूप मे भी देखा जाता रहा है | जब जब पिछ्डेपन और जातीयता की बात आती है, बिहार का ही चेहरा सामने आता है | दर-असल यह दुर्भाग्य रहा है इस प्रदेश का कि यह अपने जन्म से ही जातीय दलदल का शिकार होकर रह गया | यहां के इस सामाजिक ताने बाने का लाभ उठा राजनेताओं ने भी अपनी राजनीति की धुरी जातीय राजनीति को ही बनाये रखने मे अपना हित समझा | बिहार का आजतक का राजनैतिक इतिहास जातीय राजनीति के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा है | यहां की जातियों के समीकरणों को साधने का मतलब सत्ता की चाभी का हाथ मे आ जाना है इसीलिये यहां विकास हमेशा हाशिये पर पडा रहा | पिछ्डी व दलित जातियों के बाहुल्य वाला यह प्रदेश दर-असल इस जात पांत का ही शिकार होकर रह गया |

     90 के दशक तक यहां की राजनीति जातीय समीकरणों से ही संचालित होती रही | विकास की बात  हमेशा कोसों दूर रही | मुख्यमंत्रियों का ज्यादा समय जातीय समीकरणों को ही साधने मे जाया होता रहा | लेकिन 90 के दशक मे अयोध्या मुद्दे ने पूरे देश मे  एक नई राजनैतिक हलचल पैदा कर दी और बिहार भी इससे अछूता नही रहा | लेकिन हिन्दुत्व की यह लहर यहां बहुत दिनों तक अपनी धार कायम न रख सकी और जल्द ही मंडल ने राजनीति को एक नई दिशा मे मोड दिया | पिछ्डी जातियां सत्ता मे भागीदारी के लिए मुखर रूप से सामने आने लगीं और इन्होने अपने को लामबंद करना शुरू किया |

     दर-असल यही समय था जब लालू का जादू सर चढ कर बोलता रहा | यहां की अगडी जातियों को जो लगभग 25% हैं जिसमे ब्राहमण, राजपूत व वैश्य आदि शामिल हैं , पिछ्डी-दलित राजनीति के गठजोड ने हाशिये पर डाल दिया | यही कारण कि मंडल के बाद भाजपा अकेले दम पर यहां कभी भी मजबूत स्थिति मे नही दिखाई दी | यहां उसे किसी न किसी दल की बैसाखी की जरूरत बनी रही | इस बीच  भाजपा व नितीश के गठजोड ने पिछ्डी व अगडी जातियों का एक ऐसा समीकरण बनाया जो लालू के वर्चस्व को चुनौती देने लगा | अब तक रामबिलास पासवान की दलित राजनीति भी हिचकोले खाने लगी थी | दर-असल राजनीति के विसात पर चली चाल के फ़लस्वरूप महादलित के रूप मे दलितों के सामाजिक विभाजन ने पासवान के राजनैतिक प्रभाव को बहुत हद तक कम कर दिया था | इस बीच मोदी के सवाल पर भाजपा और जनता दल (युनाइटेड) का गठबंधन टूट गया | लेकिन भाजपा को बैसाखी मिली लोजपा के रामबिलास पासवान व राष्ट्रीय लोक समता पार्टी की | दूसरी तरफ़ जेडीयू और राजद चुनाव के मैदान पर अपने अपने समीकरणों के बल पर ताल ठोकते रहे |

     लेकिन 16वीं लोकसभा के चुनाव परिणामों ने सारे समीकरणों को ध्वस्त कर दिया और मोदी के विकास और अच्छे दिनो के वादों ने जातीय राजनीति के समीकरणों को सिरे से नकार दिया | राजद के  मुस्लिम-यादव समीकरण  को भी बुरी तरह  मुंह की खानी पडी | जद(यू) ने 13 मुस्लिम उम्मीदवार को चुनाव मे टिकट दिया लेकिन एक भी चुनाव न जीत सका | दूसरी तरफ़ राजग ने सभी सुरक्षित सीटों पर भी जीत हासिल की |


     सख्या बल मे  अपनी कमजोर स्थिति देखते हुये नीतिश ने सरकार बचाने के लिये फ़िर वही जातीय कार्ड खेलना बेहतर समझा | जतिन मांझी को मुख्यमंत्री बना कर उन्होने पासवान के बढ्ते प्रभाव को कम करने के साथ साथ दलित बोट बैंक पर फ़िर से कब्जा करने की कोशिश की है | यही नही भाजपा के सरकार गिराने के प्रयासों पर भी नकेल लगाने का मकसद इसमे छिपा  है | अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिये वह एक बार फ़िर जातीय राजनीति को अपने पक्ष मे कर विकास के मुद्दे को हाशिये पर डालना चाहते हैं | वह यह अच्छी तरह समझ गये हैं कि मोदी के विकास नारे को कुंद किये बगैर वह बिहार को नही जीत सकते | लेकिन राजनीति की इस विसात का खामियाजा भुगतेगा बिहार | चुनावी लाभ के लिए एक रबर स्टैम्प मुख्यमंत्री बना कर उन्होने बिहार के विकास को एक बार फ़िर पीछे धकेल दिया है | यही नही,  बिहार जिस जातीय राजनीति के दलदल से निकलने की कोशिश कर रहा था उन प्रयासों को फ़िर धक्का लगा है |लेकिन अगले विधानसभा चुनाव मे यह तो बिहार की जनता को ही तय करना होगा कि वह विकास और खुशहाली के रास्ते पर जाना चाहेंगे या फ़िर जातीय राजनीति के दंश को भोगना ही उनकी नियती है |

शनिवार, 17 मई 2014

मुस्लिम ध्रुवीकरण ने भी निभाई जीत मे भूमिका



( एल.एस.बिष्ट ) - यह चुनाव कई मायनों मे अलग रहा है | दस वर्षों  के कांग्रेसी शासन का इस तरह से पटाक्षेप होगा, इसकी कल्पना राजनीति के बडे-बडे पंडित भी करने मे असफ़ल हुए | बदलाव की एक सुगबुगाहट जरूर सतह पर दिखाई देने लगी थी लेकिन बदलाव की यह चाहत जनादेश के रूप मे इस तरह से सामने आएगी, परिणाम आने से पहले सोच पाना मुश्किल था |

     यह तो समझा जा सकता है कि दर-असल  यह प्रभावशाली जीत कांग्रेस के कुशासन और निहायत कमजोर व लचर प्रशासन के विरूध्द एक सुशासन और मजबूत सरकार के वादे की जीत है | लेकिन जिस तरह का जनादेश आया है इसने और भी कई महत्वपूर्ण सवाल खडे किऐ हैं | क्या यह कम आश्चर्यजनक नही कि देश को प्रधानमंत्री देने वाले उत्तर प्रदेश की 80 सीटों मे एक भी मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव नही जीत सका | यही नही, 20 फ़ीसदी से भी ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले शहरों मे भी भाजपा ने सफ़लता पाई और यहां से भी कोई मुस्लिम उम्मीदवार ससंद न पहुंच सका |

     इस नजरिये से अगर देखा जाए तो पिछ्ले दो दशकों में सबसे कम सिर्फ़ दो मुस्लिम उम्मीदवार 1991 के आमचुनाव मे सफ़ल हुऐ थे | इस अपवाद को छोड दें तो यह सख्या 2009 तक 5 से 10 के बीच हमेशा रही है | पिछ्ले आम चुनाव मे ही सात मुस्लिम उम्मीदवार विजयी होकर ससंद पहुंचे थे लेकिन इस बार यह संख्या शून्य मे तब्दील हो गई | यही नही, अल्पसंख्यक मतों की द्र्ष्टि से महत्वपूर्ण समझे जाने वाले रूहेलखंड की दस सीटों मे से भाजपा को नौ सीटों मे अप्रत्याशित रूप से सफ़लता मिली है जब कि 2009 के चुनाव मे यह सिर्फ़ दो तक सीमित थी |

     आखिर यह कैसे संभव हो सका | इस सवाल पर गौर करें तो पिछ्ले कई वर्षों से धर्मनिरपेक्ष्ता बनाम साम्प्रदायिकता के नाम पर जिस प्रकार से बहुसंख्यक समाज की भावनाओं से खिलवाड किया जाता रहा है , यह उसी का प्रतिफ़ल है | दर-असल वोट की राजनीति के तहत कांग्रेस समेत सभी प्रमुख राजनैतिक दल भाजपा को साम्प्रदायिकता के नाम पर अलग थलग करने का प्रयास करते रहे हैं | देश मे होने वाले हर छोटे बडे दंगे को भाजपा के सर मढने की जो पुरजोर कोशिश यह तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल करते रहे हैं उसने कहीं न कहीं बहुसंख्यक समाज को आहत किया | इस बीच ‘ हिन्दू आतंकवाद ‘ के भूत को भी पैदा करने के प्रयास ने आग मे घी का काम किया और इसका  दर्द सिर्फ़ संघ परिवार तक सीमित नही रहा बल्कि जन जन तक पहुंचा और यही कारण रहा कि इस चुनाव मे संघ ने इस छ्दम धर्मनिरपेक्षता के विरूध्द पूरी तरह से कमर कसी |

     गौरतलब यह भी है कि मोदी जी को प्रधानमंत्री पद के लिए घोषित किए जाने के साथ ही मुस्लिम समुदाय द्वारा भाजपा व मोदी का मुखर विरोध किया जाने लगा और भाजपा उम्मीदवारों को चुनाव मे हराने कि लिए जिस तरह से एक मुश्त मतदान करने की मुहिम चलाई गई, उसने बहुसंख्यक वर्ग मे भी प्रतिक्रिया को जन्म देने मे एक भूमिका निभाई | जहां एकतरफ़ भाजपा के विरूध्द एकजुटता होने लगी थी वहीं दूसरी तरफ़ मोदी के विकास और अच्छे दिनो का नारा बहुसंख्यक कि दिलों मे जगह बनाने लगा था ऐसे मे मोदी के समर्थकों ने भी एक्जुट होना जरूरी समझा | यही कारण है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य मे जहां जातीयता के आधार पर मजबूत ध्रुवीकरण सपा व बसपा के साथ पिछ्ले कई वर्षों से दिखाई देता रहा है, यकायक बिखर गया | इसने भाजपा के लिए नही तो  कम से कम मोदी के पक्ष मे मतदान करना बेहतर समझा | इस तरह बहुसंख्यक वर्ग के ध्रुवीकरण ने मुस्लिम वर्ग के ‘ टेक्टीकल वोटिंग ‘ के प्रभाव को शून्य कर दिया

     राजनीति के कुछ विश्लेषक यह मानते हैं कि मुस्लिम बहुल सीटों मे भाजपा की जीत मे मुस्लिम मतों का  भी योगदान रहा है , सही नही लगता | दर-असल इसका कारण सपा व बसपा के मतदाताओं के एक बडे वर्ग का मोदी के पक्ष मे मतदान करना है न कि मुस्लिम मतों का भाजपा के पक्ष में| अगर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य मे मोदी के जादू से यह जातीय समीकरण न टूटते तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती |

     बहरहाल अब कांग्रेस सहित दूसरे दलों को अपनी धर्मनिरपेक्ष्ता को नये सिरे से समझने की जरूरत है और  यह समझना होगा कि वोट के लिए तुष्टिकरण की नीति को खारिज कर दिया गया है | दूसरी तरफ़ मुस्लिम समुदाय को भी स्वयं को वोट बैंक बनने से रोकना होगा और यह तभी सभव है जब वह साम्प्रदायिकता के नाम पर सिर्फ़ और सिर्फ़ भाजपा के विरूध्द अपनी नकारात्मक सोच से मुक्त हो अपने को मुख्य्धारा मे समाहित करे | उसकी इस सोच का लाभ ही दूसरे दल उठाते रहे हैं | यही कारण है कि आज तक वह अपने बुनियादी सवालों पर इस देश मे कोई सार्थक बहस न करवा सका | सिर्फ़ धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता पर उलझ कर रह गये |

     अब समय आ गया है कि वह अपने समाज के हित के  बुनियादी सवालों , शिक्षा, रोजगार और अपनी युवा पीढी के भविष्य को प्राथमिकता दे तथा उनके लिए संघर्ष करे और इन मुद्दों पर किसने कितना किया के आधार पर मतदान के जरिये अपना समर्थन अथवा विरोध दर्ज करे | जिस दिन वह इन सवालों पर राजनीतिक दलों से जवाब मांगेगा, वह एक वोट बैंक नही रह जायेगा | यह इस विशाल लोकतंत्र के हित मे भी होगा |


बुधवार, 14 मई 2014

दैनिक जागरण में प्रकाशित कुछ महत्वपूर्ण ब्लाग

दैनिक जागरण में प्रकाशित कुछ महत्वपूर्ण ब्लाग । तलाश है एक .....29 मार्च,2014,  मजबूत लोकतंत्र के .....अप्रैल, 2014,  देशहित में नहीं.......12 मई, 2014 ।

बेस्ट ब्लागर आफ द वीक






दैनिक जागरण जंक्सन डाट काम में मेरे ब्लाग “ यात्रा “ मे प्रकाशित लेख “ हुक्मरानों ने छले हैं आदमी के ख्वाब “ को  “ बेस्ट ब्लागर आफ द वीक “ ( 09.05.2014 )