Saturday, 1 November 2014

लुप्तप्राय: सांस्कृतिक याद – रंग-बंग


( L.S. Bisht )     हिमालय क्षेत्र की वादियों में बसे गांव सदियों से अपने में बहुत कुछ समेटे हुए हैं | एक अलग सस्कृति, लोकजीवन की अपनी लय और सपनों की अपनी विरासत | यह सांस्कृतिक विरासत अब समय के थपेडों के साथ बहुत कुछ बदलने लगी है | काफ़ी कुछ बिसरता जा रहा है | कभी यहां की घाटियां अपने इन्द्रधनुषी लोकजीवन के लिए कौतुहल का विषय हुआ करती थीं | बहुत कुछ आज भी जानना-समझना शेष है |
     आकाश छूती पर्वतश्रंखलाओं के बीच इस अंचल की ऐसी ही दो घाटियां हैं – दारमा और जोहार | यहां के लोकजीवन में बहती सांस्कृतिक धारा की अपनी लय है जिसंमें बहुत कुछ अनूठा है | इन घाटियों के वाशिंदे मूल रूप से मंगोल नस्ल के हैं तथा चेहरे तिब्बती जैसे | वैसे भी तिब्बत सीमा से जुडे रहने के कारण इनका तिब्बत से व्यापारिक संबधों का एक पुराना इतिहास है | इन्हीं सीमावर्ती लोगों को अब हम आमतौर पर ‘ भोटिया नाम से जानते हैं |
     इस समुदाय के बारे में बहुत सी बातें चर्चा मे रही हैं |यहां की महिलाओं के सौंदर्य की कहानियां तो दूर दूर तक लोगों के कौतुहल का विषय बनी हैं | अनेक कहानी-किस्सों के बीच यह भी कहा जाता है कि कभी इतिहास में यहां की एक बेहद सुंदर युवती राजुला के रूप सौंदर्य का जादू दवाराहाट के एक राजकुमार पर ऐसा छाया कि वह अपना राजपाट छोड उसके गांव आ पहुंचा और अंतत: उसे अपने साथ ले जाकर ही दम लिया |
     लेकिन यह सीमावर्ती घाटियां महज इन परिणय लोककथाओं की ही गवाह नहीं हैं अपितु एक अनोखी परंपरा भी यहां सालों साल परवान चढती रही है | युवाओं को प्रेम व काम सुख का प्रथम एहसास दिलाने की एक प्राचीन परंपरा यहां रही है और जहां किशोर-किशोरियां का पहली बार मिलन होता था उसे रंगबंग गृह के नाम से जाना जाता था | यह गांव का एक सामुहिक घर होता था जिसे गांव के लोगों दवारा ही बनवाया जाता था |
     प्रथम प्रेम के उन्मुक्त व्यवहार से जुडे इस ‘ रंग-बंग ‘ नामक गृह में आने का निमत्रंण भी गांव की किशोरियां अपने तरीके से देती थीं | बहुधा किसी ऊंचे स्थान से सफ़ेद रूमाल हिला कर युवतियां दूसरे गांव के युवकों को रंग-बंग में आने का संदेश पहुंचाया करती थीं | सूरज डूबने के साथ युवाओं की टोलियां नाचते गाते पहुंच जाया करतीं और फ़िर शुरू होती लडके लड्कियों के बीच गीत प्रतियोगिता | इसमें स्थानीय लोकगीतों का भी भरपूर इस्तेमाल होता |
     इनके नृत्य और गीतों से पूरे वातावरण में प्रेम रस घुल सा जाता और फ़िर अपने पसंद के साथी को चुन पहुंच जाते ‘ रंग-बंग ‘ के भीतर , उस दुनिया में जहां उन्मुक्त प्रेमरस में डूब बुनने लगते अपने भविष्य के सुनहले सपनें | बाद मे परिवार के बडे बुजुर्ग बातचीत कर विवाह का दिन निश्चित कर लिया करते |
     इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्र्मों का आयोजन किया जाता था | युवतियां मदिरा पान करवातीं और फ़िर मस्ती में डूब सभी जोडे संगीत और नृत्य की लय में झूमने लगते | इस अवसर पर प्रणय गीतों का समां बंध जाया करता |
     प्राचीन पुस्तकों में इस अवसर पर किये जाने वाले अनेक भोटिया नृत्यों का भी उल्लेख मिलता है | चम्फ़ोली, इडियाना तथा घुरंग आदि प्रमुख नृत्य थे | यह सभी धीमी गति के नृत्य थे जिन्हें गोलाकार रूप में किया जाता था |
     यहां युवक-युवतियों को एक तरफ़ पूरी स्वतंत्रता रहती तो दूसरी तरफ़ कुछ कानून कायदों का भी पालन करना पडता था | रंग-बंग की गतिविधियों का संचाल्न उस प्रौढा द्वारा किया जाता था जो या तो आजन्म कुंवारी रही हो अथवा जिसने गृहस्थ जीवन त्याग दिया हो | यह संचालिका कुछ विशेष सामाजिक नियमों के तहत ही मिलने का अवसर देती और फ़िर उनके विवाह रस्म की तैयारियां भी शुरू हो जाया करतीं | लडकी के घरवाले बारातियों का स्वागत करते तथा भोजन की व्यवस्था भी करते |
     इस व्यव्स्था से दाम्पत्य सूत्र में बंधने वाले युगल यदि किन्हीं कारणों से बाद में अलग होना चाहते तो इसके लिए उन्हें पूरी स्वतंत्रता रहती | बहरहाल अब ‘ रंग-बंग ‘ की यह परंपरा लगभग लुप्तप्राय: ही है | दर-असल समय के साथ लोगों ने इस प्रथा को उपयोगी नहीं समझा | शिक्षा के प्रसार ने भी लोगों का नजरिया काफ़ी बदला है | लेकिन क्भी कधार सुदूर गांवों मे “ रंग-बंग” यानी युवागृह के भवन देखने मात्र से ही लोगों को पुराने दिन याद आने लगते हैं |