Wednesday, 1 October 2014

कहां खो गया ट्रस्टीशिप का सपना




[ एल. एस. बिष्ट ] - आजादी और इसके आसपास की तारीखों से जुडी घटनाओं पर बहुत कुछ लिखा व कहा जाता रहा है । लेकिन दुर्भाग्य से बहुत सी बातें कई कारणों से अंधेरे में ही गुम होकर रह गई हैं । इस संदर्भ में गौर करें तो आज देश का बच्चा बच्चा गांधी जी के असहयोग, सत्याग्रह, अहिंसा व चरखा आदि से भली भांति परिचित है । लेकिन स्वतंत्र भारत के लिए गांधी जी का एक और सपना था जिसकी पूरी तरह से उपेक्षा कर दी गई । यह सपना था ट्र्स्टीशिप का । सिर्फ यही एक दर्शन था जिसे वह अपने जीवन काल में व्यवहारिक रूप न दे सके । शोषण मुक्त समाज से जुडे इस सपने को गांधीवादियों ने भी भुला दिया । आखिर भारतीय समाज के लिए क्या थी उनकी परिकल्पना, आज इस पर सोचा जाना चाहिए ।
दर-असल यह एक सपना ही नहीं बल्कि देश की भावी अर्थव्यवस्था के संदर्भ में उनका आर्थिक दर्शन था । इसमें उन्होने शोषणमुक्त समाज की स्थापना के लिए व्यक्तिगत संपत्ति का विरोध किया था । उनका मानना था कि कोई भी धनी व्यक्ति संपत्ति का उतना ही भोग का अधिकारी है जितना देश के दूसरे लोगों को प्राप्त है । बाकी संपत्ति का उपयोग उसे दूसरों के लिए करना होगा ।
वे संपत्ति पर वंशागत अधिकार के भी विरोधी थे । वे यह मानते थे कि संपत्ति और मानव उपलब्धियों के सभी रूप या तो प्रकृति या फिर सामाजिक जीवन की देन हैं । इसीलिए वे किसी एक के न होकर पूरे समाज के होते हैं और उनका इस्तेमाल सभी के भले के लिए किया जाना चाहिए ।
दर-असल गांधी जी को शंका थी कि आजादी के बाद पूंजीवादी व्यवस्था पनप सकती है तथा करोडों लोगों को खुशहाली से वंचित किया जा सक्ता है । पश्चिमी देशों में पनपी पूंजीवादी व्यवस्था व शोषण से वे अच्छी तरह से परिचित थे । भारत में ऐसा न हो इसके लिए वे चिंतन करंने लगे थे ।
गुलामी के अंधेरे दिनों में जब वह आजादी की रोशनी के लिए संघर्ष कर रहे थे, उन्होने भावी भारत की तस्वीर का एक खाका खींचा था । देश की अर्थव्यवस्था कैसी होगी, इस बारे मे वे अफ्रीका प्रवास के दौरान ही सोचने लगे थे । उन्होने अपनी आत्मकथा में लिखा है  " गीता के अध्ययन के फलस्वरूप ' ट्र्स्टी ' शब्द का अर्थ विशेष रूप से समझ में आया । ट्र्स्टी के पास करोडों रूपयों रहते हुए भी उनमें से एक भी पाई उसकी नहीं होती । "
भारत लौटने पर उन्होने उपनिषदों का अध्ययन किया और उनसे प्रेरणा ली । उन्होने पाया कि प्रत्येक वस्तु पर ईश्वर का वास है । इसलिए उस पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार हो ही नहीं सकता । उस वस्तु का वास्तविक स्वामी तो ईश्वर है । गांधी जी पर इन धार्मिक विचारों का गहरा प्रभाव पडा और इस तरह ट्र्स्टीशिप सिद्दांत का विचार उनके मस्तिष्क में आया ।
उन्होने " हरिजन " मे एक स्थान पर लिखा है " हमारे पूर्वजों ने हमें विरासत में सच्चा समाजवाद दिया है । उन्होने हमें सिखाया है " सबै भूमि गोपाल की, वामे अटक कहां , जाके मन में अटक है, सोई अटक रहा ।  "
इसके अलावा राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के बहुवर्गीय चरित्र, भारत में अनियंत्रित पूंजीवाद दवारा किए जा रहे गरीबों के शोषण और राज्य की शक्ति के दुरूपयोग की आशंका आदि ऐसे कारण भी थे जिन्होने उन्हें अपने ट्र्स्टीशिप सिद्दांत को व्यापक स्वरूप प्रदान करने मे मदद की । गांधी जी पूंजीवाद की बुराइयों से अपरिचित नहीं थे । उन्हें मालूम था कि अनियंत्रित संपत्ति का नतीजा अंतत: यही होता है कि धनी लोग गरीबों का शोषण करके अथाह धन एकत्र करने की होड में जुटे रहते हैं । और इस तरह अमीर और गरीब के बीच की खाई बढती चली जाती है । लेकिन गांधी जी राज्य की शक्ति बढाने के पक्ष में भी नही थे । इसलिए वे उत्पादन के साधनों के विकेन्द्रीकरण के पक्ष मे अधिक थे ।
लेकिन उन्हें यह भी अच्छी तरह से मालूम था कि यह सब करना इतना आसान नहीं । वे उस वर्ग से विशेष रूप से चिंतित थे जो अंग्रेजी हुकूमत की जी हुजूरी में लगा हुआ था । समस्त सुविधाएं  प्राप्त यह वर्ग आमजन के हितों के बाते मे समाजवादी ढंग से सोचेगा, इस पर गांधी जी को शंका थी । उनका कहना था " सबसे बडी बाधा हमारे बीच, हमारे देश के ही वे निहित स्वार्थ हैं जो अंग्रेज शासन के देन हैं । "
ट्र्स्टीशिप की व्यवस्था धनी वर्ग आसानी से स्वीकार नहीं करेगा, इसका आभास उन्हें था । यही कारण रहा कि इसे लागू करने में उन्होने जल्दबाजी से काम नहीं लिया । वे चाहते थे कि इसके लिए अनुकूल माहौल बने तथा धनी वर्ग जो अंग्रेजी सरकार के तहत सारी सुविधाओं का उपभोग करता रहा है, स्वंय आगे आये । किसी प्रकार का दवाब डालने को वे अनुचित समझते थे । वे धनिक वर्ग को अधिक से अधिक समय देना चाहते थे ताकि वह स्वंय समय की मांग को महसूस कर सकें ।
बहरहाल देश स्वतंत्र हुआ तथा गांधी जी इसे लागू करने के लिए सोचने लगे । उन्होने कई महत्वपूर्ण लोगों से व्यापक विचार विमर्श किया । बडे बडे जमींदारों तथा उद्योगपतियों से उन्होने इस व्यवस्था को लागू करने की बात कही लेकिन उनकी असामयिक मृत्यु के साथ ही सब कुछ भुला दिया गया ।
कुछ समाजवादियों ने अपने प्रयास नये सिरे से प्रारंभ किए । डा. राममनोहर लोहिया ने 1967 में इसे संसद मे पेश करने का प्रयास किया लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से इस पर बहस की इजाजत नहीं मिली । डा. लोहिया के प्र्यास बंद तो नहीं हुए, लेकिन इस बीच उनकी मृत्यु हो गई तथा इतिहास का यह महत्वपूर्ण पन्ना एक बार फिर बंद हो गया ।
ऐसा नहीं कि पुराने कांग्रेसी या समाजवादी इसे भूल गए हैं । उस दौर के कुछ लोग अब भी राजनीति मे सक्रिय हैं लेकिन अब उनकी संख्या बहुत कम हैं और जो हैं भी वे अब निहित स्वार्थों के चलते इसे याद नहीं करना चाहते । कालेधन व पूंजीपतियों की सहायता से चुनाव जीतने वाले ट्र्स्टीशिप की बात किससे कहें । वैसे लोहिया के बाद राजनारायण और जार्ज फर्नाडीज ने 1969 मे लोकसभा के पहले अधिवेशन मे इस मामले को उठाया भी  लेकिन वह बात किसी तरह टाल दी गई ।
बहरहाल अब इस सपने को अब लगभग भुला दिया गया है । सच तो यह है कि न तो गांधी रहे न ही गांधीवाद का वह दौर । सबकुछ बदल गया है । आज के हालातों में तो शायद ही कोई इस मुद्दे पर बात करना चाहेगा । अब तो यह बस इतिहास का एक हिस्सा बन कर रह गया है ।

एल.एस.बिष्ट,
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