Tuesday, 7 July 2015

मां के सम्मान का फैसला

(एल. एस. बिष्ट ) - अभी हाल मे उच्चतम न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले मे कहा है कि अब बिन ब्याही मां अपने बच्चों की कानूनी रूप से अभिभावक ( गार्जियन ) हो सकती है । इसके लिए बच्चे के पिता से अनुमति लेने की जरूरत नही होगी । अदालत ने अपने ;फैसले मे कहा है कि अगर कोई अविवाहित मां बच्चे का बर्थ सर्टिफिकेट बनवाने की अर्जी लगाए तो उसे यह सर्टिफिकेट दिया जाए । अदालत ने आगे यह भी स्पष्ट किया है कि समाज बदल रहा है । ऐसी महिलाओं की संख्या बढ रही है जो स्वंय बच्चे की परवरिश करना चाहती हैं । यह सही नही होगा कि ऐसे पिता की अनुमति को जरूरी माना जाए जो बच्चे को न तो  कानूनी तौर पर रखने को तैयार है और न ही बच्चे से वह कोई मतलब रखना चाहता है ।

देखा जाए तो न्यायालय का यह फैसला मां के रूप मे एक औरत के सम्मान से जुडा ऐतिहासिक फैसला है । यह सच है कि पिता चाहे कोई भी हो लेकिन मां हमेशा मां रहती है । ऐसे समय मे जब भारतीय समाज मे परंपरागत मूल्य तेजी से बदल रहे हों तथा स्त्री-पुरूष संबधों मे खुलेपन की नित नई खिडकियां खुलने लगी हों, इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए ।

दर-असल भारतीय समाज परंपरागत रूप से पुरूष प्रधान रहा है । इस द्र्ष्टि से महिलाओं की सामाजिक भूमिका बहुत ही सीमित रही है । एक महिला का जीवन घर-परिवार की चाहरदीवारी तक ही सीमित होकर रहा है । बरसों बरस तक हमारे समाज मे महिलाओं ने इसे एक परंपरा के रूप मे सहर्ष स्वीकार किया है । इसलिए भूमिका को लेकर कभी भी अहम के टकाराव जैसी  बात देखने को नही मिली । लेकिन इधर विकास व उन्नति की सीढियां चढते भारतीय समाज मे बहुत कुछ ऐसा नया जुडा है जिसकी कल्पना साठ या सत्तर के दशक मे संभव नही थी ।

घर के चारदीवारी तक सीमित रहने वाली औरत ने बाहर की दुनिया मे भी अपनी भूमिका को तलाशा तथा उसे निर्वाह करने कि लिए अपने को एक अलग ही मानसिक सांचे मे ढालने का सफल प्रयास किया । रसोई व बच्चों से हट कर जब वह दूसरे क्षेत्रों मे भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगी तो कई पारंपरिक मूल्य व विचार यकायक दरकने लगे । खुली हुई खिडकियों से उसने अपने अलग वजूद को देखा और समझा । यहीं से शुरू हुई उसके अपने अधिकारों व सम्मान के लिए लडाई जो अब भी जारी है । अस्सी के दशक मे चर्चित टी वी कलाकार नीना गुप्ता  वेस्ट इंडिज के क्रिकेटर विवियन रिचडर्स से संबधों के चलते बिन ब्याही मां बनी थीं और तब इस मामले ने सामाजिक क्षेत्र मे एक तहलका मचा दिया था । लेकिन इधर समय चक्र के साथ सामाजिक जीवन मे बहुत कुछ बद्ला है ।

खुलेपन व समाज मे महिलाओं की बढती भागीदारी के फलस्वरूप वह सवाल भी   सामने आने लगे हैं जिन पर कभी सोचा ही नही गया । स्त्री पुरूष दैहिक संबधों की तमाम उलझनें मुखरता से अपने जवाब तलाश रही हैं । वे तमाम सामाजिक बातें जिन पर परदेदारी रही हैं, बेपर्दा हो गईं । प्यार, सेक्स व विवाह संबधों से उपजे सवालों पर जो बेबसी व लाचारगी की स्थिति को वह झेलती रही है उससे मुक्त होने के प्रयास मे वह पूरे जी जान से जुट गई है । मानवीय भूलों या अनचाही दुर्घटनाओं की स्थिति मे चाहे बलात्कार के बाद अनचाहे गर्भधारण की बात हो या फिर सहमति से बनाये गये रिश्तों के फलस्वरूप जन्म लेने वाले बच्चे का सवाल हो, उसकी स्थिति हमेशा निरीह रही मानो सारा दोष उसी का रहा हो ।

आज बेबसी व लाचारी के इस अंधेरे से ही उसे उजाले मे लाने के प्र्यास किये जा रहे हैं । जिससे वह भी समाज मे सम्मान के साथ जी सके । न्यायालय का यह फैसल्ल उसी उजाले की ओर ले जाने का एक प्र्यास है जहां उसे किसी पुरूष का मोहताज न रहना पडे । सही अर्थों मे यह एक मां का सम्मान है चाहे उसकी संतान के पिता का  रिश्ता कानूनी रूप से स्वीकार्य हो या न हो लेकिन चूंकि वह उस बच्चे की मां है इसलिए उस पर उसका पूरा अधिकार है । आने वाले समय मे तेजी से बदलते समाज मे इसका बडा दूरगामी प्रभाव पडेगा ।