Thursday, 14 August 2014

क्या भ्रष्ट व्यवस्था के स्वयं पोषक हैं हम

         

( L.S. Bisht )-      15 अगस्त 1947 को हम आजाद हुए | हमने खुशियां मनाई कि गुलामी की बेडियों से मुक्त हम युगों तक आजाद भारत में सांस लेते रहेंगे | 26 जनवरी 1950 को फ़िर हमने मिठाइयां बांटी, पटाखे छोडे कि अब हमारा राष्ट्र, हमारा जीवन हमारे ही द्वारा बनाए गए संविधान से आगे और आगे बढता रहेगा | हमने एक ऐसे गणतंत्र की आधारशिला रखी जिसमें सभी धर्म, जातियों तथा वर्गों को फ़लने-फ़ूलने का पूरा पूरा अवसर मिले |
     लेकिन आज गणतंत्र का जो स्वरूप सामने है, उसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी | हमारे प्रजातंत्र का मूल मंत्र है, जनता के लिए,जनता द्वारा,जनता का शासन | इस उदार व्यवस्था में हमें ढेरों अधिकार मिले लेकिन आज उन अधिकारों के बाबजूद गणतंत्र की वह चमक जिसकी उम्मीद की गई थी,कहीं नहीं दिखती |
     स्वतंत्रता के पूर्व अपनी बदहाली का कारण हमें गुलामी समझ मे आता था | लेकिन उस अंधेरे मे हमारे पास अपनी पीडा सह लेने के अलावा और दूसरा रास्ता था भी नहीं | लेकिन अब वह बेबसी नही रही, वह अंधेरा नही रहा, हम किस जगह की तलाश करें जहां शिद्दत से उठते तमाम सवाल खामोश हो जाएं |
     आज देश की मांसपेसियां काम नही कर पा रही हैं | धमनियों व शिराओं में रक्त प्रवाह मंथर गति से हो रहा है | कुल मिला कर गौतम बुद्द, महावीर स्वामी व गांधी का देश अपना सम्पूर्ण राष्ट्रीय चरित्र खो चुका है | आजादी मिलने के बाद भारत विश्व का सबए बडा लोकतंत्र बना | तमाम राज्य बने और संविधान के तहत सभी को बराबरी का दर्जा मिला | परंतु सत्ता व वोटों की राजनीति ने एक ऐसे तांडव को जन्म दिया जिसकी चपेट में अब सारा राष्ट्र कराहने लगा है | साम्प्रदायिक दंगों की आग कभी यहां लगती है तो कभी वहां | मासूम लोगों की मोतों पर वोट की राजनीति करने से किसी को जरा भी परहेज नही | एक तरफ़ शहरों की चकाचौंध दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ रही है तो दूसरी तरफ़ आम आदमी का शोषण व बदहाली बढती जा रही है |
     यह सच है कि इस स्थिति के लिए हमारी सरकार तथा व्यवस्था काफ़ी बडी सीमा तक जिम्मेदार हैं | परंतु क्या हम कटघरे से बाहर हैं | इतिहास साक्षी है कि गुलामी के दौर में हम सभी ने कंधा से कंधा मिला कर बेडियों से मुक्ति पाई | परतु फ़िर स्वतंत्रता के बाद ऐसा क्या हुआ कि हम हिन्दु, मुसलमान, सिख, ईसाई या हरिजन तथा सवर्ण व अमीर तथा गरीब हो गए |
     आज हम बेशक राजनीति व व्यवस्थ को कोस लें परंतु वह राजनीति व व्यवस्था कायम नहीं रह सकती जिसे हम अस्वीकार कर दें | लेकिन सच्चाई यह है कि कहीं किसी न किसी स्तर पर हम स्वय इसके पोषक हैं |
     सत्य तो यह है कि हम सभी ने देश पर ध्यान देने की बजाय अपने अपने ऊपर ध्यान देना शुरू कर दिया | हमारा राष्ट्र चरित्र हमारा व्यक्तिगत चरित्र बन गया | फ़िर प्रत्येक ने उसे कई हिस्सों में अपने अपने हितों के अनुरूप बांट लिया | चरित्रों के बंटवारे की इस अंधी दौड में वह भूल ग्या कि यह वह देश है जहां मर्यादा के लिए कभी राम ने अपनी पत्नी का भी त्याग किया | यह वह देश है जहां महात्मा बुद्द ने सारे माया बंधनों को अस्वीकार कर मोक्ष प्राप्त किया | वह भूल गया कि यह भगवान श्रीकृष्ण की भूमि है जिसने द्रोपदी की लाज बचाई |
     यह सब भूल कर वह अपनी स्वार्थ सिध्दि की अंधी दौड में शामिल हो वह सब करने लगा जिससे उसका अपना घर भर सके | आज स्थिति यह है कि अपना चरित्र खो सभी चोरी, कपट और भ्र्ष्टाचार में लगे हैं | परंतु सभी एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं | लेकिन कडवा सच  यह है कि संतरी से लेकर मंत्री तक सभी एक ही रास्ते में चल रहे हैं | देश प्रेम, जनहित, नैतिकता जैसे शब्द उपहास की वस्तु बन कर रह गए हैं | स्त्य व अहिंसा जैसे शब्दों का चीरहरण हो चुका है |
     दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि अपने हितों को देख्कर हम राष्ट्रीय हित को एक्दम नजरांदाज कर रहे हैं| यही कारण है कि आज सभी को अपनी पडी है | किसी को आरक्ष्ण की बैसाखी चाहिए तो किसी को विशेष पैकेज तो किसी को अलग प्रदेश | देश का क्या होगा, इस पर सोचने की जरूरत किसी को महसूस नहीं होती |
     हमारी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई उपलब्धियां रहीं, यह कहते, सोचते हमारे नेता नही थकते | बहुत सारे तमगे हमारे ताज पर चमक रहे हैं | लेकिन सत्य तो यह है कि शिखर चमकाने के चक्कर में हम नींव पर ध्यान देना भूल गए |
     आज स्थिति यह है कि जो जहां मजबूत स्थिति में है वह दूसरे कमजोर का शोषण कर रहा है | भौतिक सुविधाओं की होड में वह अमानवीय व्यवहार की हद तक जा चुका है | भ्रष्ट नौकरशाह, मिलावट करने वाला व्यापारी, भ्र्ष्ट ठेकेदार, भ्र्ष्ट पुलिस, स्ररकारी अफ़सरान, तीन तिकडम पढाने वाला मैकेनिक, ठगने वाला व्यापारी, संसद में बैठने वाला नेता, कहीं बाहर से तो नहीं आते | हम ही किसी न किसी रूप में इनमें से एक हैं |
     कडवा सच तो यह है कि स्वतंत्रता के बाद हमारा चारित्रिक पतन हुआ है | हम स्वार्थी और अपने हित साधने में चालाक हुए हैं | और जिस देश के नागरिकों की सोच में राष्ट्रहित सबसे अंत में आए वहां इससे अच्छी स्थिति की कल्पना की भी नहीं जा सकती | अगर हम चाहते हैं कि आने वाले वर्षों में गणतंत्र की तस्वीर बदले तो हमें स्वयं को भी बदलना होगा | यह गन्दी राजनीति व व्यवस्था तब ही बदलेगी जब हम स्वय इसके पोषक न रहें |