बुधवार, 17 जून 2015

संकट मे परीक्षाओँ की साख

                       ( L.S. Bisht )    फ़र्जी डिग्री का राजनीतिक मुद्दा अभी ठंडा भी नही हुआ था कि प्रतियोगी परीक्षाओं की पवित्रता व विश्वसनीयता सवालों के घेरे मे आ गई | देश के लिए भावी डाक्टरों का चयन करने वाली प्रतिष्ठित परीक्षा आल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट ,2015 को उच्चतम न्यायालन ने रद्द कर दिया है | साथ ही सी बी एस सी बोर्ड को निर्देश दिये हैं कि चार सप्ताह के अंदर दोबारा परीक्षा कराई जाए | देश के 1050 परीक्षा केन्द्रों मे लगभग 6 लाख छात्रों दवारा दी गई इस परीक्षा का अभी हाल के वर्षों तक काफ़ी प्रतिष्ठा रही है | लेकिन इधर इस पर भी उंगलियां उठने लगी हैं | गत तीन मई को सम्पन्न हुई इस परीक्षा मे बडे पैमाने पर नकल का पर्दाफ़ाश हुआ था | अदालत के सामने भी इस परीक्षा को रद्द करने का निर्णय लेना इतना आसान नही था | इस परीक्षा के दोबारा होने से मेडिकल कालेजों मे प्रवेश की पूरी  प्रकिया ही प्रभावित हो सकती है |
      दर-असल इस अखिल भारतीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा के माध्यम से राज्यों के मेडिकल कालेजों की 15 प्रतिशत सीटें भरी जाती हैं | छात्र अपने राज्य की मेडिकल प्रवेश परीक्षा से ज्यादा महत्व इस परीक्षा को देते हैं | इस परीक्षा मे चयन हो जाने पर अक्सर राज्य मेडिकल प्र्वेश परीक्षा की सीट छोड देने के विकल्प को ही प्रमुखता देते हैं | लेकिन अब जब यह परीक्षा ही रद्द हो गई है, सबकुछ गडमड हो गया है | अब या तो छात्र राज्य मेडिकल परीक्षा के आधार पर मिल रही सीट को छोड कर इस परीक्षा मे चयन होने का जोखिम लें या फ़िर इस परीक्षा को अपने दिमाग से ही निकाल कर राज्य प्री मेडिकल प्रवेश परीक्षा मे मिल रही सीट से अपने डाक्टर बनने के सपने को पूरा करें |
      वैसे यहां गौरतलब यह भी है कि इस बार उत्तर प्रदेश प्री मेडिकल परीक्षा भी संदेह के घेरे मे है | पुलिस की स्पेशल टास्क फ़ोर्स ने लखनऊ मे लगभग एक दर्जन लोगों को पर्चा आउट करते हुए पकडा था | उनके पास से पर्चे की फ़ोटोकापी भी बरामद हुई थी | लेकिन शासन स्तर पर कुछ न होने के कारण कुछ छात्र इलाहाबाद उच्च न्यायालय गये जहां 28 जुलाई को सुनवाई होनी है | लेकिन पता नही क्यों अतिरिक्त तेजी दिखाते हुए परीक्षा के परिणाम समय से पहले ही घोषित कर दिये गये हैं | इससे शंका और गहरा गई है | बहरहाल इस परीक्षा के ऊपर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं |

      देश के गाँव-कस्बोँ और शहरोँ मे माता-पिता अपने बच्चोँ को हमेशा कहते आए हैँ कि ' पढोगे लिखोगे बनोगे साहब, खेलोगे कूदोगे होगे खराब '
देश मे आज के सँदर्भ मे खेलंते कूदने से बिगडने वाली बात चाहे पूरी तरह से सत्य न भी हो लेकिन पढ लिख कर साहब बनने के सपनोँ मे भ्र्ष्टाचार व नकल का काला साया जरूर मँडराने लगा है ।
      अभी हाल मे उत्तरप्र्देश लोकसेवा आयोग की सबसे प्रतिष्ठित पी.सी.एस. परीक्षा के प्रारँभिक चरण के प्रशन पत्र लीक होकर बाजार मे आ गए । वाटसऐप के माध्यम से पाँच-पाँच लाख रूपये मे इन्हेँ बेचा गया । यह सबकुछ् परीक्षा प्रारंम्भ होने के एक घंटे के अंदर हुआ ।
      ऐसा पहली बार नही हुआ है । इसके पूर्व प्रदेश की प्री-मेडिकल परीक्षाओं मे व्यापक स्तर पर नकल और संगठित भ्र्ष्टाचार के मामले प्रकाश मे आए हैं । प्रतिवर्ष इस मेडिकल परीक्षा मे मुन्ना भाई पकडे जाते हैं लेकिन यह सिलसिला बदस्तूर जारी है । इंजीनियरिंग परीक्षा मे भी नकल का आरोप लगता रहा है । कर्मचारी चयन आयोग व रेलवे बोर्ड की परीक्षाओं मे भी कई बार ' मुन्ना भाई ' पकडे गये हैं और प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं सामने आई हैं ।
      इधर कुछ वर्षों मे प्रतियोगी परीक्षाओँ मे यह बीमारी तेजी से बढी है । तीन साल पहले अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के परास्नातक दाखिले के लिए होने वाली परीक्षाओं मे अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग कर नकल करने के प्रयास किए गये थे । इसका सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि नकल के यह प्रयास अब बहुत ही संगठित व अत्याधुनिक तकनीक के उपयोग से किए जा रहे हैं । इनमें उच्चस्तर के लोगों की भूमिका भी संदेह के घेरे मे है । लेकिन विडंबना यह है कि ऐसे मामलों मे कुछ दिन शोर मचने की बाद जांच के परिणामों के बारे मे कोई जानकारी नही मिलती ।
      शिक्षा व रोजगार से जुडे इस पहलू का एक स्याह पक्ष यह भी है कि कालेज व विश्वविधालय स्तर की परीक्षाएं भी नकल व भ्ष्टाचार से मुक्त नही हैं । अभी हाल मे बिहार की हाईस्कूल व इंटरमीडिएट परीक्षा मे नकल का जो नजारा पूरे देश ने देखा वह अदभुत था । यानी एक तरह से शिक्षा का पूरा क्षेत्र ही भ्रष्टाचार का शिकार है । थोडा और पीछे जाएं तो स्कूल कालेजों मे होने वाले प्रवेश व प्रवेश परीक्षाएं भी हेरा फेरी से मुक्त नही हैं । कुल मिला कर ऐसा कुचक्र बन गया है कि मेधावी छात्रों का भविष्य खतरे मे दिखाई देने लगा है ।

      नकल और भ्र्ष्टाचार के दलदल मे गहरी धंसती हुई इन प्रतियोगी परीक्षाओं की साख साल-दर-साल खत्म हो रही है । इससे सबसे बडा अहित उन छात्रों का हो रहा है जो इन परीक्षाओं के माध्यम से सरकारी सेवा मे आने का सपना देखते हैं । इसके लिए वह अपने गांव-कस्बों को छोड शहरों मे रह कर कोचिंग और किताबों मे पैसा खर्च करते हैं । रात दिन की मेहनत के बाद उन्हें पता चलता है कि जिस प्रश्नपत्र को वह देकर आए हैं वह तो पहले से ही लीक है । ऐसे मे उनकी मनोदशा क्या होगी, इसे सिर्फ सोचा जा सकता है ।
      बार बार परीक्षाओं मे नकल होने का बखेडा व उच्च स्तर पर धांधली की खबरें इनके उत्साह और मनोबल को भी तोडती हैं । उनका विश्वास इन परीक्षाओं से उठने लगता है । एकदिन वह कुंठित हो जाते हैं । यही हालात रहे तो एकदिन मेधावी छात्र सरकारी सेवाओं मे प्रदेश  की इन प्रतियोगी परीक्षाओं से ही किनारा कर लेंगे और निजी क्षेत्र मे अपने भविष्य की तलाश करेंगे । ऐसे मे सरकारी सेवा के विभिन्न क्षेत्रों के लिए दोयम दर्जे के अभ्यर्थी ही मिल सकेंगे और उनके हाथों मे देश व प्रदेश के शासन की जिम्मेदारी होगी । तब देश किस दिशा को अग्रसर होगा, आसानी से सोचा जा सकता है ।
      देश व समाज मे जरूरी है कि शिक्षा व रोजगार के क्षेत्र को भ्र्ष्टाचार से पूरी तरह से मुक्त किया जाए । इसके लिए कडे दंड की व्यवस्था बेहद जरूरी है । अभी तक इन मामलों मे अपराधी के पकडे जाने पर उसे बामुश्किल दो -एक साल की ही सजा हो पाती है । ऐसे मे अपराधियों को यह घाटे का सौदा नजर नही आता । किस्मत साथ दे गई तो लाखों-करोडों की कमाई और अगर पकडे गये तो मात्र दो-एक साल की सजा । जरूरी है कि सजा सख्त और लंबी हो । यहां तक कि इसमे आजीवन कारावास का भी प्रावधान हो ।
      इसके अतिरिक्त अब आधुनिक तकनीक ने भी इस समस्या को और भी पेचीदा बना दिया है । अपराधी अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग कर  साफ बच निकलते हैं । इसलिए जरूरी है कि साइबर अपराध से निपटने के लिए पुलिस व प्रशासन को भी नये तरीकों से लैस होना होगा । ऐसे तरीके खोजने होंगे कि नकल व पर्चा लीक होने की संभावना ही न रहे । इसमे कोई संदेह नही कि  अगर हमे सरकारी सेवा मे प्रतिभाओं की जरूरत है तो हमे इन प्रतियोगी परीक्षाओं की साख को हर कीमत पर बनाए रखना होगा ।


सोमवार, 8 जून 2015

उपभोक्ता संस्कृति मे विज्ञापनों का तिलिस्म



( L.S.Bisht) -   बहुराष्ट्रीय कंपनी नेस्ले के लोकप्रिय उत्पाद मैगी ने अनायास ही उन सवालों से भारतीय समाज को रू-ब-रू करा दिया है जो अभी तक आम आदमी की सोच के दायरे से बाहर थे | दूसरे शब्दों मे कहें तो आधुनिक उपभोक्ता संस्कृति से उपजी चिंताओं से लगभग बेखबर ही थे | मैगी का विवाद सिर्फ़ उपभोक्ता वस्तुओं की गुणवत्ता तक सीमित नही है बल्कि विज्ञापनों की उस दुनिया पर भी सवाल खडे हो रहे हैं जिनके तिलिस्म का जादू आज भारतीय समाज के सर चढ कर बोल रहा है | यहां पर यह सवाल उठना भी स्वाभाविक ही है कि क्या कंपनी के लुभावने विज्ञापनों ने सफ़लतापूर्वक उपभोक्ताओं को उत्पाद के उस सच से बेखबर रखा जिसका जानना उसके अपने हित मे बेहद जरूरी था | अगर ऐसा है तो आज सिर्फ़ मैगी ही नही अपितु विज्ञापनों की पूरी रंगीन दुनिया भी सवालों के कटघरे मे खडी है |
     मौजूदा दौर का यह एक कडवा सच है कि आज आम उपभोक्ता के लिए बाजार किसी भूलभूलैया से कम नही है | इस पर तुर्रा यह कि अपने सीमित ज्ञान व जानकारी के बल पर वह इस भूलभूलैया को समझने व उससे निकलने मे पूरी तरह से लाचार व बेबस नजर आता है | दर-असल टी वी , रेडियो और तमाम पत्र-पत्रिकाओं के विज्ञापनों ने उसे इस प्रकार से उलझा कर रख दिया है कि अब वह अपने विवेक से कुछ भी सोच पाने की स्थिति मे नही रहा | एक तरह से उसका ब्रेन वाश कर दिया गया है | इधर कुछ समय से तो विज्ञापनों के तेवर लुभावने नही बल्कि आक्रामक नजर आने लगे हैं | कहीं वह मृत्यु का भय दिखा रहे हैं तो कहीं बच्चों के भविष्य व उनके जीवन मे मंडराते खतरों का एहसास दिलाते हुए उपभोक्ता को भयग्र्स्त कर अपने उत्पाद को बेचने की पुरजोर कोशिश मे लगे हैं |
     बात यहीं तक सीमित नही है | अब तो प्रतिस्पर्धात्मक विज्ञापनों की बाढ सी आ गई है | “ इसमे है वही जो आपके मनपसंद नमक मे नही “ की तर्ज पर सैकडों विज्ञापन टी वी के पर्दे पर अपनी अपनी धाक जमाने का प्रयास करते नजर आने लगे हैं | इसके साथ ही बडी चालाकी से राष्ट्रीयता, देशभक्ति व राष्ट्रीय महापुरूषों का भी व्यावसायिक उपयोग किया जाने लगा है | कई विज्ञापनों ने तो राष्ट्रीयता की पूरी अवधारणा को ही बदल कर रख दिया है | यही नही, युवाओं के जोश और सपनों को अपने उत्पादों से इस तरह से जोड दिया गया है कि मानो उसे पाना ही  उनका एक्मात्र लक्ष्य हो | यानी हमारे चारों तरफ़ विज्ञापनों की एक नई दुनिया रच बस गई है  और हम हैं कि इससे पूरी तरह से बेखबर हैं |
     विज्ञापनों की इस मार से सिर्फ़ शहरी उपभोक्ता ही नही बल्कि हमारे गांव-कस्बे भी अछूते नही रहे | दो-चार गांवों का छोटा बाजार भी विज्ञापनों और लुभावने होर्डिंग्स से भरा मिलेगा | इस विज्ञापन दुनिया का ही परिणाम है कि बाजार संस्कृति हमारे गांवों मे भी पूरी तरह से हावी हो चली है | आज वहां भी ग्रामीण लस्सी व शर्बत की बजाए कोल्ड ड्रिंक पीने लगा है |
     यही नही, हर उम्र व वर्ग के उपभोक्ताओं मे इनका जादू सर चढ कर बोलने लगा है | बच्चों की जीवन शैली तो इनके प्रभाव से पूरी तरह से बदल चुकी है | नौनिहालों का क्या खाना चाहिए और क्या पहनना चाहिए, यह सबकुछ विज्ञापन ही निर्धारित करने लगे हैं | अब तो उनकी सेहत के नाम पर उनकी माताओं के मनोविज्ञान को भी भुनाने की होड सी लग गई है | य्हां चिंताजनक पहलू यह भी है कि मानवीय कमजोरियों का फ़ायदा उठाने की होड मे इनकी शैली आक्रामक होने लगी है | अब विज्ञापन सिर्फ़ रिझाते या फ़ुसलाते ही नही है बल्कि डराते भी हैं | हमारी सभ्यता-संस्कृति व आस्था की प्राचीन अवधारणाओं को भी तोड मरोड कर पेश किया जाने लगा है |
     बात यहीं तक सीमित नही है | बल्कि अब तो अपने उत्पादों को बेचने की होड मे कंपनियां किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हैं | सेक्स को बेहुदे तरीके से परोस कर उपभोक्ता को अपने उत्पाद के पक्ष मे उकसाने मे उन्हें कोई गुरेज नही | लेकिन यह ‘ क्रांति ‘ एक दिन मे संभव नही हुई बल्कि विज्ञापनों के व्यापक महत्व व प्रभाव से अनजान हो हमारी उदासीनता के कारण ऐसा संभव हो सका |
     थोडा पीछे देखें तो भारत मे विज्ञापन का इतिहास लगभग 200 वर्ष पुराना है | इसकी लोकप्रियता भारतीय स्माचार पत्रों के प्रसार से जुडी है | 29 जनवरी 1780 मे जेम्स अगस्त हिक्की ने पहले भारतीय समाचार पत्र की शुरूआत की थी जिसे बंगाल गजट के नाम से जाना जाता है | इसके पहले अंक मे ही विज्ञापन प्रकाशित हुए थे | यह् अलग बात है कि वह सूचनात्मक थे | 1950 आते आते अखबारों की आय का मुख्य स्त्रोत विज्ञापन बन गये | 60वें दशक से तो उपभोक्ता वस्तुओं के विज्ञापन अखबारों मे छा गये | और फ़िर 70 के दशक से रेडियो व टी वी पर भी विज्ञापन आने लगे |
     लेकिन देखते देखते विज्ञापनों मे सेक्स का पहलू कब जुड कर हमारे दिलो-दिमाग मे छा गया, पता ही नही चला | वैसे कुछ लोग इसकी शुरूआत 90 के दशक के उस विज्ञापन से मानते हैं जिसमे माडल मिलिंद सोमन और मधु सपरे ने एक जूते का विज्ञापन दिया था | जिसमे दोनो लगभग निवस्त्र थे | केवल एक पाइथन बदन पर लिपटा हुआ था | बहरहाल अब तो सेक्स विज्ञापनों की दुनिया कहीं आगे निकल गई है | इसके विरोध मे कहीं कोई सुगबुगाहट भी नही सुनाई देती | मानो सबकुछ स्वीकार कर लिया गया हो |
     लेकिन यहां सवाल इन विज्ञापनों की विशवसनीयता का है | अक्सर कंपनियां अपने उत्पादों की खूबियों को बढा चढा कर पेश करती रही हैं और इसके लिए इन्होने फ़िल्मी सितारों से लेकर क्रिकेट खिलाडियों तक का उपयोग बखूबी किया है | दूसरी तरफ़ इन सितारों की जेब मे करोडों रूपये जाने के बाद इन्हें इस बात से कोई मतलब नही कि जो वह प्रचारित कर रहे हैं , उसमे कितनी सच्चाई है | मैगी के मामले मे भी ऐसा ही हुआ है | अब वह सितारे भी सवालों के घेरे मे हैं जिन्होने इसका प्रचार किया | देखा जाए तो यह देर से आई चेतना है | बहरहाल अब इन विज्ञापनकर्ताओं को भी सख्त नियम कानूनों मे बांधे जाने की दिशा मे विचार किया जाने लगा है जो पैसा लेकर बिना सोचे समझे उत्पादों का विज्ञापन करते आए हैं |
            ऐसा नही है कि अब तक विज्ञापनों को नियंत्रित करने के लिए कोई नियम कानून थे ही नही | केबल टेलीविजन नेटवर्क नियमों के तहत टी वी चैनलों की जिम्मेदारी बनती है कि ऐसे विज्ञापन न दिखायें जो देशहित व समाज हित मे न हों तथा सच न हों |  एडवरटाइजिंग स्टेर्न्डड कांउसिल आफ़ इंडिया (ए एस सी आई) भी टी वी चैनलों को लिख सकती है कि वे ऐसे विज्ञापन दिखाना बंद करे और अगर न माने तो सूचना प्रसारण मंत्रालय को बताया जाता है जो अपने स्तर पर कदम उठाते हैं |
     वैसे भी 1985 मे गठित एडवरटाइजिंग स्टेर्न्डड काउन्सिल आफ़ इंडिया का मुख्य उद्देश्य ही विज्ञापनों की सामग्री , उनकी सच्चाई तथा ईमानदारी पर नजर रखना है तथा साथ मे यह सुनिश्चित करना भी कि विज्ञापन साफ़ सुथरे, तथा महिलाओं व बच्चों के हितों के विरूध्द न हों | समय समय पर सूचना व प्रसारण मंत्रालय से भी दिशा निर्देश जारी किये जाते हैं | लेकिन शायद ही इस दिशा मे कभी गंभीरता से सोचा गया हो कि क्या विज्ञापनों की दुनिया मे वाकई मे सब ठीक ठाक है या फ़िर कुछ घालमेल किया जाने लगा है | कभी कधार किसी विज्ञापन विशेष को लेकर कोई विवाद उठा भी तो उसे किसी तरह निपटा कर फ़िर सबकुछ भुला दिया जाता है |
     बहरहाल अब जबकि उपभोक्ता उत्पादों को लेकर विज्ञापनों मे बडे बडे लुभावने वादे किए जाने लगे हैं , जिनका सच्चाई से कोई नाता ही नही, गंभीरता समझ मे आने लगी है | यह भी महसूस किया जाने लगा है कि नैतिकता से परे तमाम विज्ञापन हमारे सामाजिक ताने बाने को ही छिन्न भिन्न करने लगे हैं | समाज को ऐसी दौड मे शामिल किया जा रहा है जहां मानवीय मूल्यों व सामाजिक सरोकारों के लिए कोई जगह नही बचती |
     अब यह बेहद जरूरी है कि विज्ञापनों को सच्चाई की क्सौटी पर कसते हुए  गलत दावों और वादों वाले विज्ञापनों पर  कार्रवाही की जाए | झूठे विज्ञापनों को दिखा कर अपना उत्पाद बेचने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना लगा कर उन्हे भविष्य के लिए प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए | जब तक सख्त कदम नही उठाये जाते यह विज्ञापन लोगों को अपने मोहपाश मे बांध कर छ्लते रहेंगे |

                                                            एल.एस.बिष्ट, 11/508, इंदिरा नगर, लखनऊ

बुधवार, 3 जून 2015

कहां खो गये बचपन के वह खेल

 (एल.एस.बिष्ट )- जिंदगी के उत्साह, उमंग और सपनों से भरे वह मासूम दिन जब  बहुत पीछे छूट चलते हैं तब याद आता है वह अतीत, वह बचपन, वह शरारतें और उन दिनों से जुडी ढेरों यादें । लेकिन यादों के इस काफिले से बचपन का जो अक्स उभरता है, वह अब कहीं नही दिखाई देता । वक्त के साथ बहुत बदल गया है बचपन । दिन-दिन भर की धमाचौकडी, तरह तरह के खेल और छोटी-छोटी तकरारें, अब कहीं नही दिखाई देते बच्चों के ऐसे झुंड । मस्ती और आपसी प्यार-सदभाव से भरे वह खेल ही अब कहां हैं जिन्हें खेल कर कई पीढियां जवान हुई।

अब तो लगता है कि समय की तेज धारा ने बच्चों को भी एक दूसरे से अलग थलग कर अपने अपने आंगन तक सीमित कर दिया है । स्वचालित खिलौने, दूरदर्शन और सेटेलाइट चैनलों ने बचपन की तस्वीर ही बदल दी है । रही सही कसर पूरी कर दी है किताबों के बढते बोझ ने \ उम्र से जुडी चंचलता, बालसुलभ शरारतें, सहजता और अल्हडपन अब कहां हैं । कुल मिला कर बचपन की पूरी तस्वीर ही बदल गई है । लेकिन बहुत समय नही बीता जब बचपन का मतलब कुछ अलग ही था । पीछे छूट चले उन दिनों को याद करें तो बे-साख्ता याद आते हैं कुछ द्र्श्य -

" आओ बच्चों खेलेंगे, गुड की भेली फोडेंगे, चम्पा फूल बिखेरेंगे, जिसकी मां न भेजे उसकी मां लंडूरी " । अपने संगी साथियों की यह टेर सुनते ही सभी घर से निकलने लगे हैं । आखिर किसे नही है अपनी मां के सम्मान का ख्याल । अब काफी बच्चे जमा हो गये हैं लेकिन फैसला करना है कि कौन सा खेल खेलें। लीजिए यह भी तय हो गया । सभी ने हामी भर दी है । अब टीम बनानी है और यह भी तय करना है कि पहली बारी किसकी होगी । लेकिन इसमें भी कोई मुश्किल नही । आंख मिचौली के लिए बच्चे एक लाइन मे खडे हो गए हैं । एक बच्चा हर शब्द के साथ प्रत्येक बच्चे पर उंगली रखता कह रहा है " ईचक दीचक दाम दडाचक, लोहा लाठी चंदन घाटी, पटके डोरा मक्खन मोरा....जिस बच्चे पर गीत का आखिरी शब्द आता है वह बाहर होता जा रहा है और अंत मे दो बच्चों मे से जो एक रह गया है उस पर ही पहली पोत (बारी) शुरू होनी है ।

मैदान के दूसरे कोने मे बच्चों का एक और झुंड । उन्होने ' कोडा जमालशाही ' खेलने का फैसला कर लिया है । वहां भी फैसला होना है कि पहली पोत कौन देगा । एक बच्चा ' इक्की विक्की जौ की टिक्की, कांणा कौन.......' कह कर हर बच्चे पर उंगली रखता आगे बढ रहा है । जिस पर गीत का अंतिम शब्द आता है वह बाहर । अंत वाला फंसा । पहले उसकी बारी । उसे छोड सभी बच्चे एक लाईन मे जमीन पर उकडु बन कर बैठ गये हैं और वह एक हाथ मे एक कपडा लिए सभी की पीठ से चक्कर लगा कहता जा रहा है, ' कोडा जमालशाही पीछे देखे मार खाई ' । जिस किसी के पीछे वह कपडा डाल देगा और उसे आभास न हो सके तो वश फंस जायेगा और पहला वाला उसकी जगह बैठ जायेगा । लेकिन जो कोई चालाकी से पीछे मुड कर देखने की कोशिश मे रहेगा उसकी कपडे से पिटाई भी पक्की है । भला पिटाई कौन चाहेगा ।

लेकिन आज कहीं नही दिखाई देते कोडा जमालशाही खेलते बच्चे । यही नही, अनायास याद आने लगती है कबड्डी की धमाचौकडी " छ्ल कबड्डी आल ताल, मर गये बिहारी लाल, उनकी मूंछे लाल लाल ...." छू जाने से कौन मर गया और कौन जिंदा है, इस पर अक्सर विवाद हो जाया करता । कबड्डी की धर-पकड के अलावा सेवन टाइल्स यानी एक के ऊपर एक रखे सात पत्थरों को गेंद से तोड कर भागने वाला खेल भी कम रोचक न था । दो दलों के बीच खेले जाने वाला यह खेल बच्चों की खूब कसरत करवाता ।

" कीलम कांटी " मे भी कम मजा नही था । लेकिन " आइस-पाइस " के खेल मे कौन कहां छिप गया, पता लगाना मुश्किल हो जाता लेकिन अगर दिखाई पड गये तो तपाक से आइस-पाइस कह कर उसे मरा हुआ मान लिया जाता । अपने को छिपाने के लिए कोई घनी झाडी के अंदर दम साधे बैठ जाता तो कोई किसी गड्ढे मे उकडू बन कर । किसी को अच्छी जगह नही मिली तो दीवार की आड ही बहुत है । जो नजर मे आ गया और देखते ही ' आइस पाइस ' कह दिया फिर सभी को ढूंढने की बारी उसकी । लुका छिपी का यह खेल बडा मजा देता । बच्चे लंच टाइम मे स्कूल के अंदर भी यह खेल खूब खेलते और जैसे ही लंच टाइम ख्त्म होने की घंटी बजती, जो जहां  छिपा होता  निकल कर अपनी अपनी कक्षा मे चला जाता ।

भाग दौड व दूसरों को छ्काने का खेल " कांए डंडी " किसी बाग या पेडों के झुरमुटों के बीच खेला जाता । एक छोटी सी डंडी को दूर फेंक कर एक लडका दूसरे लडकों को छूने दौडता । लेकिन वे पेडों पर चढ जाती । वह छूने पेड पर चढता तो वह पेड की लचीली डालियों से झूल कर तुरंत नीचे कूद पडते । इस तरह पोत वाले बच्चे को खूब पिदाया (परेशान) जाता । लेकिन अब शहरों मे  कहां हैं ऐसे पेड जिन पर बंदरों की तरह झूला जा सके । बांस की तरह मुंह उठाये सीधे खडे यूकेलिप्टस के पेडों मे कोई चाहे भी तो कैसे झूल सकता है ? वैसे भी शहरों मे अब पेडों के झुरमुट कहां ।

इन खेलों मे बच्चे एक दूसरे को खूब हैरान परेशान करते । लेकिन क्या मजाल कि कोई नियम विरूध्द चला जाए । कभी कधार कोई बच्चा ज्यादा परेशान होकर अपनी पोत (बारी) देने से इंकार कर देता तो बच्चे उसे आसानी से छोडते नही । लेकिन कोई हठ ही कर ले कि वह अपनी बारी नही देगा तो बाकी बच्चे जोर जोर से गाने लगते " पोत पोत पुलकारेंगे, बांसुरी बजाएंगे, बांसुरी का टूटा तार, जो कोई पोत न दे उसकी मां के नौ सौ यार " । यह सुन कर वह रोते हंसते, खीजते-झुंझलाते अपनी बारी जरूर दे देता ।

इन खेलों के अलावा कंचे और पिन्नियां खेलने का आलम तो यह था कि स्कूल हो या कि घर, लडकों  की जेबें कंचों से भरी रहती । जहां कहीं दो चार बालक जमा हुए और समय मिला तुरंत जमीन मे ' गुच्चक ' बना दी जाती और खेल शुरू हो जाता । घरों मे कंचें किसी शीशी या डिब्बे मे बडे जतन से रखे जाते और अगर शाम तक कुछ कंचे जीत कर उनमे इजाफा हो गया तो खुशी का ठिकाना न रहता । अक्सर इस बात पर होड रहती कि किसके पास सबसे  ज्यादा कंचे हैं । लडकों के बीच यह कंचे इतने लोकप्रिय थे कि हर दुकान पर आसानी से मिल जाते । दस पैसे मे दस  रंग बिरंगे कंचे । लेकिन देखते देखते यह कंचे भी बचपन से जुदा हो गये । अब शायद ही कहीं कंचे खेलते बच्चे नजर आएं ।

`पिन्नियां भी बचपन का हिस्सा रही हैं । पेड मे लगने वाली गोल गोल छोटी छोटी इन पिन्नियों का खेल भी बिल्कुल कंचों की ही तरह होता । इन्हें आकर्षक बनाने के लिए बच्चे अपनी पिन्नियों को अलग अलग रंगों मे रंग भी दिया करते थे । इन्हें संभाल कर रखा जाता था । क्या मजाल जेब से एक भी पिन्नी इधर उधर हो जाए ।इनकी कीमत हीरे जवाहरातों से कम न होती । प्र्त्येक बच्चे को अपने स्कूल व मुहल्ले के आसपास लगे पिन्नी के पेडों की जानकारी भी होती । लेकिन यह पिन्नियां भी अब सिर्फ अतीत से जुडी एक याद बन कर रह गई है । मौजूदा पीढी के बच्चे तो इसके नाम से ही परिचित नही ।

किशोर उम्र के लडकों मे लटटू नचाने  का नशा भी कम न था । कंचे खेलने से फुरसत् मिली तो लट्टू नचाने मे लग गये । लेकिन लट्टूओं का मतलब आधुनिक चाभी से चलने वाले लट्टूओं से नही बल्कि लत्ती ( नचाने के लिए धागे की एक मजबूत डोर ) से नचाने वाले लट्टू से है । तब दस-पन्द्रह पैसे मे अच्छा लटटू  मिल जाया करता था । लट्टू भी  कई आकार प्रकार के होते । गोल लट्टू, अंडाकार और लंबे आकार के लट्टू । आकार मे कुछ छोटे, कुछ मध्यम और कुछ काफी बडे आकार के । हर बच्चे के पास कई कई लट्टू होते । अक्सर लटटू  मे लगी कील से जेब फट जाया करती लेकिन इसकी चिंता किसे  थी । गाहे बगाहे घर मे डांट भी पडती लेकिन लट्टू के आगे सब बैकार । सच कहा जाए तो तब लट्टू और बचपन एक दसरे के पर्याय थे ।

वक्त ने ऐसी करवट् बदली किअन्य खेलों की तरह लटटू -लत्ती भी हाशिए पर चले गये । अब कम से कम शहरों मे तो लटटू नचाते बच्चे कहीं नजर नही आते । अगर बच्चे जानते हैं तो फर्श पर चाबी से नाचने वाले आधुनिक लटटू को । लेकिन इनमे वह बात कहां । आज के बच्चों को तो यह भी नही मालूम कि कभी डोरी से नचाने वाले लकडी के बने लटटू भी हुआ करते थे जिन्हें जमीन पर नचाया जाता और उनसे कई तरह के खेल खेले जाते । माता पिता भी पुराने खेलों के बारे मे बताने व समझाने की जहमत नही उठाते ।

बहरहाल मौजूदा दौर को दरकिनार कर फिर अतीत मे डूबकी लगाएं तो और भी तरह तरह के खेल याद आने लगते हैं । याद आते हैं गोल घेरा बनाए एक दूसरे का हाथ पकडे गीत गाते बच्चे " हरा समंदर, गोपी चंदर, बोल मेरी मछ्ली कितना पानी...."  । गोल घेरे के बीच मे खडी लडकी पैरों से शुरू करते हुए बताती है " इत्ता पानी, इत्ता पानी ...."  जैसे ही पानी सर के ऊपर आता है घेरे मे खडे सभी बच्चे इधर उधर भाग चलते हैं और बीच मे खडी उस लडकी को उन्हें छूना या पकडना पडता है । जिसे छू दिया वह घेरे के बीच मे आयेगा ।और फिर नये सिरे से " हरा समंदर.......।

बैठ कर खेले जाने वाले खेलों मे चोर सिपाही खेलना भी बच्चों को बहुत भाता था । इसमे पर्ची निकाल कर चार बच्चे  राजा, वजीर, चोर व सिपाही बन जाया करते । और फिर राजा के आदेश मे वजीर बने बच्चे को चोर की पहचान करनी होती । गलत बताने पर राजा वजीर को थप्पड भी मार दिया करता ।

एक मजेदार खेल पानी मे भी खेला जाता । गांव के बच्चे इस खेल को खूब मस्ती से खेलते । इस पानी के खेल को " लाल बहेडिया " कहा जाता । यह किसी तालाब या नहर मे खेला जाता । लेकिन समय के साथ इस खेल को भी भुला दिया गया ।

इस तरह के तमाम खेल बचपन से जुडे थे । मौसम और समय के पहर के हिसाब से भी किस्म किस्म के खेल हुआ करते थे । जिनसे न सिर्फ बच्चों का मनोरंजन होता बल्कि इन खेलों के माध्यम से बच्चे बहुत कुछ सीखते भी थे । सिंह-बकरी, बारह गोटा, अठारह गोटा, चौबीस गोटा, चीठा मीठा आदि खेल भी काफी प्रचलित थे । गुल्ली डंडा जैसे खेल का तो कहना ही क्या ।

लेकिन अब कहां है यह खेल । बचपन को कुछ तो किताबों के बोझ ने लील लिया बाकी टी.वी. संस्कृर्ति की भेंट चढ गया । जो बचा भी उसे जमाने की हवा ने अपने हिसाब से ढाल दिया । बेशक खेल आज भी हैं और खेलने के साधन भी लेकिन इनमे वह बात कहां जो इन खेलों मे थी । अब शायद ही कोई बच्चा किसी के दरवाजे जाकर खेलने के लिए आवाज लगाता हो । अगर लगा भी दे तो आएगा कौन ?  सच तो यह है कि " आओ बच्चों खेलेंगे, गुड की भेली फोडेंगें.......जैसे गीत बहुत पीछे छुट चले है। सामाजिक  बदलाव  का चरित्र न बदला तो शायद एक दिन हमे यह भी याद न रहेगा कि हमारे बचपन मे कभी " हरा समंदर, गोपी चंदर....या फिर " ईचक दीचक, दाम दहीचक.... जैसे गीतों से जुडे किस्म किस्म के खेल भी थे ।



शुक्रवार, 22 मई 2015

सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा पर कानून



 ( एल. एस. बिष्ट ) - देर से ही सही सरकार ने राष्ट्र्हित मे एक सही कदम उठाने की पहल की है और इस दिशा मे गंभीर प्रयास भी शुरू कर दिए हैं । वैसे तो प्रदर्शनों व आंदोलनों के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की बढती प्रवृत्ति को देखते हुए उच्चतम न्यायालय ने बहुत पहले ही एक कमेटी गठित कर दी थी । इस कमेटी को यह सुझाव देना था कि ' प्रिवेंशन आफ डेमेज टू पब्लिक प्रापर्टी कानून 1984 '  को किस तरह से और अधिक प्रभावी बनाया जा सके । लेकिन काफी समय तक इस दिशा मे कोई विशेष प्रगति नही हुई थी । अभी हाल मे कमेटी ने अपनी सिफारिशें सरकार को दे दी हैं ।इसमें  सरकारी संपत्ति की रक्षा मे वर्तमान कानून को कमजोर बताते हुए इसे और अधिक कठोर बनाने के सुझाव भी दिए हैं । अब गृह मंत्रालय इस कानून को सख्त बनाने की दिशा मे सक्रिय हुआ है तथा इस संबध मे देशभर से राय व सुझाव भी मांगे हैं ।

इस कानून को कुछ इस तरह से सख्त बनाया जायेगा कि प्रदर्शनों व आंदोलनों के दौरान किए गये सरकारी संपत्ति के नुकसान के लिए अब भारी जुर्माना देना पडे तथा लंबी कैद की सजा भी ।

यहां गौरतलब है कि इधर कुछ वर्षों से देश मे नागरिक अधिकारों व प्रजातंत्र के नाम पर ऐसे व्यवहार का प्रदर्शन किया जाने लगा है कि एक्बारगी यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि इसे राष्ट्र्हित कहें या फिर राष्ट्र्द्रोह । राजनीतिक रूप से ' भारत बंद " या ' प्र्देश बंद अथवा शहर बंद का नारा हो या फिर छोटी छोटी नागरिक समस्याओं को लेकर प्रदर्शन करना, सडक जाम कर लोगों को असुविधा मे डालना तथा सरकारी संपत्ति का नुकसान करना, यह सब अब रोज की बात है । शुरूआती दौर मे यह कभी कधार देखने को मिलता था लेकिन अब तो मानो इसे एक हथियार बना दिया गया हो ।

देखा जाए तो शुरूआती दौर मे सरकारी संपत्ति के नुकसान का श्रेय भी हमारी राजनीतिक संस्कृर्ति को ही जाता है । बंद के आयोजनों तथा राजनीतिक प्रदर्शनों मे सत्ता पक्ष दवारा किये जाने वाले विरोध की प्रतिक्रिया स्वरूप सरकारी गाडियों , इमारतों आदि को आग के हवाले कर देने से इसकी शुरूआत हुई । तब इसे इतनी गंभीरता से नही लिया गया । लेकिन धीरे धीरे इसे अपने विरोध का एक कारगर तरीका ही बना दिया गया ।

आज स्थिति यह है कि किसी मुहल्ले मे बिजली की परेशानी हो या फिर पानी की समस्या, देखते देखते लोग सडक जाम कर धरना-प्रदर्शन शुरू कर देते हैं । पुलिस के थोडा भी बल प्रयोग या विरोध से यह प्रदर्शन आगजनी व तोडफोड के हिंसक प्रदर्शन मे बदल जाता है । थोडी ही देर मे कई सरकारी वाहनों को आग के हवाले कर दिया जाता है । सबकुछ शांत हो जाने पर इस भीडतंत्र का कुछ नही बिगडता । एक औपचारिक पुलिस रिपोर्ट अनजान चेहरों की भीड के नाम लिखा दी जाती है । इस तरह की रिपोर्ट लिखवाने का मकसद ऐसे तत्वों को सजा दिलवाना नही बल्कि सरकारी स्तर पर अपनी ' खाल बचाना '  होता है । खाना पूरी के बाद लाखों करोडों के सरकारी नुकसान को बट्टे खाते मे डाल कर फाइल बंद कर दी जाती है ।

यहां गौरतलब यह भी है कि सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के इस कार्य का विस्तार अब सिर्फ राजनीतिक प्रदर्शनों या नागरिक धरनों तक सीमित नही है । न्क्सलवाद व क्षेत्रीयवाद के नाम पर भी ऐसा किया जा रहा है । नक्सलियों दवारा आए दिन सरकारी वाहनों व पुलों को उडाने की खबरें आती रहती हैं । देश के नक्सली प्रभावित क्षेत्रों मे प्रतिवर्ष करोडों रूपयों की सरकारी संपत्ति इस ' वैचारिक विरोध ' की भेंट चढ जाते हैं । आंध्र प्रदेश , महाराष्ट्र , छ्त्तीसगढ, झारखंड व बिहार जैसे राज्यों मे तो करोडों रूपयों की सरकारी संपत्ति का नुकसान प्रतिवर्ष हो रहा है ।

कुछ समय पहले इस संदर्भ मे एक पत्रिका मे एक चुटकला प्रकाशित हुआ था कि देश मे अगर किसी चार साल के बच्चे को भी किसी बात पर अपना आक्रोश व्यक्त करना है तो  वह भी अपनी दूध की बोतल को किसी सरकारी बस की तरफ ही फेकेगा । बेशक यह एक अतिश्योक्तिपूर्ण प्रसंग हो लेकिन हालातों की एक बानगी तो प्रस्तुत करता ही है ।

दुर्भाग्यपूर्ण दुखद स्थिति तो यह है कि अपने गुस्से का इस प्रकार से इजहार करते हुए शायद ही कभी किसी ने सोचने की जहमत उठाई हो कि आखिर यह सरकारी संपत्ति आई कहां से ?  क्षण मात्र के अगर य्ह विचार मस्तिष्क में कौंध जाए तो संभवत: उठे हुए हाथ वहीं ठहर जाएं । लेकिन ऐसा होता नही है । इस तरह सरकारी संपत्ति से यह खिलवाड बदस्तूर जारी है ।

वैसे देखने वाली बात यह भी है कि ऐसे ही कानूनों की आवश्यक्ता कुछ अन्य क्षेत्रों मे भी है । जिस तरह से सार्वजनिक स्थलों व सेवाओं के प्रति हमारी एक लापरवाह व स्वार्थी मानसिकता बन गई है, उसे देखते हुए कानून का भय जरूरी हो गया है । बेशक मन से न सही, कम से कम सजा के भय से तो कुछ अच्छे परिणाम मिलने की संभावना बनेगी । इसलिए अब जरूरत इस बात की है कि इस कानून को यथाशीघ्र सामयिक व सख्त बना कर देश भर मे लागू किया जाए तथा सरकारी संपत्ति के प्रति जो नजरिया बन गया है उसे बदला जाए ।

एल.एस.बिष्ट, 11/508, इंदिरा नगर, लखनऊ-16

मंगलवार, 12 मई 2015

पर्वतारोहण से मैला होता हिमालय




(एल.एस.बिष्ट )- हिमालय अभी हाल मे चर्चा का विषय बना । नेपाल मे आए भूंकप ने हिमालय की चोटियों पर जो कहर बरपाया उसमें कई पर्वतारोहियों को अपनी जान गंवानी पडी । लेकिन जिस तरह से यहां पर्वतारोहण की एक होड सी लगी है उसमें इस तरह की घटनाओं का होना कोई आश्चर्य का विषय भी नही । प्रतिवर्ष कई लोग इन बर्फीली चोटियों मे हमेशा के लिए दफन हो जाते हैं । लेकिन एक साथ इतनी मौतों ने कुछ सवाल भी खडे किये हैं । कहीं ऐसा तो नही कि रोमांच के शौकीन लोगों के लिए हिमालय की यह चोटियां एक पिकनिक स्पाट का रूप लेने लगी हों ।
इधर कुछ समय से पर्वतारोहियों की जो बाढ आयी है इसने यहां की चोटियों को किस हद तक कूडे के ढेर मे तब्दील कर दिया है , इस पर अभी गंभीरता से सोचा जाना बाकी है । लेकिन यहां की बर्फीली चोटियों मे बढते प्रदुषण की तरफ प्रधानमंत्री ने चिंता जाहिर की है और इसे प्रदूषण मुक्त किये जाने के अपने वादे को दोहराया है ।

सर एडमंड हिलेरी ने कभी कहा था कि हिमालय एक थाती है जो मात्र भारत और उसके आसपास के देशों की ही न होकर सारी दुनिया की है । उनका मानना रहा है कि अपने अनूठे आकर्षण के कारण ही एक बार जो इस प्रदेश आता है, यही का हो जाता है । लेकिन आज पर्वतारोहण अभियानों की बाढ ने इसे गंदगी और प्रदूषण का पर्याय बना दिया है । गतिविधियों की इस बाढ के फलस्वरूप हिमालय क्षेत्र मे प्रदूषण किस सीमा तक बढ गया है, इसका अंदाजा अस्सी के दशक मे ही हो चुका था ।

1983 मे दिल्ली मे हिमालय पर्वतारोहण एवं पर्यटन सम्मेलन आयोजित किया गया था । इस सम्मेलन मे भारतीय पर्वतारोहण संस्थान के तत्कालीन अध्यक्ष ने आगाह किया था कि हिमालय कि हिमालय प्रदेश मे निरंतर गंदगी फैलाई जा रही है । शिखरों को जाने वाले मार्ग कूडे के अंबार बने हैं । पेड पौधों का सत्यानाश किया जा रहा है । लेकिन यह चेतावनी अनसुनी ही रह गई । इस दिशा की तरफ कभी गंभीरता से सोचा ही नही गया ।

इधर कुछ वर्षों से पर्वताहियों की बाढ सी आ गई है । वर्ष 1960 मे हिमालय अंचल मे मात्र बीस पर्वतारोही अभियान गये लेकिन अब इनकी संख्या प्रतिवर्ष 300 से भी ज्यादा है । पर्वतारोहण के नाम पर भी अनेक संस्थाएं उग आई हैं । इसका एक बडा कारण एवरेस्ट विजय को एक उपलब्धि के रूप मे महिमामंडित करना भी रहा है । इसके अतिरिक्त प्रचार तंत्र विजयी  लोगों को जिस तरह से आंखों पर बैठाता है उसने भी पर्वतारोहण का एक ऐसा ' क्रेज ' पैदा किया जिसकी अब कोई सीमा नजर नही आती ।

दर-असल 1953 मे एवरेस्ट की पहली विजय के बाद देशी-विदेशी पर्वतारोहियों का जो सिलसिला शुरू हुआ उसने एवरेस्ट को एक कूडे के ढेर मे बदल दिया है । पुरूषों के बाद महिलाएं भी कीर्तिमान बनाने की होड मे शामिल हो गयीं हैं । बचेन्द्री पाल व संतोष यादव की सफलता ने देश मे महिला पर्वतारोहियों को एक नया उत्साह दिया और अब तो एक होड सी लग गई है ।

सर्वोच्च शिखर मे सफलता के झंडे गाडने की होड ने हिमालय क्षेत्र को किस स्थिति तक पहुंचा दिया है, इस पर किसी का ध्यान नही गया है । प्रचार माध्यम भी कीर्तिमानों का ही बखान करते रहे । अब जब हालात बद से बदतर होने लगे हैं तथा पर्यावरण की गंभीर समस्या आ खडी हुई है, इस दिशा मे सोचा जाने लगा है । हिमालय की चोटियों पर बढती गंदगी को लेकर  प्रधानमंत्री की चिंता इसका प्रमाण है।  वस्तुत: इन अभियानों की बाढ ने हिमालय के इस क्षेत्र को गंदगी और प्रदूषण का पर्याय बना दिया है । इन अभियान दलों के सदस्यों दवारा फैलाया गया कूडा-कचरा जैसे कि पोलीथीन, खाली टिन के डिब्बे, जूस व अन्य पेय पदार्थों के डिब्बे, रस्सी-खूटियां व अन्य सामान इतनी बडी मात्रा मे जमा हो गए हैं इन्हें यहां से हटाना अपने आप मे एक मुश्किल काम है । कूडे कचरे के बारे मे एक बार बछेन्द्रीपाल ने स्वयं कहा था कि साउथ पोल ( 26000 फुट ) पर इतना कूडा एकत्र हो गया है कि उससे एक मकान बनाया जा सकता है ।

आज हालात यह हैं कि आधार कैंप से लेकर एवरेस्ट की चोटी तक, पूरे मार्ग मे जगह जगह कूढे के ढेर दिख जायेंगे । यहां गौरतलब यह भी है कि ठंडे मौसम के कारण यहां कचरा उसी स्थिति मे लंबे समय तक पडा रहता है । समस्या गंभीर होती देख बीच बीच मे कुछ सफाई प्रयास भी किये गये लेकिन उनसे कोई बहुत अधिक लाभ नही मिला । लेकिन अब पानी सर के ऊपर से बहने लगा है । यह जरूरी हो गया है कि इस दिशा मे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्र्यास किये जाएं तथा इस हिमालय क्षेत्र को प्रदूषण मुक्त करने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अभियांन दलों को अनुमति देने की शर्तें और भी  कडा कर दिया जाएं ।  इसके साथ ही अभियानों की संख्या को भी सीमित रखना बेहद जरूरी है । । समय रहते इस ओर गंभीरता से न सोचा गया तो यह हिम शिखर गंदगी का ढेर बन कर रह जायेंगे ।

गुरुवार, 7 मई 2015

प्रपंच की राजनीति


( एल. एस. बिष्ट ) -मौजूदा परिद्र्श्य को देखें तो लगता है कि मूल्यों और मुद्दों की राजनीति का दौर अब इतिहास का हिस्सा बन चुका है । अब अगर कुछ शेष है तो तात्कालिक लाभ की राजनीति और उसे प्राप्त करने की जिद्दोजहद । इधर कुछ समय से मूल्यविहीन राजनीति की जो संस्कृति विकसित हुई है उससे सबसे बडा अहित उस समाज का ही हुआ है जिसके " सेवक " बनने के दावे करते हुए राजनेता नही अघाते । महत्वहीन बातों को लेकर धरना-प्रदर्शन व शोर-शराबा तो अब रोज की बात है । गैर जरूरी मुद्दों पर बेतुके बयान देकर चर्चा मे रहना भी मानो नेताओं का शगल बन गया है । गौरतलब तो यह है कि ऐसा किसी दल विशेष के साथ नही है अपितु यह पूरे देश की राजनीतिक संस्कृति बन चुकी है ।

इधर पिछले कुछ घटनाक्रमों को देखें तो बात पूरी तरह से साफ हो जाती है । मामला चाहे धर्म परिवर्तन (लव जेहाद ) का हो या फिर बलात्कार व महिला उत्पीडन का अथवा राजनीतिक प्रेम प्रसंग या फिर बाबा रामदेव की पुत्रजीवक औषधी का , एक अलग किस्म की राजनीति देखने को मिली है । कहीं कोई गंभीरता नहीं बल्कि घटिया बयानबाजी और न्यूज चैनलों की अतार्किक बहस को देख कर तो आमजन भी यह समझने लगा है कि हमारे राजनेताओं मे विषय की जानकारी का नितांत अभाव है ।

कुछ समय से महिला सबंधी खबरों पर तो मानो बेतुके बयानबाजी करने की एक होड सी लग गई है । मानवीय संवेदनाओं से जुडी इन खबरों पर जिस तरह की राजनीतिक चर्चाएं हुईं, उससे यह बात साफ हो गई कि हमारी राजनीतिक बहसों का स्तर अब अपने न्यूनतम स्तर तक पहुंच गया है । यही नही, राजनीतिक लाभ के लिए इन खबरों को लेकर जो भडकाऊ राजनीति की गई उसने सारी सीमाओं को लांघ दिया । यही नही, इस शैली ने इस संवेदनशील मुद्दे को एक पाखंडपूर्ण व्यवहार मे तब्दील करने मे कोई कोताही नही बरती । सच तो यह है कि इस राजनीतिक व्यवहार ने तार्किक चर्चा व बहस से कुछ ठोस निर्णयों व नतीजों पर पहुंचने की संभावनाओं को भी पूरी तरह धुमिल कर दिया । दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि यह सिलसिला अभी रूका नही है ।

हाल की कुछ राजनीतिक घटनाओं को लेकर जिस राजनीतिक तमाशेबाजी का प्रदर्शन देखने को मिला, उसने देश की राजनीतिक छवि को आहत ही किया है । भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर किसानों के हितैषी व झंडाबरदार बनने की होड मे जो तमाशे किए जाते रहे हैं उसने एक तरह से पूरे कृषक समुदाय का उपहास ही उडाया है । किसानों की आत्महत्याओं से उपजे बडे सवाल इस राजनीतिक तमाशे की भेंट चढ गये । आत्महत्या जैसी मार्मिक घटनाएं महज राजनीतिक ' हथियार ' बन कर रह गईं । विरोध की राजनीति तर्कसंगत है लेकिन विरोध का तरीका भी मानवीय संवेदनाओं से कट कर नही होना चाहिए । ' आप ' पार्टी की रैली मे एक किसान दवारा की गई आत्महत्या और फिर उसको लेकर की गई राजनीति से हमारी राजनीतिक संस्कृति का जो भदेस चेहरा सामने आया उसने देश मे भविष्य की राजनीति पर भी गंभीर सवाल खडे किये हैं ।

बाबा रामदेव की एक औषधी से जुडा मामला भी हमारे राजनीतिक दिवालियेपन का उदाहरण बना । ' पुत्रजीवक ' नाम की इस औषधी का कुछ नेताओं ने यह मतलब निकाल दिया कि इसका उपयोग पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता है । देखते देखते तमाम बडबोले राजनेता बैसिर-पैर की बहस करने लगे । हमारे टी.वी. चैनलों को तो मानो मुंह मांगी मुराद मिल गई हो । शुरू हो गया चर्चाओं का दौर । किसी ने भी इस बात पर तनिक ध्यान देना उचित नही समझा कि दवा के पैकेट पर साफ लिखा है कि दवा बंधत्व दोष दूर करने हेतु है यानी जिन महिलाओं को किन्हीं कारणों से संतान नही होती वह इस दवा का उपयोग कर संतान सुख प्राप्त कर सकते हैं । लेकिन तत्काल ही नेताओं की एक ऐसी फौज तैयार हो गई जिसने इसे पुत्र प्राप्ति से जोड दिया । और बाबा रामदेव को महिला हितों के विरूध्द होने का टैग लगा दिया गया । गैर जिम्मेदारी और बौध्दिक दिवालियेपन का यह एक रोचक उदाहरण बना ।

हमारी इस राजनीतिक संस्कृति से उपजा एक और मामला पंजाब मे सामने आया । एक बस मे सवार मां- बेटी कुछ लोगों की छेडछाड से बचने के लिए बस से कूद पडीं जिसमें बेटी की मौत हो गई । इत्तफाक से बस का संबध बादल परिवार से था । बस क्या था । देखते देखते सत्ता के गलियारों से लेकर सडकों तक एक् तमाशा शुरू हो गया । मौत पर राजनीति का यह रंग देख किसी का भी मानवीय मूल्यों से भरोसा उठना स्वाभाविक ही है ।


बात यहीं तक सीमित नही है । "आप " पार्टी की एक महिला कार्यकर्ता को लेकर कुमार विश्वास और पूरे मामले पर जो राजनीतिक तमाशा खडा किया गया, वह भी गैर जरूरी ही था । लेकिन अब मानो यही राजनीति का स्थाई चरित्र बन गया हो । जिन बातों को नजर-अंदाज किया जाना चाहिए, उन्हें एक बबंडर का रूप देकर खूब राजनीतिक रोटियां सेंकी जाने लगी हैं । अलबत्ता इस चुहा दौड मे न किसी को राजनीतिक मूल्यों से कोई लेना देना है और न ही मानवीय संवेदनाओं से । राजनीति का यह अमानवीय चेहरा और पाखंडपूर्ण राजनीतिक शैली, देश को किस दिशा की ओर ले जायेगी, पता नही । यह तो समय के गर्भ मे है । लेकिन इतना तय है कि यह इस लोकतांत्रिक देश के हित मे कतई नही । 

शनिवार, 2 मई 2015

अब नेपाल के सामने पहाड सी चुनौतियां




( L. S. Bisht ) -    हिमालय की गोद मे 147181 वर्ग किलोमीटर मे बसे नेपाल मे प्रकृति ने जो तांडव किया इसने पूरी दुनिया को न सिर्फ़ विचलित किया अपितु सोचने पर भी मजबूर कर दिया | चंद लम्हों मे आई इस भीषण तबाही से इस देश मे जान माल का जो नुकसान हुआ है उसका आकलन करना इतना आसान नही | लेकिन खुली आंखों से जो मंजर दिखाई दिया, उससे इतना तो स्पष्ट है कि अब इस हिमालयी देश को अपने पैरों मे खडे होने मे बहुत समय लगेगा | ऐसे मे तबाह हो चुकी इस देश की अर्थव्यवस्था को पटरी मे लाने के लिए विश्व बिरादरी के मदद की दरकार होगी |
     वैसे तो मौत और तबाही के इन भावुक लम्हों मे विश्व समुदाय ने यथासंभव मदद कर घावों मे मलहम लगाने का भरसक प्रयास किया है लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर इस देश के लिए इतना ही प्रर्याप्त नही है | दुनिया के तमाम देशों की यह संवेदना तो उसके ताजे रिसते हुए घावों मे मलहम का काम करेगी ही लेकिन असली परीक्षा तो अब शुरू होगी |
     दर-असल इधर कुछ वर्षों से नेपाल राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजरता रहा है | हाल मे हालात कुछ सामान्य हुए और विकास के रूके हुए कामों को कुछ गति मिलने लगी थी | लेकिन भूकंप की इस विनाशलीला ने सबकुछ तहस नहस कर इस देश को फ़िर कहीं पीछे धकेल दिया है |
     अमरीका के भौगोलिक सर्वे ने अपनी वेबसाइट पर लिखा है कि चंद मिनटों मे नेपाल को 10 अरब डालर ( करीब 63,000 करोड रूपये ) का नुकसान हो गया है | नेपाल की कुल अर्थव्यवस्था 20 अरब डालर ( 1,26,000 करोड रूपये ) है | सर्वे मे कहा गया है कि नेपाल की आधी अर्थव्यस्था खत्म हो गई है |
     यूनाइटेड स्टेट्स जियोलाजिकल सर्वे मे भी शुरूआती अनुमान के अनुसार भूकंप से नुकसान 10 अरब डालर तक हो सकता है | लेकिन चूंकि भूकंप 25 अप्रेल के बाद भी लगातार आता रहा है इसलिए नुकसान इस अनुमान से कहीं ज्यादा होने की संभावना है | कुछ ने इस नुकसान का अनुमान नेपाल की कुल सकल घरेलू उत्पाद ( जीडीपी ) यानी 20 अरब डालर के लगभग माना है | बहरहाल पुख्ता अनुमान अभी लगाना संभव भी नही है | लेकिन इतना तय है कि इस त्रासदी ने नेपाल की अर्थव्यवस्था को गहरा धक्का पहुंचाया है | इससे उबरने मे इसे कई वर्षों का समय लगेगा |
     भौगोलिक रूप से तीन भागों – पर्वतीय, शिवालिक और तराई क्षेत्र मे बंटा यह देश पारंपरिक रूप से कृषि आधारित रहा है | 1990 से पूर्व यहां की अर्थव्यवस्था मे कृषि का योगदान 39 प्रतिशत रहा है जो अब घट कर 33 प्रतिशत रह गया था | यह तेजी से बदलते आर्थिक परिवेश के कारण संभव हो सका | हाल के वर्षों मे आए बदलावों के फ़लस्वरूप नेपाल की अर्थव्यवस्था मे सेवा क्षेत्र की भूमिका तेजी से बढी है | यहां के सकल घरेलू उत्पाद मे इसका योगदान 52 प्रतिशत से अधिक है | इस क्षेत्र मे आय का प्रमुख जरिया पर्यटन उद्योग है |
     सांस्कृतिक रूप से नेपाल की एक समृध्द विरासत रही है | यहां समय के विभिन्न कालखंडों मे विभिन्न राजाओं दवारा बनाये गये मंदिरों की भरमार है | यूनेस्को की सात विश्व धरोहर भी नेपाल में ही हैं | इस सांस्कृतिक व पुरातत्व महत्व की पृष्ठ्भूमि के कारण यहां प्रतिवर्ष लगभग आठ लाख पर्यटक आते हैं | जिससे देश को लगभग 45 करोड डालर की आय होती है | इसके अतिरिक्त पर्यटन उद्योग मे रोजगार भी तेजी से बढा है | लेकिन अब जबकि अधिकांश पर्यटन स्थलों को भारी नुकसान पहुंचा है तथा कुछ तो पूरी तरह से खत्म ही हो चुके हैं, इसने पर्यटन व्यवसाय की कमर ही तोड दी है | आखिर पर्यटक अब क्या देखने नेपाल आयेगा , यह एक बडा सवाल है | इन्हें दोबारा बनाने, संवारने मे एक लंबा समय लगेगा | एक तरह से इस भूकंप ने नेपाल की अर्थव्यवस्था की रीढ कहे जाने वाले पर्यटन व्यवसाय को पूरी तरह से चौपट कर दिया है | यही इस देश का सबसे बडा चिंता का विषय है |
     इसके अलावा सरकारी इमारतों, अस्पतालों व अन्य सार्वजनिक भवनों के पूरी तरह से बर्बाद हो जाने के कारण भी करोडों रूपयों का जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करना भी इतना आसान नही है | विदेशी निवेश को भी इस भूकंप ने करारा झटका दिया है | यह नेपाल जैसे कमजोर देश के लिए एक सदमे से कम नही |

     कुल मिला कर भूकंप की तंरगें जो गुजर गईं इस देश को ऐसे घाव दे गई जिनका भर पाना निकट भविष्य मे संभव नही दिखता | ऐसे मे इस लाचार, बेबस देश को दोबारा पटरी पर लाने के लिए भारी आर्थिक सहायता की जरूरत होगी | दुनिया के तमाम देश अगर इस दिशा मे ठोस पहल कर सके तो यह नेपाल की बर्बाद अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी का काम करेगा | इसलिए जरूरी है कि तात्कालिक सहायता के साथ साथ ऐसे उपाय भी किये जाएं जिससे इस देश को अपने पैरों मे दोबारा खडे होने मे सहायता मिल सके | यह विश्व बिरादरी की पहल से ही संभव है |