Monday, 7 July 2014

उठने लगे हैं महिला हितों के कानूनों पर सवाल



( L. S. Bisht )  - अभी हाल मे उच्चतम न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि क्या दो व्यस्क लोगों के बीच सहमति से बना रिश्ता टूटने पर पुरूष के खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाया जा सकता है । इस पर न्यायालय ने कोई आदेश तो पारित नही किया, लेकिन इस तरह के मामलों मे चिंता जरूर जाहिर की । दरअसल इधर कुछ समय से कई मामले देखने को मिले हैं जिनमे रिश्ता खत्म होने के बाद महिलाओं ने पुरूषों के खिलाफ शादी का वादा करके सबंध बनाने पर बलात्कार का मामला दर्ज कराये हैं । 12 जुलाई,2013 को एक मामले मे फैसला सुनाते सुनाते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए टिप्पणी की थी कि ऐसे बहुत सारे मामले देखने को मिल रहे हैं, जिनमें महिलाएं सहमति से संबध बनाती हैं और फिर जब रिश्ता टूटता है तो वे कानून को बदला लेने के हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं । ऐसा पैसा उगाहने या फिर लड्के को शादी के लिए मजबूर करने के लिए भी किया जाता है । ट्रायल कोट्स के जज ऐसे मामलों सावधानी से परखें और चेक करें कि ये आरोप असली हैं या इसके पीछे और मकसद छिपा है ।
इसके ठीक दो दिन बाद दहेज के एक मामले की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने दहेज प्रताड्ना के एक  मामले मे बडी तादाद मे की जाने वाली गिरफ्तारी पर चिंता जताई है । न्यायालय ने क्हा है कि पुलिस जब भी ऐसे मामले मे गिरफ्तारी करे तो उसे निजी आजादी और सामाजिक व्यवस्था के बीच बैलेंस रखना जरूरी है । अदालत ने कहा कि दहेज प्र्ताडना से जुडा मामला चूंकि गैर जमानती है इसलिए कई बार लोग इसे हथियार बना लेते हैं ताकि वह पति और उसके रिश्तेदार को इसके जरिए गिरफ्तार करवा सकें । दहेज प्रताडना के ज्यादातर मामलों मे आरोपी बरी होते हैं और सजा दर सिर्फ 15 फीसदी है ।
अपनी टिप्पणी मे अदालत ने आगे कहा कि हाल के दिनों मे वैवाहिक विवाद मे इजाफा हुआ है । शादी जैसी संस्था प्रभावित जो रही है । दहेज प्रताडना कानून इसलिए बनाया गया कि महिलाओं को प्रताडना से बचाया जा सके । लेकिन कई बार लोग इसे गिरफ्तारी का हथियार बना लेते हैं । कई मामलों मे तो बिस्तर पकड चुके पति के दादा-दादी और विदेश मे रहने वाली बहन तक को निशाना बनाया जाता है और गिरफ्तार किया जाता है ।
दरअसल उच्चतम न्यायालय की यह टिप्णियां समाज के सच को बयां कर रही हैं । बदलते समय के साथ विकास के पथ पर अग्रसर हो रहे इस देश मे ऐसे कानूनों की आवश्यकता अनुभव की गई जिनसे महिला हितों को सरंक्षण मिल सके । इसमे दहेज ह्त्या व उत्पीडन को रोकने के लिए दहेज कानून बनाया गया जिसे गैरजमानती रखा गया । इसके बाद दिल्ली मे हुए बलात्कार कांड ने पूरे देश को हिला कर रख दिया । तब फिर बलात्कार संबधित कडे कानूनों की आवश्यकता महसूस की गई और सामाजिक दवाब मे सरकार ने बलात्कार से जुडे कानूनों को संशोधित कर धारदार बना दिया
लेकिन इस दोनो कानूनों को सख्त बनाये जाने के समय इस बात को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया कि अक्सर इस देश मे ऐसे कानूनों का दुरूपयोग भी होता है । इस चूक का परिणाम यह हुआ कि दहेज कानून ससुराल वालों व पति को प्र्ताडित करने का एक अचूक हथियार बन गया । अक्सर इस एक्ट मे दर्ज मामले फर्जी निकलने लगे । 2012 के आंकडों पर नजर डाली जाए तो देश भर मे धारा 498 ए मे एक लाख 97 हजार लोग गिरफ्तार हुए । यह 2011 के आंकडों से ज्यादा हैं । इनमे 93 फीसदी मामलों मे चार्जशीट भी हुई लेकिन सजा सिर्फ 15 फीसदी मामलों मे ही हो पाई ।
ऐसी ही कुछ बलात्कार संबधित कानूनों के साथ भी है । दिल्ली कांड की गूंज से भयभीत तत्कालीन कमजोर कांग्रेसी सरकार ने आनन फानन मे जो कानून बनाए और जिस तरह से बनाए, वह गैरजरूरी ही नही बल्कि विवादास्पद भी थे । जिसमे देखना, घूरना, छूना, इशारा करना और ऐसे ही न जाने कितनी बातों को जोड दिया गया । जिन्हें साबित करना ही कठिन होगा । देखने और घूरने मे अंतर करना तो और भी टेढी खीर है ।
इस समय आई.पी.सी की धारा 376ए के तहत अधिकतम फांसी की सजा हो सकती है । अगर बलात्कार संवधित कानूनों का गहराई से अध्ययन करें तो सारा मामला महिलाओं के पक्ष मे ही जाता है । दरअसल इस कानून की सबसे मजबूत लेकिन कमजोर कडी भी यह है कि ऐसे मामलों मे लड्की के बयान को अहम सबूत माना गया है । दूसरा यह कि ऐसे मामलों मे चाहे वह बलात्कार का हो या छेडछाड का, शिकायत के बाद पुलिस को अधिकार है कि वह आरोपी को गिरफ्तार कर ले यानी इन्हें संज्ञेय अपराध की परिधि मे माना गया है । इसमे एफ.आई.आर दर्ज करने के बाद बिना वारंट के भी आरोपी को गिरफ्तार किया जा सकता है ।
दरअसल सामाजिक दवाब मे और राजनीतिक लाभ लेने की होड से भी बनाये गये इन कानूनों मे आरोपी को तनिक भी सुरक्षा नही है । महिला वर्ग की वाही वाही लूटने की मानसिकता को रख कर बनाये गये इन कानूनों का दुरूपयोग भी हो सकता है, इस पर सोचने की जरा भी जहमत नही उठाई गई । आज इसका परिणाम सामने है । बात यहां तक पहुंच गई है कि लिव-इन-रिलेशेन मे कुछ समय अपने पुरूष मित्र के साथ, अपनी मर्जी से रहने वाली लड्की, आपसी खटपट होने पर लड्के के विरूध्द बलातकार का आरोप लगा देती है । यह लडकी से कोई नही पूछ्ता कि इस देश का कौन सा धर्म कौन सी संस्कृति किसी लड्की को बिना विवाह के संबध बनाने की आज्ञा देता है । क्या इस स्थिति से बचना उस लड्की का नैतिक कर्तव्य नही बनता । यही इस कानून की कमजोरी है । लड्का ही दोषी समझा जाता है ।
यही नही, नौकरी दिलाने के नाम किए गये शोषण के आरोपों की संख्या तेजी से बढी है । दरअसल यहां भी महिला के स्वार्थ को पूरी तरह से नजर-अदांज करते हुए मामला पुरूष के खिलाफ चला जाता है । अक्सर ऐसे मामले व्लैकमेल करने के लिए भी किए जाने लगे हैं । गांव-कस्बों मे आपसी रंजिस होना आम बात है । बदला लेने के लिए घर की महिला से छेडछाड की फर्जी रपट लिखा कर दूसरे पक्ष को परेशान करने की प्रवत्ति भी इधर देखने को मिली है ।
कुल मिला कर जल्दबाजी, भावुकता और मीडिया के शोर-शराबे के दवाब मे बनाए गए इन कानूनों के दुरूपयोग की बाढ आ जाने से न्यायालय को संज्ञान लेना पडा है । अब जरूरी है कि इन कानूनों का सही पंचनामा कर इन्हें संतुलित बनाया जाए । इसके साथ ही इसमे झूटी रपट लिखाने वाले को भी कडे दंड का प्राविधान रखना जरूरी है तथा जिसका फर्जी मामले के कारण् सामाजिक सम्मान आहत हुआ है उसे मुआवजा दिलाने का भी कानून रखा जाए । इन कानूनों के दुरूपयोग को रोकने के लिए यह जरूरी भी है ।