Saturday, 20 September 2014

10 जून, 1984 को प्रकाशित कहानी / दंगा



     मेरी यह कहानी उस दौर मे लखनऊ व इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित पत्र अमृत प्रभात में 10 जून, 1984 के साप्ताहिक परिशिष्ट में प्रकाशित हुई थी | अपने तीन दशकों के लेखकीय जीवन में मैने सिर्फ़ तीन कहानियां लिखीं जिनमे से यह एक है | सामयिक विषयों पर लेख व मानवीय तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलूओं पर फ़ीचर  मेरे लेखन की मुख्य विधा रही है | कुछ लघुकथाएं भी लिखीं व प्रकाशित हुईं | लेकिन मुख्यत: लेख व फ़ीचर | यह कहानी आज भी प्रासंगिक लगती है | *******

     वहां बहुत से लोग जमा हो गये थे | उनमें ज्यादातर बच्चे और औरतें थीं |
कुछ ऐसे बच्चे भी थे जो अभी जीवन और मृत्यु आदि शब्दों का अर्थ भी नही समझ्ते थे | उत्तर दिशा से बच्चों का एक झुंड चला आ रहा था | उनमें से कुछ तो एकदम बिस्तर से उठ कर चले आ रहे थे | कुछ बच्चों की नाक बह रही थी |
और वे अपनी गंदी कमीजों के बाजुओं से उसे साफ़ करने का असफ़ल प्रयास कर
रहे थे | कुछेक बच्चों के हाथ मे बासी रोटी के टुकडे थे जो उनके सुबह का नाश्ता
था | सभी आकर उसके चारों तरफ़ खडे हो गये |
     अब तक अच्छी खासी भीड जमा हो चुकी थी | झोपड झुग्गियों में शायद वैसे भी लोग मृत्यु के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं | लोग छोटे छोटे झुंडों
में बंट कर खडे हो गये थे | जितने मुंह उतनी बातें |
     ठंड कुछ ज्यादा होने के कारण मैने दीवार की आड ले रखी थी | शायद इसीलिए लोगों को मेरी उपस्थिति का आभास न था |
     मैं सोच रहा था क्या कुछ न सोचा था उसने अपने लिए – एक घर ,
इज्जत की जिंदगी और न जाने क्या क्या सपने थे उसकी आंखों मे |  हां, एक गूंगा भाई भी तो था उसका | कितने बडे-बडे सपने देखे थे उसने उसकी उस अपाहिज जिंदगी के लिए लेकिन सब कुछ एक पल में------|
     नीचे कच्ची जमीन मेंउसका भौतिक शरीर पडा था,एक्दम निर्जीव | आंखे आकाश में शून्य को ताक रही थीं |
     एक साल पहले ही तो आयी थी वह एक्दम फ़टेहाल कपडों में | शरीर में धूल की पर्तें जमी हुई थीं | शरीर सूख कर कांटा हो गया था | देखते ही दया आ गयी थी | ‘ माई जी भगवान भला करेगा | कोई काम दे दो मांई | “ मैं अचानक बाहर निकला | मुझे बाहर आया देख वह कुछ जोर से बोलने लगी थी |
     “ क्या चाहिए, तुझे ? “ मैने पूछा ‘ काम चाहिए साब | कुछ भी काम दे दो साब |’  ‘ नही-नही यहां कोई काम नही | कोई होटल देखो वहीं काम मिलेगा | मैने कुछ टालते हुए कहा | अब उसने दोनों हाथ जोड लिए थे | आंखों में पानी की बूंदें चमकने लगी थीं | कुछ सहमते हुये वह कुछ करीब आयी और पैरों में गिर कर गिडगिडाने लगी थी | ‘ साब ये मेरा भाई है | गूंगा है बोल नही पाता साब | दो दिन से इसने कुछ नहीं खाया | ‘आगे के शब्द उसके आंसुओं में डूब गये थे |
     उसे घर मे सफाई करने व बर्तन साफ़ करने का काम दे दिया था | उसका इस दुनिया में कोई भी नही था | सिवाय एक भाई के वह भी गूंगा | तब से कल तक वह बराबर आती थी | मौसम के साथ फ़िजा बदलती लेकिन उसका हमेशा वही भाव शून्य चेहरा रहता |
     उसे खाना व कपडे के अलावा पचास रूपया भी देते थे, लेकिन शायद ही उसने उन्हें कभी खर्च किया हो | एक दिन मां जी से कह रही थी “ मां जी एक बात कहूं ? “ ‘ हां-हां बोलो क्या बात है | मां जी मुझे एक गुल्लग ला दो | मैं उसमें पैसा रखूंगी | पैसा ? क्या करेगी उनको जमा करके ? मां जी ने यूं ही उत्सुकतावश पूछ लिया था | उन पैसों से मैं भैय्या को स्कूल पढाऊगीं | और फ़िर जब वह स्कूल लिख पढ जायेगा तो उसके लिए एक घर बनवाऊंगी | मैं भी उसी में रहूंगी | मां जी ने उसे एक गुल्लक ला दिया था | हर महीने उसे जो कुछ मिलता उसमें रख लेती |
     अपनी मर्जी से वह सुबह की चाय भी बना लेती थी | अब तो लगता ही नही था कि वह नौकरानी है | घर की एक सदस्य  बन गयी थी |
     अचानक कल दोपहर को शहर र्में किसी बात को लेकर दो संप्रदाय के लोगों के बीच कहा-सूनी हो  गई थी और शाम तक उसी ने एक भयंकर दंगे का रूप ले लिया | कई लोगों को अपनी जान गंवानी पडी | न जाने कितने मासूम बच्चों और औरतों की भी बलि चढ गयी थी |
     चौक की मुख्य सडक् में उसका शव पडा था | उसके पेट मे चाकुओं के गहरे घाव थे | बगल मे एक गंदा सा झोला पडा था | कुछ बासी रोटियां जमीन में बिखरी पडी थीं | लेकिन उस अभागी लडकी के साथ ऐसा क्यों हुआ ? मैं यही कुछ सोचते हुए न जाने कहां खो गया था | वह न तो हिंदू थी और न ही मुसलमान और न ही ईसाई | वह तो सिर्फ़ एक गरीब , असहाय मजदूर जिंदगी थी | उसका न तो कोई ईश्वर था न ही अल्लाह |
     जूठे बर्तन , गंदी फ़र्श और जूठा खाना- यही तो सब कुछ था उसका | हिंदू, मुसलमान ,ईसाई सभी के घरों मे काम करती थी वह और बदले मे वही दो बासी रोटियां और कुछ पुराने कपडे |
     उसके उन सपनों का तो कोई अपना मजहब न था | फ़िर उन ढेर सारे सपनों की ये अकाल मौत क्यों ?
     अब लोग उसकी अर्थी को कंधों मे उठाये धीरे धीरे आगे बढ रहे थे |वही फ़टेहाल लोग, नंगे भूखे बच्चे ही तो उसके सच्चे साथी थे |

     बगल की पांच मंजिला कालोनी की खिडकियां अब खुल रही थीं | उनमें से कुछेक ने खिडकियों से झांका और फ़िर खिडकियां बंद कर दीं| दूर कहीं से सायरन की आवाज आ रही थी | शायद कर्फ़्यू हट गया था |