Tuesday, 22 July 2014

आखिर कैसा हो देश मे विवाह प्रणाली का स्वरूप

          


 ( एल.एस.बिष्ट ) – { दैनिक जागरण में प्रकाशित ब्लाग } पुरातन काल से ही स्त्री- पुरूष का मिलन किसी न किसी रूप मे प्रचलित रहा है | मानव सभ्यता के आज तक के इतिहास पर नजर डाले तो विवाह के कई रूप देखने को मिलते हैं | यह दीगर बात है कि उनमे से कई विवाह पद्द्तियां तत्कालिन समाज मे भी मान्य नही थीं | परन्तु कई कारणों से वह सीमित रूप मे ही रहीं हैं | लेकिन आज कई मोडों से गुजरने के बाद विवाह प्रणाली का जो रूप हमारे बीच है वह भी तेजी से गड्ड्मड होता जा रहा है |
     बदलते सामाजिक मूल्यों मे हमारी परंपरागत विवाह प्रणाली पर भी अंगुली उठनी लगी है | तमामा बुराइयों की घुसपैठ के मद्देनजर एक बडा वर्ग अब इसमे बदलाव का समर्थक नजर आने ल्गा है | लेकिन दूसरी तरफ़ इसे एक आदर्श प्रणाली मानने वालों की संख्या आज भी कम नही |
     लगभग आठवें दशक से दहेज को लेकर हमारी परंपरागत विवाह संस्था पर जो सवाल व विवाद उठे, क्मोवेश वह आज भी जारी हैं | लेकिन इसके समान्तर प्रेम विवाह का जो रूप उभर कर सामने आया, वह भी तमाम शंकाओं और विवादों से परे नही रहा | देखा जाए तो विवाह के स्वरूप को लेकर मौजूदा समाज अजीव मन:स्थिति मे फ़ंसा दिखाई देता है | आज के परिवेश मे संबधों को लेकर जो कुछ हम देख-सुन रहे हैं उस पर भी कोहराम कम नही मच रहा |
     बहरहाल इस सवाल पर सोचने से पूर्व भारतीय समाज की विवाह प्रणाली मे स्वयंवर और नारी हरण जैसी परंपराओं से लेकर प्रेम विवाहों के जो विविध रूप एक साथ देखने को मिल्ते हैं, उन पर नजर डालना जरूरी है |
     विवाह अधिनियम 1955 के पूर्व देश मे विवाह की आठ पद्दत्तियां प्रचलन मे थीं | लेकिन इनमे सिर्फ़ चार को ही मान्यता प्राप्त थी | मान्य विधि से हुए विवाह मे ही महिला को पत्नी होने की मान्यता प्राप्त थी | आठ प्र्कार के जो विवाह प्रचलित थे उनमे गंधर्व विवाह का प्रचलन मुख्यत: क्षत्रियों मे था | ब्रह्म विवाह मे पुत्री का पिता किसी नवयुवक को स्वयं बुला कर उसकी पूजा करके वस्त्र आदि भेंट करता था और फ़िर अपनी पुत्री का कन्यादान करता था | यह एक मान्य विवाह प्रणाली थी | देव विवाह मे विधिपूर्वक यज्ञ करने के उपरान्त कन्यादान किया जाता था | इसमें धार्मिक संस्कारों को महत्व दिया गया था | इसके विपरीत असुर विवाह मे कन्या के बदले पिता को धन दिये जाने का प्रावधान था | दक्षिण भारत मे यह प्रथा बहुत लंबे समय तक रही | राक्षस विवाह प्रथा मध्य प्रदेश की गौंड जाति व इसकी कुछ उपजातियों मे प्रचलित रही | इसमे कन्या को बलपूर्वक उठा लिया जाता था |
     इन विवाह प्रथाओं के अलावा पैशाच विवाह, प्र्जापत्य विवाह व आर्य विवाह प्रथाएं भी चलने मे रहीं | आज जो विवाह प्रथा हमारे सामने है और जिसे लेकर अब काफ़ी आलोचनाएं होने लगी है, विशेष रूप से दहेज को लेकर, यही सर्वमान्य विवाह प्रथा है, जिससे समाज संचालित हो रहा है | थोडे बहुत परिवर्तन के साथ देश के अधिकांश हिस्सों मे इसका ही चलन है | इसमे देखने-दिखाने से लेकर विवाह होने तक सभी रस्मों का विधिवत पालन किया जाता है |
     दर-असल यहां गौरतलब यह है कि इस स्वरूप को लेकर मध्यम वर्ग अपने ही समाज का एक अनावश्यक भय अपने भीतर पालता है | वह इस मामले मे न तो किसी तरह की आजादी लेना चाहता है और न ही देना चाहता है | इधर कुछ वर्षों से विवाह के नाम पर जो अमानवीय स्थितियां समाज झेल रहा है, उसने कई सवाल खडे कर दिये हैं | तमाम कानूनों के बन जाने के बाद भी हालात बहुत ज्यादा नही बदले हैं | लेकिन समाज ने भी इसी को येनकेन ढोते रहने की मजबूरी मान लिया है |
     लेकिन इधर कुछ वर्षों से बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है | युवक-युवतियों का प्रेम विवाह की तरफ़ रूझान तेजी से बढा है | और समाज कि बंधन भी काफ़ी हद तक ढीले हुए हैं | अब अस्सी के दशक की तरह प्रेम विवाह काना-फ़ूसी की चीज नही रह गये हैं | इसे एक आम रूप मे स्वीकार कर लिया गया है | लेकिन विवाद  और शंकाएं यहां भी हैं |
     पिछ्ले एक दशक से महिलाओं के लिए जो अनुकूल सामाजिक परिवेश तैयार हुआ है तथा जिस तरह से युवतियां घर के बाहर निकली हैं इसने एक नई जीवन शैली को जन्म दिया है और वह है ‘ लिव इन रिलेशन ‘ यानी बिना शादी के युवक-युवती का साथ-साथ रहना | महानगरों मे इसका विस्तार बडी तेजी से हो रहा है | लेकिन समाज के एक बडे वर्ग के गले के नीचे यह आसानी से उतर पायेगा, इसमे गहरी शंका है | दर-असल पारम्परिक संस्कार और नैतिक मूल्य इसके रास्ते की सबसे बडी अडचन है | बहरहाल यह महानगरों तक सीमित है |
     कुल मिला कर सवाल जहां का तहां है कि आखिर विवाह का स्वरूप कैसा हो | परंपरा की लीक न पीटते हुए विवाह लडके-लड्कियों पर छोड दिया जाए या फ़िर मौजूदा व्यवस्था को ही जारी रखना व्यापक हित मे होगा | अथवा इसके बीच का कोई रास्ता अधिक उपयुक्त होगा | जिंदगी भर का फ़ैसला रूमानी सपनों के बीच लिये जायें यह भी उचित प्रतीत नही होता | लेकिन दूसरी तरफ़ उनकी सहमति-असहमति अथवा पसंद नापसंद को दरकिनार रखना भी कहीं से उचित नही है | तेजी से बदलते हुए सामाजिक परिवेश व मूल्यों के बीच अब यह जरूरी हो गया है कि विवाह प्रणाली पर नये सिरे से  खुले मन से विचार किया जाए तथा दहेज जैसी कुप्रथा से मुक्त किसी अन्य व्यवस्था को अपनाने की, जो हमारे भारतीय संस्कारों व मूल्यों के अनुरूप भी हो पहल की जानी चाहिये |