Tuesday, 13 October 2015

विरोध का यह कैसा चरित्र है

( एल.एस. बिष्ट ) -दादरी घटना से उपजे विरोध व समर्थन का जो सिलसिला शुरू हुआ वह थमने का नाम ही नही ले रहा । गौरतलब यह भी है कि जिस गांव मे यह घटना हुई उसने भाई-चारे की एक नई मिसाल कायम की है । इतना सबकुछ होने के बाद भी उस गांव के ही एक मुस्लिम परिवार की दो बेटियों की शादी मे गांव के हिंदुओं ने अभूतपूर्व सहयोग किया और एकबारगी लगा कि मानो कुछ हुआ ही नही । लेकिन अपने को समाज मे बुध्दिजीवी कहलाने वाले इस बुझती आग मे घी डालने का काम कर रहे हैं । साहित्यकार नयनतारा सहगल ने  पुरस्कार लौटाने की जो शुरूआत की उसमें नित नये नाम जुडने लगे हैं । अब तो भेड चाल के रूप मे एक होड सी लगती दिखाई दे रही है ।

विरोध स्वरूप पुरस्कार लौटाने की घोषणा करने वालों मे कई नाम सामने आए हैं । इनमे मुख्य रूप से कश्मीरी लेखक गुलाम नबी खयाल, कन्नड साहित्यकार श्रीनाथ, जी.एन.रंगनाथ राव, हिंदी कवि मंगलेश डबराल , राजेश जोशी व कुछ पंजाबी साहित्यकार भी शामिल हैं ।
इनका साहित्यकारों का मानना है कि मोदी सरकार के राज मे लोकतांत्रिक मूल्य संकट मे पड गये हैं  तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी खतरा मंडराने लगा है । इनका यहां तक मानना है कि मोदी सरकार पूरी तरह तानाशाही के अंदाज मे देश को चलाना चाहती है । यही नही, दक्षिण के चर्चित साहित्यकारों की हत्या के लिए भी यह मोदी सरकार को ही जिम्मेदार मान रहे हैं । यानी एक तरह से इन्हें देश का धर्म निरपेक्ष व लोकतांत्रिक चरित्र पूरी तरह से खतरे मे दिखाई देने लगा है
  यहां गौरतलब यह भी है कि इसके पूर्व भी ऐसी घटनाएं देश मे होती रही हैं लेकिन तब शायद इन्हें कहीं से भी लोकतंत्र खतरे मे पडता नजर नही आया । आज यकायक इन्हें दादरी घटना के बाद आसमान सर पर टूटता नजर आने लगा है । अपने गुस्से की अभिव्यक्ति के रूप मे यह उन साहित्यिक पुरस्कारों को सरकार को वापस करने की घोषणा कर रहे हैं जिनका सीधे तौर पर सरकार से कोई लेना देना भी नही है । साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्था है । इन्हें यह भी स्मरण नही कि यह पुरस्कार  इन्हें साहित्यिक सेवाओं अथवा कृतियों पर दिया गया है जिसके वह हकदार हैं । राजनीतिक कारणों से इन्हें वापस करना कहीं से भी तर्कसंगत नही लगता ।
यही नही, इनका विरोध भी एक पक्षीय दिखाई देता है । यह उन लोगों मे कोई बुराई नही देख रहे जो गोमांस खाने को लेकर बढ चढ कर बोल रहे हैं व गोमांस परोसने की दावतों को, दूसरों को चिढाते हुए आयोजित कर रहे हैं । यही नही, इन्हें उन लोगों मे भी कोई बुराई नजर नही दिखाई देती जो ऋषि मुनियों के मुंह मे भी गोमांस डालने मे पीछे नही । ऐसे मे इनके विरोध को क्या समझा जाए ? प्रचार पाने का तरीका या फिर अपने को बौध्दिक व सेक्यूलर दिखाने की होड ।

अब बात जब विरोध की है तो भला यहीं तक सीमित कैसे रह सकती है ? शिव सैनिकों के विरोध के चलते पाकिस्तानी गजल गायक गुलाम अली के कार्यक्रम को रद्द करना पडा । यह वही गुलाम अली हैं जिनके भारत मे भी लाखों दीवाने हैं । अब यहां पर भी यह विरोध अतिवाद का शिकार होता दिखाई दिया । राजनीतिक दुश्मनी और कलाकारों की दुनिया के बीच फर्क को न समझ कर विरोध करना यहां भी तर्कसंगत नही लगता । कहीं अच्छा होता कि शिवसैनिक इस अंतर को समझ उनके कार्यक्रम का विरोध न करते । बहरहाल, मुंबई मे  उनके गजलों का जादू पिटारे मे ही बंद होकर रह गया ।
\ विरोध की यह आंधी यहीं तक सीमित न रह सकी । इसने जल्द ही एक ऐसी घटना को जन्म दिया जो देखते देखते अंतरराष्ट्रीय खबर बन गई । शिवसैनिकों ने एक और विरोध अपने नाम दर्ज कराते हुए आब्जर्बर रिसर्च फाउंडेशन के चेयरमैन सुधींद्र कुलकर्णी के मुंह मे कालिख पोत दी । दर-असल कुलकर्णी की संस्था ने पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की किताब के विमोचन का आयोजन किया था । यह बात शिवसैनिकों को नागवार गुजरी और उन्होने उनके चेहरे मे काला रंग पोत कर अपना विरोध दर्ज किया । यह दीगर बात है कि बाद मे विमोचन कार्यक्रम संभव हो सका
यहां भी देखा जाए तो इस तरह के विरोध की जरूरत नही थी । इसका लाभ तो उनकी पुस्तक को ही मिला और जाने अनजाने पूरी दुनिया के मीडिया मे भी छा गये । दर-असल इस तरह के विरोध राजनीतिक कारणों से ही किये जाते हैं लेकिन कई बार इन विरोधों का चरित्र तर्कसंगत नही लगता । दादरी घटना को लेकर साहित्यकारों का विरोध तरीका हो या फिर मुंबई मे शिवसैनिकों के विरोध का मनोविग़्य़ान समझ से परे है । सच यह भी है कि ऐसे विरोध व्यवस्था मे बदलाव लाने मे असफल ही सिध्द हुए हैं । इन पर सोचा जाना जरूरी है ।