Sunday, 31 August 2014

आस्था पर यह कैसा विवाद




( L. S. Bisht ) -  अभी देश पाकिस्तान की सीनाजोरी और लब जेहाद जैसे मुद्दों से निकल भी न पाया था कि दारकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी ने धर्म संसद बुला कर एक नया धार्मिक मोर्चा खोल दिया है । इस धर्म संसद में लगभग 300 साधु-संतों ने भाग लेकर यह तय किया कि है कि साईं बाबा न तो भगवान थे, न संत और न ही गुरू । इसलिए देश में उनकी पूजा नहीं की जानी चाहिए । मंदिरों से उनकी मूर्तियों को हटाने की भी बात कही गई है

वैसे तो देश में विवादों की कमी कभी नही रही । शायद ही कोई ऐसा दिन हो जब कोई नया राजनीतिक या सामाजिक विवाद न जन्म लेता हो । लेकिन देश ऐसे विवादों का अभ्यस्त हो चुका है । यह पानी की बुलबुले की तरह उठते हैं और फिर कुछ दिन बाद स्वत: विलीन हो जाते हैं । लेकिन साईं बाबा को लेकर उठा यह विवाद हमारी आस्थाओं से जुडा है । यह सवाल उस देश में उठ रहे हैं जहां आस्था को लेकर कभी सवाल ही नहीं उठे ।

दर-असल यह समझ से परे है कि अचानक साईं बाबा को लेकर यह सवाल क्यों है । उनको मानने वाले आज या कल में तो उनके भक्त नहीं हुए । उनकी भक्ति की परंपरा भी बहुत पुरानी है । समाज के एक बडे वर्ग की आस्था साईं बाबा में हमेशा रही है । यह दीगर बात है कि इधर कुछ समय से उनके भक्तों की संख्या में तेजी से वृध्दि हुई है । परंतु आखिर धर्म और आस्था के क्षेत्र मे यह विवाद क्यों ।

गौर से देखें तो यह विवाद भी उसी जमीन से उपजा है जहां से नित नये विवाद जन्म ले रहे हैं । यह जमीन है निजी स्वार्थ, अहंकार, माया , लोभ व व्रर्चस्व की । इधर कुछ वर्षों मे आस्था का व्यापार तेजी से फला फूला है । अब वह दिन पीछे छूट चले हैं जब हमारी धार्मिक आस्था घर के एक कोने मे बनाये गये मंदिर तक सीमित हुआ करती थी । इसका सार्वजनिक स्वरूप कुछ विशेष अवसरों पर ही दिखाई देता था जैसे कि रामलीलाओं व दुर्गा मां की पूजा पंडालों पर या फिर जन्माष्टमी अथवा शिवरात्री जैसे पर्वों पर ।

इस आस्था का स्वरूप बहुत बदला है । कुछ मायनों मे इसका भी बाजारीकरण हुआ है । धर्म के नाम पर अलग तरह का निवेश किया जाने लगा है । देखते देखते हमारी धार्मिक आस्था का दोहन बखूबी किया जाने लगा है । इस बदले स्वरूप को समझने के लिए हमें थोडा पीछे जाना होगा ।

आज की रामलीलाएं चार तख्त बिछा कर बनाये गये मंच से पूरी नहीं होती और न ही दो चार ढोलक बजाने वालों के संगीत से । अब वह दौर हमारी यादों में बस एक याद बन कर रह गया है । अब पूरे ताम झाम और मंहगे संगीत और कलाकारों को जोड कर रामलीला का आयोजन किया जाता है । इसमें विज्ञापन, प्रचार, चंदा और स्थानीय राजनीति और पैसे की अच्छी खाशी भूमिका रहती है ।

इसके अलावा नवरात्रों के अवसर पर आयोजित जागरण कार्यक्र्म भी आस्था से ज्यादा व्यापार व दिखावे का कार्यक्र्म ही लगता है । यहां भी फुहडता, पैसा और स्वार्थों का काकटेल साफ नजर आता है । आयोजकों की चिंता चढावे और चंदे में ज्यादा दिखाई देती है । अब तो गुजरात से पनपी डांडिया संस्कृति ने इस आस्था को और भी रंगीन व व्यापारिक बना दिया है ।

लगभग यही हाल दुर्गा पंडालों में भी दिखाई देगा । यही नहीं, हमारी आस्था का दोहन कहां तक हुआ है इसे देखना हो तो नामी गिरामी कथावाचकों के कार्यक्रमों में चले आएये । सत्यनरायण की कथा से जुडी हमारी आस्था का जो विस्तार इधर कुछ वर्षों में बडे बडे पंडालों के रूप में देखने को मिला है उसमें धर्म का अंश कम और अर्थ की चाह ज्यादा दिखाई देती है ।

लेकिन यह तो स्वीकार करना ही होगा कि हमारी पूजा-अर्चना अब सिर्फ पूजा पाठ तक सीमित न होकर एक अलग तरह का व्यापार भी बन गई है । जिसका विस्तार मंदिर के चढावों से लेकर आलीशान पूजा पंडालों तक हुआ है । यही नही, आस्था यह खेल राजनीति में भी रंग दिखाने लगा है । हमारे इन धार्मिक संतों, शंकराचार्यों का अपना एक राजनीतिक महत्व विकसित हुआ है जिसमें पैसा, शोहरत व सत्ता सभी कुछ है । थोडा गौर से देखें तो पता चलेगा कि धार्मिक आस्थाओं के रथ पर सवार होकर न जाने कितने लोग सत्ता सुख के भागीदार बने हैं और यह बदस्तूर जारी है ।

यानी कुल मिला कर यह विवाद धार्मिक क्षेत्र में अपने वर्चस्व को कायम रखने की लडाई है । हर किसी को अपनी पूजा करवाने तथा मह्त्व बनाये रखने की चाह है और यह तभी संभव है जब लोग उन्हें ' भगवान ' स्वीकार करें । साईं बाबा के भक्तों की बढती संख्या ने कुछ धार्मिक मठाधिशों मे इसी भय को जाग्रत किया है । वैसे यह भी कम अचरज का विषय नहीं कि इधर कुछ समय से साईं बाबा भक्तों के बीच कुछ ज्यादा ही लोकप्रिय हुये हैं । बल्कि युवतियों के एक बडे वर्ग मे तो उन्हें मानना और उनके मंदिर मे जाना एक फैशन के रूप में भी दिखाई देने लगा है । साईं बाबा आस्था के फैशन रूप मे कब और कैसे स्थापित हो गये, कह पाना मुश्किल है ।

बहरहाल इस विवाद मे आस्था के बहाने आस्था के प्रभाव के गणित को साधने की कोशिश ज्यादा दिखाई दे रही है । फिर भी यह धार्मिक विवाद कहीं से भी समाज व देश के हित मे नही है । अच्छा तो यही है कि इसे मुद्दा न बना कर इसे व्यक्ति विशेष की आस्था तक ही सीमित रखा जाए । यही इसका एक् मात्र हल है ।