Tuesday, 12 May 2015

पर्वतारोहण से मैला होता हिमालय




(एल.एस.बिष्ट )- हिमालय अभी हाल मे चर्चा का विषय बना । नेपाल मे आए भूंकप ने हिमालय की चोटियों पर जो कहर बरपाया उसमें कई पर्वतारोहियों को अपनी जान गंवानी पडी । लेकिन जिस तरह से यहां पर्वतारोहण की एक होड सी लगी है उसमें इस तरह की घटनाओं का होना कोई आश्चर्य का विषय भी नही । प्रतिवर्ष कई लोग इन बर्फीली चोटियों मे हमेशा के लिए दफन हो जाते हैं । लेकिन एक साथ इतनी मौतों ने कुछ सवाल भी खडे किये हैं । कहीं ऐसा तो नही कि रोमांच के शौकीन लोगों के लिए हिमालय की यह चोटियां एक पिकनिक स्पाट का रूप लेने लगी हों ।
इधर कुछ समय से पर्वतारोहियों की जो बाढ आयी है इसने यहां की चोटियों को किस हद तक कूडे के ढेर मे तब्दील कर दिया है , इस पर अभी गंभीरता से सोचा जाना बाकी है । लेकिन यहां की बर्फीली चोटियों मे बढते प्रदुषण की तरफ प्रधानमंत्री ने चिंता जाहिर की है और इसे प्रदूषण मुक्त किये जाने के अपने वादे को दोहराया है ।

सर एडमंड हिलेरी ने कभी कहा था कि हिमालय एक थाती है जो मात्र भारत और उसके आसपास के देशों की ही न होकर सारी दुनिया की है । उनका मानना रहा है कि अपने अनूठे आकर्षण के कारण ही एक बार जो इस प्रदेश आता है, यही का हो जाता है । लेकिन आज पर्वतारोहण अभियानों की बाढ ने इसे गंदगी और प्रदूषण का पर्याय बना दिया है । गतिविधियों की इस बाढ के फलस्वरूप हिमालय क्षेत्र मे प्रदूषण किस सीमा तक बढ गया है, इसका अंदाजा अस्सी के दशक मे ही हो चुका था ।

1983 मे दिल्ली मे हिमालय पर्वतारोहण एवं पर्यटन सम्मेलन आयोजित किया गया था । इस सम्मेलन मे भारतीय पर्वतारोहण संस्थान के तत्कालीन अध्यक्ष ने आगाह किया था कि हिमालय कि हिमालय प्रदेश मे निरंतर गंदगी फैलाई जा रही है । शिखरों को जाने वाले मार्ग कूडे के अंबार बने हैं । पेड पौधों का सत्यानाश किया जा रहा है । लेकिन यह चेतावनी अनसुनी ही रह गई । इस दिशा की तरफ कभी गंभीरता से सोचा ही नही गया ।

इधर कुछ वर्षों से पर्वताहियों की बाढ सी आ गई है । वर्ष 1960 मे हिमालय अंचल मे मात्र बीस पर्वतारोही अभियान गये लेकिन अब इनकी संख्या प्रतिवर्ष 300 से भी ज्यादा है । पर्वतारोहण के नाम पर भी अनेक संस्थाएं उग आई हैं । इसका एक बडा कारण एवरेस्ट विजय को एक उपलब्धि के रूप मे महिमामंडित करना भी रहा है । इसके अतिरिक्त प्रचार तंत्र विजयी  लोगों को जिस तरह से आंखों पर बैठाता है उसने भी पर्वतारोहण का एक ऐसा ' क्रेज ' पैदा किया जिसकी अब कोई सीमा नजर नही आती ।

दर-असल 1953 मे एवरेस्ट की पहली विजय के बाद देशी-विदेशी पर्वतारोहियों का जो सिलसिला शुरू हुआ उसने एवरेस्ट को एक कूडे के ढेर मे बदल दिया है । पुरूषों के बाद महिलाएं भी कीर्तिमान बनाने की होड मे शामिल हो गयीं हैं । बचेन्द्री पाल व संतोष यादव की सफलता ने देश मे महिला पर्वतारोहियों को एक नया उत्साह दिया और अब तो एक होड सी लग गई है ।

सर्वोच्च शिखर मे सफलता के झंडे गाडने की होड ने हिमालय क्षेत्र को किस स्थिति तक पहुंचा दिया है, इस पर किसी का ध्यान नही गया है । प्रचार माध्यम भी कीर्तिमानों का ही बखान करते रहे । अब जब हालात बद से बदतर होने लगे हैं तथा पर्यावरण की गंभीर समस्या आ खडी हुई है, इस दिशा मे सोचा जाने लगा है । हिमालय की चोटियों पर बढती गंदगी को लेकर  प्रधानमंत्री की चिंता इसका प्रमाण है।  वस्तुत: इन अभियानों की बाढ ने हिमालय के इस क्षेत्र को गंदगी और प्रदूषण का पर्याय बना दिया है । इन अभियान दलों के सदस्यों दवारा फैलाया गया कूडा-कचरा जैसे कि पोलीथीन, खाली टिन के डिब्बे, जूस व अन्य पेय पदार्थों के डिब्बे, रस्सी-खूटियां व अन्य सामान इतनी बडी मात्रा मे जमा हो गए हैं इन्हें यहां से हटाना अपने आप मे एक मुश्किल काम है । कूडे कचरे के बारे मे एक बार बछेन्द्रीपाल ने स्वयं कहा था कि साउथ पोल ( 26000 फुट ) पर इतना कूडा एकत्र हो गया है कि उससे एक मकान बनाया जा सकता है ।

आज हालात यह हैं कि आधार कैंप से लेकर एवरेस्ट की चोटी तक, पूरे मार्ग मे जगह जगह कूढे के ढेर दिख जायेंगे । यहां गौरतलब यह भी है कि ठंडे मौसम के कारण यहां कचरा उसी स्थिति मे लंबे समय तक पडा रहता है । समस्या गंभीर होती देख बीच बीच मे कुछ सफाई प्रयास भी किये गये लेकिन उनसे कोई बहुत अधिक लाभ नही मिला । लेकिन अब पानी सर के ऊपर से बहने लगा है । यह जरूरी हो गया है कि इस दिशा मे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्र्यास किये जाएं तथा इस हिमालय क्षेत्र को प्रदूषण मुक्त करने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अभियांन दलों को अनुमति देने की शर्तें और भी  कडा कर दिया जाएं ।  इसके साथ ही अभियानों की संख्या को भी सीमित रखना बेहद जरूरी है । । समय रहते इस ओर गंभीरता से न सोचा गया तो यह हिम शिखर गंदगी का ढेर बन कर रह जायेंगे ।