Tuesday, 9 September 2014

' इस्लामिक स्टेट ' के खतरनाक मंसूबे


( L. S. Bisht ) - भारत जैसे देश में आज भी यह माना जाता है कि हम बच्चे को जैसा सिखायेंगे वह वैसा ही बनेगा । यहां तक कि हम उसके बचपन के लिए खिलौनों का चुनाव भी बहुत सोच समझ कर करते हैं । हिंसक खिलौने से उसके बचपन को दूर रखने की पूरी कोशिश की जाती है । ऐसे खिलौनों को जो उसमें रचनात्मक प्र्वत्ति को विकसित करे उपलब्ध कराते हैं । लेकिन दूसरी तरफ दुनिया के एक कोने मे बच्चों को हिंसा की आग में जानबूझ कर ढ्केलने के प्रयास किए जा रहे हैं और यह सब धर्म की नाम पर किया जा रहा है ।
इराक में सक्रिय आतंकवादी संगठन ' इस्लामिक स्टेट ' ने अब बच्चों को अपनी जेहाद का मोहरा बनाया है । अभी तक इस संगठन के मुखिया अबु बकर अल बगदादी मुस्लिम युवाओं को दुनिया में इस्लामिक स्टेट का सपना दिखा कर अपनी लडाई में शामिल करते आये हैं । बगदादी अपने मजहबी भाषणों और वीडियो के जरिये मुस्लिम युवाओं को यह समझाने में सफल रहा है कि दुनिया में इस्लाम खतरे मे है और शरीयत के अनुसार एक इस्लामिक देश बनाया जा सकता है जो दुनिया पर राज करे लेकिन इसके लिए एकजुट होकर लडना होगा । कई देशों के युवा उसकी बातों से प्र्भावित हो उसके साथ शामिल हो चुके हैं ।
अगर सीरियन आब्जर्बेटरी फार ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के आंकडों पर विश्वास करें तो इस संगठ्न के पास लगभग 50 हजार लडाके इरान में और 30 हजार सीरिया में हैं । इनमें अच्छी खासी संख्या विदेशी लडाकों की भी है । इनमें मुख्य रूप से फ्रांस, ब्रिटेन, चेचेन्या आदि देशों के युवा शामिल हैं ।
लेकिन अब बात सिर्फ युवाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह संगठन अब मासूम बच्चों को अपना मोहरा बनाने लगा है । पांच साल से 14 साल तक के बच्चों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देकर इन्हें लडाई में झोंका जा रहा है । दर-असल बच्चों को शामिल करना इस संगठन की बहुत सोची समझी रणनीति है । यह एक पीढी के मासूम दिलो-दिमाग में अभी से नफरत पैदा कर इस्लाम के लिए लडने वाले जेहादियों की एक खतरनाक फौज तैयार कर रहा है । उसका मकसद आने वाले समय के लिए इन्हें तैयार करना है ।
यही नही, इन बच्चों को लडाई के मोर्चों पर एक ढाल के रूप में भी इस्तेमाल करने की उसकी सोची समझी योजना है । वह जानता है कि जब इन कम उम्र बच्चों के हाथों में हथियार होंगे और यह आग उगल रहे होंगे तब अमरीका या कोई भी दूसरा देश चाह कर भी इनके विरूध्द वह सैन्य कार्यवाही न कर सकेगा जो अभी तक उसके लिए संभव है । इनके मारे जाने पर विश्व समुदाय की प्रतिक्रिया उसके पक्ष मे जायेगी ।
आज पूरा विश्व आतंकवाद के जिस चेहरे को देख रहा है वह आने वाले कल मे और भी भयावह होगा लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि अभी भी बहुत से देश इसके जहर को या तो समझ नहीं पा रहे हैं या फिर राजनैतिक व धार्मिक कारणों के चलते समझना ही नहीं चाहते । वैसे भी अगर आतंकवाद के इतिहास पर नजर डालें तो शुरूआती दौर में कुछ देशों के निहित स्वार्थों के चलते ही आतंकवाद का प्रसार हुआ था । यह दीगर बात है कि अब अपने ही हितों के लिए खडा किया गया यह दैत्य पूरी दुनिया के वजूद के लिए ही खतरा बन रहा है ।
दर्-असल सत्तर व अस्सी के दशक में दुनिया के कई देश अपने निहित स्वार्थों के लिए आतंकवाद को बढावा देते आये थे और अपने को बडी चालाकी से इससे अलग रखने में भी सफल रहे थे । दूसरे देशों में अस्थिरता पैदा करने के लिए आतंकवाद का सहारा लिया जाता रहा । कई ऐसे देश रहे जिन्होने आतंकवादी संगठनों को बाकायदा सुविधाएं उपलब्ध कराईं और दूसरे राष्ट्रों के विरूध्द उकसाने का काम किया ।
इस संदर्भ में फिलिस्तीनी मुक्ति मोर्चे ( पी.एल.ओ.) को ही लें । यह संगठन 1964 में फिलिस्तीन लोगों को एक स्वतंत्र फिलिस्तीन राज्य के निर्माण हेतु बनाया गया था । उसे तत्कालीन कई आतंकवादी संगठनों का समर्थन प्राप्त था । उस दौर में एक और संगठन था लेबनानी सशस्त्र क्रांतिकारी ग्रुप । इसकी शुरूआत 1979 में हुई थी । अमरीका इजराइल और फ्रांसीसी सशस्त्र सेवाओं की दासता से मुक्ति पाने के लिए तथा फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना हेतु यह संगठन बनाया गया था । इस संगठन का संबध भी कई आतंकवादी संगठनों से रहा है । सीरिया सरकार का भी इसे परोक्ष समर्थन प्राप्त था ।
1975 मे गठित एक संगठन है सीक्रेट आर्मी फार द लिबरेशन आफ आर्मीनिया । इस संगठन का उद्देश्य रहा है प्रथम विश्व युध्द के समय आर्मीनियाई लोगों के सामूहिक हत्याकांड की जिम्मेदारी तुर्की दवारा स्वीकार कराने हेतु उस पर दबाव डालना । यह आज भी सक्रीय है । इसी तरह 1970 मे गठित एक संगठन है जैपनीज रेड आर्मी । इसका उद्देशय रहा है जनता का जनतंत्र स्थापित करना । इसे लीबिया , उत्तरी कोरिया जैसे अनेक देशों का समर्थन मिलता रहा ।
दक्षिण अफ्रीका में जातीय राजनीति के विरूध्द एक वर्गविहीन सरकार की स्थापना करने के उदेश्य से बनाया गया संगठन ' अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस ' भी काफी चर्चित रहा । इसे उस दौर में कई देशों का परोक्ष समर्थन प्राप्त था । इसी तरह कई इस्लामिक आतंकवादी संगठन भी समय समय पर आतंक फैलाने का काम करते रहे । ओसामा बिन लादेन का ' अल कायदा ' तो आतंक का एक नया चेहरा बन कर उभरा । इसके अलावा ' सिमी ' जमात-ए. इस्लाम  और इससे जुडे अन्य संगठनों ने आतंक की एक नई कहानी लिखी जो अब भी जारी है ।  भारत मे भी कई इस्लामिक आतंकवादी संगठन आतंक फैलाते रहे हैं ।
दर-असल अपने अपने राजनीतिक हितों के लिए प्र्त्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन देने का परिणाम यह निकला कि पूरे विश्व में आतंकवाद का एक जाल सा बिछ गया और समय के साथ इन सभी संगठनों के उद्देश्य भी बदलते चले गये । अब इनसे मुक्त हो पाना मुश्किल लग रहा है । लेकिन यह असंभव भी नही है । इसके लिए जरूरी है कि विश्व राजनीति मे कथनी और करनी में फर्क न हो । मौजूदा इस्लामिक संगठन के संदर्भ में थोडा राहत देने बाली बात यह है कि खाडी देश अब इस खतरे को महसूस करने लगे हैं । यह देश अमरीका का साथ देने को तैयार हो गए हैं ।
अब यह जरूरी हो गया है कि सभी देश ऐसे खतरनाक मंसूबों के विरूध्द एक्जुट होकर सामने आऐं अन्यथा जब पांच साल के मासूम भी बंदूक लेकर धर्म के नाम पर खून खराबे के लिए आने लगेंगे तो पूरी दुनिया का वजूद ही खतरे में पड जायेगा । इस भयावह खतरे को हर कीमत पर यहीं पर रोकना बेहद जरूरी है ।