Tuesday, 4 November 2014

केनी, तुम्हें क्या कहूं

                                               
( L.S. Bisht ) आज वह फिर उदास है । वैसे उसके चेहरे में गहरी उदासी की रेखायें देखने का मैं एक तरह से अभ्यस्त सा हो गया हूं । मुझे पता है कि उसकी जिंदगी में बसंत अब एक गुजरे दौर की याद भर रह गया है । अब अगर कुछ शेष है तो रेगिस्तान की मानिंद खामोशी जिसे उसने स्वीकार कर लिया है ।

अस्सी के दशक की केनी यानी कनुप्रिया अब कहीं खो सी गई है । लखनऊ विश्वविधालय में बिताए खूबसूरत दिनों की यादों को संजोये रखने की भी उसे कोई वजह नजर् नहीं आती । हां कुछ साहित्यिक  किताबें जिन्हें वह अक्सर हम दोस्तों से साझा किया करती थी एक कोने में धूल खा रही हैं । बीच में दो मोटी किताबें वुडवर्थ की लिखी मनोविज्ञान  विषय पर जिन्हें मैं अक्सर उससे उधार मांगा करता था अभी सही सलामत हैं । बस यही कुछ् निशानियां हैं उसके पास उस बीते दौर की जिसे वह बहुत पीछे छोड चुकी है ।

चंचल हिरनी की तरह विश्वविधालय के मनोविज्ञान ब्लाग् में कुंलाचे भरने वाली केनी अब बेदम, बेबस सी , झील के ठहरे हुए पानी की तरह बस मुझे टुकर टुकर देखती भर है । बहुत कम बोलती है । उसके पास अब शायद ही कोई आता हो । उसने अपने आपको उदासी की गहरी परतों में कैद जो कर लिया है । लेकिन मेरा आना जरूर उसे सुकून सा देता है । शायद इसलिए भी कि मैं एक्मात्र गवाह हूं उसकी उस स्वप्निल दुनिया का, सुहानी शामों और चांदनी रातों का जो कभी उसने नीरज के साथ गुजारे । सबकुछ एक फिल्म की तरह आंखों में तैरने लगता है ।

लेकिन उसके सपनों के उस राजकुमार के लिए तो प्यार मात्र एक खिलवाड था । प्यार में अपना सबकुछ न्योछावर कर देने वाली केनी की जिंदगी से विवाह के पांच साल बाद नीरज का  यूं चले जाना, उस दौर के हम दोस्तों के लिए एक आघात से कम नहीं रहा ।

परिवार से संबध प्यार के चलते पहले ही छिन्न भिन्न हो चुके थे । समय की गति ने बाकी बचे रिश्तों को भी अपने आगोश मे ले लिया । वह दुनिया में निपट अकेली रह गई और तब तक उन दिनों के दोस्त भी इधर उधर बिखर गये । नौकरी जीने का सहारा बन गई लेकिन यादों के टीसते नासूर को भुला उसने जिंदगी मे दोबारा रंग भरने की कोशिश कभी नहीं की । अपनी उदासियों और छ्ले जाने के संताप के बीच, पहाड सी जिंदगी मे अब वह एक प्रौढ महिला में तब्दील हो चुकी है ।

अब मेरा उसके पास जाना भी बहुत कम हो पाता है । सोचता हूं आखिर उसके सपनों और प्यार की यह अकाल मौत क्यों हुई । एक दोस्त के रूप में उन दिनों  नीरज हमें कभी बुरा क्यों नही लगा । लेकिन आखिर उसने ऐसा क्यों किया । एक छ्लावे भरे प्यार के लिए अपनी पूरी जिंदगी को होम कर देने वाली इस मित्र केनी को क्या कहूं ।जहां एक तरफ महिलाओं के भावनात्मक व शारीरिक शोषण को लेकर बडे बडे कानूनों व बातों की हवा बह रही हो वहीं अपने को अपने ही जीवन मूल्यों पर होम कर देना एक सवाल तो उठाता ही है कि आखिर तमाम विद्रोही स्वरों के बीच यह कैसी सोच है । यह भी संभव है कि  शायद प्यार की दुनिया है ही ऐसी कुछ चीजें कभी समझ नहीं आतीं ।