Friday, 10 October 2014

लापता बच्चों की है एक अंधेरी दुनिया

     

 ( L.S. Bisht ) -“ बबलू तुम जल्दी घर आ जाओ, कोई तुम्हें कुछ नही कहेगा | पैसे नहीं हैं तो जल्दी लिखो, पापा आ जायेंगे |”
एक दूसरा विज्ञापन – “ राजू बेटा तुम्हारी मां तुम्हारे बिना रो-रो कर पागल हो गई है | वह तुम्हें ही याद कर रही है , घर लौट आओ | “
इस तरह के विज्ञापन रोज पत्र-पत्रिकाओं मे छ्प रहे हैं | दूरदर्शन और दूसरे माध्यमों मे भी इन खोये हुए बच्चों के बारे मे सूचनाएं प्रसारित की जाती हैं | लेकिन कितने अपने घर वापस लौट पाते हैं, पता नहीं | अलबत्ता ऐसे विज्ञापनों की संख्या निरन्तर बढती जा रही हैं |
     इन बच्चों के मामले में एक दुखद पहलू यह भी है कि लापता होने की कोई कानूनी परिभाषा भी नही है | प्रत्येक राज्य अपने नियम-कानूनों का पालन करता है | व्यवस्थित व नवीनतम आंकडों का भी नितांत अभाव है | दर-असल इस पहलू को  कभी गंभीरता से लिया ही नही गया | खोये या लापता हुए यह बच्चे किस दुनिया में चले जाते हैं , किस हाल में रहते हैं, क्या करते हैं, इन सवालों से मानो किसी को कोई लेना देना ही नहीं |
     अभी हाल में उच्चतम न्यायलय ने लापता बच्चों के मामले मे अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अमीर घरों के बच्चों को तलाशने में पुलिस तत्परता दिखाती है लेकिन गरीब बच्चों को नहीं | इसके पूर्व 5 फ़रबरी,2013 में भी लापता बच्चों को खोजे जाने के मामले में सरकार के रवैये की आलोचना की थी और कहा था कि लगता है इन बच्चों की किसी को चिंता नहीं है | यही नही,  17 मार्च 2012 को भी एक जनहित याचिका पर उच्चतम न्यायलय ने केन्द्र व राज्य सरकारों को नोटिस भी जारी किया था तथा यह भी सलाह दी थी कि गायब हुए बच्चों को तलाशने के लिए सरकारें आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करे |
     जुलाई 2014 को गृह मंत्रालय की तरफ़ से संसद मे जो आंकडें पेश किये गये थे उसमें बताया गया था कि देश में 2011 से जून 2014 के बीच 3.25 लाख बच्चे देश मे लापता हैं | औसत रूप से प्रतिवर्ष 1 लाख बच्चे लापता हो रहे हैं |
     इस संदर्भ में एक गौरतलब तथ्य यह भी है कि ऐसे मामलों में अधिकांश में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज ही नही की जाती | सिर्फ़ लापता हुए लोगों की लिस्ट में नाम दर्ज कर लिया जाता है और पुलिस स्टेशनों को फ़ोटो भेज दी जाती है | प्रथम सूचना रिपोर्ट तब दर्ज की जाती है जब उसे अपहरण या फ़िरौती का केस बनाया जाए | इस पुलिसिया अंदाज ने इस समस्या को और भी अधिक गंभीर बना दिया है |
     घर से बेघर हो लापता होने वाले इन बच्चों के लिए कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है | कुछ गैर सरकारी संस्थाओं दवारा किए गये अध्यनों में जो कारण सामने आए हैं उनमें सबसे प्रमुख है गरीबी | कुछ बच्चों के माता-पिता स्वयं ही उन्हें छोड देते हैं क्योंकि वह उनका पालन नहीं कर् सकते | इसके अलावा कुछ बच्चे यात्रा के दौरान माता-पिता से बिछुड जाते हैं और फ़िर गलत लोगों के हाथों में चले जाने के कारण कभी मिल नहीं पाते |
     एक बहुत बडी संख्या उन बच्चों की भी होती है जो घर के माहौल से स्वयं ही भाग जाते हैं और फ़िर कभी लौट कर नही आ पाते | दर-असल बच्चों में प्यार पाने व स्नेह की मूल प्रवृत्ति होती है परंतु जब उन्हें प्यार नही मिलता तो अक्सर छोटी सी बात पर वे घर छोड देते हैं | एक और बडा कारण है बच्चों को बहुत ज्यादा मनोवैज्ञानिक दवाब मे रखा जाना | जिसका परिणाम यह होता है कि उनके अंदर एक डर की भावना घर कर जाती है | इस तरह के बच्चे अक्सर परीक्षा में पास न हो पाने की स्थिति में घर से भाग जाना बेहतर समझते हैं | वह माता-पिता के सामने आने की हिम्मत नही जुटा पाते | परीक्षाओं के परिणाम निकलने के बाद अक्सर इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं | कुछ बच्चे तो दो चार घंटे में या दो-एक दिन बाद घर लौट आते हैं लेकिन कुछ कभी वापस नहीं आ पाते |
     पारिवारिक खराब माहौल भी इस समस्या का एक बडा कारण है | दर-असल पारिवारिक सबंधों का बच्चों पर सीधा प्रभाव पडता है | बल्कि बच्चे इस सबंध में अधिक संवेदनशील पाये गये हैं | घर में माता-पिता के मध्य कलह रहने से उसका दुष्प्रभाव बच्चों पर भी पडता है, किशोर उम्र के बच्चे अप्ने को ऐसे माहौल मे कटा सा महसूस करने लगते हैं तथा घर से भाग जाने की भावना उनमें जाग्रत होने लगती है | कमजोर क्षणों मे वह ऐसा कर भी बैठते हैं |
     इन पारिवारिक व सामाजिक कारणों के अलावा लापता हुए बच्चों में एक बडी संख्या उन बच्चों की भी है जिन्हें असमाजिक तत्व अपने हितों के लिए अपहरण कर लेते हैं या पहले बहला फ़ुसला कर और बाद में हिंसात्मक तरीके अपना कर अपने वश में कर लेते हैं | इन बच्चों को गैरकानूनी कामों मे इस्तेमाल किया जाता है |
     कई और कारणों से भी असमाजिक तत्व कम उम्र के बच्चों का अपहरण करते हैं | गायब किए गये बच्चों मे लडकियों को देह व्यापार के काम मे इस्तेमाल किया जाता है और इसके साथ ही बाल पोर्न कि लिए भी इनका इस्तेमाल किये जाने लगा है |यही कारण है कि लापता हुए बच्चों मे 65% की उम्र 13 से 18 के बीच होती है | भारत में कुछ संगठित गिरोह ऐसे बच्चों को भीख मांगने के काम मे लगाने के लिए इनका अपहरण करते हैं | समय समय पर कई ऐसे मामले प्रकाश में आए हैं लेकिन इन्हें जड से खत्म नही किया जा सका |
     कारखानों मे मानव श्रम की अधिक मांग को देखते हुए इन बच्चों का उपयोग वहां किया जाने लगा है | छापों में ऐसे कई बच्चे बरामद भी हुए हैं | इधर कुछ समय से मानवीय अंगों की बढती मांग को देखते हुए कुछ लोग इन बच्चों का अपहरण कर इनके शरीर के महत्वपूर्ण अंगों की तस्करी भी करने लगे हैं | यह घिनौना व्यवसाय देश मे इधर कुछ समय से पनपा है और इसके लिए बच्चे सबसे आसान टारगेट सिध्द हुए हैं |
     यानी कुल मिला कर देखा जाए तो बच्चों की मासूम दुनिया का यह एक ऐसा  उपेक्षित पहलू है जिस पर कभी गंभीरता से सोचा ही नही गया | प्रतिवर्ष लाखों बच्चे लापता हो जाते हैं और इनकी एक बडी संख्या कभी लौट कर घर नही आ पाती | माता-पिता भी थक हार कर इसे अपनी नियती मान बैठते हैं या फ़िर किसी चमत्कारिक घटना की आस में दिन काटते रहते हैं | गुमशुदा की औपचारिक रिपोर्ट लिखने के बाद पुलिस भी ऐसे बच्चों को तलाशने का कोई गंभीर प्रयास नहीं करती और कुछ समय बाद फ़ाइल बंद कर दी जाती है | लाखों बच्चे कहां खो गये, यह जानने की जहमत कोई नही उठाता | विकास की सीढियां चढते इस देश मे इस पहलू को आखिर कब तक नजर-अंदाज किया जाता रहेगा | जरूरी है कि इसके लिए एक व्यवस्थित व आधुनिक तत्र विकसित किया जाए जो पूरी तरह से इस काम के लिए जवाबदेह हो तथा इस तंत्र पर प्रभावी नियंत्रण भी हो | इसमें कोई संदेह नही कि प्रशासनिक व कानूनी स्तर पर हमारे थोडे से गंभीर प्रयास लाखों बच्चों की दुनिया में फ़िर से उजाला बिखेर सकते हैं |