Sunday, 10 June 2018

सिनेमाई नंगई के विरोध मे कौन जलाएगा मोमबत्ती


देश के किसी शहर मे किसी महिला के साथ  बलात्कार होता है तो मोमबत्तियां लिए एक सैलाब सड़कों पर आ जाता है | नारे, धरना-प्रदर्शनों का सिलसिला ही चल पड़ता है और भारतीय मीडिया तो वहां अपना तम्बू ही गाड़ देता है | टीवी न्यूज चैनलों पर तीखी बहसें शुरू हो जाती हैं | लेकिन जब पूरे समाज के साथ बलात्कार होता है तब कहीं कुछ नहीं | एकदम खामोशी | बल्कि उस सिनेमाई बलात्कार को प्रयोगवादी फिल्म का टैग लगा कर और महिला सशक्तिकरण से जोड़ कर उसे सही ठहराने की पुरजोर कोशिश की जाती है |

       पिछले वर्ष प्रदर्शित विवादास्पद फिल्म “ लिपस्टिक अंडर माए बुर्का “ और अभी सिनेमाहालों मे चल रही  “ वीरे द वेडिंग “ यह सोचने के लिए मजबूर करती है की आखिर देश मे हम किस तरह के महिला सशक्तीकरण की वकालत कर रहे हैं या कहें सपना संजो रहे हैं |

       यह इत्तफाक ही है की पॉर्न फिल्मों को भी पीछे छोड देने वाली तथाकथित प्रयोगवादी फिल्म “ लिपस्टिक अंडर माए बुर्का “ और वीरे द वेडिंग , दोनों मे चार महिला चरित्रों की कहानी है जो जिंदगी को अपने तरीके से  जीना चाहती हैं | लेकिन दोनों  फिल्म देख लीजिए “ जीने  की अलग ललक “ के नाम पर सिर्फ और सिर्फ सेक्स फंतासी है जिसे पूरी फूहड़ता के साथ फिल्माया गया है | “ लिपस्टिक ........... मे अगर सेक्स आजादी के नाम पर खुले द्र्शय हैं तो वीरे द वेडिंग मे साक्षी की भूमिका मे  स्वरा भास्कर ने जो अश्लील संवाद बोले हैं उससे तो बेशर्मी भी शर्मा जा जाए | सड़क छाप सेक्स संवादों से लबरेज इस फिल्म ने उन सेक्स  उपकरणों से भी लड़कियों को परिचित करा दिया जिन्हें वह अभी तक जानती न थीं |

      अब एक सवाल उन तथाकथित प्रगतिशील लोगों से भी जो यह मानते हैं की पुरूषों /लड़कों के बारे मे तो इस तरह के सवाल नही उठाए जाते, तो फिर महिलाओं या लड़कियों के बारे मे ही क्यों ? उनसे यही कहना है की वे अपने किशोर या युवा बच्चों के साथ इस फिल्म को देखने जरूर जाएं और फिर इस तरह के फिल्मों की वकालत करें | समझ मे आ जाएगा की यह फिल्मे महिला आजादी के नाम पर क्या परोस रही हैं |

       सवाल यह है कि यह किस तरह का महिला सशक्तीकरण है जो इन फिल्मों मे सिर्फ सेक्स के इर्द गिर्द ही घूम रहा है | या फिर इस बहाने सेक्स परोस कर पैसा कमाने का प्रयास भर है ? अगर यही महिला आजादी का शंखनाद है तो अब वह समय ज्यादा दूर नही जब स्कूली लड़कियां भी अपने बस्तों मे कंडोम के पैकेट लेकर घूमती मिलेंगी | बेटियां बचानी   है तो इस सिनेमाई नंगई के विरोध मे भी मोमबत्तियां जलानी होंगी |