Sunday, 15 April 2018

एक आंसू का सफरनामा (16 अप्रैल जन्मदिवस पर)


आज जब दुनिया से हंसी गायब हो रही है बरबस याद आते है चार्ली चैपलिन । दुनिया भर के बच्चे जिस चेहरे को आसानी से पहचान लेते है वह चार्ली चैपलिन का ही है। चैपलिन की फिल्म 'द किड' 1921 में बनी थी उसमे चैपलिन के साथ एक चार साल के बच्चे जैकी कूगन ने अदभुत अभिनय किया था । 'द किड के बाद चैपलिन बुढापे मे कूगन से मिल पाए । यह एक मार्मिक मुलाकात थी । 4 साल का बच्चा अब 57 साल के गंजे आदमी मे बदल चुका था। बूढे चैपलिन की आखो मे आंसू आ गए।

चार्ली की आत्मकथा 1964 में छपी थी। उस समय वह 75 के थे पांच सौ से भी अधिक पृष्ठों वाली इस किताब में चैपलिन ने यादों के सहारे अपने लंबे जीवन का पुनसर्जन किया था । कैसा था उनका बचपन और उनकी जिंदगी, यह सब लिखा है चैपलिन ने ।

"सच तो यह है कि गम और तनाव में डूबे, लोगों को हंसाने वाले मुझ मसखरे कलाकार की जिंदगी में घोर अंधेरा रहा है। सच तो यह है कि मेरी जिंदगी का सफर भीड़ भरे शहर लंदन से शुरू हो कर हालीवुड की रंगीन दुनिया में जाकर ही खत्म नहीं होता । इस सफर में बहुत से मोड़ हैं। जहां शोहरत और ग्लैमर का उजाला ही नहीं बल्कि घोर गरीबी और हालातों का गहरा अंधेरा है। ऐसा अंधेरा जिसे भरपूर उजाले के हाथ कभी छू तक नहीं सके। मेरी यादों में एक छोटा सा घर, उसके अंदर सिमटी दुनिया अब भी जिंदा है । पिता की मौत के बाद किस तरह बदल गई थी मेरी दुनिया और मैं किस तरह घर की सुरक्षित बाहों से छिटक कर मां के साथ खुले आसमान के नीचे आ गया, यह भूला भी कैसे जा सकता है। मैं एक तरह से अनाथ हो गया। पेट की आग ने मुझे कब थिएटर में ला खड़ा किया पता नहीं। रोटी के लिए लगाए गए ठहाकों और मसख़री में मेरी जिंदगी के दुख दर्द पता नहीं कहां दब गए। मैंने दुनिया को हंसाया और हंसते हुए देखा लेकिन मै कब रोया किसी को पता नहीं।"

बुढापे को चार्ली ने अपनी ही शर्तों पर स्वीकार किया । आज चैपलिन हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी फिल्में हमेशा साथ रहेगी। 25 दिसंबर 1977 को यह मसखरा दुनिया को हंसता छोड विदा हो गया।

Tuesday, 27 February 2018

वसंतोत्सवों का चरम है होली


साहित्य में कामदेव की कल्पना एक अत्यन्त रूपवान युवक के रूप में की गई है और ऋतुराज वसंत को उसका मित्र माना गया है ।कामदेव के पास पांच तरह के बाणों की कल्पना भी की गई है ।य़ह हैं सफेद कमल, अशोक पुष्प, आम्रमंजरी, नवमल्लिका, और नीलकमल । वह तोते में बैठ कर भ्रमण करते हैं । संस्कृत की कई प्राचीन पुस्तकों में कामदेव के उत्सवों का उल्लेख मिलता है ।
इन उल्लेखों से पता चलता है कि प्राचीन भारत में वसंत उत्सवों का काल हुआ करता था । कालिदास ने अपनी सभी कृतियों में वसंत का और वसंतोत्सवों का व्यापक वर्णन किया है । ऐसे ही एक उत्सव का नाम था मदनोत्सव यानी प्रेम प्रर्दशन का उत्सव ।यह कई दिनों तक चलता था ।राजा अपने महल में सबसे ऊंचे स्थान पर बैठ कर उल्लास का आनंद लेता था । इसमें कामदेव के वाणों से आहत सुंदरियां मादक नृत्य किया करती थीं । गुलाल व रंगों से पूरा माहैल रंगीन हो जाया करता था । सभी नागरिक आंगन में नाचते गाते और पिचकारियों से रंग फेकते (इसके लिए श्रंगक शब्द का इस्तेमाल हुआ है } नगरवासियों के शरीर पर शोभायामान स्वर्ण आभुषण और सर पर धारण अशोक के लाल फूल इस सुनहरी आभा को और भी अधिक बढ़ा देते थे । युवतियां भी इसमें शामिल हुआ करती थीं इस जल क्रीड़ा में वह सिहर उठतीं (श्रंगक जल प्रहार मुक्तसीत्कार मनोहरं ) महाकवि कालिदास के “कुमारसंभव” में भी कामदेव से संबधित एक रोचक कथा का उल्लेख मिलता है ।

     इस कथा के अनुसार भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था तब कामदेव की पत्नी रति ने जो मर्मस्पर्शी विलाप किया उसका बड़ा ही जीवंत वर्णन कुमारसभंव में मिलता है ।  

     अशोक वृक्ष के नीचे रखी कामदेव की मूर्ति की पूजा का भी उल्लेख मिलता है । सुदंर कन्याओं के लिए तो कामदेव प्रिय देवता थे । “रत्नावली” में भी यह उल्लेख है कि अंत;पुर की परिचारिकाएं हाथों में आम्रमंजरी लेकर नाचती गाती थीं ।यह इतनी अधिक क्रीड़ा करती थीं लगता था मानो इनके स्तन भार से इनकी पतली कमर टूट ही जायेगी ।

     “चारूदत्त” में भी एक उत्सव का उल्लेख मिलता है । इसमें कामदेव का एक भब्य जुलूस बाजों के साथ निकाला जाता था । यहीं यह उल्लेख भी मिलता है कि गणिका वसंतसेना की नायक चारूदत्त से पहली मुलाकात कामोत्सव के समय ही हुई थी ।

     बहरहाल यह गुजरे दौर की बातें हैं । कामदेव से जुड़े तमाम उत्सव अतीत का हिस्सा बन चुके हैं और समय के साथ सौंदर्य और मादक उल्लास के इस वसंत उत्सव का स्वरूप बहुत बदल गया है । अब इसका स्थान फुहड़ता ने ले लिया है ।अब कोई किसी से प्रणय निवेदन नही बल्कि जोर जबरदस्ती करता है और प्यार न मिलने पर एसिड फेकता है । प्यार सिर्फ दैहिक आकर्षण बन कर रह गया है । कामदेव के पुष्पवाणों से निकली मादकता, उमंग, उल्लास और मस्ती की रसधारा न जाने कहां खो गई ।

Thursday, 22 February 2018

नाकाम मोहब्बत की एक दास्तां / मधुबाला (पुण्य तिथि 23 फरबरी )



“ हमे काश तुमसे मुहब्बत न होती, कहानी हमारी हकीकत न होती .........



शायद यह किसी को भी न पता था कि सिनेमा के परदे पर अनारकली बनी मधुबाला पर फिल्माया यह गीत उनकी असल जिंदगी का भी एक दर्दनाक गीत बन  जाएगा  और बेमिसाल हुस्न की मलिका की जिंदगी नाकाम मोहब्बत की एक दर्दनाक  दास्तां  | लेकिन ऐसा हुआ | आखिरकार  तन्हा जिंदगी को समेटे “  पूरब की वीनस “  कही जानी वाली अपार सौंदर्य की इस मालिका ने  23 फ्रबरी 1969 को इस दुनिया को अलविदा कहा था | लेकिन एक दौर गुजर जाने के बाद भी , मुझ जैसे करोड़ों सिने प्रेमियों की यादों मे वह आज भी जिंदा हैं |

       एक अजीब इत्तफाक ही तो है कि 14 फरबरी यानी वेलेंटाइन डे पर इस दुनिया मे आने वाली इस बेमिसाल अदाकारा को न सिर्फ ताउम्र प्यार के लिए तरसना पड़ा बल्कि वह नाकाम मोहब्बत के दंश ताउम्र झेलती रहीं |

       कहते हैं कमाल अमरोही की मोहब्बत मे चोट खाई मधुबाला ने दिलीप कुमार को जुनून की हद तक चाह और प्यार किया लेकिन एक मोड पर आकर यह दास्तान-ए-मोहब्बत भी दफन हो गई और इसी के साथ मधुबाला की तमाम हसरतें भी |

       यह बहुत कम लोग जानते हैं कि सिल्वर स्क्रीन की इस मालिका को जिसने हिंदी सिनेमा की आज तक की सबसे बेमिसाल फिल्म मुगल-ए-आजम मे अनारकली का कभी न भूल सकने वाला किरदार निभाया , जीते जी कोई पुरस्कार नही मिला |  भाग्य का सितम देखिये कि एक ऐसी अदाकारा  जिसने शौक से नही बल्कि अपनी गरीबी से निजात पाने और घर चलाने के लिए नौ वर्ष की उम्र मे सिनेमा की दुनिया मे कदम रखा , उसे जिंदगी के आखिरी कुछ साल अपनी बीमार काया के साथ बिस्तर पर गुजारने पड़े | दर-असल उनके दिल मे एक छेद था और वह उन्हें मौत के आगोश तक ले आया | मात्र 36 वर्ष की उम्र मे हुस्न की इस मलिका को  इस दुनिया से अलविदा कहना पड़ा  | 

       बेशक वह अब इस दुनिया मे नही हैं लेकिन आज भी मोहब्बत मे नाकाम प्रेमियों की उदासियों मे उनकी  दर्दभरी यह आवाज सुनाई देती है....... मोहब्बत की झूठी कहानी पे  रोये , बड़ी चोट खाई जवानी मे रोये | विनम्र श्र्ध्दांजलि |  

Tuesday, 20 February 2018

लड़की की आंखों मे लट्टू होता मीडिया


एक लड़की ने आंख क्या मारी पूरा देश मानो उसका दीवाना हो गया | अपने को जिम्मेदार चौथा खंभा कहने वाले भारतीय मीडिया को तो मानो मन मांगी मुराद मिल गई हो | वह आंख मारने के तौर तरीकों, किस्मों और उसके विशेष प्रभावों पर चौपाल लगाने लगा | बड़े बड़े मुद्दे पीछे छूट गए | यहां तक की सीमा पर रोज-ब-रोज शहीद होते जवानों और उसके बीच पाकिस्तान की गीदड़ भभकी , यह सब कहीं भुला दिये गए | सबसे महत्वपूर्ण खबर बन गई प्रिया प्रकाश नाम की लड़की का आंख मारना |
       प्रिंट मीडिया भी कहीं पीछे नही दिखा | शायद ही कोई अखबार रहा हो जिसमे उसकी फोटो न छपी हो | यही नही, सोशल मीडिया ने तो वह धूम मचा दी की पूरा फेसबुक, टिवटर और वाटसएप प्रिया प्रकाश के ही रंग मे सराबोर हो गया |परिणामस्वरूप एक लड़की जिसे कोई ठीक से जानता तक नही था , कुछ ही घंटों मे सेलीब्रेटी बन गई | उसकी थर्ड ग्रेड दक्षिण भारतीय फिल्मों  के वितरण के लिए होड सी मचने लगी  | निर्माता उसके घर के चक्कर लगाने लगे | उसे स्कूल  मे पढ़ाने वाले टीचर तक उसके गुरू होने पर गर्व करते हुए इंटरव्यू देने लगे | देश भर मे उसकी हम  उम्र की लड़कियां उसके भाग्य से ईषर्या करने लगीं  |
       ऐसा पहली बार नही हुआ | कोलावरी डी गाने से लेकर बेवफा सोनम गुप्ता तक की यही कहानी है | लेकिन जब ऐसी बातों से रातों रात स्टार बनने के लिए देश भर मे लड़कियां ऊंटपटांग हरकते करने लगेंगी , तब यही प्रिंट , इलेक्ट्रानिक और सोशल मीडिया गहरी चिता जताने लगेगा और उसे सांस्क्र्र्तिक प्रदूषण का नाम भी देगा | सारा दोष लड़कियों पर मढ़ते हुए यह  भूल जाएगा की आखिर ऐसे मामलों मे उसने किस ज़िम्मेदारी का परिचय दिया है  और कैसी भूमिका निभाई | सच कहा जाये तो सोशल मीडिया सहित प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया का यह चरित्र जाने- अनजाने बेहूदेपन को ही बढ़ावा दे रहा है | इसे महसूस किया जाना चाहिए |

Tuesday, 23 January 2018

सेक्स अपराधों मे पुरूष ही कटघरे मे क्यों ?

वाकई हम एक भेड़चाल समाज है | एक सुर मे चलने वाले लोग | जब पहला सुर टूटता है तब दूसरे को पकड़ लेते है और इसी तरह तीसरे सुर को | इस तरह ताले बजाने वाले इस सुर से उस सुर मे शिफ्ट हो जाते है |
       आजकल महिला सशक्तिकरण का शोर है | शोर ही नही जोश भी है और इस जोश मे कहीं होंश की भी कमी साफ दिखाई दे रही है | किसी महिला के साथ कहीं कुछ हुआ तो  बस दुनिया के सारे पुरूषों को कठघरे मे खड़ा कर दिया जाता है | फांसी से नीचे तो कोई बात ही नही होती | इसमे एक बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो दोहरा चरित्र रखते है | मन से महिलाओं के हितेषी बेशक न हो लेकिन वाह, वाह करने मे सबसे आगे |

       इधर कुछ समय से अपने स्वार्थों तक सीमित रहने वाले समाज ने अपने हित मे एक ऐसा माहौल बना दिया जिसमे दीगर बात करने वाले या अलग सोच रखने वाले के लिए कोई जगह बची ही नही | अगर किसी ने साहस करके कुछ कहने का प्रयास किया भी तो महिलावादियों की फौज ने उसे “ बैक टू पेवलियन “ के लिए मजबूर कर दिया | वैसे इसका एक दुष्परिणाम यह भी निकला कि दुष्कर्म जैसे मामलों मे जैसे जैसे दवा की गई मर्ज बढ़ता गया | फांसी की सजा के बाबजूद  कोई विशेष प्रभाव पड़ता नजर नही आया |  दर-असल कारणों को जानने के लिए सभी के विचारों को समझा जाना जरूरी था लेकिन महिला हितों के झंडाबरदार कुछ भी अपने विरूध्द सुनने को तैयार नही है | इसलिए तमाम नारों और सख्त कानूनों के बीच समस्या जस की तस है |
       लेकिन जब अति होने लगती है तो कुछ लोग सामने आकर सही और सच कहने का साहस जुटाते है | ऐसा ही एक प्रयास वकील ऋशी मल्होत्रा ने एक याचिका के माध्यम से किया है जिस पर उच्चतम न्यायालय 19 मार्च को सुनवाई करेगा | याचिका मे कहा गया है की आईपीसी की कुछ धाराओं मे सिर्फ पुरूषों को ही अपराधी माना गया है और महिला को पीड़िता | याचिकाकर्ता का कहना है की “ अपराध और कानून को लिंग के आधार पर नही बांटा जा सकता | क्योंकि महिला भी उन्हीं आधारों और कारणों से अपराध कर सकती है जिन कारणों से पुरूष करते है | ऐसे मे जो अपराध करे उसे कानून के मुताबिक दंड मिलना चाहिए |

       दरअसल दुष्कर्म के मामले मे यह माना जाता है की ऐसा सिर्फ पुरूष ही करते है महिलाएं नहीं | जबकी ऐसा महिलाए /लड़कियां भी करती है और कई बार तो सेक्स करने के लिए मजबूर तक  कर देती है| कम उम्र के लड़कों के साथ बहुधा ऐसा होता है | अपने सेक्स जीवन से असतुषट अधेड़ उम्र की महिलाओं दवारा बहला फुसला कर  कम उम्र के किशोरों का शोषण क्या बलात्कार नही ? ज्यादा उम्र की लड़कियों दवारा भी किशोर उम्र के लड़कों के शोषण के मामले समाज मे दिखाई देते है लेकिन उसे कम उम्र के लड़के के साथ दुष्कर्म  क्यों नही माना जाता ? मौजूदा कानून यहीं पर भेदभाव करता है | यही नही अपनी मर्जी से सेक्स संबध बनाने वाली महिला किसी के दवारा देखे जाने पर ज़ोर जबरदस्ती या शोषण का  आरोप पुरूष पर लगा कर अपने को सामाजिक बदनामी से बचा लेती है और कानून सिर्फ पुरूष को कठघरे मे खड़ा कर देता है | ऐसे मामलो की भी कमी नही | 

 
          यही नही, आज जो खुलेपन का परिवेश बन रहा है , उसमें तो इसकी संभावना और भी बढ़ जाती है |   यह अलग बात है की ऐसे मामले दर्ज नही होते लेकिन यह मानना की ऐसा होता ही नही सच से मुंह मोड़ना है | ऐसे मे कानून एकतरफा कैसे हो सकता है ?, महिला हमेशा पीड़िता और पुरूष अपराधी  | दर-असल कानून को “ जेनडर न्यूट्र्ल “ (  लिंग निरपेक्ष ) होना चाहिए लेकिन इन मामलों मे ऐसा है नही | सेक्स अपराधों मे यह कानून  महिला को पूरी तरह से निर्दोष मानता है |  अब समय आ गया है उच्चतम न्यायालय दुष्कर्म व सेक्स अपराधों के इस पहलू पर भी विचार करे और लिंग के आधार पर पक्षपातपूर्ण वाली आईपीसी की  धाराओं की समीक्षा करे |  

Wednesday, 9 August 2017

ओनली लिपिस्टिक इज नाट अंडर योर बुर्का



       आश्चर्य होता है कभी कभी कि राजनीति से जुडी एक घटिया गोसिप पर मीडिया के सभी माध्यमों से लेकर सोशल मीडिया मे भी कई कई दिन तक बहस हो सकती है लेकिन प्रयोगवादी फिल्म के लबादे मे प्रदर्शित हाल की दो फिल्मों यानी “ बेगम जान “
 व लिपिस्टिक अंडर माई बुर्का “ पर कुछ भी खास  सुनने, देखने व पढने को नही मिलता ।

       इत्तफाक से दोनो फिल्मों के कथानक मे महिला ही केन्द्र बिंदु पर है परंतु जिस तरह से दोनो फिल्मों ने अपनी हदें पार की , उस पर बहस या चर्चा तो होनी ही चाहिए थि । यह सवाल पूछा ही जाना चाहिए था कि आखिर यह कैसी क्रियेटिव फ्रीडम है ? क्या ‘ ए’ सर्टिफिकेट देने मात्र से किसी फिल्म को पोर्न फिल्म के रूप मे दिखाने का लाइसेंस मिल जाता है ?

       अभी ताजा तरीन तथाकथित प्रयोगवादी बोल्ड फिल्म “ लिपिस्टिक अंडर माइ बुर्का “ महिला आजादी के नाम पर  नई पीढी की युवतियों को क्या संदेश देना चाहती है ? फिल्म बेवजह के उत्तेजक द्र्श्यों के माध्यम से क्या युवाओं को  विशेष कर आधुनिक बालाओं को दैहिक रिश्तों के लिए  उकसा नही रही ? फिल्म की कहानी चार महिला चरित्रों की सेक्स कुंठा व फंतासी के  इर्द गिर्द घूमती है और साथ मे पहनावे से लेकर बाहर घूमने फिरने की आजादी की वकालत करती  भी नजर आती है । फिलम एक पचपन वर्षीय  प्रौढ महिला के चरित्र के माध्यम से यह भी बताने का प्रयास करती है कि सेक्स की इच्छा सभी मे होती है । उसे बस बाहर निकलने के लिए अनुकूल हालातों या अवसर की तलाश रहती है । इन महिला चरित्रों की सेक्स जिंदगी को परदे पर जीवंत दिखाने के बहाने जिस तरह के द्र्श्य फिल्माये गये, उन्हें देख कर कोई भी शर्मशार हो जायेगा । सवाल उठता है कि बुर्के के अंदर लिपिस्टिक दिखाने के बहाने यह फुहडता दिखाना क्या गैर जरूरी नही था ।

       ऐसा नही कि कला या प्रयोगवादी फिल्में पहले नही बनीं । बल्कि गौर करें तो अस्सी व नब्बे का दशक तो कला फिल्मों का स्वर्णिम युग रहा है । सत्यजीत राय, मृणाल सेन, गोविंद निहलानी , ऋषिकेशमुखर्जी , सईद मिर्जा , व महेश भट्ट आदि वे नाम रहे जिन्होने एक से बढ कर एक बेहतरीन फिल्में दी हैं । अगर कथानक की द्र्ष्टि से भी देखें तो ऐसा भी नही कि महिला विषयों पर फिल्में नही बनीं । कई फिल्में तो ऐसी रहीं हैं जो आज भी अपनी कलात्मकता , प्रस्तुतीकरण  व विषय चयन के कारण याद की जाती हैं ।

       पचास व साठ के दशक मे बनी महिला चरित्र प्रधान फिल्मों का भारतीय फिल्म  इतिहास मे एक अलग ही स्थान है । सत्तर, अस्सी व नब्बे के दशक मे भी महिला विषयों पर फिल्में बनी हैं और खूब सराही गईं । कुछ खास फिल्मों मे 1987 मे बनी  केतन मेहता की “ मिर्च मसाला “ भी रही है । इसमे सोनबाई के चरित्र मे स्मिता पाटिल के अभिनय को आज भी याद किया जाता है । इसी तरह मुख्य धारा से हट कर अल्ग विषय पर बनी फिल्म “ अर्थ “ काफी सराही गई । कुछ अच्छी महिला प्रधान फिल्मों मे ‘ आस्था ‘ , चांदनी बार ,  लज्जा , कहानी व डर्टी पिक्चर भी रही हैं । इन फिल्मों ने भारतीय संदर्भ मे औरत की सामाजिक स्थिति , उसकी समस्याओं , संघर्ष , सपनों और दुखों पर बहुत कुछ कहने का प्रयास किया है  । लेकिन कहीं कोई फुहडता नही ।

       ‘ बेगम जान ‘  आजादी के पूर्व एक कोठे पर रहने वाली कुछ वेश्याओं की जिंदगी की कहानी है । उनके रूतबे और फिर बिखराव की कहानी । ऐसे ही विषयों पर पहले भी फिल्में बनीं । इनमे ‘ मंडी ‘ व बाजार जैसी फिल्में आज भी याद की जाती हैं । कुछ वर्ष पूर्व बनी ‘ चमेली ‘ ने भी कफी दर्शक जुटाये । इन सभी फिल्मों मे महिला चरित्रों की कहानी कोठे की त्रासदायक जिंदगी के इर्द गिर्द ही घूमती है । लेकिन जो खुलापन या यूं कहें दैहिक रिश्तों की नुमाइश बेगम जान मे देखने को मिली , वह इन फिल्मों मे कहीं नही थि । जबकि अपने कथानक व प्रस्तुतीकरण  के कारण मंडी जैसी कला फिलम सिने दर्शकों और समीक्षकों दवारा सराही गई । कम से कम इस द्र्ष्टि से बेगम जान पिछ्डती नजर आती है । सवाल उठता है कि क्या कोठेवालियों की जिंदगी के नाम पर इतना खुलापन परोसना गैर जरूरी नही लगता ? सच कहा जाए तो यह फुहडता की पराकाष्ठा है ।


       बहरहाल आश्चर्य इस बात पर भी है कि बात बात मे बैनर थाम लेने वाले  महिला संगठनों को भी इन फिल्मों मे कोई बुराई नजर नही आई । नैतिक मूल्यों के झंडाबरदार भी खामोश रह जाते हैं । क्या इसे बदलते भारत की एक ऐसी तस्वीर मान लिया जाए जो देर सबेर सभी को स्वीकार्य होगी , बिना किसी किंतु परंतु के ? अगर ऐसा है तो कहना पडेगा कि  वाकई हम यूरोप से कहीं आगे निकलने की राह पर हैं । 

Wednesday, 5 July 2017

रूठा हुआ सावन


      वसंत के बाद अगर किसी के स्वागत के लिए पलकें बिछाई जाती हैं तो वह है सावन । कौन ऐसा अभागा होगा जिसका सावनी फुहारों मे मन मयूर नृत्य करने के लिए मचलने न लगे । तपती हुई दोपहरियों और आग बरसाते सूर्य देवता के ताडंव के बाद् सावन की रिमझिम फुहारें मन को शीतलता प्रदान कर जो उमंगें भरती हैं उसके वर्णन मे हमारे कवियों और शायरों ने न जाने कितनी स्याही उडेली है । लेकिन यह सावन है जिसकी मदहोशी , महिमा और उल्लास का कोई छोर ही नजर नही आता ।
      यही तो सावन है जिसके लिए नायिका अपने नायक को उलाहने देने मे भी नही चूकती और कह उठती है - ' तेरी दो टकिया की नौकरी मे मेरा लाखों का सावन जाए.........। सच भी है सावन की इस मस्ती के आगे सभी रंग फीके हैं । ऐसे मे नौकरी की क्या हैसियत कि वह नायिका के सावनी आमत्रंण को नकार सके ।
      भीगी हुई धरती से निकली सोंधी महक जब हवाओं के रथ पर सवार होकर , शोर मचाते, गली - गली, गांव-गांव अपने आने का संदेश देती है तभी तो अपने पिया के इंतजार मे बैठी कोई नवयौवना कह उठती है " सावन का महीना पवन करे शोर........." और यही शोर ही तो है कि उसका मन-मयूर नाच उठता है ।
      पेडों की झुरमुटों के बीच से खिलखिलाती युवतियों के कजरी गीत माहौल मे एक अलग ही रंग घोल देते हैं और मौसम के बदलते चक्र को न समझने वाला भी कह उठता है - " पड गये झूले सावन रितु आई रे........." । लेकिन सावनी कजरी गीतों का यह रिश्ता झूलों का ही मोहताज नही । खेतों मे धान की रोपाई करती युवतियां भी इन गीतों के सुरीली लय से फिजा मे एक अलग ही रस घोल देती हैं ।
      लेकिन अब बदलते जमाने के साथ सावन का यह पारंपरिक चेहरा भी तेजी से बदलने लगा है । पेडों की डालियों मे झूलों की संख्या साल-दर-साल कम होती जा रही है । शहरों मे पली बढी गांव की इन नवयौवनाओं का भला कजरी गीतों से क्या रिश्ता । खेतों मे धान की रोपाई भी अब मजदूरों का काम बन कर रह गया है । ऐसे मे खेतों मे गीतों की वह तान कहां ।
      लेकिन फिर भी हमारे ग्रामीण जीवन मे सावन आज भी एक उत्सव की तरह आता है और सभी को अपने रंग मे सराबोर कर देता है । अपने मायके मे सखी-सहेलियों से बतियाने का इंतजार करती यौवनाओं को आज भी सावन का इंतजार रहता है ।
      लेकिन यही सावन मानो शहरों से रूठ सा गया हो । कंक्रीट के जंगल के बीच न ही खेत रहे और न ही वह पेड जिनकी डालों पर झूले डाले जा सकें । आधुनिकता ने हरियाली को भी डस लिया है । ऐसे मे बेचारा सावन यहां मानो मन मसोस कर रह जाता है । शहरों से रूठे इस सावन को कभी हम दोबारा बुला सकेंगे, कह पाना मुश्किल है । लेकिन फिर भी उसकी भीगी-भीगी फिजा मे घुली मदहोसी बता ही देती है कि देखो सावन आ गया ।